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Monday, April 28, 2008

हम साथ साथ हैं

पिछली २५ तारीख को विश्वविद्यालय का पुरस्कार वितरण समारोह था । जिसमें प्रायोजित रूप से एक प्रतिष्ठित विभाग की बड़ी धूम रही । लेकिन फिर भी शायद जितना यादगार दिन ये केव्स के लिए था उतना किसी के लिए भी नही होगा । और शायद २५ अप्रैल ने सबसे बड़ा इनाम भी हमारे विभाग को ही दिया । "संगठन का इनाम"

ये वह दिन था जिसकी सूचना विभागीय प्रतिष्ठा के प्रश्न के रूप मे हमे मिली थी, हमेशा की तरह देर से। वह भी कुछ स्वयम्भू प्रतिभावान लोगों की मेहरबानी से। जैसे सारी प्रतिभा भगवान् ने उन्ही में भर दी और हम लोग निठल्ले रह गए।

केव्स जिसे कबरतिन का भक्त समझा जाता था । सिर्फ़ भागीदारी को महत्त्वपूर्ण मानने वाला विभाग। लेकिन इस टाइप कास्ट इमेज से केव्स अब ऊबने लगा था। सबके दिल में गर्मी थी कुछ कर दिखाने की । अंगारे थे स्वयं सिद्धि के। यह अंगारे हवा चाहते थे , पर अंगारों के मुहाने पर फूँक मार कर अपना मुह कौन जलाये ? यह जिम्मा लिया मयंक सर ने।

फ़िर तैय्यारियां शुरू हुई । क्यूंकि इस बार हमे भागीदारी के लिए नही , बल्कि जीतने के लिए खेलना था.पूरा केव्स एकजुट हुआ , न कोई सीनियर , न कोई जूनियर , em न बीजे । बस केव्स ......

लगातार, बार बार कोशिश जारी थी । सब अधीर थे अपने माथे पर लिखे उस "निकम्मे" के टीके को मिटाने के लिए। मयंक सर कुछ ज्यादा ही। तभी गुस्सा भी हो जाते थे । लेकिन अगले ही पल पुचकार लेते थे। हम अपना प्रदर्शन तो सुधार ही रहे थे साथ ही साथ दूसरों को भी मनोबल दे रहे थे। खास कर विजय सौरभ प्रशांत मे मैंने एक महान प्रतिबद्धता देखी। लेकिन हमलोग के पास जज्बे के अलावा कुछ नही था तो चीज़ें ठीक नही हो रही थी । न ब्लोकिंग न संवाद । लेकिन विश्वास था की उस दिन सब ठीक होगा।

आख़िर वह दिन भी आया। बिना कुछ खाए पिए हम स्टेज पर पहुच गए। और कुछ ही देर में इम्तेहान शुरू हुआ । हमने स्टेज की कॉपी पर उत्तर देना शुरू किया । हम सब एक दूसरे के लिए उत्तर लिख रहे थे क्यूंकि सबकी यही कामना थी की की दूसरा व्यक्यी अपने संवाद सही बोले। विजय रिहर्सल मे अलख जगे बोलता था , जब उसकी बारी आई तो सबके कान खड़े थे लेकिन उसने बिल्कुल सही बोला । ऐसा ही कुछ प्रशांत ने भी किया । सब खुश थे , इसी जज्बे ने केव्स को बाँध रखा था ।


आख़िर प्ले पूरा हुआ । हर चीज़ परफेक्ट थी। सबके अन्दर एक ही दिल धड़क रहा था । और एक ही आवाज़ "हमने कर दिखाया "

मैं ज़िंदगी में बहुत बार स्टेज पर चढा और उतरा हूँ , पर उस दिन का अनुभव वाकई स्पेशल था। वह दिन एक यादगार दिन रहेगा क्यूंकि उस दिन मैंने एकत्व को न केवल समझा बल्कि महसूस भी किया ..........काश ! ये भावना बनी रहे ।

"मुमकिन हैं आसान हो ये सफर , कुछ दूर साथ चल कर देखें

थोड़ा तुम बदल कर देखो , थोड़ा हम बदल कर देखें ।"

1 comment:

  1. मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर

    लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

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