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Friday, November 23, 2018

Monday, November 19, 2018

Wednesday, October 17, 2018

ये हैं सेकुलजरिम का घिनौना चेहरा । जिनका जिहाद जघन्यता के बिना अधूरा है 

Friday, May 15, 2015

क्यों नहीं चाहिए स्मार्ट अफसर

हमें स्मार्ट सिटी चाहिए, स्मार्ट सरकार, स्मार्ट कार्ड, स्मार्ट फोन, स्मार्ट पत्नी, स्मार्ट क्लास और स्मार्ट टीवी समेत और भी न जाने क्या-क्या स्मार्ट चाहिए। मगर अफसर वही चाहिए। सफारी सूट या तपती धूप में भी गलेबंद टाई, सूट में कैद कांख में फाइल दबाए कोई मुनीम सा। ऐसा क्यों?
छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अफसर और जगदलपुर के जिला कलक्टर अमित कटारिया से राज्य सरकार ने सिविल सर्विस के सिविल कोड की किसी अ, ब, स, द धारा के उपबंध ढिमका के तहत फलां के उल्लंघन का दोषी मानते हुए जवाब तलब किया है। अफसर की चूक सिर्फ इतनी है कि उसने प्रधानमंत्री से मिलते वक्त ब्रांडेड चश्मा और रंगीन चटक शर्ट पहन रखी थी। बेचारे कमअकल अफसर ने भारत की आम आदमी की पहचान बांह से फटी शर्ट नहीं पहनी, अस्पतालों में मिलने वाला मोतियाबिंद ऑपरेशन वाला चश्मा नहीं लगाया था। मोदी के दो घंटे के कार्यक्रम में दो शर्ट भी बदल ली थी। इसलिए अफसर बहुत दोषी है।
न जाने क्यों ये देश नंगों पर ही भरोसा करता है। बाबा, वैराग्य के चोले को ही क्यों मान्यता देता है। हाथी पर बैठकर भीख मांगने वाले को क्यों संत कहता है और पैदल चलकर तल्ख धूप में सब्जी बेचने वाले को ठग्गू क्यों मानता है।
इक्कसवीं सदी में प्रधानमंत्री के सूट पर बवाल, अफसर के ब्रांडेड चश्मे पर सवाल गले में फंस जाते हैं। क्या इस देश को गंगा किनारे के पंडा चलाएं, जो पहनें तो भरोसे का प्रतीक भगवा, मगर ठगी में चंबल के डाकुओं के बाप हों। क्यों किसी अफसर को हम भिनका सा ही देखना चाहते हैं। क्या छत्तीसगढ़ में ही ऐसे अफसर नहीं हैं, जो अरबों की संपत्ति के मालिक हैं, जिनके पैसे स्विस बैंक में जमा हैं। दुबई में इंटरनेशनल कंपनी में भागीदारी है। कइयों मंत्रियों की अकूत संपदा देश-विदेश में है। नसबंदी कांड के दोषी मंत्री अमर अग्रवाल के दामादों की दवा कंपनियों के ही कितने ठेके राज्य के स्वास्थ्य विभाग में हैं। लेकिन वे सामान्य खादी का कुर्ता पहनते हैं, इसलिए हमें ऐतराज नहीं। वे सामान्य पोशाक में आते हैं तो हमें दिक्कत नहीं है। बस कोई स्टाइल में नजर न आए। मजे की बात तो ये है कि समकक्ष और वरिष्ठ अफसर तो वेतन वृद्धि तक रोकने की बात कह रहे हैं। अमित कटारिया कोई दूध के धुले नहीं हैं। मगर इस मामले में आम आदमी उनके साथ है। ऐसे तो युवा अफसर लाॅबी डिमॅरलाइज हो जाएगी। जरा मुक्त रखिए इन्हें बकवासों से। कितने ऊर्जावान हैं छत्तीसगढ़ के युवा अफसर ओमप्रकाश चौधरी, अमित कटारिया, सारांश मित्तर, रजत कुमार, किरण कौशल, सिद्धार्थ कोमल परदेशी। इन्हें यूं डिमॅरलाज न कीजिए।
-सखाजी

Wednesday, May 13, 2015

Review- Parlok Me Satellite

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' हास्य व्यंग्य का जीवंत नायक है। इसके जरिए लेखक ने समाज के हर वर्ग को संबोधित किया है। गहन विज्ञान और मनोविज्ञान का इस्तेमाल नजर आता है। कथानक की शुरुआत ही बुंदेलखंड के एक ऐसे पात्र से होती है, जो अपनी कुर्सी बचाने और उसे जस्टीफाई करने के लिए अपने मातहतों को तौलता रहता है। व्यंग्य सरकारी दफ्तरान में ''साहबवाद'' को भी एड्रेस करता है। सबसे मौजू और महत्वपूर्ण व्यंग्य के भीतर छुपा वह विचार है, जिसमें लेखक दुनियाभर की स्पेस एजेंसियों के अलग-अलग मिशनों पर कटाक्ष करता है। वह यहां सार्वभौमवाद जैसे अतिगंभीर टाॅपिक पर भी पाठक से वार्तालाप सा करता हुआ हास्य अंदाज में चर्चा करता है।
भूखे देश में अरबों रुपये विफल सैटेलाइट पर खर्चने के बाद स्पेस एजेंसी के डायरेक्टर की राजनैतिक खुरफातों का व्यंग्य में जीवंत चित्रण है। गंभीर से गंभीर बात बेहद सरल और हास्य के जरिए ऐसे कर दी गई  है, जैसे पाठक से आमने-सामने तादातम्य बिठाकर बात की जा रही हो।
सैटेलाइट का परलोक से दृश्य भेजना। पृथ्वी के मानव समाज की प्रतिक्रियात्मकता अद्भुत है। कई बातें ऐसी हैं, जिनकी बहुत ढंग से व्याख्या की जा सकती है। कई नये शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। मुद्दों पर विस्तृत राय है।
व्यंग्य दो कारणों से जरूर पढ़े। पहला तो एक संपूर्ण व्यंग्य, जहां कहीं भी आपको गंभीर होने की जरूरत नहीं और एक बार भी बचकाना या हल्कापन नहीं लगेगा। दूसरा कारण इसकी शैली है। पाठक को कहीं भी उलझना नहीं पड़ता। एक पैरा सवाल खड़ा करता तो दूसरा ही पैरा जवाब दे देता है।
व्यंग्य की दो खामियां भी हैं। पहली तो यह अश्लील गालियों से गुरेज नहीं करता दूसरी इसमें किसी तरह की व्यावसायिकता की परवाह नहीं की गई। इससे प्रकाशक खोजने में दिक्कत हुई। वहीं  इतनी स्पष्टवादिता बरती गई है, कि कोई भी सरकारी पुस्तकालय इस विस्फोटक को अपने यहां रखने से भी गुरेज कर रहा है।

Tuesday, May 12, 2015

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' अब notnul.com के साथ pothi.com पर भी

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' अब notnul.com के साथ  pothi.com पर भी।
http://pothi.com/pothi/preview?pFile=51294#preview-top

Wednesday, October 17, 2012

कब निखरेगा ये बछड़ा

किसान अपने बछड़े को बैल बनाने से पहले दो युक्तियां करता है। पहली तो मैं बता नहीं सकता दूसरी निखारने की। इसके लिए वह नाथ डालकर बछड़े को बलात बैलगाड़ी में लगाकर खेतों में घुमाता है। पूरा गांव उस गाड़ी के पीछे मजे करता घूमता है। खासकर बच्चे। और जब बछड़ा नहीं निखरता तो दूसरी युक्ति के रूप में उसके गले पर बेवजह एक लकड़ी डाल दी जाती है, ताकि उसकी आदत है। तब भी नहीं निखरता तो बछड़े को खेत में गहरे हल गड़ाकर निखारा जाता है। और फिर भी नहीं निखरा तो किसान उसे गर्रा कहकर बेचने की कवायद में जुट जाता है। और कई बार वह कसाइयों के हात्थे भी चढ़ जाता है। मोरल ऑफ द स्टोरी श्रमवीर, कर्मवीर बनो वरना कसाई के चाक पर गर्दन रखो। संसार कहता है कर्म करो या मरो।
ऐसा ही राहुल बाबा के साथ सोनिया कर रही हैं। उन्हें 25 साल के बाद तो निखारने के लिए मना पाईं। फिर लोकसभा के आम चुनाव 2009 में नाथ डाली गई। पहला काम जो किसान करता है वह तो शादी के इतने लेट होने से अपने आप हो गया। (एक विधि से किसान बछड़े का मर्दानापन कम करता है)। फिर उन्हें रिएक्टिवेट करके बैलगाड़ी में नुहाया (लगाया) गया। यानी महासचिव बनाया गया। फिर भी नहीं निखरे तो यूपी में प्रपंच करवाया गया। फिर भी नहीं निखर रहे तो अब सोनिया उन्हें केबिनेट में लाने की तैयारी में हैं। पीएम सीधे न सही तो बेटा केबिनेट में अंकल लोगों से कुछ सीखकर बिजनेस में हाथ बटा। मगर राहलु बाबू हैं कि चिगते (हिलते) ही नहीं है। अब किसान करे तो क्या। कसाई को बेचेगा तो भगवान मार डालेंगे, नहीं तो जिंदगीभर खिलाएगा तो बोझ पड़ेगा। और फिर बछड़ा बड़ा होकर दो लाइन में किसी एक में जाता है, पहली तो किसान के साथ बैल बन कर सालों सेवाओं के बाद ससम्मान सेवनिवृत्ति की तरफ जाती है। कुछ-कुछ आदमी के नौकरी करने जैसा। और दूसरी लाइन सांड बनने की होती है, यह रिस्की है किंतु मजेदार है। इसमें भी एक लाभ है अगर सांड के रूप में आपकी पोस्टिंग गांव में हुई तब तो लोग पूज भी सकते हैं और पेट भी पाल लेंगे, लेकिन अगर शहर में हुई तो समस्या होगा, यहां तो सब्जियों के ठेलों पर लट्ठ ही मिलते हैं। और गाहेबगाहे मौका मिलते ही सकाई भी लपक सकते हैं। अब राहुल बाबा को सोनिया सियासी सेवानिवृत्ति तो देंगी नहीं। केबिनेट में और लाकर देखती हैं, अगर वे सुबह जल्दी उठकर मंत्रालय (मनी फैक्ट्री) जाने लगे तो ठीक वरना फिर किसान को खेती के लिए अपनी दूसरी बछिया पर निर्भर रहना पड़ेगा, वह खेतों में जा नहीं सकेगी तो फिर कौन बचा.....वा.......ड्रा ! वरुण के सखाजी

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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