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Wednesday, April 30, 2008

लम्हे ...

एक वो लम्हा था, एक ये लम्हा है.....

वो भी क्या संसार था,

जहा माँ का प्यार था,

आंखो मे उसके ममता थी,

और हाथो मे दुलार था,

कभी डांटना मुझको गुस्से से,

फ़िर सहलाना मेरे बालो को,

देख पसीना चेहरे पर,

पोछ्ना आकर गालों को,

सोचता हू उस कल के बारे मे,

तो लगता है की ये आज कितना तन्हा है......

एक वो लम्हा था,एक ये लम्हा है......

एक सुंदर सी प्यारी बहना है मेरी,

बस नही चलता मेरा उसकी शरारती यादों पर,

चाही अनचाही कहा सुनी के साथ,

एक धागा रोज महसूस करता हू हाथो पर,

कभी छोड़ना उसको सहेली के घर,

फ़िर फिक्र करना उसकी शामो सहर ,

सोचता हू उस कल के बारे मे,

तो लगता है की ये आज कितना तन्हा है.....

एक वो लम्हा था,एक ये लम्हा है.....

मकरंद काले

cavs

जयहिंद सर
आपने मूझे इस ब्लाग पर लिखने के लिए आमंत्रित किया उसके लिए धन्यबाद ।

महाशय आपकों बहुत बहुत धन्यबाद जो आपने मुझे एक नई तकनीक से परिचय कराया समय मिलने पर मै जरुर लिखता रहूंगा अतः मेरी तरफ से आपको sahriday dhanyavaad

क्या बात है !!

दरअसल यह हमारे नए स्तम्भ का नाम है। इस नए स्तम्भ में हम अपने ब्लॉग के साइड बार में इस शीर्षक के अंतर्गत नियमित रूप से कुछ मजेदार, प्रेरक, चुटीले और चर्चित कथन या उक्तियाँ प्रकाशित करेंगे। हमेशा की तरह हम विश्वास करते हैं कि आप इसे सराहेंगे।

Tuesday, April 29, 2008

रावण वध

भारतीय हाकी की विजयादशमी के पर्व की आप सभी को केव्स परिवार की ओर से बधाई !



भारतीय ओलंपिक संघ के लिए बस यही
देर आए पर दुरुस्त आए ....... या फिर देर लगी आने में तुमको, शुक्र है फिर भी आए तो !!

खेल से खिलवाड़

मुझे क्रिकेट मे कैरियर बनाना है।
बस बल्ला ही तो घुमाना है।

राष्ट्रीय खेल न सही पर इसी का ज़माना है।
कौन सा मुझे ओलमपिक खेलने जाना है।

वैसे भी हॉकी मे बड़ी मारा मारी है।
पैसे देकर खेलने की आती बारी है।

अच्छे खिलाड़ी मुफलिसी मे जीते हैं
और जोड़-तोड़ वाले मेज़ से घी पीते हैं।

गिल को गिला नहीं खेल कहीं भी जाए।
ऐसे हालत मे और किया भी क्या जाए।

कोई ज्योतिकुमारन जब तक इसकी सेवा करेगा।
अपना राष्ट्रीय खेल यूही तिल-तिल मरेगा।

फिर किसी और पर दोष मढ़ दिया जाएगा।
कुछ को निकाल कर पल्ला झाड़ लिया जाएगा।

- तन्जीर अंसार ( एम् ऐ बी जे - चतुर्थ सेमेस्टर )

Monday, April 28, 2008

हम साथ साथ हैं

पिछली २५ तारीख को विश्वविद्यालय का पुरस्कार वितरण समारोह था । जिसमें प्रायोजित रूप से एक प्रतिष्ठित विभाग की बड़ी धूम रही । लेकिन फिर भी शायद जितना यादगार दिन ये केव्स के लिए था उतना किसी के लिए भी नही होगा । और शायद २५ अप्रैल ने सबसे बड़ा इनाम भी हमारे विभाग को ही दिया । "संगठन का इनाम"

ये वह दिन था जिसकी सूचना विभागीय प्रतिष्ठा के प्रश्न के रूप मे हमे मिली थी, हमेशा की तरह देर से। वह भी कुछ स्वयम्भू प्रतिभावान लोगों की मेहरबानी से। जैसे सारी प्रतिभा भगवान् ने उन्ही में भर दी और हम लोग निठल्ले रह गए।

केव्स जिसे कबरतिन का भक्त समझा जाता था । सिर्फ़ भागीदारी को महत्त्वपूर्ण मानने वाला विभाग। लेकिन इस टाइप कास्ट इमेज से केव्स अब ऊबने लगा था। सबके दिल में गर्मी थी कुछ कर दिखाने की । अंगारे थे स्वयं सिद्धि के। यह अंगारे हवा चाहते थे , पर अंगारों के मुहाने पर फूँक मार कर अपना मुह कौन जलाये ? यह जिम्मा लिया मयंक सर ने।

फ़िर तैय्यारियां शुरू हुई । क्यूंकि इस बार हमे भागीदारी के लिए नही , बल्कि जीतने के लिए खेलना था.पूरा केव्स एकजुट हुआ , न कोई सीनियर , न कोई जूनियर , em न बीजे । बस केव्स ......

लगातार, बार बार कोशिश जारी थी । सब अधीर थे अपने माथे पर लिखे उस "निकम्मे" के टीके को मिटाने के लिए। मयंक सर कुछ ज्यादा ही। तभी गुस्सा भी हो जाते थे । लेकिन अगले ही पल पुचकार लेते थे। हम अपना प्रदर्शन तो सुधार ही रहे थे साथ ही साथ दूसरों को भी मनोबल दे रहे थे। खास कर विजय सौरभ प्रशांत मे मैंने एक महान प्रतिबद्धता देखी। लेकिन हमलोग के पास जज्बे के अलावा कुछ नही था तो चीज़ें ठीक नही हो रही थी । न ब्लोकिंग न संवाद । लेकिन विश्वास था की उस दिन सब ठीक होगा।

आख़िर वह दिन भी आया। बिना कुछ खाए पिए हम स्टेज पर पहुच गए। और कुछ ही देर में इम्तेहान शुरू हुआ । हमने स्टेज की कॉपी पर उत्तर देना शुरू किया । हम सब एक दूसरे के लिए उत्तर लिख रहे थे क्यूंकि सबकी यही कामना थी की की दूसरा व्यक्यी अपने संवाद सही बोले। विजय रिहर्सल मे अलख जगे बोलता था , जब उसकी बारी आई तो सबके कान खड़े थे लेकिन उसने बिल्कुल सही बोला । ऐसा ही कुछ प्रशांत ने भी किया । सब खुश थे , इसी जज्बे ने केव्स को बाँध रखा था ।


आख़िर प्ले पूरा हुआ । हर चीज़ परफेक्ट थी। सबके अन्दर एक ही दिल धड़क रहा था । और एक ही आवाज़ "हमने कर दिखाया "

मैं ज़िंदगी में बहुत बार स्टेज पर चढा और उतरा हूँ , पर उस दिन का अनुभव वाकई स्पेशल था। वह दिन एक यादगार दिन रहेगा क्यूंकि उस दिन मैंने एकत्व को न केवल समझा बल्कि महसूस भी किया ..........काश ! ये भावना बनी रहे ।

"मुमकिन हैं आसान हो ये सफर , कुछ दूर साथ चल कर देखें

थोड़ा तुम बदल कर देखो , थोड़ा हम बदल कर देखें ।"

Saturday, April 26, 2008

छा गया केव्स ......!!


विश्वविद्यालय में शुक्रवार दिनांक २५ अप्रैल २००८ को वार्षिकोत्सव प्रतिभा का भव्य समापन समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर एक ओर जहाँ छात्रों ने अनेक रंगारंग प्रस्तुतियां दीं वहीं प्रतिभा २००८ के दौरान विभिन्न प्रतियोगिताओ में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्रों को पुरस्कार प्रदान किए गए। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय एवं विभाग के सदस्यों के अलावा विशिष्ट अतिथियों के रूप में लोक सभा चैनल की पूर्व मुख्य संपादक वर्तिका नंदा तथा स्टार न्यूज़ की प्रसिद्ध एंकर शाजिया इल्मी भी उपस्थित थी।


कार्यक्रम में सारे विभागों ने सराहनीय व मनोरम प्रस्तुतिया दे कर सबका मन मोह लिया। द्रश्य श्रव्य अध्ययन केन्द्र के छात्रों द्वारा दी गई प्रस्तुतियां दर्शको की तालियाँ और समीक्षकों की सराहना दोनों लूटने में सफल रहीं। द्रश्य श्रव्य अध्ययन केन्द्र के karyakram रहे,


  • भजन - सौरभ मिश्रा ( राधे रानी .... )

  • रूपक मंचन - 'पत्रकारिता- कल से कल तक ' ( सौरभ जैन, सौरभ मिश्रा , मौली, प्रियंका, सुयश, शुभम, महेश सिंह, हिमांशु बाजपयी, विजय गुप्ता, पूजा मिश्रा, सिमी, अंकुर, प्रतीति पाण्डेय, नेहा, प्रशांत, अखिलेश, रंजीत, तन्जीर, देविका, मयंक )

  • समूह गान - सिमी, मकरंद, मयंक, मीनू, सौरभ, ललिता ( आसमा के पार ..... )

  • गीत - मकरंद काले ( ज़िंदगी मौत न.... )

यही नही इसके अलावा विभाग के छात्रों को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया


प्रतिभाओं के आकाश में छा जाने के लिए आप सभ को CAVS संचार की ओर से हार्दिक बधाई !!


Thursday, April 24, 2008

तिब्बत पर हमारी पहल ...



काफ़ी दिन से महसूस किया जा रहा था और हमारे साथी चाहते थे कि तिब्बत पर हम कुछ करें तो हम ने यह निर्णय लिया है कि हम रोज़ तिब्बत की जंग ऐ आजादी से जुड़ी तसवीरें ब्लॉग पर प्रकाशित करेंगे .....तो रोज़ एक नई तस्वीर क्यूंकि एक तस्वीर हज़ार अल्फाज़ को बयां करती है !!


जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी


( माँ और मातृभूमि सबसे बढ़कर हैं ....)


अगर ऐसा ना होता तो क्यों भिक्षु जंग ऐ आजादी में कूद पड़ते ?


क्या आप तिब्बत पर हमारा और तिब्बतियों का समर्थन करते हैं ?


हमें ई मेल करें


cavssanchar@gmail.com


तिब्बत से जुड़ी तसवीरें देखने के लिए साइड बार में " मेरा तिब्बत वापस दो" देखें !!


केव्स प्रणाम !

Monday, April 21, 2008

जूनून ऐ आजादी

यह तस्वीर उस संघर्ष का प्रतीक है जो पिछले ६० सालो से चल रहा है अपने मातृभूमि तिब्बत के लिए और इसकी मशाल उन लोगो के हाथ मे है जिनका जन्म भी तिब्बत मे नही हुआ। इतने सालो मे न जाने कितने पड़ाव आए लेकिन तमाम मुश्किलात के बाद भी प्रतिरोध की ज्वाला शांत नही हुई है। फ्रांस से भारत तक इस तरह के प्रदर्शन शायद उनकी जिजीविषा को ही दिखाते है।


''पराधीन सपनेहु सुख नाही ''

मिलेगी परिंदों को मंजिल एक दिन ............

''मुमकिन है की कुछ पलों के लिए राह में मुश्किलें आयें
पर वही हौसलामंद हैं जो उन्हें हँसते-खेलते पार कर जायें"

कैव्स मेरे लिए मसीहा साबित हुआ। इस माध्यम से मैंने वो सीखा जो शायद सिखाना किसी और के बस की बात नही थी। अभी भी बहुतों की ज़िंदगी को किनारा नही मिला है पर पूरी उम्मीद है की हमारी मेहनत और लगन अपना असली रंग दिखला पायेगी। मैं अपने सभी साथियों की अपार सफलता की तहे दिल से दुआ करती हूँ।

जिंदगी में हमेशा वो ही सफल होते हैं जो दूसरों से जलने और उनके काम में ताक़ झांक करने की जगह अपने पर विशवास रखते हैं साथ ही अपने कर्तव्य को पूरी लगन और निष्ठा से निभाते हैं। उम्मीद है की हम सब इस बात पर गौर करेंगे और अपनी ज़िंदगी के इन सिद्धांतों पर अमल कर पायेंगे।

Saturday, April 19, 2008

c.a.v.s. के प्लेसमेंट

प्राप्त सूचना के अनुसार रश्मि मैडम (m.a. b.j.-4 sem)की नियुक्ति महिलाओ पर आधारित भारत के प्रथम टीवी चैनल फोकस टीवी मे हो गया है। साथ ही साथ आप लोगो को यह भी याद होगा की श्रुति तैलंग मैडम (m.a. b.j.-4 sem) भी इस समय my f.m.(bhopal) मे R.j. के पद पर कार्य कर रही है। c.a.v.s. परिवार इन लोगो के उज्जवल भविष्य की कामना करता है।

26 को होगा ETV Campus !


सभी सीनियर छात्रों के लिए विशेष सूचना है कि विश्वविद्यालय परिसर में २६ अप्रैल २००८ को ETV मध्य प्रदेश की कैम्पस रिक्रूटमेंट परीक्षा का आयोजन किया गया है, उपरोक्त परीक्षा के लिए चतुर्थ सेमेस्टर एवं उत्तीर्ण सभी छात्र पात्र हैं। कैम्पस में बैठने के इच्छुक छात्र प्लेसमेंट अधिकारी श्री अविनाश बाजपेयी से ०९४२५३९२४४८ पर सम्पर्क कर लें एवं २६ अप्रैल को परिसर में उपस्थित रहे।

ज्ञात हो की इस परीक्षा में चयनित छात्रों के लिए अन्तिम परीक्षा देने संबंधित कोई बाध्यता नहीं है, वे अन्तिम सेमेस्टर की परीक्षा देने के ई टीवी की ओर से स्वतंत्र हैं। २६ अप्रैल को प्राथमिक दौर में चयनित छात्रों का २९ अप्रैल को अन्तिम साक्षात्कार होगा।

सम्पर्क

श्री अविनाश बाजपेयी - 09425392448


Thursday, April 17, 2008

उत्तर प्रदेश उपचुनाव में बसपा का दबदबा

उत्तर प्रदेश मे १२ अप्रैल को सम्पन हुए विधान सभा की तीन और लोक सभा की दो सीटो के लिए हुए मतदान मे बसपा ने अपना परचम लहरा दिया है। लोस की दो सीटो -खलीलाबाद और आजमगढ़ और विस की तीन सीटो -मुरादनगर ( गाजियाबाद ),बिलग्राम ( हरदोई ) और करनैलगंज ( गोंडा ) मे बसपा प्रत्यासियो ने एकतरफा जीत हासिल की। बिलग्राम सीट बसपा विधायक की मौत कर कारण जबकि बाकि दोनों सीटे जीते विधायक के सत्ताधारी दल मे शामिल होने के बाद इस्तीफा देने के बाद खाली हुई थी। दोनों संसदीय सीटे सांसदों के दल बदल के कारण उनकी सदयस्ता रद्द होने पर खाली हुई थी। बिलग्राम ( हरदोई ) सीट पर रजनी तिवारी ने ३८०००मतों से सपा प्रत्याशी को हराया .मुरादनगर ( गाजियाबाद) और करनैलगंज ( गोंडा ) सीट पर भी बसपा प्रत्याशियों ने कम से कम १०००० मतों से जीत हासिल की। खलीलाबाद मे ६४००० और आजमगढ़ मे ५४००० मतों से सपा और भाजपा को बसपा ने पटखनी दी। इस जीत के बाद विस मे बसपा विधायको की संख्या २१५ हो गई है। लोस मे सदस्यों की संख्या १९ ही रह गई है।
ख़बर कर लिए लिंक करे-http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_4364456/

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं ......

२१ अप्रैल को शायर- ऐ- इंकलाब , अल्लामा इकबाल साहब की वफात का दिन होता है ...........वही इकबाल साहब जिन्होंने दुनिया को बताया था की उर्दू शायरी सिर्फ़ माशूका के पुरनम दामन में महसूस होने वाली मुअत्तर बाद-ऐ-सबा नही, सिर्फ गुलो-बुलबुल की तसव्वुराती दास्ताँ नही , सिर्फ़ रिन्दों का शिकवा-ओ-छेड़ नही, ...........उसके आगे भी एक मुसलसल रिवायत-ऐ-सुखन है,वह आवाम को नींद से जगा सकती है .......मुखतलिफ कौमों में इख्तेलात पैदा कर सकती है, मुल्क की कदमबोसी कर सकती है, और वक्त की पाबंदियों से भी आगे जा सकती है ।


सितारों से आगे जहाँ और भी है
अभी इश्क के इम्तेहां और भी हैं

तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा
तेरे लिए आसमाँ और भी हैं

गए दिन की तनहा था मैं अंजुमन में
यहाँ अब मेरे राजदाँ और भी हैं


हिमांशु बाजपेयी "हिम"

Monday, April 14, 2008

बधाई ....



आज हिन्दू मान्यता के अनुसार भगवान् श्री राम की जन्मतिथि अर्थात रामनवमी है और साथ ही साथ संविधान के जन्मदाता और दलित नेता - चिन्तक डाक्टर भीमराव अम्बेडकर की भी जयंती है, सो इस अवसर पर CAVS संचार परिवार की ओर से आप सभी को बधाई .........
आशा है कि निश्चित रूप से हम श्री राम के चरित्र से मर्यादा, संकल्प बद्धता सत्य और साहस तथा डाक्टर अम्बेडकर के जीवन से दृढ़ निश्चय और परिश्रम का सबक लेंगे ......!!



सोने का पिंजरा

( अभी भड़ास नाम के एक मशहूर ब्लॉग पर एक पत्रकार का ई टीवी का अनुभव पढ़ा और कुछ कटु सत्यो से दो चार हुआ ... तो लगा यह बात सब तक पहुचानी चाहिए ....... सो पेश है ! )

ईटीवी में नौकरी करना बड़ा कठिन काम है। बस यूं समझ लीजिए कि आपको जंजीरों से जकड़ कर सोने के पिंजरे में डाल दिया गया है. रामोजी फिल्म सिटी किसी हसीन वादी से कम नहीं है. कई बार इसे एशिया की बेहतरीन फिल्म सिटी का अवार्ड मिल चुका है. सो मैंने इसे सोने का पिंजरा नाम दिया है. जहां आपकी जंजीरें एक निश्चित समय के बाद ही खुलेंगी. ऐसे मौके तो बहुत मिलते हैं कि आप खुद से उन जंजीरों को तोड़ कर बाहर आ जाएं. लेकिन तब आपकी हालत लुटी पिटी सी होती है. जी हां मेरी भी कुछ ऐसी ही है. मेरी ही क्यों ऐसी हिमाकत करने वाले सैकड़ों लोग लुटे पिटे से हैं. इतना कुछ खो जाने के बाद संभलने में काफी समय लगता है. खासकर दिमागी तौर पर आप हमेशा परेशान रहते हैं. मैं कोई पहेली नहीं बुझा रहा. ईटीवी में ट्रेनी से शुरूआत करने वाले मेरी व्यथा समझ गए होंगे. चलिए आपको भी विस्तार से व्यथा की कथा बता ही दूं ....लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद मेरा सेलेक्शन ईटीवी में हो गया. खुशी हुई कि अब अमर उजाला छो़ड़कर टीवी पत्रकारिता की शुरूआत करुंगा. लेकिन इसके लिए तीन साल का बॉन्ड भरवाया गया. बॉन्ड में साफ साफ लिखा था, एक साल के अंदर अगर आपने नौकरी छोड़ दी तो आपको एक लाख रुपये भरने होंगे. दूसरे साल नौकरी छोड़ने पर 75 हजार रुपये और तीसरे साल नौकरी छोड़ने पर 50 हजार का जुर्माना देना होगा. जब हैदराबाद पहुंचा तो ज्वाइनिंग से पहले सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट जमा करा लिए गए. भारी मन से पांच हजार की नौकरी के लिए सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट जमा करा दिए. काम शुरू कर दिया लेकिन जोर का झटका काफी जोर से लगा. यहां कोई विजुअल एडीटर नहीं था. ट्रेनी से लेकर कॉपी एडिटर तक सभी विजुअल एडीटर थे. एक आदमी एंकर लिखता था वो भी स्ट्रिंगर्स की खबरों में का, के, की और मात्रा की अशुद्धि ठीक कर देने भर से अपनी ड्यूटी पूरी कर लेता था. महज कुछ लोग ऐसे थे जो नए सिरे से एंकर लिखने की जहमत उठाते थे. समझ नहीं पा रहा था कि इस नौकरी का क्या करूं. बॉन्ड इसलिए भरा था कि तीन साल में इलेक्ट्रानिक मीडिया की अच्छी खासी समझ हो जाएगी. लेकिन यहां तो विजुअल एडिटिंग के सिवाय लिखने का काम नाम मात्र का ही था. हालांकि दिन भर मे एक पैकेज लिखने का मौका तो मिल जाता था. लेकिन अफसोस, सीनियरों से दिखाने पर बिनी एक शब्द काटे पैकेज ओके हो जाता था. ऐसा बिल्कुल नहीं था कि मैं बहुत अच्छा लिखता था. ऐसा हर किसी के साथ होता था. यानि आप जो लिखते हैं सभी सही है.एक साल बाद कॉपी एडिटर का ओहदा मिला. इसे विजुअल एडिटर का नाम दिया जाता तो जस्टीफाइ होता. सबसे बेहतर कॉपी एडिटर वह होता था जो विजुअल में जर्क नहीं भेजता था. कई इफेक्ट के साथ पैकेज बनाता था. कमबख्त समय का मारा मैं भी एक बेहतर कॉपी एडीटर बन गया. कहना जरूरी नहीं कि एक बेहतर विजुअल एडीटर बन गया. डेढ़ साल होते होते समय काटना मुश्किल हो गया. हर किसी का प्रोफेशनल लाइफ बर्बाद हो रहा था क्योंकि कलम की ताकत खत्म हो रही थी. कई तो इसी में खुश थे. और ईटीवी को जर्नलिजम की स्कूल मानने लगे थे. जहां पत्रकारों की उपज होती है. ऐसा शायद ही कोई था जिससे विजुअल एडिटिंग नहीं कराई जाती थी. शायद डेस्क इंचार्ज ऐसा नहीं करते थे. लेकिन ज्यादातर डेस्क इंचार्ज ऐसे थे जो पहले कॉपी एडिटर थे. मतलब साफ है विजुअल एडिटर थे. ईटीवी की एक और खासियत थी. किसी विजुअल में जर्क ऑन एयर हो जाने पर या फिर बाइट में प्री रोल पोस्ट रोल नहीं होने पर कॉपी एडिटर की क्लास लगती थी. ये क्लास कोई और नहीं ईटीवी के सीनियर मैनेजर लेते थे. है न मजे की बात. मैनेजर डेस्क इंचार्ज को कहता था अमुक व्यक्ति ने गलती की है मेरे पास भेजिए.इन सब चीजों से परेशान हो कई लोग मौका देख नौकरी छोड़ रहे थे. लेकिन सबकी अब तक की जमा पूंजी यानि कि ऑरिजनल सर्टिफिकेट यहीं फंसे रहे. नौकरी छोड़ने पर लीगल नोटिस भेजा जाता था. कई लोगों ने डरकर पैसे दिए और सर्टिफिकेट लेकर चैन की सांस ली. लेकिन अभी भी दर्जनों लोग ऐसे हैं जिनके सर्टिफिकेट सोने के पिंजरे(रामोजी फिल्म सिटी) में बंद है. मैंने भी हिम्मत करके नौकरी छोड़ दी और लाइव इंडिया ज्वाइन कर लिया. लेकिन मुश्किल और भी बढ़ गई है. सारे सर्टिफिकेट वहीं फंसे हैं. रिजाइन देने के बाद लीगल नोटिस भेजा गया कि, आपने बॉन्ड ब्रेक किया है इसिलिए पैसे चुकाएं. बात सिर्फ इतनी नहीं है पीएफ के पैसे भी फंसे हैं. बार बार धमकी भरा पत्र आता है कि आप सेटलमेंट कर लो नहीं तो कोर्ट में घसीटे जाओगे. और लोगों की तरह मैं भी इंतजार में हूं जब कोर्ट में मामला जाएगा तो देखेंगे. लेकिन इस बीच बॉन्ड भरने के दौरान साक्षी बने मेरे एक रिश्तेदार को भी धमकी भरा पत्र मिला कि सारे पैसे उनसे वसूले जाएंगे.

कौशल

असल पोस्ट पर जाएं ... ( http://bhadas.blogspot.com/2008/04/blog-post_14.html )

भूल गए न .....





कल थी १३ अप्रैल और हम सब एक बार फिर कुछ भूल गए ..... कल के ही दिन १९१९ में जलियांवाला बाग़ में कातिल डायर के हाथों सैकडो निर्दोषों की जान गई थी कुछ याद पडा ? खैर कोई बड़ी बात नहीं हैं क्यूंकि अब यह आम बात हैं दरअसल फ़िल्म अभिनेताओ के जन्मदिन याद रखते रखते अब हम ये सब छोटी मोटी बातें भूलने लगे हैं ...


पर माफ़ी चाहूँगा कि मैंने जुर्रत की याद दिलाने की पर अब याद आ ही गई हैं तो भगत सिंह की डायरी से कुछ , यह कविता भगत सिंह ने जतीन दा की मृत्यु पर पढी थी, जिसके लेखक यू एन फिग्नर थे,


जो तेजस्वी था वह धराशायी हो गया


वे दफ़न किए गए किसी सूने में


कोई नहीं रोया उनके लिए


अजनबी हाथ उन्हें ले गए कब्र तक


कोई क्रोस नही


कोई शिलालेख नहीं बताता उनका गौरवशाली नाम


उनके ऊपर उग आई है घास ,


जिसकी झुकी पत्ती सहेजे है रहस्य


किनारे से बेतहाशा टकराती लहरों के सिवा


कोई इसका साक्षी नहीं


मगर वे शक्तिशाली लहरें


दूरवर्ती गृह तक विदा संदेश नहीं ले जा सकती ........



कुल मिला हम आगे भी शायद इनका बलिदान याद नहीं रखने वाले हैं जब तक कि याद न दिलाया जाए ! खैर कुछ लोग हमेशा इस याद दिलाने के काम में लगे रहेंगे .....


धन्यवाद महान नेताओं को


जागरूक मीडिया को


सेवक समाज सेवियो को


साम्यवादी कलाकारों को


देशभक्तों को परदे पर उतारते फ़िल्म कलाकारों को


बुद्धिजीविओं को


विद्वानों को


हम सबको


जो आज का दिन भूल गए


ठीक ही है .....


जब सामने मरता आदमी नहीं दिखता


तो वो तो बहुत पहले मर चुके !!


जलियावाला बाग़ में आज के दिन १९१९ में रोलेट एक्ट का विरोध करने एक आम सभा में करीब २० हज़ार लोग इकट्ठा हुए थे ........ दिन था फसलों के त्यौहार बैसाखी का ...... बाग़ से निकलने के इकलौते रास्ते को बंद करवा कर पंजाब के लेफ्टिनेंट माइकल ओ डायार ने १६५० राउंड फायर करवाए ....निर्दोष औरत, बच्चे , बूढे, और पुरूष क़त्ल...............१५०० घायल !!!


भूल गए


हो गई गलती .....


आख़िर कहाँ तक याद रखें ....!


मार्च १९४० में उधम सिंह ने डायर की लंदन में हत्या की ..... मकसद था जलियावाला का बदला लेना फांसी दिए जाने पर उधम सिंह ने कहा,


" मुझे अपनी मौत का कोई अफ़सोस नहीं है। मैंने जो कुछ भी किया उसके पीछे एक मकसद था जो पूरा हुआ ! "


पर हम भूल गए क्या कोई मकसद है हमारे पास ?????


सोचना शुरू करिये ....... आख़िर आप सब भावी पत्रकार हैं !


सुनहरे भविष्य की शुभकामनाएं !!!



मयंक सक्सेना


mailmayanksaxena@gmail।com

Saturday, April 12, 2008

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं .....

अच्छा लग रहा है यह देख कर कि इस प्रयास की प्रशंसा हो रही है पर अभी आगाज़ है ...... इस ब्लॉग का मकसद कोई प्रशंसा या प्रसिद्धि पाना नही है क्यूंकि हम सब के पास उसके कई तरीके हो सकते हैं जो आसान भी हैं ..... मकसद है अन्दर का उबाल बाहर लाना पर रचनात्मक रूप में, रचनात्मकता को मरने से बचाना और हम सबको करीब और करीब करना सो मैं गुजारिश करता हूँ कि सब इससे जुड़े , जो पहले से से जुड़े हैं वो विभाग के और लोगों तक बात पहुँचाये, उनको प्रेरित करें इस ब्लॉग से जोड़े !
हम सब यह चाहेंगे कि इस से हमारे सारे साथी विभाग के सारे लोग वर्तमान, भूतपूर्व और अभूतपूर्व सब जुड़े .... आख़िर सवाल विभाग की इज्ज़त का है ! तो साथियो हाथ में हाथ और एक ही बात कि ब्लॉग पर रोज़ अगर ५ पोस्ट भी ना आये तो ब्लॉग कैसा ? तो अपनी तलवारे मेरा मतलब कलम उठाओ और लिख डालो कुछ नई कहानियाँ जो दुनिया ना सही ख़ुद को ही बदल डालें .....

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आग मेरे दिल में ना सही, आग तेरे दिल में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए

सदस्यता के लिए अपन अपरिचय और ई मेल आईडी हमें भेजे इस पते पर
cavssanchar@gmail.com

जय हिंद
केव्स प्रणाम

आपका
मयंक सक्सेना

ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे ............

आइन्दा २० तारीख को मशहूर शायर और हिन्दी फिल्मों के लिए सबसे शीरीं नगमात लिखने वाले मरहूम शकील बंदायूनी साहब को दुनिया से रुखसत हुए ३८ साल मुक़म्मल हो जाएँगे !!! इस जज्बाती मौके पर cavs संचार उन्हें सलाम करता है,,,,,,,,,,,,,

शकील साहब की पैदाइश उत्तर प्रदेश के बन्दायूं शहर में ३ अगस्त १९१६ को हुई । अपने एक दूर के रिश्ते दार जिया उल कादरी जो की मज़हबी शायरी करते थे उनसे हौसला पाकर शकील साहब बचपन से ही काफिये - रदीफ़ के पेचो ख़म में उलझने लगे । १९३६ में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिले के बाद उनकी शायरी परवान चढी।

अगरचे वह दौर तरक्की पसंद शायरी का था और साहिर, फैज़, मजाज़ जैसे शायरों की धूम थी लेकिन शकील साहब की तासीर जुदा थी । शायरी के नए और ज़दीद दौर में भी उन पर रिवायती उर्दू शायरी का रूमानी रंग दिखता था । सो उनके लिए अदबी दुनिया से ज़्यादा मुनासिब थी फिल्मों की दुनिया ।

फिल्मी दुनिया में शकील को पहला मौका नौशाद ने १९४७ में फ़िल्म दर्द में दिया । इसी फ़िल्म का शकील का लिखा गीत " अफसाना लिख रही हूँ " जिसे टुनटुन ने गाया , बहुत हिट हुआ। रफी नौशाद के पसंदीदा गायक थे , शकील पसंदीदा गीतकार। नौशाद , रफी, शकील की तिकड़ी ने मेला(१९४८), अंदाज़(१९४९), दुलारी(१९४९), बैजू बावरा(१९५२), मदर इंडिया (१९५७), मुगल ऐ आज़म (१९६०), जैसी कई फिल्मों में अपना जलवा बिखेरा । खास कर अपने भजनों से ये तिकड़ी भारत की मज़हबी एकता की मिसाल बन गयी।

शकील की इश्किया शायरी फिल्मों को बहुत रास आई। रूमानी रंग में साहिर भी शकील को नही पकड़ सके । शकील ने १९६१ , १९६२,१९६३, का सबसे अच्छे गीतकार का फ़िल्म फेयर अवार्ड भी अपने नाम किया । १९६५ के आस - पास शकील को शुगर की बीमारी ने पकड़ा और इसी से २० अप्रैल १९७० को उनका इंतकाल हुआ ।

शकील साहब की वफात के ३८ साल बाद , आज फिल्मी गीतों की शक्ल-ओ-सबाहत भले ही बदल गयी हो , लेकिन उनसे जो कैफियत फिल्मी दुनिया को मिली वह हमेशा कायम रहेगी ................


ग़मे-आशिक़ी से कह दो रहे–आम तक न पहुँचे ।
मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत मेरे नाम तक न पहुँचे ।।

मैं नज़र से पी रहा था कि ये दिल ने बददुआ दी –
तेरा हाथ ज़िंदगी-भर कभी जाम तक न पहुँचे ।

नयी सुबह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है,
ये सहर भी रफ़्ता-रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे ।

ये अदा-ए-बेनियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारिक,
मगर ऐसी बेरुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे ।

जो निक़ाबे-रुख उठी दी तो ये क़ैद भी लगा दी,
उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे ।



हिमांशु बाजपेयी
mabj 2nd sem

Thursday, April 10, 2008

cavs कुटुंब ,,,,,,,,,,

अब तक जो सोते रहे , सब जायेंगे जाग
cavs वालों का निकला , नया नवेला ब्लाग
लेकर अपनी ढपली तुम, खूब अलापो राग
अपने हाथों से लिखो , इस पर अपना भाग

सबके हित पहिले पहिल, बना cavs संचार
आओ मिल कर एक हो , अपना ये परिवार
पहचानो अपनी प्रतिभा को , दो उसको आकार
इक दिन तुमको मानेगा , ये सारा संसार

आओ लें संकल्प हम , हवन ये चलता रहे
सृजन और साहस का , दीप ये जलता रहे
चित्त में हो शान्ति ! उर में निर्मलता रहे
अपना cavs कुटुंब ये , फूलता फलता रहे

हिमांशु बाजपेयी "हिम"

mabj 2-nd sem

शुभकामनाये

बेशक एक ऐतिहासिक प्रयास है cavs संचार . जहाँ जिज्ञासाएं पैदा होंगी तों किरदार भी होगा आवारगी का एहसास होगी तों भावनाएं भी उबाल खायेंगी । ऐसा होगा cavs संचार का दिलचस्प संसार ... आशा है जूनियर और सीनिअर के बीच निरंतर संवाद कायम होगी जो इस विश्वविद्यालय को एक दिशा प्रदान करेगी जिससे भविष्य मे ज्योति से ज्योति जलाने मे एक जज्बा का जन्म होगा । इसी शुभकामनाओं के साथ ................................
विजय गुप्ता mscem

बधाई

C.A.V.S. का ब्लॉग लांच कराने के लिए मयंक सर को साधुवाद .आशाहै कि यह एक मंच साबित होगा जहा सभी जूनियर व सीनियर छात्र आपस मे संवाद कर सकेंगे .परिसर से कॅरिअर तक के उनके अनुभवो से जूनियर छात्र जरुर लाभान्वित होंगे .साथ ही साथ यह हमारे जैसे लोगो को तमाम मुद्दों पर आपनी बात कहने का अवसर भी देगा. विभाग कि तमाम घटनाओं कि सूचना भी इस पर होगी। सभी को Pratibha- 2008 के लिए शुभकामनाये।
Mahesh Singh(Msc EM ) 2nd sem.

Wednesday, April 9, 2008

परिचय

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के दृश्य श्रव्य अध्ययन केन्द्र ( Centre for Audio Visual Studies ) के विद्यार्थियों द्वारा रचनात्मकता की दिशा में एक पहल के रूप में इस ब्लॉग का शुभारम्भ किया जा रहा है। इस ब्लॉग का प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थियों के भीतर की रचनात्मकता और सृजन क्षमता एवं उनके अन्दर के पत्रकार को दुनिया के सामने लाना है। उनकी प्रतिभा को एक मंच प्रदान करना है और नए युग में वेब पत्रकारिता के संभावनाओं को द्रष्टिगत रखते हुए ब्लॉग सबसे तीव्र व सरल जरिया है। CAVS संचार विश्वविद्यालय और विभाग की गतिविधियों तथा सूचनाओं का भी माध्यम बने ऐसी हमारी सोच है।
पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में प्रसिद्ध पत्रकार अच्युतानंदन मिश्र जी का वरदहस्त एवं विभागाध्यक्ष के रूप में विद्वान् डाक्टर श्रीकांत सिंह का मार्गदर्शन द्रश्य श्रव्य अध्ययन केन्द्र को प्राप्त है। इसके साथ ही श्री महावीर सिंह, श्री संजीव गुप्ता, श्री बी वी देशपांडे तथा श्री आलोक चटर्जी जैसे कुशल व सिद्धहस्त अध्यापकों का सानिध्य भी विद्यार्थियों को प्राप्त है। विश्वविद्यालय सन् १९९० में मध्य प्रदेश विधानसभा के एक्ट १५ के द्वारा स्थापित हुआ। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जैसे जुझारू स्वतन्त्रता सेनानी और मूर्धन्य पत्रकार के नाम पर स्थापित हमारा विश्वविद्यालय का विभाग पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। यहाँ के विद्यार्थियों ने पत्रकारिता के क्षेत्र में देश भर में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है एवं इस दिशा में सतत प्रगतिशील हैं। सूचना विस्फोट के के इस युग में इलेक्ट्रोनिक माध्यमो की केन्द्रीय भूमिका को देखते हुए द्रश्य श्रव्य अध्ययन केन्द्र निरंतर उत्कृष्ट योग देने को प्रतिबद्ध एवं प्रयासरत है।
हम कृतज्ञ अनुभव करेंगे यदि हमारा प्रयास विश्वविद्यालय और विभाग के उद्देश्यों की प्राप्ति में किंचित भी सहायक हो।

- सभी विद्यार्थी ( द्रश्य श्रव्य अध्ययन केन्द्र )
संकलन : प्रतीति पांडे ( एम् ऐ बी जे - द्वितीय सेमेस्टर )

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अर्थ...अनर्थ....मतलब की बात !

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