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Saturday, January 31, 2009

वसंत पंचमी....और निराला

आज वसंत पंचमी है, आज दिन है हिन्दू मान्यता में विद्या और कला की देवी माँ सरस्वती की आराधना का। दरअसल जो धर्म में विशवास नहीं करते वे भी इसे विद्या और कला के प्रतीक पर्व के रूप में तो मना ही सकते हैं। आज के दिन से वसंत ऋतु का प्रारंभ माना जाता है। वसंत जो माह है उत्साह का उल्लास का....जब खेतों में सरसों सोना बिखेर देती है और हवाओं में ठंडी ताजगी और भीनी सुगंध होती है.....वसंत
जो पर्व है प्रेम का....(शायद इसीलिए इसी माह में विदेशी प्रेम दिवस 'वैलेंटाइन डे' और देसी वसंतोत्सव सभी पड़ते हैं। वसंत के लिए महादेवी वर्मा कहती हैं,

मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत
मैं अग जग का प्यारा वसंत
खैर बात होती है तो वसंत पंचमी की तो याद आते हैं निराला .......महाप्राण ! वाकई महाप्राण ........ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म भी माना जाता है कि इसी दिन हुआ था .....और हुआ हो या ना ये मस्त औघड़ अपना जन्मदिन इसी दिन मनाता था। साहित्य को निराला जैसा कुछ भी शायद ही किसी और ने दिया हो। मैं तो उस व्यक्तित्व से इतना प्रभावित था कि काफ़ी दिनों तक उसी शैली में कवितायें लिखता रहा.....प्रेम हो या समाज या फिर भक्ति, निराला की शैली ही निराली थी.....श्रृंगार देखें जब वे कहते हैं कि,
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!



वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबमें दाँव, बंधु!
समाज की बात की तो भिक्षुक की आंखों से ऐसा चित्र खींच दिया कि दर्द कागज़ पर छलक आया, दिखी समाज की विडम्बना.....
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!
खैर निराला पर पूरी बात किसी और दिन जब उनके लखनऊ प्रवास की भी चर्चा होगी पर अभी मुद्दे की बात.....आज वसंत पंचमी है और मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि सरस्वती वंदना जो निराला ने लिखी थी वह सर्वश्रेष्ठ वंदना है....सो उसे पढ़ें और गुनगुनाएं....


वीणा वादिनि


वर दे, वीणावादिनि वर दे।



प्रिय स्वतंत्र रव,
अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे।
काट अंध उर के बंधन स्तर

बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।

नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।
वर दे, वीणावादिनि वर दे।




वसंत पंचमी की शुभकामनाएं.......

मैंने गांधी को मारा है.....


यह कविता मैंने पिछले साल लिखी थी और उस दिन थोड़ा संतुष्ट था कि लगभग सभी मीडिया ने बापू को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था पर इस बार दूरदर्शन छोड़कर किसी ने भी राष्ट्रपिता को याद करने की भूल नहीं की (देखें .taazahavaa.blogspot.com), सो इस बार यह कविता प्रस्तुत है केव्स संचार के पाठकों के लिए,


मैंने गांधी को मारा है !!
मैंने गांधी को मारा है .....
हां मैंने गांधी को मार दिया !!


मैं कौन ?
अरे नही मैं कोई नाथूराम नहीं
मैं तो वही हूँ जो तुम सब हो
हम सब हैं

क्या हुआ अगर मैं उस वक़्त पैदा
नही हो पाया
क्या हुआ अगर गांधी को मैं
सशरीर नही मार सका
मैंने वह कर दिखाया
जो नाथू राम नही कर पाया

मैंने गांधी को मारा है
मैंने उसकी आत्मा को मार दिखाया है
और मेरी उपलब्धि
कि मैंने गांधी को एक बार नही
कई बार मारा है

अक्सर मारता रहता हूँ
आज सुबह ही मारा है
शाम तक न जाने कितनी बार मार चुका हूँगा
इसमे मेरे लिए कुछ नया नहीं
रोज़ ही का काम है

हर बार जब अन्याय करता हूँ
अन्याय सहता हूँ
सच छुपाता झूठ बोलता हूँ
घुटता अन्दर ही अन्दर मरता हूँ
अपने फायदे के लिए दूसरे का नुकसान
करता हूँ
और उसे प्रोफेश्नालिस्म का नाम देकर
बच निकलता हूँ

तब तब हर बार
हाँ मैंने गांधी को मारा है ........

जब जब यह चीखता हूँ कि
साला यह मुल्क है ही घटिया
तब तब ......
जब भी भौंकता हूँ कि
साला इस देश का कुछ होने वाला नही
और जब भीव्यंग्य करता हूँ कि
अमा यार' मजबूरी का नाम .........

'तब तब हर बार मैंने
उसे मार दिया
बूढा परेशान न करे हर कदम पर
आदर्शो के नखरों से
सो उसे मौत के घाट उतार दिया

तो आज गीता कुरान जिस पर कहो
हाथ रख कर क़सम खाता हूँ
सच बताता हूँ
कि मैंने गांधी को मारा है
पर इस साजिश में मैं अकेला नहीं हूँ
मेरे और भी साथी हैं
जो इसमे शामिल हैं
और
वो साथी हैं
आप सब !!बल्कि हम सब !!!!
यौर होनौर आप भी ......

अब चौंकिए मत
शर्मिन्दा हो कर चुप भी मत रहिये .......
फैसला सुनाइये
मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है !!!!!!!
हाँ दो मुझे सज़ा दो क्यूंकि मैंने गांधी को ....................

Friday, January 30, 2009

युगावतार गांधी....


महात्मा गाँधी पर यह कविता कई साल पहले प्रसिद्ध कवि सोहनलाल द्विवेदी ने लिखी थी। द्विवेदी बच्चो के लिए लिखने वाले कुछ प्रमुख कवियों में से एक थे। यह कविता मैंने अपनी स्कूल बुक में कक्षा ७ या ८ में पढी थी। प्रस्तुत है अंश ............ याद करें राष्ट्रपिता को उनकी पुण्यतिथि पर !



चल पड़े जिधर दो डग, मग में,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि,
पड़ गये कोटि दृग उसी ओर;
जिसके सिर पर निज धरा हाथ,
उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया,
झुक गये उसी पर कोटि माथ।

हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु!
हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि!
हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम!

युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख,
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख;
तुम अचल मेखला बन भू की,
खींचते काल पर अमिट रेख।

तुम बोल उठे, युग बोल उठा,
तुम मौन बने, युग मौन बना
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर,
युग कर्म जगा, युगधर्म तना।

युग-परिवर्त्तक, युग-संस्थापक,
युग संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें,
युग-युग तक युग का नमस्कार!

सोहन लाल द्विवेदी

Wednesday, January 28, 2009

दो दो हिंदुस्तान

केव्स संचार पर हम लगातार देश की हालातों पर चर्चा करते है तो आज सोचा की क्यों ना लम्बी चर्चा की जगह एक कविता जो गुलज़ार ने लिखी है और मुझे बहुत पसंद है वो पेश कर दी जाए.....तो इस स्वाद चखें

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं

एक है जिसका सर नवें बादल में है
दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है

एक है जो सतरंगी थाम के उठता है
दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है

फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा
एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है‘
अग्नि’ पर रख पर पांव
उड़ जाने को तय्यार खडा है
हिंदुस्तान उम्मीद से है!

आधी सदी तक उठ उठ कर
हमने आकाश को पोंछा है
सूरज से गिरती गर्द को छान के
धूप चुनी है
साठ साल आजादी के…
हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है
अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!
हिन्दोस्तान उम्मीद से है॥

Tuesday, January 27, 2009

२६ जनवरी

२६ जनवरी यानी कि गणतंत्र दिवस फिर आ कर गया है ....... गणतंत्र दिवस यानी कि इस दिन हम गणतंत्र बने थे मतलब अपना संविधान लागू हुआ था और सो मानते हैं कि यह असली आजादी थी । पर आज संविधान क्या है हम भूलते जा रहे हैं ..... सो समय है सोचने का कि आगे का क्या प्लान है इस मुल्क का, इसके नेताओ का, और अवाम का..... तब तक प्रस्तुत है काका हाथरसी की कविता २६ जनवरी जो कई साल पहले लिखी गयी और पिछले साल मैंने ताज़ा हवा पर भी प्रकाशित की थी पर आज भी प्रासंगिक है ..... गणतंत्र दिवस की बधाई !

२६ जनवरी

कड़की है भड़की है मंहगाई भुखमरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

कल वाली रेलगाडी सभी आज आई हैं
स्वागत में यात्रियों ने तालियाँ बजाई हैं
हटे नही गए नहीं डरे नही झिड़की से
दरवाज़ा बंद काका कूद गए खिड़की से

खुश हो रेलमंत्री जी सुन कर खुशखबरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

राशन के वासन लिए लाइन में खडे रहो
शान मान छोड़ कर आन पर अडे रहो
नल में नहीं जल है तो शोर क्यो मचाते हो
ड्राई क्लीन कर डालो व्यर्थ क्यो नहाते हो

मिस्टर मिनिस्टर की करते क्यो बराबरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

वेतन बढ़ाने को कान मत खाइए
गुज़र नहीं होती तो गाज़र चबाइए
रोने दो बाबू जी बीबी अगर रोती है
आंसू बह जाने से आँख साफ़ होती है

मिस्टर मिनिस्टर की करते क्यो बराबरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

छोड़ दो खिलौने सब त्याग दो सब खेल को
लाइन में लगो बच्चो मिटटी के तेल को
कागज़ खा जाएंगी कापिया सब आपकी
तो कैसे छपेंगी पर्चियां चुनाव की

पढ़ने में क्या रखा है चराओ भेड़ बकरी
चुप रहो आज है २६ जनवरी

- काका हाथरसी

Sunday, January 25, 2009

वर्ण और हित

अमेरिका में ओबामा का आना एक अच्छा संकेत है .लेकिन ख़ुद भारत के लिए अभी दिल्ली दूर है क्यूंकि अमेरिका में चेहरे बदलते है लेकिन राष्ट्र हित नही और यही हमें भी सीखना होगा .

Saturday, January 24, 2009

आखिर कयों न हो जै-जै ओबामा वरुण जी..

वरुण जी आपकी शुरुआती बातों से तो मैं इत्तेफाक रखता हूं.. लेकिन आपके निष्कर्ष से थोड़ा असहमत हूं.. आखिरकार ओबामा को हमारे देश में इतनी तवज्जो क्यों नहीं दी जानी चाहिए.. क्योंकि वे दुनिया के सबसे मजबूत और व्यवस्थित लोकतंत्र के पहले अश्वेत राष्ट्रपति हैं.. क्योंकि उनका चुना जाना श्वेत और अश्वेत के बीच विभेद के खत्म होने का सुखद और संभवतः निर्णायक अहसास कराता है.. क्योंकि वे एक ऐसे देश से सम्बन्ध रखते हैं.. जिस देश की तमाम परम्पराएं भारत की ही तरह ब्रिटिश हुकूमत के आंचल में ही पलकर जवान हुईं हैं.. वही ब्रिटिश हुकूमत जिसका हर फैसला फूट डालो और राज करो की कसौटी पर कसा जाता था..
वरुण जी ये तो रही ओबामा और उनके अमेरिका की बात.. अब हम कुछ अपनी बात भी कर लें.. आखिरकार हम क्यों न ओबामा की महिमा का गुणगान करें.. क्योंकि हमें भी अमेरिका की ही तरह चरण वंदना करने की आदत भी ब्रिटिश हुकूमत से विरासत में मिली थी.. कयोंकि आज भी हमारे नेता सार्वजनिक सभाओं में लोगों से चरण स्पर्श करवाने में गर्व की अनुभूति किया करते हैं..
वरुण जी अब मैं सीधे निष्कर्ष पर आ जाता हूं.. हमें कुछ बातें अमेरिका से सीखनी चाहिए.. वह देश काफी बदल गया है.. अब वह चरण वंदना करता नहीं बल्कि करवाता है.. लेकिन हम....... छोड़िए.. मैं यह नहीं कहता कि हमें अमेरिका जैसा बन जाना चाहिए.. मैं यह नहीं कहता कि हमें ओबामा के आवेग में पूरी तरह से बह जाना चाहिए.. लेकिन मैं यह जरुर कहता हूं कि हमें भी एक ऐसा ही ओबामा अपने देश में ही चाहिए.. जो देश में मौजूद तमाम सामाजिक दायरों को पाट दे.. और जरुरत पड़े तो सदियों के इतिहास को भी पलट दे..
बस आज इतना ही

नेताजी सुभाष के लिए


विगत दो दिवस से शहर के बाहर था सो देरी के लिए क्षमा चाहता हूं, पढ़ें नेताजी को याद करते हुए धर्मवीर भारती की ये कविता

सुभाष की मृत्यु पर

दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचे
सोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर
मानवता के तरुण रक्त से लिखा संदेशा पाकर
मृत्यु देवताओं ने होंगे प्राण तुम्हारे खींचे

प्राण तुम्हारे धूमकेतु से चीर गगन पट झीना
जिस दिन पहुंचे होंगे देवलोक की सीमाओं पर
अमर हो गई होगी आसन से मौत मूर्च्छिता होकर
और फट गया होगा ईश्वर के मरघट का सीना

और देवताओं ने ले कर ध्रुव तारों की टेक -
छिड़के होंगे तुम पर तरुनाई के खूनी फूल
खुद ईश्वर ने चीर अंगूठा अपनी सत्ता भूल
उठ कर स्वयं किया होगा विद्रोही का अभिषेक

किंतु स्वर्ग से असंतुष्ट तुम, यह स्वागत का शोर
धीमे-धीमे जबकि पड़ गया होगा बिलकुल शांत
और रह गया होगा जब वह स्वर्ग देश
खोल कफ़न ताका होगा तुमने भारत का भोर।

धर्मवीर भारती

जै-जै हे ओबामा.......

भगवान आ गये अब कोई चिंता नहीं है........
"सुनी है के भगवान को जनम भओ है"....गहरे अचरज से उसने पूछा "कहाँ ?"..."अरे बड़े दिनो से टीबी में कहूं चल रओ थो, तंयीं बाबू जी ने सुइ बताओ के किस्न भगवान को औतार हैं वो...ऐंसे कउंके देस में जनमे हैं बे जहां कभउं कोई करिया नइ होय"....फिर वह खुशी से मिश्रित अपने आप में उम्मीदों संग कहीं खोते हुए बोला "तो का भैया हमरी मजूरी होन लग्हे का ?"....दूसरा अपनी धुन में यशगाथा सुनाता रहा वो उम्मींद से भरता रहा अपना मन.....घर में खाट पे आकर धरा सा गया रोज़ चिंतित,व्यथित रहने वाला हल्कोरी आज वेफ़िक्र खाट पे पड़ा हुआ है....झिन्या से रहा नही गया खुशी मगर जिज्ञासा से सनी आश्चर्य की मारी तिरछी भौंह से पूछा "का बात है आज तुम बड़े निसफिकर लग रये हो। ....जान के अच्छो तो लगो मनो बात तो कछु है सही"........"अरी कछु नइहै बस बैसइ" फिर निंश्चिंतता से जबाव दिया.... "अच्छा मैं जैसे चूले चौंका में ही घुसी हों जानत हों कछु तो है.........."झल्ला कर सवाल में जान डालते हुए फिर पूछा...."हाँ अब सबकी चिंता दूर होजै है" कहते हुए हल्कोरी ने मुंह पर गमछा डालते हुए कहा....."कैसे ?"...... भौंह का तिकोना उसके खूबसूरत चेहरे पे उभर आया.....पल्लू दांतों से बाहर निकालते हुए बोली....हल्कोरी ने जबाव दिया "अरे कहूं बिदेस में भगवान को जनम भओ है....ते बे सब कै रै थे"......"कौन ?"......फिर झिन्या ने उतावली हो कर पूछा......."एरी तू बेसुरत रेत है....तोय कछु पता नइ रेय बो कलगी भगवान हैं...ओबामा".....झिन्या को जैसे साक्षात भगवान दिख गये हों श्रद्धा और विश्वास के साथ दोंनो हाथ जोड़ कर दूर से आंख बंद कर बोली जै हो भगवान।........."अब हमरी सुइ सुरत लइयो...ओबामा भगवान...जै जै ओबामा"।।।.....मीडिया किसी को भी इतना कवरेज़ देने से पहले ज़रा इनके बारे में भी सोचे कि आखिर ये लोग भी तो हैं जो अपके अर्थ को ज़रा में अनर्थ बना कर ले लेते हैं हालाकि समूचा देश इस वक्त सिर्फ काले से दिखने वाले ओबामा को निहार रहा है, मैंने इतना नकारापन कभी इस देश में नहीं देखा।।।।।। इन हालात की ज़िम्मेदार... ग़ैरज़िम्मेदार मीडिया और मज़बूर सरकार है....।।।।।

Thursday, January 22, 2009

shant

एक देश जो कभी अंतुले के बयान से घबराता है तो कंही रब ने बना दी जोड़ी के सहारे रहता है किसी दूसरे देश में अवतार (ओबामा }जन्म ले ,यज्ञ करता है उसकी अपनी समस्याओं को समाप्त करने के लिए आका का हुक्म आने का इंतज़ार, अपनी निजता को वास्तविकता में खोता नजर आ रहा है वास्तव में भारत शान्ति का प्रतीक है और शांत भी लेकिन ठीक उसी तरह जैसे भयंकर तूफ़ान आने से पहले समुद्र ,सोचनीय यह है की यह तूफ़ान कही अपने ही घरो की सीमा को तबाह करने के लिए तो नही .विश्व में अपने आपको सर्व करने की होड़ में अपनी आंतरिक नीतियों को भूल जाना कुछ हजम नही होता और सच्चाई यही रही है की देश में सत्ता उसी की बनी है जो आंतरिक नीतियों पर चला है लेकिन दुर्भाग्य आंतरिक नीतियों पर कोई सुध्रिड न ही नीति बनी न ही कोई कारवाही,मेहता ,पारीख ,बहूत हुआ फिर सत्यम अब तो हद हो गई ,कारन पहले सेबी बन नही पायी थी और अभी पूर्ण रूप से विकास नही कर पाई ,पहले भारत के दिल (संसद)पर हमला ,फिर भारत की जान मुम्बई पर कारन पहले आन्तरिक खुफिया तंत्र मजबूत और ज्यादा टेक्नीकल नही था और अभी लापरवाह ,देश मंहगाई की आग में समय समय पर जलता है कारन प्रख्यात इकोनोमिस्ट (मनमोहन)महत्वपूर्ण seet पर है ,देश adhyatmik था लेकिन kamjor नही वस्तुतः कमजोर कड़ी को अपनी सबसे मजबूत कड़ी मानते हुए उसे मजबूत करने की जरूरत है वरना परिणाम नक्सल ,इंडियन मुजाहिदीन .और भी जो हमारे न सुधरने पे पैदा होते रहेंगे ...जरी रहेगा......

Wednesday, January 21, 2009

सत्य से स्वप्न तक.....किंग से ओबामा तक

कल रात जब भारत में रात के दस बज रहे थे....दुनिया के दूसरे कोने में सूर्योदय हो रहा था, सूर्योदय आशाओं का, सत्य का, उत्साह का और एक नए नेता का। एक लड़ाई जो ४० साल पहले बीच में ही सुशुप्त हो गई थी पर अन्दर ही अन्दर जगी हुई थी, उसका अंत हुआ और वो जीता जिसे मार दिया गया था। दरअसल मार्टिन लूथर किंग की १९६८ में हत्या के ४५ साल बाद ओबामा की जीत ने ये तो दिखा ही दिया था कि हत्या व्यक्ति की हो सकती है विचारों की नहीं...उसके बाद वो लड़ाई सामने नही पर नेपथ्य में चलती रही और अफ्रीकी मूल के अमेरिकी आख़िर अपने नागरिक अधिकार एक एक करके पाते रहे और आख़िरकार एक समता मूलक समाज बँटा गया जिसकी कि कल्पना अमरीकी संविधान के 'परस्यूट ऑफ़ हैप्पीनेस' में की गई है जो कहता है, "सभी लोग स्वतंत्र हैं, सभी समान हैं और सबको अपने हिस्से की ख़ुशियाँ तलाश करने के लिए अवसर मिलने चाहिए।"
मार्टिन लूथर किंग के आन्दोलन के विषय में मैं एक पोस्ट में पहले ही कह चुका हूँ पर आज बात करेंगे कि यह सब महत्वपूर्ण क्यों है.....दरअसल हम सब पिछले कुछ समय से यह चिंता और विमर्श कर रहे हैं कि भारत या दुनिया पर इसका क्या असर पड़ेगा .....क्या ओबामा भारत का साथ देंगे या पाकिस्तान के साथ खड़े हो जायेंगे। पर ओबामा ने अपने कल के भाषण में एक बड़ी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक बात की कि हमें नफरत को ख़त्म करना है। दरअसल यही मूल मंत्र है क्यूंकि जब तक नफरत ख़त्म नहीं होती किसी भी तरह के आतंकवाद को ख़त्म नही किया जा सकता ना ही यह कोई दीर्घकालिक उपाय है।
वस्तुतः यह मूलमंत्र उस पीड़ा से उपजा है जो कभी कबार ओबामा और सदियों तक उनके पूर्वजों ने सही है, जो नफरत और तिरस्कार गौर वर्णों की आंखों में उन्हें दीखता रहा उससे। और वे जानते हैं कि किसी भी समस्या को तात्कालिक नहीं दीर्घकालिक उपायों की ज़रूरत है। इन सब बातों से हटकर अगर देखें तो यूरोप से अलहदा जितने भी देश हैं जहाँ के लोगों की चमड़ी का रंग गोरा नहीं है उनकी तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है और ये परिवर्तन उनके लिए है। ओबामा ने शायद इसके लिए ही अपने भाषण में कहा, "अमरीका ईसाइयों, मुसलमानों, यहूदियों, हिंदुओं और नास्तिकों का भी देश है, इसे सबने मिलकर बनाया है, इसमें सबका योगदान है, अमरीका की नीतियों को हम हठधर्मी विचारों का गुलाम नहीं बनने देंगे."
परिवर्तन जो वहाँ हुआ है एक प्रेरणा स्रोत बनेगा उनके लिए और अब दुनिया के और कोनो में अंगडाई लेगा। ये सब जानते हैं कि परिवर्तन जब अंगडाई लेता है तो होके ही रहता है। ये शुरुआत है सर्वहारा में उत्साह और आत्मविश्वास भरने की। ये बदलाव है जब लोग अपनी स्थिति को और सम महसूस करंगे ......ये जीत है उस सपने की जो मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने देखा था और कहा था," आई हैव अ ड्रीम"
ज्यादा दिमाग ना खाते हुए देखिये ये दो वीडियो एक उस सपने का और एक इस हकीकत का,
सपना



हकीकत
(इस वीडियो में आप कई नागरिको की आँखों में आंसू भी देख सकते हैं)


अमरीका ईसाइयों, मुसलमानों, यहूदियों, हिंदुओं और नास्तिकों का भी देश है, इसे सबने मिलकर बनाया है, इसमें सबका योगदान है

२० जनवरी को जन्मे पितामह

२० जनवरी एक ऐतिहासिक दिन लेकिन किसके लिए अमेरिका के लिए या एक तरफ़ खड़े पूरे विश्व मंच के लिए शायद यह अब रहस्य न रह जाए /बराक ओबामा ४४ वे और पहले अश्वेत पितामह अमेरिका के ,ने पूरे विश्व में उत्साह पैदा किया है लेकिन शायद विश्व मंच यह भूल रहा है की पितामह अमेरिका के हितों के लिए है न की विश्व मंच के लिए जिसका सीधा परिणाम हम २६/११ हमले में नई नवेली अमेरिकन विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के बयान से देख सकते है "अब अमेरिका पाकिस्तान को तीन गुना अधिक वित्तीय सहायता प्रदान करेगा ताकि लोकतंत्र मजबूत हो सके " इस बयान का मतलब सीधा है की अमेरिका तेल के लिए कुछ भी करेगा /और दूसरी तरफ़ हम आतंक वाद के ख़िलाफ़ एक जुट होंगे का नारा बुलंद कर रहा है /पितामह ने अंतररास्ट्रीय राजनीति से विशेषज्ञता हासिल की है और इसी लिए शायद बयान की तारीफ़ भी कर रहे है ,पितामह जानते है की तेल उत्पादक देशो से पाकिस्तान के रिश्ते मजबूत है और बिना पाकिस्तान से दाल गलाए काम नही चलेगा /और वाकई इनकी विशेषज्ञता को मानना पड़ेगा /बुश जी शायद जूता खाने के बाद सदमे में है खैर पितामह के पिछलग्गों को विवेक मिश्रा की तरफ़ से बध्हाई /जारी रहेगा विवेक मिश्रा

Tuesday, January 20, 2009

एक अश्वेत का व्हाइट हाउस सफर

दुनिया की शक्तिशाली एवं ताकतवर देश अमेरिका में एक नया सूय्रौदय होने जा रहा है। वह है ब्लैक क्रांति का , यह उदय व्हाइट हाउस में न केवल अमेरिकी जनता के लिए गर्व की बात है बल्कि पुरी दुनिया के लिए सुखद आश्चर्य है । मार्टिन लूठेर किंग का सपना साकार कर अमेरिकी जनता ने अमेरिका के दो सौ सालके इतिहास को तब्दील कर एक अश्वेत , अज्ञात वक्ती को श्वेत रास्त्रपति की श्रणी में ला दिया है । बरैक हुसेअन ओबाम अमेरिका के ४४ वे रास्ट्रपति के रूप में आज यानि २० जनवरी को पचीस हज़ार सुरक्षा बल के बीच भारतीय समयानुसार शाम ६.३० बजे वासिगातन के कैपेनहॉल में शपथ लेंगे । हलाकि बरैक ओबाम की पारिवारिक पृष्ठभूमि काफी उथल -पुथल एवं कई मोडे घुमाने वाला रहा है ओबाम के पिता केनिया मूल के मुसलिम थे और माँ अमेरिकी मूल की इसाईओबाम का लालनपालन आपनी मौसी के यहाँ हुआ है। ओबाम की पत्नी का नाममिशेल एवं बेटी का नाम शोहेल है ।
उलेखानिये है की ओबाम अमेरिका के रास्ट्रपति एसे समय बने है जब अमेरिका पुरी तरह से मंदी के चपेट में आ चुका है , अमेरिकी अर्थवयवस्था चरमरा गई है।अमेरिका के कई बैंक दिवालिया घोषित हो चुके है। लोगो को रोजगार से निकाला जा रहा है आदी । निश्चित रूप से ओबाम का पहला कर्तव्य एवं दायित्व बनता है की अमेरिका को मंदी से निकाले और अमेरिकी अर्थवेय्वास्थ को चीन की दिवार के तरह ठोस एवं मजबूत बनाये।

Monday, January 19, 2009

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सभी पूर्व छात्रों के लिए यह ख़बर है

कहने को यह एक सूचना ही है पर दरअसल यह एक इच्छा है जो शायद स्वप्न से यथार्थ में बदलती दिख रही है। अपने विश्वविद्यालय ने हमको एक शानदार मौका दिया है की हम सब सीनिअर और जूनियर एक बार फिर से एक साथ इकठ्ठा हों .....जी हाँ एक साथ ! आपको बताना चाहता हूँ कि फरवरी माह के अंत में विश्वविद्यालय (माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय) अपना दीक्षांत समारोह आयोजित कर रहा है।
यूँ तो दीक्षांत समारोह का अंत विधिवत दीक्षा का अंत करना यानी कि डिग्री प्रदान कर देना है पर क्या हम सबके लिए भी इसका बस इतना ही मतलब है...ज़रा सोचिये ?(चैनल का असर है यह!)
दरअसल यह शायद भोपाल छोड़ने के बाद के इतिहास का और आने वाले भविष्य का इकलौता मौका होगा जब हम सब .....वरिष्ठ और कनिष्ठ ...... अग्रज और अनुज ....... और वर्तमान एवं भविष्य एक साथ इकट्ठे होंगे.....सोचिये कितना विहंगम दृश्य होगा.....जब कल पढ़ चुके और आज पत्रकारिता सीख रहे एक साथ होंगे.....ये अवसर शायद दुर्लभ है!
मित्रों यह मौका है पुराने मित्रों से मिलने का....शत्रुओं (हालांकि यह केवल बचपना था) से मित्रता करने का.....गिले शिकवे दूर करने का ....साथ मिल बैठने का! पुराने लम्हों को याद करने का ........ नए किस्से सुनाने का का.....बंधे पिटारे खोलने का और प्यार बिखरा देने का.....हम साथ बैठेंगे, पुराने अनुभव फिर से याद किए जायेंगे...नए अनुभव बांटे जायेंगे .......सबसे बड़ी बात सब एक साथ शायद फिर सरलता से नहीं मिल पाएंगे।
पुरानी शरारतें, चाची की चाय, पोहा जलेबी.....क्लास बंक कर के घूमना, वो बड़ी झील, महावीर पहाडी.....टॉप एंड टाऊन, चाय के साथ सिगरेट, श्रीकांत सर की डांट, संजीव सर की कातिल मुस्कराहट, महावीर सर के असाइंमेंट, बापू सर का गुनगुनाना, तिवारी सर का भोकाल,बाजपेयी सर का सीधापन, लाइब्रेरी कार्ड, हरी और मनोज भइया की सदाशयता, न्यू मार्केट, सिटी, १० नंबर, ७ नंबर.......याद आ रहा है ना सब.....को खां ? अपन को तो सब याद आ रिया है !
जानता हूँ सब लगभग रोज़ याद करते हैं......भोपाल को ! अब एक मौका है...ये गंवाया तो मियाँ जाओगे तो ज़रूर भोपाल पर एक कसक रह जायेगी कि यार सब लोग अपन लोग साथ में आते तो कितना मज़ा आता....को खां ? बस में बैठ कर याद है पूरा भोपाल घूमा था, कई बार किराए को लेकर झिकझिक भी की थी....हकीम भाई की दूकान अभी भी वहीं है पर जायका बंद हो गया है.....तो ऐसा है ज्यादा ना नुकुर ना करें....क्या करना है हम बता रहे हैं.....
  1. डा अविनाश बाजपेयी को तुंरत फोन लगायें, उनका मोबाइल नंबर है 09425392448
  2. संभवतः यह कार्यक्रम है 28 फरवरी को सो बाजपेयी जी से बात कर के आरक्षण करा लें (बाध्यता नहीं है, मेरे जैसे लोग अभी भी जनरल डिब्बे में ही सफर करते हैं)
  3. अपने बाकी सभी साथी जिनके भी संपर्क में हैं उनको ख़बर कर दें।
  4. बाजपेयी सर आपको एक ई मेल भेजेंगे जिसमे दी गई प्रोफाइल भर के उन्हें तुंरत वापिस ई मेल कर दें या डाक से भेज दें।
  5. अपने बढ़िया वाले कपड़े तैयार कर लें नई शोपिंग भी की जा सकती है।
  6. कम से कम दो दिन की छुट्टी ले कर आयें नहीं आने जाने में ही सब वक़्त निकल जायगा मिल के क्या ख़ाक बैठेंगे।
  7. दफ्तर में अभी से छुट्टी के लिए आवेदन दे दें।
  8. आने की सूचना बाजपेयी सर को, मुझे (cavssanchar@gmail.com, mailmayanksaxena@gmail.com, mayank.saxena@zeenetwork.com), हिमांशु को (kavi.him@gmail.com) अथवा अपने किसी पुराने साथी को जो वहाँ पहले से मौजूद हों उन्हें दे दें.....हमारा प्रयास रहेगा कि हम रेलवे स्टशन पर मौजूद रहे। (हालांकि मैं ख़ुद नॉएडा से वहाँ पहुंचूंगा)
  9. और किसी सहायता के लिए इन मोबाइल नंबरों पर या ई मेल पर संपर्क करें,
  • डा अविनाश बाजपेयी (प्लेसमेंट अधिकारी) : 09425392448 (mcuconvocation@yahoo.co.in)
  • डा श्रीकांत सिंह (विभागाध्यक्ष, केव्स) : 09424412772 (अभी तक ई मेल आई डी नहीं है)
  • मुझे मतलब मयंक सक्सेना को : 09310797184 ( mailmayanksaxena@gmail.com, mayank.saxena@zeenetwork.com)
  • देविका छिब्बर को : 09310953590 (devikachhibber@gmail.com)
  • अजीत कुमार को : 09990753296 (kumarajeet20@gmail.com)
  • हिमांशु बाजपेयी को : 009981907330/09415433093 (kavi.him@gmail.com)

तो तैयार हो जाइए एक अविस्मरणीय यात्रा के लिए.....ऐसी यात्रा जो पहले कभी नहीं की (वो अंग्रेज़ी में कहते हैं ना जर्नी ऑफ़ अ लाइफ टाइम ) इसके बाद कुछ लोग मिलेंगे कभी एक दूसरे की शादियों, बच्चो के मुंडन और जन्मदिनों में पर शायद एक साथ सब कभी ही इकट्ठे हो पाये....तो ये मौका चूकना कहाँ तक जायज़ है ? मुझे तो अभी से भोपाल याद आ रहा है....तो अपन सब को आना है और सबसे बड़ी बात इस री यूनियन के साथ ही हम अपने अलुमनी संगठन को भी दुबारा जिंदा करेंगे (जिसके लिए परेश सर बहुत परिश्रम कर रहे हैं)......याद आ रहा है ना फेयर वेल का दिन....पुरानी जींस और गिटार वाला गाना .....देखा हमको भी ससुर इमोशनल कर डाला ...कितना रोये थे सब एक दूसरे के गले लग लग के .....अब किस्मत फिर मौका दे रही है और वही शेर गुनगुना रही है जो उस समय गुनगुनाया था.....

अबके बिछडे हुए तो फिर कभी ख़्वाबों में मिलें

जैसे सूखे हुए कुछ फूल किताबों में मिलें

तो सामान बाँध कर आ जाओ सब एक बार फिर करने के लिए तफरीह, खाने के लिए पोहा जलेबी.....और मिलने के लिए एक दूसरे से .........और शायद मिलने के लिए खोये हुए ख़ुद से !

दिल ढूढता है फिर वही............

(जनहित में जारी)

आख़िर किराये का घर छोड़ कर

चौथा सेमेस्टर शुरू होते ही सब भविष्य के बारे में और संजीदगी से सोचने लगे हैं । इन्टर्न-शिप और नौकरी की तलाश में भोपाल से हिजरत भी शुरू हो गई है । दिन कैसे गुज़र गए पता ही नही चला । और अब लग रहा है की एक खूब सूरत कहानी अपने अंत की ओर बढ़ रही है या किसी दूसरी कहानी की तैय्यारी है , पहले सिम्मी और शुभम गए, उसके बाद गुलशन, फ़िर सौरभ, प्रतीति, हमारे प्यारे शचीन्द्र भैय्या और अब रोहिणी और पूजा भी जा चुके हैं ,(आज से आजतक में इस बीच की पहली इन्टर्न शुरू हो रही है , पहले जत्थे को शुभकामनाएं ।) प्रियंका के बारे में भी सूचना आ रही है की वो घर जा चुकी हैं ...एक गुलज़ार चमन धीरे धीरे सूना हो रहा है । अंजुमन के चिराग मद्धम हो रहे हैं ....

और इन सब के बीच मैंने एक नज़्म लिखी है, ये मैंने खास अपने सह-पाठियों के लिए लिखी है लेकिन जुदाई के दर्द की शिद्दत समझने वालों के लिए ये उनकी अपनी दास्ताँ होगी....


आख़िर किराये का घर छोड़ कर
जाने लगे सब शहर छोड़ कर

अलग मंजिलें हैं , अलग रास्ते हैं
मरासिम अलग हैं , अलग वास्ते हैं
आधा -अधूरा सफर छोड़ कर
जाने लगे सब शहर छोड़ कर

आख़िर किराए का घर छोड़ कर....

रंगीन समां था सजती थी अंजुमन
था रंगे जवानी , जज़्बात थे रौशन
मुहब्बत भरी रहगुज़र छोड़ कर
जाने लगे सब शहर छोड़ कर

आख़िर किराए का घर छोड़ कर ....

और पास होंगे जब दूर रहेंगे
उनकी सुनेंगे कुछ अपनी कहेंगे
कदम के निशाँ राह पर छोड़ कर
जाने लगे सब शहर छोड़ कर

आख़िर किराए का घर छोड़ कर .....

Sunday, January 18, 2009

कहां गई छग की ग्रेनबैंक योजना?

"छेरछेरा माय धान ल कोठी हेरहेरा" याने छेरचेरा पर्व जो मनाया गया। जान कर बड़ी खुशी हुई कि इसी की तर्ज़ पर केंद्र सरकार ने पिछले साल एक योजना छत्तीसगढ़ के लिए बनाई थी। जिसका नाम था "ग्रेनबैंक" याने अनाज का बैंक। सचमुच गांवों की फालतू सी जान पड़तीं कइयों ऐंसी रीतियों रिवाज़ों के भीतर की परिकल्पना कितनी दूरदर्शी होती थी, कि लोग कभी भूखे ना मरें। पहले का समाज इतना जुड़ा,बंधा,कसा,और वेलनिटेड होता था कि काहे की मंदी, काहे की लाचारी "हमर पेट ना कोऊ खतरा हे" छत्तीसगढ़ का खास ज़िक्र इसलिए क्योंकि, इस राज्य ने अपने गांवी संस्करों, अल्हड़ पहाड़, जबान खेतों, ज़िम्मेदार खलिहानों, रचनात्मक हलों, बख्खरों, जुआं, नारियों, और घर के सदस्य से गाय, बैल, भैसों कुत्तों को अभी तक छोड़ा नहीं है....हाँ कुछ हैं जो अपने इस इतिहास पर शर्म करते हैं लेकिन बाकी राज्यों की तुलना में यहां ऐंसे लोगों की कमी है।.....यही चीज़ अच्छी लगती है।........मैं बात कर रहा था "ग्रेनबैंक" की। जी हां ये योजना "छेरछेरा" से प्रेरित थी, मगर दुर्भाग्यवश इस पर अमली जामा नहीं पहनाया जा सका......इसके पीछे मंशा थी कि गांवों के पास बड़े वेयर हाउस बना कर अनाज रखा जाए जिस पर ब्याज़ की भी व्यवस्था थी लेकिन कौन करे इस पर काम ये थोड़े ही इंपोर्टेड है, जो हम हाथोंहाथ लेते.....या कल कोई अखवार छाप दे या कोई नेता घूम आये विदेश जहां ये योजना चल रही हो....तब देखिए वही वरिष्ठ पत्रकार नेता चीखने लगेगें हमारे यहां भी होना चाहिए......खैर ये तो हमारी जेनेटिक प्रोबलम है। छत्तीसगढ़ को मैं देख नही रहा हूँ, बल्की महसूस कर रहा हूँ। ये है वह वेधड़क स्टेट जो अपने आप से ज़्यादा ग़िला शिक़वा नहीं करती आज भी ग्रामीण अपनी भाषा, पहनावे से बिल्कुल भी शर्मिंदा नहीं होते। यही चीज़ जो इसे पहचान दिलाती है।...हां कुछ शहरी,अपडेट,जींस,लेदरशू के बाइकिया लोगों के मन में ज़रूर ही अपने आप का गांव से संबद्ध होने का मलाल है।।।।।।।।।।

Saturday, January 17, 2009

अबुझमाड़ः अबुझ पहेली

अविभाजित मध्यप्रदेश में पांचवी क्लास में पढ़ा करते थे छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है, जिज्ञासु, अबोध,मन सोचता था, कि आखिर धान का कटोरा क्या है.....क्या किसी बॉउल में धान रखा है या फिर कुछ और। किसी तरह से इस सवाल का तो जबाव मिल गया लेकिन एक प्रश्न जो मन में फंसा रहा, वो ये कि आखिर अबुझमाड़ के वनवासी क्या है.....ये बस्तर क्या है.....सालों बाद जब इस राज्य को देखने समझने और आत्मसात करने का मौका मिला तो सबसे पहले इसी सवाल ने घमासान मचाया.......मीडिया एक माध्यम है लेकिन ये बात इसके लिए अप्रासंगिक हो चुकी है...जबकि मेरे लिए बिल्कुल नई...तब समसामयिकता की तूती फूंकने वाले प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से उम्मींद ही करना बेकार है...कभी प्रिंट तो फिर भी दे सकता है, लेकिन अद्दतन होने का दाबा करने वाले टीव्ही माध्यम से तो कभी आशा ही नहीं रही........किसी तरह से लोकल के लोगों से जानने की कोशिश की, मगर फिर वही बात सामने आई...उनका खुद के प्रति असंतोष, डर, भय, सामने आया। संपदा पर सीना तानने वाले एक हमारे साथी ने ख़ूब बखान किया लेकिन फिर भी वे इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं दे पाये.....तब महाराज का करहों...हमारे साथी जो बस्तर से है उनसे जानना चाहा जो जानकारी मिली वो दे रहा हूँ.....बस्तर का अबुझमाड़ का इलाका जिसका आज तक भारतीय भू-अभिलाखागार में कोई रिकॉर्ड नहीं है....कोई आज तक यहाँ का सर्वे नहीं कर सका है ग़ुलाम भारत में अंग्रेज़ों ने ज़रूर ही इस दिशा में प्रयास किया था, लेकिन तत्कालीन हालात आदिवासियों की ख़िलाफत के बन गये तो ये काम फिर ठंडे बस्ते में गया तो फिर निकला नहीं आज़ाद भारत में किसी ने भी ऐंसा प्रयास तक नहीं किया किसी ने अगर कोशिश भी की तो भारत की राजनीति मासाअल्लाह है, जो कुछ भी करो तो सारे मानवाधिकार आयोगों के दढ़ियल लोग चील की तरह ताड़ने लगते है...तो फिर वहीं राग अलापा गया वे नहीं बदलना चाहते ख़ुद को तो क्यो ज़बरन ऐंसा किया जाए.....और फिर कभी कोई कोशिश नहीं हुई.....कलेक्टर (डीएम) की खास इजाज़त से ही घूमा जा सकता है इस जगह जाने की भी अनुमति नहीं है....कारण प्रशासन ग्यारंयटी नहीं ले सकता...आखिर मुझे समझ नहीं आया क्यों ऐंसा होता है.....बस्तर कभी भारत का सबसे बड़ा ज़िला हुआ करता था....आज इसके टुकड़े किये गये कि प्रशासन बेहतरी से काम कर सके.....इस जगह के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है बस जाने की इच्छा है ....नक्सल का गढ़ यह एरिया आम लोगों की लापरवाही, सरकारों की निकम्माशाही,प्रशासन की नज़रअंदाज़ी और प्रबुद्धों की महज़ कलम घसीटी के कारण बुरी तरह अपेक्षित है.....जो अपने आप में दुनिया की खूबसूरती लिए है बताना चाहता हूँ.....यहाँ दुनिया में सबसे ज़्यादा साल वनों का घना छायादार एरिया है......इतना ही नहीं यहाँ भारत का नियाग्रा फॉल याने चित्रकोट भी है......यह सब दखने की बड़ी तमन्ना है आप सभी की तरह....मुझे भी इंतज़ार है किसी मेकमोहन का या सर कलिंगम का। जो इस जगह पर शोध कर दबेकुचले लोगों में आत्मबल भरेगा औऱ नये इतिहास के साथ ही भारत के गौरवशाली कल में आज की ख़ुशबू भरेगा.........ऐंसे किसी अंग्रेज़ की राह तकता हूँ.......

Thursday, January 15, 2009

कंटेंट कोड के मायने

सुना है जनवरी के अंत तक टीवी चैनलों पर कंटेंट कोड लागू हो जाएगा । मतलब अब किसी कंटेंट के प्रसारण पर प्रशासन तय करेगा की कोई सामग्री देश हित में है या नही यदि नही है तो वह प्रसारित नही हो सकती । हर फोनों , विसुअल , स्क्रॉल, टिकर, आदि अब प्रशासन के निर्णय पर चलेगा । मतलब इस कोड के मुताबिक आने वाले दिनों में पत्रकारिता और न्यूज़ वेल्यु का निर्धारण पत्रकार नही बल्कि कलेक्टर, दरोगा , मजिस्ट्रेट आदि करेंगे ।जिनका पत्रकारिता की परम्परा और उसके मार्ग-बिन्दुओं से कोई सरोकार ही नही पत्रकारिता को खेल या स्नानघर में गाया जाने वाला गाना समझ लिया गया है जिसे कोई भी खेल या गा सकता है या फ़िर कोड ye कहना चाहता है की देश हित क्या होता है ये सिर्फ़ सरकार जानती है .....जिस २६/११ पर सरकार मीडिया के कान उमेठ रही है उसमे देश हित के माने जानने वाली सरकार की भूमिका कैसी रही ये जो है ये सब जानती है । दरअसल ye खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे जैसी baat है । उस समय मीडिया ने बहुत आदर्श काम नही किया ये सही बात है, लेकिन उस घटना में आपको सिर्फ़ मीडिया की खामी ही दिखाई देती है , तंत्र की, राजनीति की और न किसी औरमीडिया की । और अगर मीडिया दोषी भी है तो उसके लिए आपके पास पहले से ही कम अधिकार या नियम नही हैं,केबल टीवी एक्ट के तहत आप चैनल पर जुर्माना या पाबंदी दोनों लगाने के अधिकारी हैं फ़िर ये प्रे सेंसरशिप जैसा कोड क्यूँ ? दरअसल इस कोड की आड़ लेकर सरकार मीडिया पर वार करना चाहती है . जिससे अगली बार जब कोई सांसद सदन में सवाल करने के लिए घूस मांगे तो पूरा देश उसके इस काले चेहरे को न देख पाये ? जब शहीदों के ताबूतों में घोटाला हो तो सफ़ेद पोश नंगे न हो जाए . कुछ आप को भी याद होंगे . जो लोग मेरी तरह पत्रकारिता से सरोकार रखते हैं वो तो जानते ही हैं की मीडिया में जब सरकारी दखल होगा तो लोकतंत्र में दीमक लगना तय है ...... मीडिया सरकार का प्रतिनिधि नही है , न ही सरकार के प्रति जवाबदेह है ....मीडिया जनता की आवाज़ है और उसी के प्रति उत्तर दाई है....कहते हैं न आवाजे- khalk नगाडा-ऐ खुदा......मीडिया का सरकारीकरण जब होता है तब जो होता है उसे आप इंदिरा-युग के दौरान देख चुके हैं ...... अब मीडिया को ध्रितराष्ट्र बनाने की तैय्यारी है और अब इसे सरकारी संजय की आंखों से देखना पड़ेगा ......संजय भी नही क्यूंकि वो तो तटस्थ था....... मीडिया की galtiyon या laaparwaahiyon की tarafdaari बिल्कुल नही होनी chaahiye ........ samvidhan का artikal 19(२) भी yuktiyukt nirbandhon की बात करता है ......लेकिन आपको press cauncil जैसी sansthaon को shaktiyaan देनी चाहिए .........मीडिया अगर सरकार का हो गया तो लोकतंत्र की शक्ल इतनी badsoorat हो jayegi की उसके बारे में सोचने के लिए भी बड़ी himmat karni होगी ....

Wednesday, January 14, 2009

बोल कि लब आजाद हैं तेरे .....

अकबर इलाहाबादी ने अगर ये कहा था तो सोच समझ कर ही कहा होगा

खेंचो ना कमानों को ना तलवार निकालो

जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो

और ज़ाहिर है कि देश में सरकार, सरकारी और भ्रष्टाचारी पर ये तोप यानी कि मीडिया भारी पड़ने लगी है। दरअसल बड़ा सवाल यह नहीं है कि मीडिया पर सेंसरशिप हो या ना हो बल्कि बड़ा सवाल यह है कि हो या क्यूँ ना हो ? फिलहाल बात यह है कि हमारी गजब की निकम्मी सरकार मीडिया का मुंह बंद करने के लिए गजब की इच्छा शक्ति दिखा रही है। ब्रोड कास्ट बिल के बहाने जिस तरह से सरकार मीडिया को अपना पालतू गुलाम बनाने की कोशिश में है वह सफल तो नहीं होगी यह पक्का है पर उसे शायद यह अंदाजा नहीं है कि इस सब के चक्कर में उसकी कितनी फजीहत होने वाली है।

मेरा सवाल है कि आख़िर ऐसा क्या किया है देश के न्यूज़ चैनल्स ने ? क्या सच बोलना अपराध है या दिखाना ? क्या अगर हाकिम निकम्मे बन कर सोते रहे और जनता की आवाज़ उन तक ना पहुंचे तो उसको बुलंद करना गुनाह है ? मुंबई हमलों में मीडिया पर जिस तरह से आतंकवादियों की अप्रत्यक्ष मदद करने का इल्जाम लगा है वह अपने आप में ही हास्यास्पद है....और फिर अगर यहाँ मीडिया दोषी है तो क्या वे अधिकारी, मंत्री और खुफिया एजेंसी के लोग दोषी नहीं हैं जिनकी अकर्मण्यता और उपेक्षा की वजह से यह सब हुआ ? क्या इसके लिए सरकार दोषी नहीं है ?

दरअसल २६/११ के बाद जिस तरह से मुंबई और पूरे मुल्क की जनता सरकार और नेताओं के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुई....वह सरकार के सरदर्द का सबब है। मैं मानता हूँ कि कई जगह कई मामलों में मीडिया को विवेक से काम लेना होता है, मैं यह भी मानता हूँ कि उल जुलूल और गैर ख़बरीसामगी को ख़बर के तौर पर पेश करने से मीडिया की छवि ज़रूर गिरी है पर यह बताएं कि क्या अगर मुंबई हमले के बाद तीन दिन तक सारे अखबार, टीवी चैनल और वेब मीडिया लगातार लिखती और चीखती ना रहती तो


हमारे दोनों माननीय पाटिल इस्तीफा देते ?


क्या सरकार कभी पाकिस्तान पर इतना ज़बरदस्त दबाव बनाती ?


क्या हमारे वे मंत्री जो कहते रहते हैं कि देख रहे हैं, देखेंगे, दोषियों को छोड़ा नहीं जायेगा ....चुप रहते या फिर पड़ोसी के ख़िलाफ़ साहसी बयान देते ?


क्या ये पूरा मसला हमेशा की तरह एक दो हफ्तों बाद शांत हो कर अवचेतन में खो नहीं जाता ?


मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि हम ज़ाहिर तौर पर अपनी गलतियां भी स्वीकारें और अपने हक के लिए, अपनी स्वतन्त्रता के लिए अपनी तलवारें .....अपनी कलम हाथों में ले लें

हम पत्रकार हैं, हम जानते हैं कि हमें क्या करना है, हम अपनी गलतियां भी स्वीकारेंगे, हो सकता है कि हम कभी कोई बाबा या को जानवर ख़बर बना कर कभी दिखा दें पर हम कभी भी देश के ख़िलाफ़ नहीं जाते ..... ऐसा नहीं कि फालतू खबरें ग़लत नहीं हैं पर उस बहाने से मीडिया की स्वतंत्रता पर बुरी नज़र डालता है तो न तो हम यह बर्दाश्त करेंगे न ही यह लोकतंत्र का तकाजा है। सरकार मीडिया पर अंकुश लगाने की बात करती है...क्यूँ ? हमने कौन सा राष्ट्रीय संपत्ति को नुक्सान पहुंचाया है ? हमने क्या किसी राष्ट्रीय गोपनीयता के दस्तावेजों को लीक किया है ? क्या हम चैनल्स पर देश विरोधी बातें करते हैं ? और अगर ऐसा है तो क्यूँ नहीं सरकार हमें इसके लिए जेल में डाल कर हम पर राष्ट्र द्रोह का मुकदमा चलाती है ?

दरअसल चूँकि जनता अब जागने लगी है और सरकार के ख़िलाफ़ अब खुल कर सड़कों पर उतरने लगी है....हम अब दिखाने लगे हैं की किस प्रकार जनता का नेताओं पर से विशवास उठ चुका है.....ये अच्छी तरह से जानते हैं कि जनता का सड़कों पर इस तरह से उतरना इनके लिए अच्छा संकेत नहीं है और इसलिए अब ये यह चाहते हैं कि आम आदमी वही देखे जो यह दिखाना चाहते हैं।

पर इन सबको हम बताना चाहते हैं कि हम लोकतंत्र के चौथे खंभे की स्वतन्त्रता के लिए आखिरी सफलता तक लड़ाई लडेंगे ..... हम दूरदर्शन नहीं हैं और ना ही आप हमें कभी बना सकेंगे ! मीडिया पर सेंसरशिप लादने को तैयार सरकार क्या कहना चाहेगी अपनी सरकार में शामिल अपराधियों और दागियों के बारे में ? उस पर कोई रोक क्यूँ नहीं ? क्या कहेगी अपने लापरवाह अफसरों के बारे में या भ्रष्टाचार के बारे में .....? क्या कहेगी आख़िर क्या जवाब देगी ? देश की ८५% समस्याओं के जिम्मेदार नेता आज हम पर सेंसरशिप और नैतिकता की बात करते ना तो बहुत अच्छे लग रहे हैं ना ही महान सो बंद करें ये बकवास.....

इससे पहले भी इस तरह की कोशिशें हो चुकी है पर इतिहास अपने आप सब कुछ कह देता है। मीडिया को कुचलने की जितनी कोशिश की गई है, वह उतनी ही ताक़तवर हो कर उभरी है, अज्ञेय ने एक कविता में लिखा था....

मैं कहता हूँ मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ

कुचला जाकर भी धूलि सा, आंधी सा और उमड़ता हूँ

यह कोशिश है अपने ख़िलाफ़ उठने वाली किसी भी आवाज़ को अनसुना कर के सोते रहने की। आम आदमी को यह जानना चाहिए कि इस तरह की सेंसर शिप से सरकार अप्रत्यक्ष रूप से जन आंदोलनों की कवरेज़ पर भी रोक लगा देने का प्रयास कर रही है।

तो याद रखियेगा ये आवाम की आवाज़ है, और आवाज़ ऐ खल्क - नगाडा ऐ खुदा है तो इसे छुपाना कम से कम किसी इंसान के बस की तो बात नहीं। हम जितना दबाये जायेंगे, हमारा स्वर उतना ही और मुखर होगा ! अंत में रामधारी सिंह 'दिनकर' की पंक्तियों के साथ बात को अभी विराम.....

दो में से क्या तुम्हे चाहिए

कलम या कि तलवार

एक भुजाओं की शक्ति

दूजा बल बुद्धि अपार

कलम देश की बड़ी शक्ति है

भाव जगाने वाली

मन ही नहीं विचारों में भी

आग लगाने वाली

जहाँ पालते लोग लहू में

हलाहल की धार

क्या चिंता यदि वहाँ

हाथ में नहीं हुई तलवार




अब पढिये क्या कहते हैं मीडिया जगत के वरिष्ठ लोग ;

"सेंसर का नाम आपने बहुत दिनों से नही सुना , लेकिन इस सरकार के इरादे ठीक नही लगते अभी सिर्फ़ टीवी को रेगुलेट करने के नाम पर क़ानून बनाने की बात हो रही हैं। कानून का मतलब ये हुआ कि सिर्फ़ मुंबई जैसे हमले ही नही बल्कि गुजरात जैसे दंगो का कवरेज भी वैसे ही होगा जैसे सरकार चाहेगी। न तो हम अमरनाथ का आन्दोलन टीवी पर देख पाएंगे न ही पुलिस के जुल्म की तस्वीरें क्योंकि नेशनल इंटरेस्ट के नाम पर कुछ भी रोका जा सकता हैं । नेशनल इंटरेस्ट वो सरकार तय करेगी जो मुंबई में हमला नही रोक सकी।बात अगर टीवी से शुरू हुई हैं तो प्रिंट और इन्टरनेट तक भी जायेगी। अभी नही जागे तो बहुत देर हो जायेगी"

मिलिंद खांडेकर - मैनेजिंग एडिटर स्टार न्यूज़




"सरकार का इरादा टीवी चैनलों को रेगुलेट करना नहीं उन्हें अपने काबू में करना है ताकि कभी को ऐसी खबर जिससे सरकार की सेहत पर असर पड़े, चैनलों पर न चल पाए। अगर टीवी न्यूज चैनलों से मुंबई हमलों के दौरान कोई चूक हुई तो उसे सुधारने के लिए और भविष्य में ऐसी चूक न हो इसके लिए एनबीए ने अपनी गाइडलाइन जारी कर दी है। सभी न्यूज चैनलों के संपादकों के साथ बातचीत करने के बाद एनबीए आथारिटी के चेयरमैन जस्टिस जे एस वर्मा ने सेल्फ रेगुलेशन का ये गाइडलाइन लागू कर दिया है। फिर भी सरकार चैनलों सेंसरशिप की तैयारी कर रही है। ये मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है। इसे नहीं मंजूर किया जाना चाहिए और जिस हद तक मुमकिन हो इसका विरोध किया जाना चाहिए,वरना वो दिन दूर नहीं जब कोई सरकारी बाबू और अफसर नेशनल इंट्रेस्ट के नाम पर किसी भी न्यूज चैनल की नकेल कसने में जुट जाएगा। फिर कभी भी गुजरात दंगों के दौरान जैसी रिपोर्टिंग आप सबने टीवी चैनलों पर देखी है ,नहीं देख पाएंगे। कभी भी सरकार या सरकारी तंत्र की नाकामी के खिलाफ जनता अगर सड़क पर उतरी और उसकी खबर को तवज्जो दी गयी तो उसे नेशनल इंट्रेस्ट के खिलाफ मानकर चैनल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर दी जाएगी। हर सूबे और हर जिले का अफसर अपने -अपने ढंग से नेशनल इंट्रेस्ट को परिभाषित करेगा और अपने ढंग से इस्तेमाल करके मीडिया का गला घोंटेगा ।"

अजीत अंजुम - मुख्य सम्पादक, न्यूज़ २४




"सरकार न सिर्फ टीवी बल्कि प्रिंट और वेब मीडिया पर भी अपना अंकुश लगाना चाहती है। सरकार की ये कोशिश किसी मीडिया सेंसरशिप से कम नहीं है। प्रेस के लिए बाकायदा कानून हैं। अगर कोई विवाद की स्थिति होती है तो संस्था और पत्रकारों पर मुकदमे चलते ही हैं, लेकिन सरकार अब जो करने की कोशिश कर रही है वो प्रेस की आजादी पर हमला है, फंडामेंटल राइट्स के खिलाफ है।"

सतीश के सिंह



(इस लेख का मतलब यह नहीं की हम सब कुछ सही कर रहे हैं पर अगर यह बिल पास होता है तो कुछ भी सही नहीं होगा।)

छत्तीसगढ़ यात्रा कराने के लिए ..... बरुन को साधुवाद

यह बहुत कम होता है की आप किसी को धन्यवाद देने के लिए पोस्ट लिखें.....इसके लिए आम तौर पर केवल टिप्पणी देकर ही काम चला लिया जाता है पर शायद बरुन ने जो कुछ लिखा और जिस तरह मेरे अनुरोध को स्वीकार कर आगे बढाया वह मेरे लिए एक बड़ा उपहार है और संभवतः पाठकों के लिए भी।
मैंने एक टिपण्णी में इस ब्लॉग का मोडरेटर ही नहीं बल्कि एक सक्रिय पाठक भी होने के नाते बरुन के छत्तीसगढ़ पर पहले लेख पर ही अनुरोध किया था कि अगर उनके लिए सम्भव हो तो वे छत्तीसगढ़ पर एक बरुन श्रीवास्तव विशेष श्रृंखला लिख डालें। क्यूंकि बरुन इस समय ज़ी न्यूज़ के छत्तीसगढ़ चैनल में ही पत्रकार हैं तो उनसे यह अनुरोध जायज़ भी था पर सुखद आश्चर्य यह है कि बरुन ने अपने इतने व्यस्त समय में से कुछ हिस्से निकाल कर अब तक तीन धुँआधार पोस्ट लिख डाली है जिसमे छत्तीसगढ़ के अलग अलग रंग दिखे हैं। इस नाते मुझे लगा कि एक ऐसा राज्य जिस के बारे में तथाकथित नगरिया सभ्यता कम ही जानती है उसके बारे में हमें नई जानकारी मिल रही है।
जब मेरे और बरुन के बीच वैचारिक बहस का दौर चला था तब कई लोगों ने उसे एक लड़ाई का नाम दिया था और उसे बंद करने को कहा था। कुछ लोगों को यह शंका थी कि इससे मेरे और बरुन के व्यक्तिगत संबंधों पर भी असर पड़ेगा तो कुछ ने सहपाठी होने की दुहाई भी दी थी पर मेरे अनुरोध पर बरुन का यह बड़प्पन सबकी शंकाएं निर्मूल साबित करता है।
तो मेरी तरफ़ से बरुन को कोटि साधुवाद....बरुन के इन लेखों को केव्स संचार एक श्रृंखला के तौर पर प्रकाशित कर रहा है। इसके सारे लेख पढने के लिए साइड नेविगेशन में दूसरे क्रम पर छत्तीसगढ़ यात्रा के नाम से एक संपर्क सूची है जिसमे आप क्लिक कर के ये श्रृंखलाबद्ध पोस्ट पढ़ सकते हैंबरुन इंतज़ार है छत्तीसगढ़ पर आपके छत्तीस लेखों के दस्तरख्वान का !

छत्तीसगढ़ः एक खोज

मुझे अफसोस है कि छत्तीसगढ के छेरछेरा पर्व के बारे में तारीख 11से पहले मुझे कोई जानकारी नहीं थी। संभवतः आपको भी नहीं होगी, अगर होगी भी तो एक हल्की, सुनी-सुनी सी बात की तरह। जो लोग इस राज्य के नहीं हैं या किसी रूप से यहाँ से नहीं जुड़े हैं, उनके लिए तो ये शब्द भी अनजाना हो सकता है।.........क्यों ऐंसा हुआ ? आखिर कारण क्या था ? जो मैं राज्य की छाती रायपुर में रह कर भी इस विषयक जानकारी नहीं जुटा सका या फिर इस बारे में कोई पता न चल सका.....क्या ? मेरी रुची नहीं थी इसे जानने की या फिर मेरी लापरवाही। क्या कहा जाए ?........लेकिन दोस्तों ऐंसा कुछ भी नहीं है...इसका कारण सीधा सा ख़बरों के अकाल को तरसता मीडिया, इस ख़बर पर ठीक पर्व के दिन ही बन सका इससे हम जैसे वाहरी लोगों के लिए यह पर्व नया हो गया.......मैं यहां मीडिया को दोष नहीं दे रहा हूँ बल्की उन मेरे साथियों से भी असंतुष्ट हूँ, जो इस राज्य का गुणगान करने में कंजूसी करते हैं। बल्की कुछ लोग तो मुंह से आवाज़ तक नहीं निकालते....किसी नई जगह की बेहतर जानकारी कागज,पन्नों से ही नहीं जुटाई जा सकती बल्की ज़्यादा अच्छी और वास्तविक जानकारी लोकल के लोगों से ली जा सकती है.....मगर अफसोस, छत्तीसगढ़िया ऑफिस में हर अगला आदमी लोकल है, फिर भी छेरछेरा का पता तक नहीं चला। आखिर ये सब बात करने के पीछे मेरी मंशा किसी के ज्ञान पर सवाल खडे करने की नहीं है वरन लोगों के उत्साह को परखने की है...कोई बात अगर मध्यप्रदेश की होती तो सभी लोग उत्साह के साथ तीज त्यौहारों की बात कर रहे होते रोज़ एक बार तो ज़रूर ही ये बात आ जाती कि फलां दिन फलां तीज या त्यौहार है....और सिर्फ मध्यप्रदेश ही क्यों भारत के सभी राज्यों में कमोवेश ऐसं ही होता। क्या ये मीडिया की उदासीनता है ? या फिर स्थानीय लोगों की उत्साह हीनता। खैर जो भी हो मगर इस त्यौहार ने छत्तीसगढ़ के एक और रचनात्मक पहलू से रूबरू ज़रूर कराया है....इस दिन गांव के बच्चे घर-घर जाकर इस गीत के साथ धान मंगते हैं....अगरहिन ल नेवतेंव,बगरहिन ल नेवतेंव,नेवतेंव बन के चांटी,पीपर तरी के खुसरा ल नेवतेंव,ओखरों बड़े बड़े आंखी.....और साथ ही बच्चे गाते है...छेरछेरा,माई कोठी के धान ल हेरहेरा....मैं दुर्भाग्यवश इस पर्व का साक्षी नहीं बन सका क्योंकि नवयुग के जींस ठाठ के लोग इन सब परंपराओं को देखना या इनका ज़िक्र करना तक अपना पिछड़ापन मानते है। रायपुर या लाइक दिस सिटी में ये पर्व उतने उत्साह से नहीं मनाया गया जितना उत्साह गांवों में देखा गया.....गांव ही तो हैं जो परंपराओं को लेकर चल रहे हैं और निरंतर बिखराव सह रहे हैं।........मीडिया और माउथ पब्लीसिटी के लोगों से निवेदन है कि अपनी जड़ों में मठा ना डालें।.......फिर भी जो कुछ भी इस बारे में पता चला आखिर मीडिया से ही....तो फिर धन्यवाद में क्यों कंजूसी.........धन्यवाद मीडिया........

छत्तीसगढ़ एक उगता सूरज।

छत्तीसगढ़ की उम्र आठ साल हो चुकी है...यूं तो ये बड़ा वक्त नहीं, जो किसी से इतनी अपेक्षायें पाल ली जाएं कि आलोचनाओं के तीर पर तीर छोड़े जाने लगें। हाँ लेकिन ऐंसा भी नहीं कि ये कोई कम समय है...दरअसल इस राज्य की विडंबना कहिए या नेताओं का निकम्मापन....कुछ भी कहें आज इसने जो पाया है वह अपने अकेले दम पर मध्यप्रदेश के ज़माने में तो जैसे ये सिर्फ भारी भरकम टेक्स देने वाली ज़मीन भर था.....राज्य विखंडन के बाद नई स्फूर्ती के साथ स्टेट ने अपनी हाज़िरी दर्ज़ कराई...मीडिया भी इस राज्य को पिछड़ा समझता था मगर ये बात अब बीते वक्त की हो चुकी है....सदियों से मुंह चिढ़ाते भोपाल को आज इस राज्य ने पीछे छोड़ दिया है....भोपाल से जहाँ एक भी समाचार चैनल अपना प्रसारण नहीं करता वहाँ रायपुर से एक सेटेलाइट समेत क़रीब दो चैनल्स का प्रसारण होता है.........मीडिया ने इस राज्य पर नज़रे इनायत नहीं की है...ना ही कोई अहसान ही कर रहा है...अगर ऐंसा था तो पहले भी ये सब किया जा सकता था......कुल मिला कर मीडिया अपना स्वार्थ लेकर इस राज्य में घुसपैठ कर रहा है,राज्य प्रगति की नई कहानी लिख रहा है....इसी का एक उदाहरण है यहाँ से दो चैनल्स का प्रसारण और आने वाले वक्त में मध्यभारत का मीडिया हब बनने की ओर अग्रसर होना.....चाहे वह स्टार के रीजनल बकेट्स की बात हो या आजतक के क्षेत्रीय चैनल की सभी के प्रसारण केंद्र रायपुर में बनने की संभवनाएं हैं....कोई कहे ना कहे मगर यह सत्यता है कि इस रीजनल मीडिया क्रांती को रायपुर से शुरू करने और नये मीडिया युग के सूत्रपात के आग़ाज़ पीछे ज़ी24घंटे,छत्तीसगढ़ की बड़ी भारी भूमिका है। जिसके लिए ज़ी परिवार को साधूवाद.........

Tuesday, January 13, 2009

उत्सव प्रिया मानवः

आज शाम चैनल वालों ने लोहड़ी के उत्सव को मनाने का खासा इन्तेजाम कर दिया था। सुबह दफ्तर पहुँचते ही एक ई मेल मिली जिसमें लिखा था,
" ढोल की गूँज और अलाव की गर्मी के माहौल में आप सभी के साथ हम नाच नाच कर लोहडी मनाना चाहते हैं। समय शाम ६ बजे दफ्तर के ही प्रांगण में।"
ऐसा लुभावना प्रस्ताव और आमंत्रण तो कोई महा नीरस व्यक्ति ही छोडेगा। सो हम भी छः बजे पहुँच गए लोहडी मनाने। वैसे आपको बताते चलें कि लोहडी मूलतः पंजाब में मनाया जाने वाला पर्व है। इसको मनाने के कारण गिनाये तो तमाम जाते हैं पर बड़े कारण दो ही हैं एक तो यह की इस समय सर्दी की विदाई शुरू हो जाती है और अगले दिन यानी कि मकर संक्रांति से ही सूर्य उत्तरायण होने लगता है। तो अलाव के किनारे नाच गा कर, रक्त शुद्धि के लिए नई फसल के तिल, गुड, मूंगफली और मक्का को अग्नि को समर्पयामि कर के ख़ुद भी उसका प्रसाद ग्रहण करते हैं।
अच्छा दूसरा कारण जो बताया गया वह थोड़ा किवदंती वाला है। कहते हैं कि अकबर के समय के आस पास पंजाब में एक लुटेरा हुआ करता था जिसका नाम था दुल्ला भट्टी, ये साहब एक गरीब मुस्लिम परिवार से थे और अमीरों को लूट कर गरीबों को निहाल किया करते थे। इस लिहाज से इन्हे हम रोबिन हुड का भी पूर्ववर्ती मान सकते हैं। कहा जाता है कि ख़ुद मुस्लिम होते हुए भी कई बार इन्होने खाड़ी के मुल्कों में ज़बरन ले जाई जा रही हिन्दू लड़कियों को मुक्त कराया और देखते ही देखते पूरे पंजाब के हीरो बन गए। हालांकि इस बारे में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि इनका इस पर्व से क्या सम्बन्ध है पर लोहडी के हर गीत में दुल्ला भट्टी का उल्लेख ज़रूर मिलता है।
इसके अलावा तीसरी चौथी और पांचवी कथा भी है पर मैं आज यह पोस्ट कथा सुनाने की लिए नहीं लिख रहा हूँ। मकसद कुछ और है। लोहडी की जलती लकडियाँ, बंटती मूंगफली, रेवडी और ढोल की धुन पर मदमस्त होकर नाचते अपने साथियों को देख कर मेरे दिमाग में ये दंतकथाएं नहीं घूम रही थी बल्कि महाकवि कालिदास की एक सूक्ति उचर रही थी,
उत्सव प्रिया मानवः
उस आंच और थिरकते नौजवानों और संग बूढों के अन्दर की ऊर्जा को भी महसूस कर पा रहा था और समझ रहा था कि कालिदास ने क्या और क्यूँ कहा था। देखिये ना इतिहासकारों की छोड़ दें तो आम आदमी कहाँ किसी भी त्यौहार के असली कारण को बहुत मर्म में जाकर समझता है ? हमारे या दुनिया के किसी भी धार्मिक उत्सव को मनाने के पीछे की कहानियां बहुत तार्किक या पुख्ता नहीं हैं और ना ही पूरी हैं पर हम मनाते हैं और इस धूम धाम से कि क्या कहा जाए। दरअसल हम उत्सव मनाना चाहते हैं, जीवन की दुःख तकलीफों को झेलते हुए हम कुछ समय चाहते हैं जब हम हंस सकें, त्यौहार मना सकें, पकवान खा सकें और लोगों से हंस के मिल सकें। हम इतना नाचते हैं और अपनी पूरी नकारात्मक ऊर्जा उसमे नष्ट कर देते हैं और जब नाच कर थक के चूर होते हैं तो एक अनोखे आनंद से भरे होते हैं और सुखद सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज़। ( कभी महसूस नहीं किया क्या ) ज़रूर ध्यान दें कि क्यों आख़िर व्यक्ति खुल कर नाचते समय एक अजीब से नशे से मदमस्त हो जाता है.....उसने सोमरस पिया हो या ना पिया हो !
दरअसल यह मानव की ख़्वाहिश है जो कभी ख़त्म नहीं होती पर रोज़ पूरी नहीं हो सकती है सो जैसे और जब मौका मिले तब......क्यूँ आख़िर ऐसा होता है कि दूसरे की शादी में भी आदमी मदमस्त होकर नाचता है.....? सच में आज के मौके ने मुझे एक दर्शन दिया....कि जब मैं ख़ुद उस उत्सव में शामिल हो कर नाच रहा था तब मैं महसूस कर पा रहा था...मैंने उन लोगों को भी देखा जो भद्र होने का प्रयास कर रहे थे....वे दूर खड़े तो थे पर पैर उनके भी लगातार तल पर ताल दे रहे थे। अंत में जब हमारे आउट पुट हेड और एच आर हेड भी हम सबके साथ नाचने आ उठे और ढोल की थाप और तेज़ होती गई........कुछ दिख नहीं रहा था....रौशनी के सिवा, कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.....संगीत के सिवा, कुछ महसूस नहीं हो रहा था.....आनंद के सिवा......एक परालौकिक आनंद.....जो केवल इसी लोक में मिल सकता है.....
समझ में आया कि वस्तुतः पारलौकिक कुछ भी नही.....जो सबसे लौकिक है, वही सबसे पारलौकिक है.....जो सबसे भदेस है....वही सर्वाधिक सुखदायी है।
दरअसल उत्सव का कोई धर्म नहीं ......उत्सवधर्मिता ही सबसे बड़ा मानव धर्म है। कालिदास फिर कहने लगे कि देखो मैंने कहा था न.....उत्सव प्रियः .....कोई पीछे से लोहडी का प्रसिद्द लोकगीत गा रहा था.....
सुंदर मुंदरिये हो !
तेरा कौन विचारा हो !
दुल्लह भट्टी वल्ला हो !
दुल्ल्हे दी धी व्याये हो !
सेर शक्कर पाई हो!
कुड़ी दा लाल परांदा हो!
एक भोला रह गया!
सिपाही पकड़ के लै गया!
सानू दे दे लोहरी
ते तेरी जीव जोड़ी!
और गीत समझ में ना आने पर भी वहाँ ज़्यादातर लोग अपने सबसे बड़े धर्म का निर्वाहन कर रहे थे.....उत्सवधर्मिता का !
( ये गीत बचपन में याद किया था....पंजाबी ना होने के बावजूद टूटा फूटा भी याद रहना उपलब्धि मानी जाए)

Sunday, January 11, 2009

हम रहें या न रहें लेकिन यह झंडा रहना चाहिए

(यह लेख कल लिखा गया था पर बैंडविथ की समस्या के कारण आज प्रकाशित किया जा रहा है)

'हम रहें या न रहें लेकिन यह झंडा रहना चाहिए और देश रहना चाहिए। मुझे विश्वास है कि यह झंडा रहेगा, हम और आप रहें न रहें, लेकिन भारत का सिर ऊँचा होगा।'

कौन सा भारतीय होगा जिसका मस्तक इन शब्दों को सुन कर गर्व से ऊंचा किस हिंन्दुस्तानी का सर इस गर्जन को सुनकर ऊंचा नहीं हो जाएगा ? यह सिंह नाद किया था लाल किले की प्राचीर से भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री ने। १५ अगस्त १९६५ की उस सुबह वह भाषण इसलिए ही नहीं महत्वपूर्ण था कि उसे प्रधानमंत्री ने दिया था बल्कि इसलिए भी कि उस समय भारत एक युद्ध की स्थिति से जूझ रहा था.....युद्ध जो थोपा गया था, युद्ध जो प्रतिष्ठा का प्रश्न था। ठीक आज की तरह....

आज मैं यह बात इसलिए कर रहा हूँ कि आज ११ जनवरी है और आज शास्त्री जी पुण्यतिथि है। दुर्भाग्य यह रहा कि मीडिया को ढूंढ ढूंढ कर कोसने वाला ब्लॉग जगत भी आज इससे अनजान रहा, क्या वाकई हमें याद नहीं था या हम याद करना नहीं चाहते। शास्त्री जी की पुण्यतिथि का भी महत्त्व इसलिए ज्यादा है कि उनका निधन तब हुआ जब वे रूस के ताशकंद में पाकिस्तान के साथ ऐतेहासिक समझौते के लिए गए थे।

२ अक्टूबर १९०४ को मोहन दास करमचंद गाँधी के जन्म के ठीक ३५ वर्ष बाद उत्तर प्रदेश के मुगलसराय कसबे में लाल बहादुर शास्त्री का जन्म हुआ पर जन्म के दो साल बाद ही पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव का देहावसान हो गया। माता के साथ लाल बहादुर मामा के पास चले गए। ये वे संकट और दुःख के दिन थे जब पिता के ना होने का एहसास और पराव्लाम्बित होने की पीड़ा की पहली वेदना को महसूस किया। बचपन से ही कद छोटा और काठी कमज़ोर थी और लाल बहादुर एक दोहा अक्सर गुनगुनाते थे
नानक नन्हे ही रहो, जैसे नन्ही दूब
और रूख सूख जायेंगे, दूब खूब की खूब
इस पीड़ा और परावलंबन की वेदना ने उन्हें वह ताक़त और हौसला दिया कि बचपन में स्कूल जाते पर जेब में नाव का किराया ना होने पर बाढ़ में उफनती हुई गंगा को तैर कर पार करते करते ज़िन्दगी के हर उफान को उसी हिम्मत और जज्बे से पार करते गए। असहयोग आन्दोलन में भाग लेने की वजह से जब सरकारी स्कूल से निकाल दिए गए तो १६ मील पैदल चल कर काशी विद्यापीठ रोज़ जाना वह जिजीविषा दिखाता है जिसने कभी हार नहीं मानी।
आज़ादी की लड़ाई के साथ ललिता शास्त्री से परिणय सूत्र में जुड़े, ससुराल से लिया एक खादी का थान और चरखा....यह थी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता। १५ साल के स्वाधीनता आन्दोलन के जीवन में ९ साल जेल में रहे, आज़ादी के शास्त्री जी रेल मंत्री थे जब एक गेट मैन की असावधानी से हुई दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी ख़ुद पर लेते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस कदम पर पंडित नेहरू ने कहा था,
'उनमें ऊँचे दर्जे की ईमानदारी, आदर्श के प्रति निष्ठा, अंतरात्मा की आवाज सुनने और कड़ी मेहनत करने की आदत है।'
क्या शिवराज पाटिल जैसे लोग भी उसी कौंग्रेस का हिस्सा हैं...१९६५ में देश में खाद्य संकट के समय जब अमरीका ने अनाज देने का प्रस्ताव रखा तो शास्त्री जी प्रधान मंत्री थे, राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उन्होंने कहा,
"साग सब्जी ज्यादा खाओ, सप्ताह में एक शाम उपवास रखो। जीना है तो इज्ज़त से जियेंगे, बेईज्ज़ती की रोटी से इज्ज़त की मौत भली।"
क्या है आज के किसी नेता में ऐसा आत्म सम्मान
पाकिस्तान के हमले पर शुरुआत में जब सरकार गांधीवादी नीति अपनाती रही तब लोकसभा में एक बार शास्त्री जी को Chiken Hearted (मुर्गी के दिल वाला) कह दिया गया। व्यथित शास्त्री जी अपने कार्यालय पहुंचे और तीनो सेनाध्यक्षों को बुला कर हमलावरों को कुचल देने का आदेश दे दिया। १३ दिन के अन्दर भारतीय सेनायें लाहोर पहुँच गई। पाकिस्तान के अमरीका से उधार लिए गए पैटन टैंक नेस्तनाबूद कर दिए गए।
बाद में रूसी राष्ट्रपति कोसिगिन के हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता हुआ....तारीख थी १० जनवरी १९६६ और उसी रात तथाकथित ह्रदय गति रुकने से ताशकंद में ही शास्त्री जी का निधन हो गया। रूस की जनता जो उनके स्वागत में सडको पर उतर आई थी, नम आंखों से उनको विदाई दे रही थी। भारत में जब उनका शव विमान से उतरा तो उसे श्री कोसिगिन और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान कन्धा दे रहे थे।
छोटे कद का विराट व्यक्तित्व चिर निद्रा में था। बचपन में गंगा के तट से शुरू हुई मझ्धारों की यात्रा अब परिणिति की ओर थी
माना अगम अगाध सिन्धु है, संघर्षों का पार नहीं है
किंतु डूबना मझधारों में, साहस को स्वीकार नहीं है
देश ने उनके १८ माह के प्रधानमंत्रित्व में आत्म सम्मान और हौसला पाया पर उनको खो दिया। एक ऐसा प्रधान मंत्री जो कद काठी में साधारण से भी कम और व्यक्तित्व में असाधारण से भी ज्यादा, जो बच्चो के द्बारा सरकारी कार के प्रयोग होने पर अपनी जेब से उसमे पेट्रोल डलवाता था....एक ऐसा प्रधानमन्त्री जिसके पास अपनी मृत्यु तक ख़ुद का मकान नहीं था......क्या आज ऐसे राजनेता हैं या कभी भविष्य में होंगे। अभी मैं उनको याद कर रहा हूँ और पीछे हरी ॐ शरण की आवाज़ में कबीर का भजन चल रहा है...जो शास्त्री जी का भी प्रिय भजन था .....
झीनी झीनी बीनी चदरिया
काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया
इडा पिङ्गला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया
आठ कँवल दल चरखा डोलै, पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया
साँ को सियत मास दस लागे, ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया
सो चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढि कै मैली कीनी चदरिया
दास कबीर जतन करि ओढी, ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया

मेरे नज़र में छग...

4 जून 2008 की सुबह राज्य की राजधानी में पहली बार मैं जब आया तो यहाँ की भीषण गर्मी ने मुझे पिछ्छे पांव लौटने का सा अनुभव कराया। तारीख़ 06 को हुए दूरदर्शन के इंटरव्यूह में चयन के बाद ज्वाइन ना करने की बजह यहाँ की जलती धूप सुलगती दोपहर और आंचभरी शाम हल्की गर्म रात ऊपर से जहां-तहां सढ़ांध मारती दुर्गंध उफ कैसे रहूंगा इस शहर में.....जबकि नौकरी मेरी ज़रूरत ही नहीं बल्की मज़बूरी भी थी॥फिर भी ना बाब ना यहां रहना....कभी नहीं सोचा था इत्तेफ़ाक से ज़ी24घंटे,छत्तीसगढ़ का इंटरव्यूह कॉल और समयांतर में चयन लगा सखाजी की यही इच्छा है....तब इस राज्य को कर्मभूमि बनाने का फैसला महज़ एक नौकरी नहीं बल्की इसे समझने की एक ज़िद और जानने की जिज्ञासा भी थी.....शुरूआत में जितनी दिक्कतें हो सकती थीं होती गईं...बाद में लगा प्रदेश ना सिर्फ नक्सली हिंसा का पर्याय है बल्की औऱ भी कुछ है..और भी कुछ हां जी और भी कुछ... राज्य में कितनी प्राकृतिक संपदा है यह मेरे लिए गौढ मुद्दा है जबकि प्रदेश में कितना प्राकृतिक सौंदर्य है यह बड़ा सवाल है...आज की आपाधापी भरी ज़िंदग़ी में वक्त कस कर भिंची मुठ्ठियों से भी खिसक रहा है...जीवन एक कठिन चुनौती बनता जा रहा है..रचनात्मकता और तकनीकि का शीतयुद्ध सा छिड़ा है...ऐंसे में दो पल घने पेड़ की छांव में बिता कर जो सुख मिलता है वह किसी उपभोग में नहीं है......मुझे यह प्रदेश सिर्फ इसीलिए अच्छा लगा कि यहाँ के लोग सीधे सरल भोलेनाथ हैं जो इनकी सबसे बड़ी कमी भी बना हुआ है,ज़्यादा पसंद आया। इतना ही नहीं यहां के लोगों के बोल-चाल रहन-सहन में गांव की खुशबू है जो अक्सर तथाकथित वैश्वीकरण में हीन भाव समझा जाता है...शेष सभी संपदाओं का भंडार व्यापारियों के लिए छोड़ता हूं कि वे ही गौर फरमाये और यहाँ के मूलनिवासियों का जो शोषण कर सकें वे करें....इस पर लकीर पीटना मुझे नहीं आता....मेरा राज्य के प्रति किसी अज़नवी को कोई भी राय बिना समझे बनाने से रुकने का आग्रह है... युवा अग्रणी पठनशील जिज्ञासु कर्मशील लोगों से इस राज्य को बड़ी उम्मीदें हैं। सिर्फ लोहे,लक्कड़,धातु धतूरों से कोई राज्य बनिया दृष्टि से संपन्न हो सकता है लेकिन लोगों की आत्मीयता,स्वागतातुरता,ईमानदारी,और फका दिली ही सच्चे मायने में रहने,बसने का सा महसूस कराती है...वरना छत की तलाश में लोग कहीं भी घर बनाने में नहीं चूकते.....और ये सब इस राज्य में मैने महसूस किया है...वस थोड़ा सा लोग कन्फ़्यूज़न छोड़ दें कुछ ज़्यादा ही किंकर्तव्यव्यूमूढ़ हैं.....अस्तु.....

Saturday, January 10, 2009

हम भी कार्टून, साल भी कार्टून....

आज की श्रृंखला में आज हमने सोचा कि कुछ अनूठा किया जाए तो हम आज वाकई एक अभिनव प्रयास लेकर आए हैं। हमने सबसे पहले एक चित्र श्रृंखला प्रस्तुत की थी .....आज एक कदम आगे जा कर हम बीते हुए साल को कुछ रोचक कार्टून के रूप में पेश करेंगे ....हमने प्रयास किया है कि पिछले साल की प्रमुख घटनाएं जिनको कार्टूनिस्टों के हमलों का सामना करना पड़ा उन्हें आपको दिखायें, हमने इकट्ठे किए हैं साल के कुछ सबसे रोचक व्यंग्य चित्र सो मज़ा लें ....महीनेवार
जनवरी २००८


नैनो ने ऐसे सपने दिखाए कि साल भर नींद न आई
न टाटा को, न ममता को, न सिंगूर की जनता को
फ़रवरी 2008

कम्युनिस्टों ने थामा हाथ कैपिटलिस्टों का
सेज़ पर मचा बवाल
मार्च 2008
खाली बैठे आडवाणी ने, वक़्त नहीं किया खराब
पी एम कब बनें क्या पता, लिख डाली किताब
अप्रैल 2008

एक ओर बुंदेलखंड में मरते रहे किसान
नेता रहे खेलते उसपे, राजनीतिक घमासान
मई 2008

पूरे मुल्क में फैली थी भुखमरी, मंहगाई
और सियासतदान ससुरे खाते रहे मलाई

जून 2008
कोशिश कर कर के थके, निकला मुंह से झाग
आरुषि हत्याकांड के न पुलिस को मिले सुराग
जुलाई 2008

नेता अपने बेशरम, सभी जने है बुझाय
पर अबकि ये संसद में नोट दिए लहराय
अगस्त 2008

ख़त्म हुई अपमान की, परम्परा वह ओल्ड
सुशील, विजेंदर और बिंद्रा, जीते ब्रोंज़ और गोल्ड
सितम्बर 2008

कई मरे बम ब्लास्ट में, हुए सैकड़ो चोटिल
बैठ के घर पर, सोलहों सिंगार कर रहे पाटिल
अक्टूबर 2008

डूब गया घर और फ़सल, फैल रहे थे रोग
नेतवा हैलीकाप्टर में, फंसे बाढ़ में लोग
नवम्बर 2008

अमरीका में मच गया देखो क्या हंगामा
जूता बुश के जा पड़ा और जीते ओबामा
दिसम्बर 2008


देश पर हमले से दुनिया ने देखा पाक का सच
क़सम है अबकि किसी तरह से जो वो जाए बच
हमेशा कि तरह उम्मीद तो यही है कि ये आपको पसंद आया होगा

Wednesday, January 7, 2009

चुनाव परिणामो ने लौटाई हसीना की मुस्कान .......

खासी गहमागहमी के बाद बंगलादेश में शेख हसीना के नेतृत्व वाली आवामी लीग पार्टी ने भारी बहुमत से जीत दर्ज कर ली है बंगलादेश में संपन्न हलिया चुनावो ने दिखा दिया है की हार और जीत तो चुनावो के साथ लगे रहती है लेकिन असली किंग वही बन पता है जिसको जनता जनार्दन का प्यार मिलता हैइस चुनाव में जहाँ शेख हसीना की आवामी पार्टी को २२५ सीटे मिली है वही खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनल पार्टी मात्र २६ सीटो पर सिमट गई इस लिहाज से देखे तो खालिदा की पार्टी की यह अब तक की सबसे करारी हार है हसीना की इस जीत के कई एतिहासिक मायने है बांग्लादेश में यह पहला अवसर है जब किसी पार्टी को इतने भारी बहुमत से जीत मिली है इस बार के चुनाव में मतदान का परसेंट भी ज्यादा देखा गया जिस कारन लोग यह मानकर चल रहे थे की दोनों पार्टियों के बीच कडी टक्कर देखने को मिलेगी लेकिन जब चुनाव परिणाम सामने आए तो राजनीती के पंडितो के होश उड़ गए सारे अनुमानों को धता बताकर हसीना की आवामी पार्टी बदलाव की बयार पर सवार हुई

बांग्लादेश में पिछले कुछ वर्षो से भारी अस्थिरता का माहौल रहा इस दरमियान वहां पर सेन्य सरकार का भी नियंत्रण रहा जिससे दोनों प्रधानमंत्री भी अछूती नही रही आपातकाल के दौर में दोनों को सलाखों के पीछे रहना पड़ा लेकिन जनता के भारी दबाव के चलते सेन्य सरकार को चुनाव करवाने को विवस होना पड़ा जिसका परिणाम आज हम लोकतंत्र की परिणति के रूप में देख रहे है बीता साल पड़ोस में लोकतंत्र के लिहाज से भारत के लिए शुभ रहा है इस दौरान पाकिस्तान, नेपाल , भूटान , मालदीव में लोकतंत्र स्थापित हुआ अब नव वर्ष की इस कड़ी में हमारे लिए बांग्लादेश लोकतंत्र की नई सौगात लेकर आया है

भारत ने १९७१ में बांग्लादेश के मुक्ति आन्दोलन में उसको सहयोग दिया जिसकी आवश्यकता वहां की स्थानीय जनता को थी भारत शुरू से बांग्लादेश से दोस्ती का हिमायती रहा है बांग्लादेश के पितामह शेख मुजी बुर रहमान के रहते दोनों देशो के बीच सामान्य सम्बन्ध रहे परन्तु उसके बाद पाकिस्तान पोषित आई एसआई ने दोनों मुल्को के बीच के संबंधो में तल्खियों को बढाना शुरू कर दिया इस मिशन को पूरा करने में खालिदा जिया ने बड़ा योगदान दिया जो पाक के कट्टरपंथियों की हम दम साथी बने रही नए युवको को आई एस आई आतंकवाद फेलाने के लिए तैयार करने में लगी रही यही वह दौर था जब बांग्लादेश आतंकवाद की नर्सरी के रूप में जाना जाने लगा भारत में आतंकी घटनाओ को बढावा देने के लिए भरती किए जाने वालो नौजवानों को उकसाया जाने लगा इस दौरान भारत बांग्लादेश की खुली सीमा घुसपैठियों की पनाहगाह बनी रही जिस कारन लाखो की संख्या में लोग भारत में घुस गए आज यही घुसपैठिये भारत के लिए बड़ी चुनोती बन गए है क्युकिइन्होने भारत की नागरिकता और राशन कार्ड प्राप्त कर लिए है बंगलादेश सरकार इस घुसपैट की समस्या को शुरू से नकारती रही है शेख हसीना का पिछला कार्यकाल बताता है उनका झुकाव भारत की तरफ़ ज्यादा रहा है अब उनके प्रधानमंत्री बननेके बाद उम्मीद है वह भारत दोनों देशो के बीच सम्बन्ध सुधारने की दिशा में अपना अहम् रोल निभाएंगी साथ ही वह बांग्लादेश में चल रही आतंकवादी गतिविधियों और आई एस आई की अति सक्रियता पर अंकुश लगाएंगी आने वाले दिनों में कई चुनोतियों से पार पाना हसीना के लिए आसान नही रहेगा देखना होगा वह इन सबका मुकाबला कैसे करती है ??

चुनाव में जीत के बाद हसीना ने कहा है वह बांग्लादेश की धरती को आतंकवाद की नर्सरी बन्नेपर रोक लगाएंगीइसको भारत के लिए शुभ संकेत मान सकते है पिछले कुछ समय से बांग्लादेश में हुजी ने दिनों दिन अपना प्रभाव बढाया है यही नही उल्फा ने भी बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए किया मुंबई के घावो पर अभी मरहम भी नही लगा था की अचानक आसाम में बम धमाके हो गएइसमे भी ऐसे कयास लगाये जा रहे है की घटना की रणनीति बांग्लादेश में बनी थी अभी तक बांग्लादेश की सरकार कट्टरपंथियों के इसारू पर नाचती रही है बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को पाक का बड़ा समर्थक माना जाता रहा है जिस कारन भारत के साथ उसकी गाडी पटरी पर कम बैटीइस चुनाव में जिया को आशा थी की वह फिर से वापसी कर प्रधानमंत्री बनेंगी लेकिन मतदाताओ की गुगली ने " जिया को " बेक फ़ुट " ड्राइव पर ला दिया है अभी तक यह सवाल जिया के मन को कचोट रहा है आख़िर उनकी पार्टी से कहाँ चूक हो गई जो उनकी पार्टी २६ पर सिमट गई पर यह तो जनादेश है जनता का फेसला तो सभी को मान्य होना चाहिए
इस चुनाव में हसीना ने जिस तरह से कट्टरपंथियों को आडेहाथो चुनाव प्रचार के दौरान लिया वह दिखाता है हसीना के पास इस बार बांग्लादेश के विकास का नया विजन है जिसके लिए उन्होंने इक बड़ी कार्ययोजना तैयार की है जिसको अमल में लाने की तैयारी वह करने जा रही है हसीना को यह समजना होगा मतदाताओ ने जिस विस्वास के साथ उन पर भरोसा व्यक्त किया है उन पर वह पूरा खरा उतरने की कोसिस करेंगी मुंबई पर हमले के बाद भारत ने बांग्लादेश से आतंकियों की माग की है जिस पर बांग्लादेश की नई सरकार के रुख का सभी को इंतजार है देखना होगा इस मसले पर ऊट कौन सी करवट बैठता है???

Tuesday, January 6, 2009

कपिल देव का जवाब नहीं


आज ६ जनवरी है और आज है भारत को क्रिकेट विश्व कप दिलाने वाले महान हरफनमौला क्रिकेटर कपिल देव का जन्मदिन। कपिल ख़ास और महान क्रिकेटर हैं इस मायने में नहीं की उनकी अगुआई में हमने विश्व कप जीता बल्कि इस कारण से कि वे हमेशा अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने और खुल कर अपनी बात रखने से कई बार मुसीबतों से भी घिरे पर हमेशा साहस दिखाया। शायद इसी वजह से वे अपने समकालीन और खिलाड़ियों से ऊपर उठ जाते हैं।
कभी हार ना मानने का रवैया और कुछ अलग की ओर उनका खिचाव जगजाहिर है। फिर चाहे क्रिकेट से संन्यास के बाद गोल्फ का पेशेवर बन जाना या बी सी सी आई के ख़िलाफ़ जा कर आई सी एल के साथ खड़े हो जाना यह सब ना केवल अलग है बल्कि मिथक और तानाशाही तोड़ने के लिए उनकी प्रतिबद्धता भी। एक योद्धा जो अन्दर से शिशु है, आपको याद होगा कि जब कपिल पर फिक्सिंग का आरोप लगा तो कैसे वे एक बच्चे की तरह टीवी कैमरे पर फूट फूट कर रो पड़े थे।
हममें से क्रिकेट का कोई भी शौकीन उनकी १९८३ विश्व कप में जिम्बाब्वे के विरुद्ध खेली गई १७५ रनों की आतिशी पारी को दुनिया की अब तक की सर्वश्रेष्ठ पारियों में गिनने में शायद ही शक करे।
आज कपिल का जन्मदिन है, कपिल जिनको विस्डन ने सदी का सबसे महान खिलाडी चुना और ना भी चुनती तो हम तो मानते ही थे। आज की यह विशेष प्रस्तुति है कपिल देव के नाम

कपिल देव का साक्षात्कार : साभार बी बी सी हिन्दी
पिछले वर्ष मार्च की महीने में बी बी सी हिन्दी सेवा ने कपिल देव का एक साक्षात्कार प्रसारित किया यह साक्षात्कार सम्पादक संजीव श्रीवास्तव ने किया .....इसके कुछ अंश आज के दिन आपके लिए साभार प्रस्तुत हैं....,

संजीव श्रीवास्तव: सबसे पहले जब आप पहली सिरीज़ खेलने पाकिस्तान गए थे, आप 18-19 साल के रहे होंगे, कैसा लग रहा था आपको?
कपिल :तब इतना होश नहीं था। ज़्यादा कुछ मालूम नहीं था। वैसे भी 18-19 साल का लड़का क्या सोच सकता है। बस देश के लिए खेलने की लगन थी और इसके अलावा मन में कुछ ख़ास नहीं था।

संजीव श्रीवास्तव: और उस वक़्त आपके हीरो कौन थे?
कपिल : यकीनन विश्वनाथ का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक था। हालाँकि उनके बारे में ज़्यादा कुछ देखा-सुना नहीं था, लेकिन उनका नाम बहुत अच्छा था. जब उनसे मिला तो वो इंसान भी बहुत अच्छे निकले.

संजीव श्रीवास्तव: कपिल देव से पहले भारत के पहले ऐसा तेज़ गेंदबाज़ नहीं था, जिसका ख़ौफ़ विपक्षी टीम पर हो। तो उस दौर में जब हर कोई बेदी, वेंकटराघवन, चंद्रशेखर बनना चाहता था, आपने तेज़ गेंदबाज़ी की क्यों सोची?
कपिल: मैं समझता हूँ कि जिंदगी में कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो किसी योजना से नहीं होती। किस्मत साथ थी और लोग मेरी तेज़ गेंदबाज़ी की तारीफ करते थे. तो बस मेहनत कर इसमें सुधार किया.

संजीव श्रीवास्तव: अपने शुरुआती दिनों का कोई यादगार लम्हा। मसलन फॉलोऑन बचाने के लिए 24 रन चाहिए थे और आपने एक के बाद एक चार छक्के उड़ा दिए. लोग तो अब भी मानते हैं कि कुछ चीजें तो सिर्फ कपिल ही कर सकते थे?
कपिल: ऐसा नहीं है, आज के क्रिकेटर बहुत प्रतिभाशाली और अच्छे हैं. अगर आप किसी खिलाड़ी का 15 साल का कैरियर देखें तो बहुत से यादगार लम्हे होंगे. चाहे वो किरमानी हो, रोजर बिन्नी हो, गावस्कर हों, वेंगसरकर हों, मदनलाल हों या फिर मोहिंदर.
सभी से कुछ न कुछ यादें जुड़ी होंगी। जैसे बलविंदर सिंह संधू की 1983 के विश्व कप की इनस्विंगर कोई नहीं भूला, जिस पर गॉर्डन ग्रीनिज आउट हुए थे. तो जब आप खेलते हैं तो यकीनन लोगों को आपकी अच्छी चीजें याद रहती हैं.

संजीव श्रीवास्तव: तो क्या इस बेख़ौफ बल्लेबाज़ी का राज़ ये था कि आप मुख्यतः गेंदबाज़ थे?
कपिल: यकीनन ये था। बहुत से क्रिकेटर मुझसे कहते भी थे कि अगर मैं अपनी बल्लेबाज़ी पर ध्यान दूँ तो बहुत से रन बना सकता हूँ. शायद वो सही कहते होंगे. लेकिन मैने बल्लेबाज़ी को हमेशा बोनस माना और जब बोनस अच्छा मिल रहा हो तो सबको खुशी होती है.

संजीव श्रीवास्तव: वर्ष 1983 का विश्वकप. जिम्बाब्वे से मुक़ाबला. आप कप्तान थे. चार विकेट 9 रन पर गिर चुके थे. जब आप बल्लेबाज़ी के लिए निकले तो सोचा था कि आप मैच की शक्ल बदल देंगे?
कपिल: हर खिलाड़ी यही इरादा लेकर मैदान में उतरता है कि मैच की शक्ल बदल देगा, लेकिन होता नहीं है। वो वक़्त था, जब टीम मुश्किल में थी और मेरे ऊपर ज़िम्मेदारी थी और अच्छी बात ये रही कि ज़रूरत के वक़्त मैं ये पारी खेल सका। ऐसे लम्हे लोगों के दिमाग में लंबे समय तक रहते हैं.

संजीव श्रीवास्तव: ये पारी तो भारतीय क्रिकेट की लोककथा बन गई है। क्या आपको लगता है कि ये मैच विश्व कप का टर्निंग प्वाइंट था?

कपिल: नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता। विश्व कप का टर्निंग प्वाइंट वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ पहला मैच या इंग्लैंड के विरुद्ध सेमीफाइनल था.

संजीव श्रीवास्तव: जब टीम 183 रन ही बना सकी तो ड्रेसिंग रूम में बैठे खिलाड़ी क्या सोच रहे थे?
कपिल: देखिए ये सब नहीं सोचा जाता. ठीक है वेस्टइंडीज की टीम अच्छी थी, लेकिन हममें जोश की कमी नहीं थी. सोच ये होनी चाहिए कि हमसे बेहतर कोई नहीं है.
मुझे याद है कि जब हम क्षेत्ररक्षण के लिए जा रहे थे तो मैने कहा था कि हम 183 रन बना चुके हैं और वेस्टइंडीज़ को अभी इतने रन बनाने हैं। हम उन्हें मुश्किल में डाल सकते हैं. मैने कहा 'चलो जवानों लड़ो' तब गावस्कर ने कहा, कभी ऑफिसर भी बोल दिया करो. तो उन हालात में भी ऐसे मजाक चला करते थे.

संजीव श्रीवास्तव: जीत के बाद जश्न कैसे मनाया?

कपिल: आलम ये था कि हर मोड़ पर कोई न कोई शैंपेन लिए खड़ा था। सच बताऊँ तो इतनी खुशी में शैंपेन और जश्न के माहौल में हमें खाना भी नहीं मिला. लंदन में 11 बजे रेस्त्रां बंद हो जाते हैं और हम एक-दो बजे खाना ढूँढ रहे थे. फिर ब्रेड-टोस्ट खाकर रात गुज़ारी.


संजीव श्रीवास्तव: चार सौ विकेट और चार हज़ार रन। आपके दौर में तीन ऑलराउंडर और भी थे. आपकी नज़र में उनमें से कौन बेहतरीन था?
कपिल: मैं कहूँगा कि रिचर्ड हेडली का बतौर गेंदबाज़ मैं बहुत सम्मान करता हूँ। इमरान ख़ान ने शानदार गेंदबाज़ी के साथ-साथ टीम का नेतृत्व किया। पाकिस्तानी टीम का नेतृत्व करना आसान नहीं है, लेकिन इमरान ने इस काम को बखूबी अंज़ाम दिया. ऑलराउंडर की बात करें तो बॉथम सर्वश्रेष्ठ थे.

संजीव श्रीवास्तव: इस पूरे दौर में आपको बेहतरीन उपलब्धियों को लिए लोगों से खूब सम्मान मिला। पर जब मैच फिक्सिंग प्रकरण हुआ और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चला तो आपको क्या लगा?
कपिल: कई ख़याल मन में आए. बहुत दुख हुआ और लगा कि डूब मरना चाहिए, गुस्सा भी आया और लगा कि आरोप लगाने वालों को गोली मार देनी चाहिए. दुख तो होता ही है कि इतने साल की मेहनत और सच्चाई की राह पर चलने के बाद लोग आप पर आरोप लगाते हैं.
लेकिन ये जिंदगी का दस्तूर है और सारी उम्र इस पर बात करने का कोई मतलब नहीं है। हाँ, लोगों को इतना ज़रूर सोचना चाहिए कि किसी की बातों में यूँ ही नहीं आना चाहिए. अपनी सूझबूझ से काम लेना चाहिए.
(बी बी सी हिन्दी से साभार)

दरअसल इस साक्षात्कार को यहाँ उद्घृत करने का मकसद यह बताना नहीं था की कपिल ने क्या सोचा और क्या किया बल्कि यह की इतनी बुलंदियों पर पहुँच कर भी एक व्यक्ति कितना सहज और कितना विनम्र है।
एक बड़ा दिलचस्प वाकया है जब कपिल काफ़ी युवा थे और टीम में नहीं चुने गए थे , बात 1976 की है जब कपिल देव 17 बरस के थे। एक ट्रेनिंग कैंप में उन्होंने खाने के लिए और रोटियाँ माँगीं लेकिन उन्हें रोटियाँ नहीं दी गईं और ये वाक़या हुआ मुंबई के क्रिकेट क्लब ऑफ़ इंडिया के एक ट्रेनिंग कैंप में।
कपिल के रोटी माँगने पर अनुशासन के लिए मशहूर कैंप कमांडर केकी तारापोर ने उनसे पूछा,"तुम्हें और रोटियाँ क्यों चाहिए?"
कपिल ने कहा,"मैं जवान हूँ और ताक़तवर बनना चाहता हूँ ताकि भारत के लिए तेज़ गेंदबाज़ी कर सकूँ"।
तारापोर ने झिड़कते हुए उनसे कहा,"भूल जाओ ये सब। तुम्हारे लिए अलग से कुछ भी नहीं होगा. मैं तेज़ गेंदबाज़ों को शक्ल से ही पहचान जाता हूँ"
इसके दो साल बाद कपिल अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में आए और आज वो कहाँ हैं इसके बारे में क्या कहा जाए....पर यह वाकया भी यही बताता है कि कपिल ने हमेशा अपनी आवाज़ और हौसले को बुलंद रखा।
खैर अभी तो ६ जनवरी १९५९ को जन्मे कपिल देव रामलाल निखंज को उनके पचासवें जन्मदिन पर बधाई और आखिरी में पढ़ते हैं कि क्या कहा था कपिल ने १९८३ विश्व कप की ट्रोफी उठाने के बाद,
"मैं बहुत खुश हूँ. मेरी टीम ने जो कर दिखाया है उससे मैं बेहद खुश हूँ. हम यहाँ दोबारा आने चाहते हैं, अगले साल इसी जज़्बे के साथ।हम अगली बार भी ऐसा ही करना चाहेंगे।वीवी रिचर्डस वेस्टइंडीज़ के लिए अच्छी बल्लेबाज़ी कर थे पर वो कुछ ज़्यादा ही तेज़ खेल रहे थे।हमारे लिए अच्छा ही था कि वे तेज़ खेलें क्योंकि हमें लगा कि इसी दौरान वे अपना विकेट गंवा देंगे।वे 60 ओवर के हिसाब से नहीं 30 ओवर के हिसाब से खेल रहे थे।
83 का स्कोर कुछ ख़ास नहीं था लेकिन हमें बस कुछ विकेटों की ज़रूरत थी। पूरी प्रतियोगिता में हम विजेताओं की तरह खेले. हर खिलाड़ी जी जान से खेला और कहा कि हम जीत कर रहेंगे. अब हम जश्न मनाएँगे क्योंकि ऐसे मौके आसानी से नहीं आते

और हम तो बस यही कहेंगे जो शायद मेरी याद में बप्पी दा ने कहा था और कुमार सानू से कहलवाया था
हकीकत है यह ख्वाब नहीं
कपिल देव का जवाब नहीं

Sunday, January 4, 2009

नए साल का विजयी सूर्य

शायद यह कविता २००४-०५ में लिखी थी मैंने .....नए साल पर मतलब करीब ५ साल पहले। हालांकि तब और अब की परिस्थितियों में बहुत अन्तर है....तब मैं विज्ञान का विद्यार्थी था लखनऊ के डिग्री कोलेज में ...और आज एक पत्रकार हूँ एक मशहूर समाचार चैनल में। समय बीता है, उम्र बढ़ी है और माहौल भी बदला है पर शायद नए साल की शुरुआत में आज भी दिमाग कुछ भी कहे दिल यही कहता है.....क्यूंकि आशावाद के अलावा शायद कोई विकल्प भी नहीं है.....दुनिया उम्मीद पर ही कायम है और उम्मीद से ही कायम रहेगी ! स्वाद लें।
(जी हाँ ...कविता का भी स्वाद होता है)

नए साल का विजयी सूर्य

बादलों से झांकता सूरज,
आख़िर ऊपर आ पाता है
दूर पेड़ पर बैठा परिंदा,
यह देख मुस्कुराता है
आँखें खुल जाती हैं
रात हार मानती है
सूर्य की किरणें
अपना गंतव्य जानती हैं

नई सुबह आ गई है, एक झोंका यह कानों में बताता है
बादलों से झांकता सूरज , आख़िर ऊपर आ जाता है

रात टूटते तारों को देखकर
कुछ दुआएं मांगी थी
हर बार कुछ और पाने की चाहत में
ये आँखें रात भर जागी थी
जब नींद आई तो पलकों में
ढेरो स्वप्न समाये थे
ना जाने रात भर कौन कौन
किन किन सपनो में आए थे

पर अब वह पपीहा कुछ गाकर, मुझे जगाता है
बादलों से झांकता सूरज , आख़िर ऊपर आ जाता है

यह नया दिन है
वही जिसका इंतज़ार था
वो दिन आया है आज
जो हमें सदा स्वीकार था
मुंदी पलकों को खोल
स्वप्न सच करने का वक्त आ गया है
चल पडो अभीष्ट पर
समय का फ़रिश्ता बता गया है

मेरा रास्ता आज तो, ख़ुद सूरज चमकाता है
बादलों से झांकता सूरज , आख़िर ऊपर आ जाता है

वो खुशबू जो ख़्वाबों में आती थी
उससे अब आंगन महकेगा
संगीत जो दूर था कहीं
अब साँसों में चहकेगा
घर जो सूने पड़े थे
आबाद होने को हैं
मुस्कराहट बिखरने
और अवसाद खोने को है

हर नयन में आशा का दीप, झिलमिलाता है
बादलों से झांकता सूरज , आख़िर ऊपर आ जाता है

जीवन बदलने को है
पर क्या तुम तैयार हो
परिवर्तन ऐसा कि
चाहो हर बार हो
देखो कैसे सब कुछ
हां सब कुछ साकार होगा
विश्व तुम्हारा, लोग तुम्हारे
तुम्हारा आकार और निराकार होगा

क्यूंकि यह दिन
सिर्फ़ एक दिन नहीं है
ये शुरुआत है नवजीवन की
तुम्हे समझना यही है

देखो सर उठा आसमान में एक
बादल का टुकडा लहरा रहा है
नीले आसमान की गोद में
सूरज शिशु सा इठला रहा है
हँसता है गुलाब,
कमल मुस्कुरा रहा है

बरगद बाबा बूढा सुनकर, जटाएं अपनी हिला रहा है
कि देखो नया दिन आ रहा है
बादलों को चीरकर सूरज ऊपर......और ऊपर आ रहा है.......

नव वर्ष मंगलमय हो

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

अर्थ...अनर्थ....मतलब की बात !

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