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Wednesday, October 17, 2012

कब निखरेगा ये बछड़ा

किसान अपने बछड़े को बैल बनाने से पहले दो युक्तियां करता है। पहली तो मैं बता नहीं सकता दूसरी निखारने की। इसके लिए वह नाथ डालकर बछड़े को बलात बैलगाड़ी में लगाकर खेतों में घुमाता है। पूरा गांव उस गाड़ी के पीछे मजे करता घूमता है। खासकर बच्चे। और जब बछड़ा नहीं निखरता तो दूसरी युक्ति के रूप में उसके गले पर बेवजह एक लकड़ी डाल दी जाती है, ताकि उसकी आदत है। तब भी नहीं निखरता तो बछड़े को खेत में गहरे हल गड़ाकर निखारा जाता है। और फिर भी नहीं निखरा तो किसान उसे गर्रा कहकर बेचने की कवायद में जुट जाता है। और कई बार वह कसाइयों के हात्थे भी चढ़ जाता है। मोरल ऑफ द स्टोरी श्रमवीर, कर्मवीर बनो वरना कसाई के चाक पर गर्दन रखो। संसार कहता है कर्म करो या मरो।
ऐसा ही राहुल बाबा के साथ सोनिया कर रही हैं। उन्हें 25 साल के बाद तो निखारने के लिए मना पाईं। फिर लोकसभा के आम चुनाव 2009 में नाथ डाली गई। पहला काम जो किसान करता है वह तो शादी के इतने लेट होने से अपने आप हो गया। (एक विधि से किसान बछड़े का मर्दानापन कम करता है)। फिर उन्हें रिएक्टिवेट करके बैलगाड़ी में नुहाया (लगाया) गया। यानी महासचिव बनाया गया। फिर भी नहीं निखरे तो यूपी में प्रपंच करवाया गया। फिर भी नहीं निखर रहे तो अब सोनिया उन्हें केबिनेट में लाने की तैयारी में हैं। पीएम सीधे न सही तो बेटा केबिनेट में अंकल लोगों से कुछ सीखकर बिजनेस में हाथ बटा। मगर राहलु बाबू हैं कि चिगते (हिलते) ही नहीं है। अब किसान करे तो क्या। कसाई को बेचेगा तो भगवान मार डालेंगे, नहीं तो जिंदगीभर खिलाएगा तो बोझ पड़ेगा। और फिर बछड़ा बड़ा होकर दो लाइन में किसी एक में जाता है, पहली तो किसान के साथ बैल बन कर सालों सेवाओं के बाद ससम्मान सेवनिवृत्ति की तरफ जाती है। कुछ-कुछ आदमी के नौकरी करने जैसा। और दूसरी लाइन सांड बनने की होती है, यह रिस्की है किंतु मजेदार है। इसमें भी एक लाभ है अगर सांड के रूप में आपकी पोस्टिंग गांव में हुई तब तो लोग पूज भी सकते हैं और पेट भी पाल लेंगे, लेकिन अगर शहर में हुई तो समस्या होगा, यहां तो सब्जियों के ठेलों पर लट्ठ ही मिलते हैं। और गाहेबगाहे मौका मिलते ही सकाई भी लपक सकते हैं। अब राहुल बाबा को सोनिया सियासी सेवानिवृत्ति तो देंगी नहीं। केबिनेट में और लाकर देखती हैं, अगर वे सुबह जल्दी उठकर मंत्रालय (मनी फैक्ट्री) जाने लगे तो ठीक वरना फिर किसान को खेती के लिए अपनी दूसरी बछिया पर निर्भर रहना पड़ेगा, वह खेतों में जा नहीं सकेगी तो फिर कौन बचा.....वा.......ड्रा ! वरुण के सखाजी

Saturday, October 6, 2012

गांधी परिवार के 'दो दामाद'

भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस और इसी पार्टी के राजनेताओं के दो हाईप्रोफाइल दामाद एक इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी की पोती प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा।  इन दोनों दामादों में फर्क सिर्फ इतना है कि एक ने भ्रष्टाचार को लेकर आवाज को बुलंद रखा तो दूसरे दामाद पर भ्रष्टाचार के आरोप सरेआम लगाए जा रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि  फिरोज जहां गांधीवादी,सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले थे, तो रॉबर्ट ठीक इसके विपरीत फास्ट लाइफ और विदेशी कारों,शानदार बाइक्स के शौकीन हैं।

 1. पंडित नेहरू के दामाद- फिरोज गांधी

गांधी परिवार के पहले दामाद फिरोज ने 1958 में एलआईसी में भ्रष्टाचार के खिलाफ सवाल उठाए थे। जिसकी बदौलत बीमा कंपनियों में कई संदिग्ध निवेशों की जांच हुई और एलआईसी में भ्रष्टाचार का सफाया किया गया। फिरोज गांधी ने राष्ट्रीयकृत बीमा कंपनी एलआईसी के कई निवेशों के बारे में सवाल उठाए थे। यह निवेश एक उद्योगपति हरिदास मुंधड़ा की संदिग्ध कंपनियों में किए गए थे। फिरोज की भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहीम का असर हुआ और एक न्यायिक जांच की घोषणा की गई। और आगे चलकर तात्कालीन वित्तमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और कई बड़े अधिकारी निकाले गए।

नेहरू परिवार से जुड़े होने के बावजूद फिरोज गांधी की अपनी अलग पहचान थी। फिरोज को हमेशा स्वच्छ सामाजिक जीवन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले राजनैता के रूप में याद किया जाता है। फिरोज गांधी का राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के परिवार से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। वह एक पारसी फैमिली से ताल्लुख रखते थे और उनका असल नाम फिरोज जहांगीर शाह था। लंदन में पढ़ाई के दौरान इंदिरा नेहरू से धनिष्ठता बढ़ी और फिर 1942 में दोनों ने शादी कर ली।


          
                                 

शादी के बाद से फिरोज जहांगीर शाह फिरोज गांधी बन गए। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए फिरोज को इलाहाबाद की नैनी जेल में एक साल कारावास में बिताना पड़ा। स्वतंत्रता के बाद फिरोज नेशनल हेरल्ड समाचार पत्र के प्रबंध निदेशक बन गये। पहले लोकसभा चुनाव में वह रायबरेली से जीते। उन्होंने दूसरा लोकसभा चुनाव भी इसी संसदीय क्षेत्र से जीता।

संसद में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कई मामले उठाये जिनमें मूंदड़ा मामला प्रमुख था। फिरोज गांधी का निधन 8 सितंबर 1960 को दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से हुआ। दिल्ली में मृत्यु के बाद फिरोज गांधी की अस्थियों को इलाहाबाद लाया गया था और पारसी धर्म के रिवाजों के अनुसार वहां उनकी मजार बनाई गई।


2. सोनिया गांधी के दामाद- रॉबर्ट वाड्रा

प्रियंका वाड्रा के पति राबर्ट वाड्रा पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हें। कथित रूप से अवैध संपत्ति जुटाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी उठाई गई है। टीम अन्ना के सदस्य रहे अरविंद केजरीवाल ने रॉबर्ट पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वाड्रा चार साल में 50 लाख से 300 करोड़ रूपए के कैसे हुए। डीएलएफ ने वाड्रा को बेहद सस्ती कीमतों पर कई फ्लैट के अलावा करोड़ों का कर्ज बिना ब्याज दिया है। उनका कहना है कि एक शीर्ष राजनीतिक परिवार के दामाद द्वारा इतनी ज्यादा संपत्तियों का अधिग्रहण कई सवालों को जन्म देता है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति हैं रॉबर्ट वाड्रा राजनीति से अलग लग्जरी लाइफ स्टाइल की वजह से भी चर्चा रहे हैं। बिजनेस के अलावा फिटनेस और फैशन में भी काफी दिलचस्पी रखने वाले 43 साल के वाड्रा को पिछले ही एक अंग्रेजी अखबार ने बेस्ट ड्रेस्ड मैन का खिताब से दिया था।

                              

गौरतलब है कि 1991 में प्रियंका गांधी से मुलाकात के बाद में दोनों की नजदीकियां बढ़ी और 18 फरवरी 1997 को दोनों विवाह बंधन में बंध गए। गांधी परिवार से नाता जुड़ते ही कारोबार जगत में बड़े कारोबारी वाड्रा,सबसे पावरफुल दामाद के रूप में उभरी।

दरअसल राबर्ट वाड्रा का हैंडीक्राफ्ट और कस्टम ज्वैलरी का कारोबार है और वह हमेशा से विदेशी कारों और बाइक्स को लेकर सुर्खियों में रहे हैं।




Saturday, September 22, 2012

बड़ा अजीब पीएम है देश का

प्रधानमंत्री सच कह रहे हैं, किंतु तरीका ठीक नहीं। वे बिल्कुल भी एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह नहीं बोले। न ही एक देश के जिम्मेदार प्रधानमंत्री की तरह ही बोले। वे एक प्रशासक और गैर जनता से कंसर्न ब्यूरोक्रैट की तरह बोले। पैसे पेड़ पर नहीं लगते? 1991 याद है न? महंगी कारों के लिए पैसा है डीजल के लिन नहीं? और सबसे खराब शब्द सिलेंडर जिसे सब्सिडी की जरूरत है वह 6 में काम चला लेता है और गरीबों के लिए कैरोसीन है? अब जरा पीएम साहेब यहां भी नजर डालिए। देश में गरीबों को कैरोसीन मिलता कितना मशक्कत के बाद है और मिलता कितना है यह भी तो सुनिश्चि कीजिए। सिलेंडर जो यूज करते हैं वह 6 में काम चला लेते हैं, तो जनाब क्या यह मान लें कि गरीब कम खाते हैं या फिर मध्यम वर्ग कभी अपनी लाचारी और बेबसी से बाहर ही न आ पाए। सिलेंडर पर अगर आप कर ही रहे हैं कैपिंग तो इसके ऊपर के सिलेंडर एजेंसियों के चंगुल से मुक्त कर दीजिए। पीएम साहब1991 याद दिलाकर देशपर जो अहसान आप जता रहे हैं, वह सिर्फ आपका अकेले का कारनामा नहीं था। और ओपन टू ऑल इकॉनॉमी की ओर तो भारत इंदिरा गांधी के जमाने से बढ़ रहा था। 1991 से पहले जैसे जिंदगी थी ही नहीं? जनाब जरा संभलकर बोला कीजिए। पैसे पेड़ पर नहीं उगते यह एक ऐसी बात है जो किसी को भी खराब लग सकती है। ममता को रिडिक्यूल कीजिए, जनता को नहीं। यूपीए आप बचा लेंगे मगर साख नहीं बचा पाएंगे। और पैसे तो पेड़ पर नहीं लगते कुछ ऐसा जुमला है जो गरीब या भिखारियों को उस वक्त दिया जाता है जब वे ज्यादा परेशान करते हैं, क्या जनता से पीएम महोदय परेशान हो गए हैं। जब भी किसी विधा का शीर्ष उस विधा का गैर जानकार व्यक्ति बनता है तो उस विधा को एक सदी के बराबर नुकसान होता है। मसलन नॉन आईपीएस को डीजीपी, नॉन जर्नलिस्ट को एडिटर, नॉन एक्टर को फिल्म का मुख्य किरदार बना दिया जाए। वह उद्योग सफर करता है जिसमें ऐसी शीर्ष होते हैं। और हुआ भी यही जब पीएम डॉ. मनमोहन सिंह बनाए गए? - सखाजी

Friday, September 21, 2012

कल के भविष्य के लिए, आज का बेहतर विकल्प 'ग्रामीण शिक्षा'


शिक्षा, किसी भी सभ्य समाज के लिए अमृत की तरह हैं इस बात में कोई दोहराव नहीं, पर आज जिस तरह भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रहीं है। जिनमें प्रारंभिक शिक्षा को लेकर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। आखिर यही मासूम तो हमारे आने वाले कल के सुदृढ़ नागरिक है, जिनके भविष्य को बेहतर बनाने के लिए नींव को मजबूत तो करना ही होगा तभीतो ये एक सभ्य, शिक्षित और सुसंस्कृत पीढ़ी का निर्माण करेंगे।
       
              

मध्यप्रदेश में ग्रामीण शिक्षा को सुचारू रूप से चलाने के लिए वैसे तो केंद्र और राज्य सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रहीं हैं। पर प्रारंभिक शिक्षा को बेहतर रूप से संचालित करने के लिए पद्रेश के सभी जिलों में चलाए जा रहे सर्व शिक्षा अभियान ने ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में नया मोढ़ दिया है। जहां एक तरफ तो मध्यप्रदेश में ग्रामीण शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए प्रदेश में 26 मार्च 2011 को नि: शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनयम जारी किया गया है। हालाकि केन्द्र सरकार द्वारा अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम साल 2009 पहले ही देश भर में लागू किया जा चुका है।

ग्रामीण शिक्षा का फैलता दायरा


पढ़ने-लिखने की कोई उम्र नहीं होती, जब चाहे शुरू हो जाओ जब यह विज्ञापन दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर प्रसारित किया गया तो लोगों में पढ़ने लिखने की जो ललक पैदा हुई आज इसी का नतीजा है कि ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ने की लालसा लिए ग्रामीण शिक्षा को लेकर चलाए जा रहीं योजनाओं में लाभ उठा रहे हैं।

                

इसी को मद्देनजर रखते हुए प्रदेश सरकार ने राज्य में कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय की नींव रखी है। जिसमें अनु.जाति/अनु.जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और उम्र का एक पढ़ाव पार कर चुके लोगों के लिए शिक्षा की कवायद शुरू की गई है, वर्तमान में प्रदेश के 47 जिलों में 207 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय संचालित किए जा रहे हैं साथ ही इसके अतिरिक्त साल 2011-12 में 8100 छात्राओं के लिए 308 बालिका छात्रावास स्थापित किए जाने का प्रावधान है। इसी के साथ ही प्रारंभिक शिक्षा के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत प्रदेश सरकार को 2012-13 को लिए 4196.88 करोड़ का बजट स्वीकृत किया गया है।

इस अधिनियम के अंतर्गत ही प्रदेश के सभी जिलों के निजी विद्यालयों में कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई हैं। जिसमे अभी तक यानि सत्र 2011-12 में लगभग 1.37 लाख बच्चों को लाभ मिला है। जब हमनें इस बारे में मध्यप्रदेश के भिंड जिले के एक निजी स्कूल संचालक राजपाल सिंह कहते हैं कि बच्चों के लिए हर निजी विद्यालयों में मुफ्त शिक्षा देने की सरकार की पहल सराहनीय है पर आज भी ऐसे कई गांव है जहां आज भी प्राथमिक स्कूल नहीं हैं और बच्चों को दूर के गांवों में जाना पड़ता है अगर ऐसे गांवों के बीच संकुल केंद्र स्थापित किए जाएं तो ग्रामीण शिक्षा में आ रहीं इन दिक्कतों से हल पाया जा सकता है।

              

इस योजना के फैलते दायरे को देखते हुए हाल ही में केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश के इस मॉडल को सभी राज्यों में लागू करने का मन बनाया है।

सभी के लिए सर्व शिक्षा अभियान

मध्य प्रदेश में शिक्षा की प्रगति का पैमाना इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज देश में जिस तरह शिक्षा को लेकर लोगों में जागरुकता हुई है इससे हमारा ग्रामीण अंचल भी अछूता नहीं है।

प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान आज ग्रामीण नहीं शहरी तहसील,कस्बों में भी अक्षरों की महिमा के जरिए बच्चों को निरक्षरता से तो निज़ात दिला ही रहा है साथ ही शासकीय स्कूलों में बेहतर प्रबंधन में भी महत्तवपूर्ण भूमिका अदा करता है।

सर्व शिक्षा अभियान के तहत पिछले कुछ सालों में यहां 16867 प्राथमिक/ माध्यमिक विद्यालयों का निर्माण किया गया तो वहीं इन विद्यालयों में 54172 शिक्षकों के पद स्वीकृत किए गए हैं। इसके साथ ही इस योजना में हर साल कक्षा 1 से 8 तक के शासकीय विद्यालयों, पंजीकृत मदरसों और संसकृत विद्यालयों में पढ़ने वाले बचेचों को नि: शुल्क किताबें, दो जोड़ी गणवेश के लिए 400 रुपए का चैक दिया जाता है।
                  
               

वहीं जब छात्र 5वीं कक्षा उत्तीर्ण कर 6वीं प्रवेश करते हैं तो उन्हें नि: शुल्क साईकिल के लिए 2300 रुपए का चैक देने का प्रावधान है। जिसके चलते 2011-12 में करीब 3.65 लाख बच्चों को साईकिल वितरित की गईं हैं।

स्कूल चलें हम

हर साल बच्चों को स्कूल तक लाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए स्कूल चलें हम अभियान की शुरूआत की गई। यह अभियान 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए निर्धारित हैं जिसमें बच्चों के लिए आवासीय/ गैर आवासीय विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। इस अभियान के जरिए प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर के बच्चों की नियमित उपस्थिति और उनकी शैक्षणिक गतिविधियों को रोज फॉलो किया जाता है ताकि बच्चे स्कूल में स्कूली शिक्षा का भरपूर लाभ उठा सकें।

              

ग्रामीण अंचल में स्कूल चलें हम अभियान की उपलब्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां पर बच्चों में पढ़ने की ललक का दिनों दिन इज़ाफा हुआ है। मध्यप्रदेश के दतिया जिले के राजापुर गांव की शिक्षिका कहतीं है कि स्कूल चलें हम अभियान में जहां बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है तो वहीं इस तरह की योजनाएं आने से शिक्षण व्यवस्था में भी सुधार हो रहा है। तो वहीं विदिशा जिले की तहसील कुरवाई के एक गांव छीरखेड़ा के शिक्षक संदीप जैन का भी मानना है कि सरकार की इन्हीं योजनाओं के चलते ही आज निर्धन वर्ग के बच्चों का स्कूल आना शुरू हुआ है नहीं तो वो अपने माता-पिता के साथ खेतों में काम बटाया करते थे।

Tuesday, September 18, 2012

ओ.....ओ....जाने जाना, ढूंढे तुझे दीवाना

देश में अचानक एक बड़ा राजनैतिक तूफान आ गया। ममता ने यूपीए से नाता तोडऩे की घोषणा कर दी। कांग्रेस के माथे पर ज्यादा सलवटें नहीं आईं। जैसे वे यह खबर सुनने के लिए तैयार से थे। बीजेपी को सांप सूंघ गया। अभी तक कोई न बयान न राय? सपा, बसपा के अपने राग और अपने द्वेष हैं। मुलायम पर कोई भरोसा करने तैयार नहीं, वे दिल से चुनाव चाहते हैं, तो माया अभी इंतजार के मूड में हैं। दिल मुलायम, चाल खराब: मुलायम पर कोई भरोसा करने तैयार नहीं। मुलायम भी ऐसे हैं कि जानते हैं, कल को कोई भी नतीजे आए, वे बिना कांग्रेस के पीएम नहीं बन पाएंगे। बीजेपी तो उन्हें हाथ भी नहीं रखने देगी। तब वे कांग्रेस से सीधा भी मुकाबिल नहीं होना चाहते। जबकि चुनाव के लिए आतुर हैं, दरअसल समाजवादियों का कोई भरोसा नहीं कब कहां गुंडई कर दें और अखिलेश बाबू परेशान में पड़ जाएं और चुनाव तो दूर की कोड़ हो जाए। ऐसे में उनके पास अब एक अवसर आया है कि कुछ टालमटोल करें और सरकार गिरा दें। अब देखना यह है कि वे इस काबिल शतरंजी चाल को कैसे चलते हैं? माया मंडराई: माया से दूर रहना ही ठीक लगता है। क्योंकि यह लोग बड़े महंगे होते हैं। न जाने कितने तो पैसे लेंगे और कितने मामले वापस करवाएंगे। ऊपर से तुर्रा यह होगा कि यूपी को परेशान करो, ताकि अखिलेश माया के चिर शत्रु परेशा हो जाएं। अब सोनिया की यह होशियारी है कि चुनाव में जाएं या फिर इन दुष्टों को लें। ममता न पसीजेगी: ममता नाम की ममता हैं। वे नहीं पसीजेंगी। चूंकि वे पंचायत में कांग्रेस से हटकर लडऩा चाहती थी। वे यह खूब जानती हैं कि कांग्रेस के बिना बंगाल में बने रहना कठिन है। वह यह भी जानती हैं, कि इस बार भले ही वे वाम की खामियों से जीत गईं, लेकिन कांग्रेस अगर साथ में रही तो वे अगली लड़ाई इसी से लड़ेंगी। इसलिए पहले तो इन्हें राज्य से बेदखल किया जाए। शरद, करुणा: शरद पवार ईमानदार हैं। वे चाहते हैं हमेशा रहेंगे कांग्रेस के साथ। चूंकि महाराष्ट्र के समीकरण कहते हैं, कांग्रेस के साथ वे नहीं जीतेंगे। शिवसेना के साथ जाएं। तो मन ही मन वे भी चाहते हैं कि विधानसभा और लोकसभा एक साथ ही हो जाएं, तो उन्हें कुछ लाभ मिलना होगा तो जल्द मिल जाएगा। हां देर सवेर यह जरूर सोचते हैं कि उनकी छवि के अनुरूप कांग्रेस बीजेपी के सत्ता से दूर रखने के लिए समर्थन देकर पीएम बनवा सकती है। मगर शिवसेना के साथ गए तो क्या करेंगे? यह वे सोचेंगे यही उनकी काबिलियत भी है। क्या अब आएगा नो कॉन्फिडेंस: बीजेपी इस पूरे मामले में अभी कुछ नहीं बोलेगी। वह शुक्रवार के बाद जब औपचारिक रूप से यह तय हो जाएगा तभी वह कॉन्फिडेंस वोट के लिए कहेगी। मगर सीधे नहीं, बल्कि ममता को अपने हाथ में लेकर। बीजेपी अपनी पुरानी सहयोगी बीएसपी को भी साथ में ले सकती है। बीएसपी एक ही कीमत पर जाएगा, कि अग कांग्रेस उसे उपेक्षित कर दे। चलिए अब देखते हैं भाजपा क्या करती है? हाल फिलहाल देश की राजनीति में यह बड़ी उथल-पुथल है। कांग्रेस अगर इस वक्त चुनाव में गई तो कम से कम 5 केंद्रीय मंत्री और 6-7 सांसद समेत 40 से ज्यादा विधायक इनके दूसरी पार्टियों से चुनाव लड़ेंगे। इतना ही नहीं बीजेपी बिल्कुल भी तैयार नहीं है फिर भी गाहेबगाहे उसके हत्थे सत्ता चढ़ सकती है। हालांकि कांग्रेस यह जानती है कि थर्ड, फोर्थ जो भी फ्रंट बने बीजेपी को बाहर रखने के लिए किसी को भी पीएम बनाने में सहयोग देगी। अंत में लेफ्ट राइट: लेफ्ट इस समय राजनीति के मूड में नहीं, वे ममता से चिढ़ते हैं। मगर ग्राउंड वास्तव में उनके भी विचारों के उलट जा सकता है। इसलिए वे कांग्रेसी समानांतर दूरी बनाए रखते हुए अपनी तीसरी दुनिया की ताकत जुटाएंगे, ताकि भूले भटके ही सही कहीं वाम का पीएम बन गया तो? वरुण के सखाजी

Monday, September 17, 2012

रिझाती है अल्पिन तुम्हारी मासूमियत

बचपन में जब अल्पिन को देखता तो लगता था यह कमाल की चीज है। यूं तो अल्पिन में बहुत कुछ ऐसा होता भी नहीं कि कोई कमाल उसमें लगे। पर न जाने क्यों यह मुझे आकर्षित करती थी। इसके दो सिरों को गोलाकार सा ऐंठकर बना वृत जैसे कोई फूले कपोल सी युवती हो जान पड़ता। तो वहीं कंटोप में ढंकी इसका नुकीला सिरा आज्ञाकारिता के गुण को लक्षित करता। कैसे वह एक इशारे पर कंटोप में ठंक जाता। जरा सा दबाओ तो बाहर फिर वैसे ही अंदर। कालांतर में सोच बढ़ी, समझ बढ़ी तो अल्पिन जो कभी मेरे जीवन की बड़ी इंजीनियरी थी, वह इंजीनियरी की सबसे निचले ओहदे की कमाल साबित हुई। आज भी जब मुझे घर पर कहीं अल्पिन दिखती है तो खुशी होती है। लगता है अपनी बिछड़ी माशूका को देख रहा हूं। स्कूल गया तो वहां पर एक अलग तरह की पिन देखी, जिसे भी लोग कई बार अल्पिन कहते थे। मुझे इस बात से बड़ी कोफ्त थी कि लोग छोटी सी इस पिन को अल्पिन कहकर अल्पिन जैसी महान इंजीनियरिंग टूल को अपमानित करते हैं। कितनी खूबसूरती से वह अपने टिप (नोक) को छोटे से कवर में ढांप लेती है। जब काम नहीं होता तो वहां आराम करती है। यह इसलिए भी वहां चली जाती है कि बिना काम के मेरी नोक खराब हो जाएगी। चूंकि खुली रहेगी तो कोई न कोई उसे छेड़ेगा जरूर। अल्पिन की यह सोच मुझे बहुत प्रेरित करती थी। उस वक्त तो इस अल्पिन को लेकर सिर्फ एक मोहब्बत थी, वो भी बेशर्त। न कुछ और न कुछ और। पर जब सोचने की ताकत बढ़ी तो इस मोहब्बत के कारण समझ में आए। दरअसल यह अल्पिन अपनी नोक पर कंटोप इसलिए पहन लेती थी, ताकि भोथरी होने से बची रही तो वक्त पर काम आ सके। ठीक एक बुद्मिान और समझदार व्यक्ति की तरह। ऐसा व्यक्ति अपनी दिमागी शार्पनेस को बेवजह नहीं जाया करते। वे खुद के ही बनाए एक कंटोप में सारी समझदारी और शक्ति के संभालकर रखते हैं। लेकिन इस अल्पिन से इतर, इसी की हमशक्ल एक और पिन होती है। इस पिन का इस्तेमाल अक्सर कागजों को नत्थी करने में किया जाता है। लेकिन प्यारी अल्पिन तो नारी श्रृंगार के दौरान यूज की जाती है। वह कागजों की नहीं, सौंदर्य की चेरी है। हमशक्ल वाली पिन ने इस अल्पिन को तेजी से खत्म करने की कोशिश की। मगर अपने नुकीले स्वभाव को न छिपा पाने और नुकसान पहुंचाने को लेकर बिना नैतिकता की सोच वाली होने के कारण इसे समाज में वह स्थान नहीं मिल पाया। जबकि अल्पिन, पिन, सुई, कांटा समाज की सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली पिन ही है। मगर अल्पिन तो जैसे आम लोगों में बैठी खूबसूरत विशिष्ट चीज है, सुई जैसे समाज की कारिंदा सोच की प्रतिनिधि है। तो वहीं कांटे नैतिकता से परे बेझिझक, गंवार टाइप के दुर्जन लोग हैं। अल्पिन ने महज अपनी मोहब्बत ही नहीं दी, मुझे तो कई आयामों पर सोचने की शक्ति भी दी है। विद्वानों की तरह मूर्खों में ऊर्जा न खपाना कोई विमूढ़ता नहीं। और इन बेवकूफों के बीच प्रतिष्ठा न पा सकने का कोई अफसोस भी नहीं। एक दिन जब अल्पिन ने बाजार के फेरे में आकर अपना रूप बदला तो मैं भौंचक रह गया। वह अब आकर्षक शेप में थी। अपनी असलियत को कहीं अंदर ढंके हुए बाहर तितलीनुमा कवच के साथ आई। इस रूप को देखकर तो मुझे और भी इसकी ओर आकर्षित होना चाहिए था। मगर हुआ उल्टा। मुझे इसका यह रूप बिल्कुल भी नहीं भाया। चूंकि मैं तो इसके असली रूप से ही मोहब्बत करता हूं, कैसे इसे अनुमोदन दे दूं। और जब प्यार निस्वार्थ भाव से होता है, तो फिर उसमें कोई भी तब्दीलगी इसे भौंडा बना देती है। प्यार की इस परिभाषा को सर्वमान्य तो नहीं कहा जा सकता, हां मगर एन एप्रोप्रिएट एंड अल्मोस्ट एडमायर्ड एक्सेप्टीबल काइंड ऑफ लाव जरूर कहा जा सकता है। और मोहब्बत का यह प्रकार ऐसा होता है कि लाख बदलावों के बाद भी अपनी माशूका में खोट नहीं देखता। अल्पिन की इस भंगिमा को देखकर भले ही पलभर के लिए क्रोध घुमड़ा हो, मगर यह वसुंधरा सा उड़ भी गया। सबकुछ जानकर भी यह यकीं नहीं हुआ, कि मेरी प्यारी अल्पिन ने जान बूझकर अपनी मासूमियत को इस नकल से ढांप लिया होगा। बार-बार जेहन में यही लगता रहता है कि अल्पिन को जरूर सुई, कांटा, पिन, स्टेप्लर की नन्ही दुफनियांओं ने मिलकर साजिश की होगी। अल्पिन की मासूमियत और उनकी उपयोगिता दोनों को बरक्स रखा जाए तो भी अल्पिन बीस ही निकलती। इसी ईष्र्या ने शायद अल्पिन को बलात ऐसा रूप दे दिया गया हो। यह अल्पिन के लिए मेरा जेहनी पागलपन से सना प्यार है, या फिर उसपर भरोसा। यह तो नहीं पता, पर यह जरूर समझ आता है कि आपकी मोहब्बत कई बुराइयों को भी अच्छाइयों में बदल सकती है, फिर वह चाहे अल्पिन से हो या हाड़ मांस के हम और आपसे। वरुण के सखाजी

Thursday, September 6, 2012

कौन है यह वाशिंगटन पोस्ट और क्यों मच रहा है हल्ला

यह नहीं कि वाशिंगटन पोस्ट या टाइम गलत हैं या सही हैं। बस सवाल सिर्फ इतना है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं वह उनकी खबर क्यों है? व्यावसायिक परिदृश्य में देखें तो मीडिया के नाम पर विदेशी मीडिया की मनमानी कतई लोक की आवाज नहीं है। यह नितांत विदेशी कूटनीति का हिस्सा है। इसलिए दुनिया के मंच पर जब देश के संदर्भ में कोई बात की जाए, तो सावधानी रखना जरूरी हो जाता है।
कायदा ए कायनात में भी इंसान को अपनी आवाज पेश करने की इजाजत हक के बतौर बख्सी गई है। यह अच्छी बात भी है। आदिकाल से इंसानी बिरादरी को अनुशासित और गवर्न करने के लिए बनाई गईं व्यवस्थाएं सबसे ज्यादा डरती भी इसी से हैं। आवाजों को अपने-अपने कालखंडों में मुख्य बादशाही ताकतों ने कुचलने की कोशिश की है। कभी कुचली भी गई हंै, तो कभी सालों कैदखानों में बंद भी कर दी गईं हैं। किंतु फिर अचानक अगर कैद करने वाली बादशाही ताकत को किसीने उखाड़ा भी, तो वह यही कैदखानों में बंद आवाजें थीं। लोकतंत्र में इसका अपना राज और काज है। काज इसलिए कि यह अपनी स्वछंदता और स्वतंत्रता के बीच के फर्क से परे प्रचलन में रहती है। और असल में गलती इस आवाजभर की भी नहीं है, दरअसल आवाज को नियंत्रित करने वाले भी इसे गवर्न के नाम पर दबोच देना चाहते हैं, तो आवाजें बुलंद करने वाले आजादी के नाम पर अतिरेक कर डालते हैं। ऐसे में न तो आवाज की ककर्शता ही खत्म हो पाती है और न ही इसकी ईमानदारी ही बच पाती है। कहने का कुल जमा मायना इतना है कि माध्यमों की सक्रियता के चलते होने वाली उथल-पुथल और अर्थ स्वार्थ पर चिंता की जानी चाहिए। साथ ही यह भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि वह आखिरकार कहीं कैद न होकर रह जाए। मौजूदा सिनेरियो में आवाज को बकौल टीवी, प्रिंट और वेब मीडिया देखा जाना चाहिए। हर देशकाल में यह तो माना गया कि आवाज महत्वपूर्ण है। और यह भी जान लिया गया कि यह सर्वशक्तिमान से कुछ ही कम है। किंतु कहीं कोई मुक्कमल योजना नहीं बनाई जाती कि इसका इस्तेमाल कैसे करें। हर उभरते हुए लोक राष्ट्र में आवाजें भी समानांतर उभरती हैं। सरकारी व्यवस्थाएं भी सक्रिय होती हैं। किंतु दोनों ही एक खिंचाव के साथ आगे बढ़ती हैं। आवाजें उठती और बैठती रहती हैं। परंतु व्यवस्थाओं का एक ही मान रहता है कि वह इन जोर-जोर से सुनाई दे रहीं लोक ध्वनियों को सुनकर मान्यता नहीं देंगे। और यही दोनों की जिद अंतिम रूप में अतिरेक में बदल जाती है। आवाजें अपनी राह लाभ, हानि के विश्लेषण से परे होकर नापती रहती हैं, तो व्यवस्थाएं लोक सेवक का लड्डू हाथ में लिए निर्धुंध कानों में रूई ठूंसे हुई जो बन पड़ता है अच्छा बुरा काम किए जाती हैं। आवाजों का शोर और आवाजों की उपेक्षा दोनों ही इस काल में अपने चरम पर हैं। समूची दुनिया से नितनई सनसनीखेज बातें होती रहती हैं। एक माध्यम ने तो लीबिया के गद्दाफी को ही उखाड़ फेंका, तो असांज ने मुखौटे पहने हुए लोगों के गंदे चेहरे सबके सामने रखे। आवाजें अपना काम कर रही हैं। लेकिन यह इसलिए और ज्यादा कर रही हैं, कि इनकी ताकत को बादशाही शक्तियां या तो पहचानती नहीं है या फिर पहचानकर मान्यता देने के मूड में नहीं हैं। भारत में भी स्टिंग ऑपरेशन के जरिए सियासी दलों के नेता बेनकाब होते रहे हैं और कालांतर में हाफ शर्ट पहनकर नीति, रीति और व्यवस्था को कब्जाए बैठे नौकरशाह भी चाल, चरित्र में बेढंगेपन के साथ सबके सामने आए। यह कारनामा किया इन्हीं आवाजों ने। राजतंत्र में आवाजों को नहीं आने दिया जाता था। और अगर किसी तरह से कहीं से आ भी गई तो कुचलने की ऐसी वीभत्स प्रक्रिया अपनाई जाती थी, कि लोगों की रूह कांप जाए। मगर जब दुनिया को लोकतंत्र की नेमत मिली तो व्यवस्थाओं के सामने खूबसूरत विकल्प था। एक ऐसा तंत्र ऐसी व्यवस्था, जिसे लोक ही चलाएगा, लोक ही बनाएगा और लोक के लिए ही यह बनी रहेगी। किंतु लोकतंत्र, जिसे भारी खून खराबे के जरिए बरास्ता यूरोप इंसानों ने पाया उसके मूल में आखिर यही आवाज व्यवस्था की नाक में दम करने फिर हाजिर थी। और इस बार यह आवाज कुछ ऐसी है कि इसे छाना नहीं जा सकता। बादशाही ताकतों को इसे अपने कानों में बिना किसी फिल्ट्रेशन के ही सुनना पड़ेगा। कर्कशता, गालियां, मनमानापन, बेझिझकी, बेसबूतियापन और सच्चाई, शांति, समझदारी से मिश्रित रहेगी। वाशिंगटन पोस्ट ने हमारे पीएम के बारे में जो भी लिखा, टाइम ने जो भी संज्ञा दी थी। यह सब कुछ इसी आवाज से निकलने वाली कर्कश ध्वनियां हैं। इन्हें रोका नहीं जा सकता है, किंतु उपेक्षित किया जा सकता है। संसार में सबसे बड़ी ताकत या तो दमन है या उपेक्षा। दमन जब नहीं किया जा सकता तो उपेक्षा कर देनी चाहिए। यह नहीं कि वाशिंगटन पोस्ट या टाइम गलत हैं या सही हैं। बस सवाल सिर्फ इतना है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं वह उनकी खबर क्यों है? व्यावसायिक परिदृश्य में देखें तो मीडिया के नाम पर विदेशी मीडिया की मनमानी कतई लोक की आवाज नहीं है। यह नितांत विदेशी कूटनीति का हिस्सा है। इसलिए दुनिया के मंच पर जब देश के संदर्भ में कोई बात की जाए, तो सावधानी रखना जरूरी हो जाता है। वक्त आ गया है कि इन आवाजों को बादशाही ताकतें मान्यता दें। वक्त आ गया है कि आवाजों को नीति, रीति और योजनाओं में शामिल किया जाए। मुमकिन है फिर वाशिंगटन पोस्ट का कमेंट किसी देश के पीएम के लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ आएगा और उसपर प्रतिक्रिया भी राष्ट्रीय सीमाओं की गरिमा के अनुकूल होगी। यह नहीं कि अपने शत्रु पड़ोसी की बुराई दूसरे मुहल्ले वाले करें तो हम भी दुंधभियां बजा-बजाकर करने लग जाएं। वरुण के सखाजी चीफ रिपोर्टर, दैनिक भास्कर, रायपुर

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