CAVS संचार
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे....
Wednesday, February 22, 2012
Not news
क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो बिना मीडिया में आए इसके खिलाफ केस दर्ज करवाए? और शेष मीडिया से भी मेरी अपील है कि वह इस घटना को छापे भी तो इसमें अपनी एक लाइन साफ करते हुए छापे कि हम लेखिका कौन है यह नहीं बताएंगे। इससे विवादों के सहारे संवाद करने वाले गैर जिम्मेदार लोगों की फेहरिश्त बढ़ेगी। अगर कोई ऐसा करना चाहता है तो वह शीघ्र करे।
- सखाजी
Tuesday, February 21, 2012
आत्मसम्मान............एक अनोखा जज्बा !

उचित कार्य व व्यवहार तभी संभव है, जब हम अपने दिन भर के कार्य का अवलोकन स्वयं करें। हमें देखना चाहिए कि हमने कौन से ऐसे कार्य किए जिन्हें हमें नहीं करना चाहिए था, और किए गये अच्छे कार्यों को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है।
हमें सदैव दूसरों के प्रति अच्छी भावना रखनी चाहिए। ‘‘हमें अपने कार्य को सिद्ध करने के लिए अपने आत्मसम्मान का सौदा कदापि नहीं करना चाहिए।’’
हमारे व्यक्तित्व में सबसे महत्वपूर्ण चीज कुछ है तो वह है हमारा आत्मसम्मान अतः किसी भी प्रकार से इसकी सुरक्षा करना हमारा दायित्व है।
कभी-कभी फायदे के लिए हम अपना ज़मीर दांव पर लगाने से नहीं चूकते। यह आत्मसम्मान के लिए खतरा है क्योंकि ‘‘लालची व्यक्ति का आत्मसम्मान कभी बरकरार नहीं रह सकता। इसलिए लालच से खुद को दूर रखने के लिए आत्मसंयम बरतना चाहिए।
जब आपकी समझ पर काफी कुछ निर्भर करता है। यदि हमें यह मालूम हो जाए कि क्या सही है और क्या गलत? तो गलत काम करने से पहले एक बार कदम जरूर रुकते हैं। लेकिन फिर भी हम गलत काम दोबारा दोहराते हैं तो स्वयं ही आत्मसम्मान नष्ट कर लेते हैं।
आत्मसम्मान पाने में हमें जितनी मेहनत करनी पड़ती है और इसे खोने में जो क्षणिक मूर्खता करनी पड़ता है, उसमें धरा और आकाश सा अन्तर है।
इसे पाने के लिए ऐसे उच्च कार्य करने पड़ते हैं, जिनका कोई मोल नहीं है। कुछ ऐसे कार्य हमें आत्मसम्मान खोने पर मजबूर कर देते हैं । अतः हमें उन गलत कार्यो को त्यागकर अच्छे कार्यों पर जोर देना चाहिए।
हां एक बात और कह दूं कि आत्मसम्मान को झझकोर कर रख देने में हमारी जुबान(वाणी) की अत्यन्त तीखी एवं तीव्र भागीदारी रहती है। जुबान चाहे तो हमें आत्मसम्मान दिला सकती है ओर चाहे तो हमें गालियां दिला सकती है।
अतः सदैव बात-चीत के ढ़ंग को शालीनता से सुदृढ़ता पूर्वक लहजे से प्रस्तुत करना चाहिए।
-अमित कुमार सेन
Saturday, February 4, 2012
अस्मिता के 19 साल...
चाय की दुकान पर बैठा अखबार पर चर्चा कर रहा लोगों का वो झुंड अचानक उठ कर उस शोर की दिशा में चल देता है...शोर में आवाज़ सुनाई दे रही है, कुछ युवाओं की...अरे क्या कह रहे हैं ये...ये चिल्ला रहे हैं...आओ आओ...नाटक देखो...और फिर देखते ही देखते उस मंझोले शहर के नुक्कड़ पर लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है। काले कपड़ों में तैयार वो युवा एक सुर में आवाज़ देते हैं और एक गीत के साथ नाटक शुरु होता है...लोग खूब तालियां बजाते हैं...हंसते हैं...फिर अचानक गंभीर हो जाते हैं...फिर तालियां बजाते हैं...और फिर अचानक से उदास हो उठते हैं...नाटक के अंत में एक धवल केश और दाढ़ी वाला शख्स हाथ जोड़कर लोगों के बीच आ खड़ा होता है...उनसे उस नुक्कड़ नाटक के सरोकारों पर बात करता है, उस के मुद्दों पर बात करता है...उसके बाद शुरु होता है चाय का सिलसिला और लगभग हर शख्स चाहता है कि वो इन बच्चों को चाय नाश्ता कराकर ही जाने दे...ये कमाल पूरी तरह से एक आदमी के नाम लिखा है...अरविंद गौड़, और काले कपड़ों से रंगीन रोशनियों तक ये है उनका रंगमंडल...अस्मिता।
दरअसल ये दो तस्वीरें हैं जो अस्मिता के उन दो चेहरों को जोड़ती हैं, जो देश के उन दो हिस्सों को जोड़ती हैं, जिन्हें हम इंडिया और भारत कहते हैं। नुक्कड़ नाटक के दर्शक और प्रोसीनियम के दर्शक दोनो ही उद्वेलित हो रहे हैं, एक अपने अधिकारों के लिए जाग रहे हैं, तो दूसरे अपने रवैये के लिए शर्मिंदा हो रहे हैं। दरअसल ये ही कमाल है अरविंद गौड़ नाम के उस शख्स का जिसके लिए साधारण बने रहना सबसे असाधारण कमाल है, ये ही सादगी उनकी भी आभा पिछले तीन दशकों से बढ़ा रही है, और इसी आभा से अस्मिता को चमकते 19 साल हो गए हैं।
जी हां...अस्मिता अपने 19 साल पूरे कर रहा है, अस्मिता 20 वें साल में प्रवेश कर रहा है और साथ ही 2 दशक की यात्रा तय कर आज भी जारी है प्रतिरोध के थिएटर का ये सफ़र। एक अभिनव प्रयोग अस्मिता, जो कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के साथ रामलीला मैदान में हज़ारों लोग जुटा लाता है तो कभी इरोम शर्मिला के साथ जंतर मंतर पर एक काले कानून के खिलाफ आवाज़ उठाता खड़ा होता है। कभी ये गांधी और अम्बेडकर के बीच के रिश्ते को समझने की कोशिश करता करता, वर्ण व्यवस्था की जड़ पर कुदाल चला देता है तो कभी जिन्नाह की रूह को ज़िंदा कर अपने सिर पर इनाम रखवाता है पर झुकना स्वीकार नहीं करता। अस्मिता के ये 20 साल उतार-चढ़ाव से भरे रहे तकनीक से लेकर अभिनेताओं तक सब कुछ बदला लेकिन कुछ नहीं बदला है तो वो है अरविंद गौड़ की जिजीविषा, प्रतिरोध की शैली और अस्मिता की मुखरता।
अस्मिता की बात करते वक्त तमाम और लोगों की तरह मैं गिनवा सकता हूं कि यहां से कौन कौन से अभिनेता निकल कर बॉलीवुड में नाम बन गए हैं लेकिन थिएटर से इतर भी दरअसल अस्मिता की अपनी एक अलग दुनिया है। ये एक अद्भुत परिवार है, जिसमें न जाने कितने सदस्य हैं। 60 से ज़्यादा वर्तमान अभिनेताओं के साथ (जिनमें से ज़्यादातर युवा हैं और 25 साल से कम उम्र के हैं) ये अलग ही घर है। एक घर जहां लगभग हर चौथे दिन किसी का जन्मदिन होता है और हर जन्मदिन पर एक उत्सव। एक ऐसा परिवार जो एक दूसरे के लिए तो दिन रात खड़ा ही है, दूसरों की मदद के लिए भी सबसे आगे है। रामलीला मैदान में आपको याद होगा अस्मिता के काले कपड़े वाले बच्चों का जज़्बा। न जाने कितनी बार मैंने देखा कि अस्मिता के सदस्य कभी किसी की मदद के लिए रक्तदान करने तो कभी किसी मोहल्ले-बस्ती की सफाई में श्रमदान करने निकल पड़ते हैं। एक एसएमएस एक-एक मोबाइल से न जाने कहां कहां पहुंच जाता है। दिल्ली की ये सड़के उन रातों को जूतों के निशानों को अपने ज़ेहन से मिटा नहीं पाई हैं, जब अरविंद गौड़ को इसी दिल्ली ने नाटक करने से प्रतिबंधित कर दिया था। अरविंद गौड़ उस दौर में हर रात मंडी हाउस से शाहदरा अपने घर तक पैदल जाया करते थे और शायद वो ही न झुकने की ज़िद उनके अंदर आज भी कूट कूट कर भरी है...
अरविंद गौड़...और अस्मिता को न जाने कितने साल से सिर्फ चाय और पारले जी के सहारे दिन रात मेहनत करते देख रहा हूं। हो सकता है कि हम में से कई अस्मिता के कलाकारों के अभिनय पर सवाल उठा दें। उनके कम उम्र और कम अनुभव पर सवाल उठा दें...लेकिन अरविंद गौड़ का थिएटर जो सवाल उठा रहा, क्या उनके जवाब हम देने को तैयार हैं? क्या हम इस योगदान को नकार सकते हैं कि देश और समाज के बारे में शून्य समझ रखने वाली एक पूरी पीढ़ी के न जाने कितने युवाओं के दिमाग अरविंद गौड़ बदल चुके हैं। थिएटर के ज़रिए किस कदर सोशल चेंज हो सकता है, ये अरविंद गौड़ और अस्मिता से हम लम्बे समय तक सीख सकते हैं।
हर बार जब अस्मिता जाता हूं, इन जोशीले नौजवान साथियों से मिलता हूं तो कई बार डर लगता है कि कहीं पूंजीवाद की आंधी और इंडिया की शाइनिंग किसी रोज़ अरविंद गौड़ और अस्मिता को न बदल दे। लेकिन तभी रिहर्सल्स के बाद अरविंद जी को साहित्यकार लक्ष्मण राव जी (लक्ष्मण राव के बिना अस्मिता की कहानी अधूरी है...)की चाय की दुकान पर ज़मीन पर ही बैठा देखता हूं, और हाथ से इशारा कर मुझे बुलाते हैं...तो लगता है कि नहीं उम्मीदें अभी बाकी हैं और उम्मीदों को बाकी रहना ही होगा...दिल्ली के आईटीओ पर हिंदी भवन के बाहर बैठा मैं सोच रहा हूं कि काश देश में ऐसे 10 अस्मिता होते, तो क्या हो सकता था...काश अरविंद जी हमेशा ऐसे ही रहें...और अस्मिता भी...बचा रहे बुर्जुआ से और बाज़ार से...अरविंद जी आप सुन रहे हैं न...
(अस्मिता के 20वें साल में प्रवेश के मौके पर कुछ सशक्त प्रस्तुतियां दिल्ली में हो रही हैं...जिस कड़ी में 4 फरवरी को शाम 7 बजे दिल्ली के श्रीराम सेंटर में कोर्ट मार्शल, 12 फरवरी को मयूर विहार में बुज़ुर्गों के लिए अम्बेडकर और गांधी की विशेष प्रस्तुति दोपहर 3 बजे, श्रीराम सेंटर में ही 18 फरवरी को शाम 7 बजे एक मामूली आदमी, 19 फरवरी को दोपहर 3 बजे श्रीराम सेंटर में मोटेराम का सत्याग्रह और 19 फरवरी को ही शाम 7 बजे अम्बेडकर और गांधी का श्रीम सेंटर में मंचन होगा...देखिए कि आप इनमें से किसमें आकर इस दो दशक के जश्न में शामिल हो सकते हैं...)

मयंक सक्सेना
Saturday, January 7, 2012
मानव तस्करी ..............

यह जानकर अत्यन्त दु:ख और शर्म का अनुभव होता है कि आज भी हमारे देश में मानव तस्करी जैसा जघन्य अपराध जारी है। मध्यप्रदेश में पुलिस ने सात बच्चियों को तस्करों के चंगुल से छुड़ाकर उस समाज को आईना दिखा दिया, जो समाज बेटियों की पूजा भी करता है। आश्चर्य होता है कि हमारे देश में ऎसे दानव तुल्य लोग भी हैं, जो मानव को बेचने और खरीदने का गोरखधंधा करते हैं और यह सारा कुछ समाज के बड़े-बड़े ठेकेदारों और बड़े-बड़े कर्णधारों की नाक तले होता आया है। मानव की खरीद-बिक्री कोई ऎसा कारोबार नहीं है, जिसे आसानी से चलने दिया जाए और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। यह काला कारोबार मानवीयता, सभ्यता और कानून-व्यवस्था के साथ-साथ हमारे धर्मो को भी चुनौती देता है।
आज से लगभग 30 साल पहले एक पत्रकार अश्विनी सरीन ने कमला नाम की महिला को धौलपुर से 2300 रूपए में खरीद कर देश को आईना दिखाया था कि देखिए, अपने देश में लड़कियां-युवतियां पशुओं की तरह बेची-खरीदी जाती हैं। तब बड़ा हंगामा हुआ था, सरकारें हरकत में आई थीं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। आज भी लड़कियां बिक रही हैं, फर्क केवल इतना पड़ा है कि उनकी कीमत बढ़ गई है। अब वे 20 से 60 हजार रूपए में बेची और खरीदी जा रही हैं। मध्यप्रदेश के मंदसौर में जो ताजा खुलासा हुआ, वह तो इसलिए भी ज्यादा संगीन है, क्योंकि पूरा एक गिरोह सक्रिय था, जो इन्दौर, खरगोन से बेबस बçच्चयों को अगवा करके वेश्यावृत्ति करवाने वालों को बेचा करता था। थोड़ा व्यापकता में देखें तो हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में लड़कियों और युवतियों को बेचे जाने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि चांद पर पहुंचने और अंतरिक्ष भ्रमण करवाने की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली सरकार ने अभी तक मानव तस्करी करने वालों पर पूरी कड़ाई से क्यों प्रहार नहीं किया है?
कोई शक नहीं है कि मानव तस्करी करने वालों के लिए कठोरतम सजा का प्रावधान होना चाहिए, जब तक ऎसा नहीं होगा, तब तक मानव तस्करी नहीं रूकेगी। कठोरतम सजा का प्रावधान इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कन्या भू्रण हत्या की वजह से लिंगानुपात बुरी तरह से बिगड़ रहा है। बड़ी संख्या मे लोग कन्या को जन्म लेने से रोक रहे हैं, लेकिन कन्या के बिना समाज का काम चल भी नहीं सकता, तो येन-केन-प्रकारेण कन्या किसी वस्तु की तरह जुटाई जा रही है। कन्या भ्रूण हत्या और जबरन वेश्यावृत्ति को भी रोकना जरूरी है। परंपरागत रूप से मध्यप्रदेश की जो जाति या जातियां वेश्यावृत्ति से जुड़ी हैं, उनके पुनर्वास पर कठोरता से काम करना होगा। दुनिया में हमारी गिनती सभ्य, लोकतांत्रिक व उदारवादी देशों में होती है, ऎसे में घिनौनी परंपराओं और सड़ान्ध मारती सामाजिक कुरूतियों को जड़ से उखाड़ फेंकने की जरूरत है। मंदसौर में जो लोग मानव तस्करी में पकड़े गए हैं, उन्हें ऎसी सजा मिलना चाहिए कि दूसरे मानव तस्करों की रूह कांप जाए।
सौजन्य से राजस्थान पत्रिता-अमित सेन
Saturday, December 31, 2011
नव वर्ष आपके जिंदगी में खुशी संपन्ता और उन्नती प्रदान करे इन्ही आशाओं के साथ वर्ष 2012 की हार्दिक शुभकामनाएं

उदासीनता ना सही पर जो जिज्ञासा और मोह नए के प्रति होता है पुराने के साथ नहीं रह पाता । बीता वर्ष चाहे कितनी ही खूबसूरत सौगातें सौंप जाए लेकिन लोभी मन कभी संतुष्ट नहीं होता। आने वाले वर्ष के लिए कहीं अधिक खूबसूरती के सपने अनजाने ही शहदीया आँखों में सजने लगते हैं।
कितना सुखद लगता है नूतन वर्ष को निहारना, उत्सुकतावश ताकना ! ह्रदय में तरंगित होता है यह भोला प्रश्न -- ' क्या लाए हो मेरे लिए ?'
और ह्रदय में ही काँपता -कुनमुनाता एक घबराया प्रश्न -- पता नहीं क्या लाए हो मेंरे लिए? '
उत्सुकता एक ही है पर स्वरुप भिन्न है। एक उत्साह से भरपूर कि क्या लाए हो मेरे लिए और दूसरा आशंका में डूबा कि पता नहीं.....?
जाते हुए साल ने जो जहरीले दंश दिए हैं उससे सभी आहत हुए हैं। मुंबई की अनहोनी के बाद हर भारतीय मन का आशंका से ग्रस्त होना स्वाभाविक है।
पर मानव कितनी ही विषम परिस्थितियों में रहे। उसका भोलापन अमिट है। इसीलिए आँधी और अंधकार से घिरी विचार श्रृँखला के बीच भी दिल की बगिया के कहीं किसी कोने में विश्वास की एक गुलाबी, नाजुक कोंपल फूट ही पड़ती है।
कौन जाने इस नए वर्ष में आकांक्षा पूरी हो जाए। नया जॉब मिल जाए । शायद बिटिया दुल्हन बन जाए। एक अदद आशियाना खड़ा हो जाए। बच्चों के परीक्षा परिणाम अपेक्षानुरूप आ जाए। कोई हमसफर मिल जाए। प्रमोशन हो जाए। या फिर कोई नन्हा,गुदगुदा 'खिलौना' मुस्कुरा उठे।
कितनी -कितनी तमन्नाएँ , कितने-कितने अरमान!
हर दिल की ख्वाहिश कि नए बरस में कोई ऐसी खुशी मिल जाए जिसे बरसों से बस दिल में ही संजोकर रखा है। कभी व्यक्त नहीं किया है।
कितने भावपूर्ण, मोहक, मधुर और सुवासित सपने हैं!
नया वर्ष इसीलिए तो आता है , अपने अंतर में निहित सुंदर सपने, आकांक्षाएँ और कल्पनाएँ पुन: याद करने के लिए । उन्हें साकार करने के लिए मन में एक नवीन ऊर्जा का विस्फोट करने के लिए।
बीते वर्ष में सांसारिकता के ना जाने कितने कसैले घूँट पीए होंगे। किसी प्रियजन को हमेशा-हमेशा के लिए बिछुड़ते देखा होगा, कभी विश्वास चटके होंगे, कभी आकर्षक भ्रम चकनाचूर हुए होंगे ।
कभी संबंधों ने दरक कर दम तोड़ा होगा। कभी अपनों के आवरण में लिपटे परायों का परिचय हुआ होगा। ऐसे ही उलझे हुए ताने-बाने में दिल के दरवाजे पर हताशा के हथौड़े ने दस्तक दी होगी ---
'क्यों ? क्यों होता है ऐसा सिर्फ मेरे ही साथ?
Thursday, December 22, 2011
पहिए सी चलती ये जिंदगी
अब कोलगेट, वेस्टर्न टॉयलेट, यूरोपियन बाथरूम, म्यूजिक, गीजर, वाशिंग मशीन, बड़ा सा आइना और झम-झम करके बरसता शॉवर। कपड़े, टाई, बेल्ट, कोट, जूते न जाने कितने बंधन। नाश्ता, डायनिंग। न जाने क्या-क्या। अटैची, कागज, मोबाइल, आईपैड, लैपटॉप, चश्मा और फिर कार। सीट बेल्ट, लाइसेंस, कार के कागज और सरपट तारकोल को रौंदते टायर। ऑफिस, नमस्ते, सलाम साब, लेट, अरे इतने जल्दी, तुम्हारा कल का काम, आज यह नहीं वह, कल फिर से वही। साहिब चाय। फोन, ट्रिन. ट्रिन। मेल का क्या हुआ, जवाब दो। मुझे आज के आज सब कुछ चाहिए। जमीन। महत्वाकांक्षाएं, स्पर्धा, सर्वश्रेष्ठ, पिछड़ापन आदि। चंदना, वंदना, शीला, मुन्नी, मोहन, रोहन, सोहन न जाने कितने कौन, क्या उनका काम, कैसा अच्छा बुरा, खराब, नया पुराना और बस लैपटॉप बंद फिर वही शाम के 8 बजे। घर से फोन कब, कहां डिनर में क्या लोगे। घर, बेटा, बीवी, टीवी, ऑफिस की फाइलें, सुबह की प्लानिंग, एडमिशन, स्कूल, परेशान बेटा, चिंतित पत्नी। वीडियो गेम और न्यूज चैनल, सास बहु साजिश, दिल्ली में दो हत्या मुंबई में बलात्कार, विधायक एक करोड़ का, बाबू के पास 10 कारें, सोने के हार, अंधेरे को चीरती कुछ सनसनी सी, हीरा, हार, मोती, ज्योतिष मंगाए, खुश हो जाएं। मंगल को व्रत रखें, अंगूठी पहनें दांयी उंगली में ऑफर के साथ और न जाने कब आंख लग सी गई। बस यही जिंदगी। एक दम नकली सी।
- वरुण के सखाजी, चीफ रिपोर्टर, रायपुर दैनिक भास्कर
Sunday, December 11, 2011
अन्ना की आंधी............!
अन्ना की आंधी का एक और नजारा दिल्ली के जंतर मंतर में देखने को मिल रहा है। मीडिया के लिए अन्ना एक ऐसा हथियार बने चुके हैं,जिसे वो महज टीआरपी के लिए ही अपनाना चाहती है।इस संदर्भ में अगर बात अन्ना के जन लोकपाल बिल की करें तो साफ है,इस बिल को सरकार भी लाना चाहती है,पर अपने बनाए नियमों के अनुसार वही अन्ना का कहना है कि स्थाई समिति ने कमज़ोर लोकपाल बिल संसद में भेजा है और ये देश के साथ धोखा है,स्टैडिंग कमेटी की रिपोर्ट में लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की सिफ़ारिश की गई है,स्थाई समिति के अध्यक्ष अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक लोकपाल को अभियोजन प्रक्रिया शुरू करने के लिए किसी भी तरह की पूर्व-अनुमति नही होनी चाहिए पर लोकपाल के चुनाव के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायधीश, लोकसभा के अध्यक्ष और लोकसभा में नेता विपक्ष के अलावा एक चौथा व्यक्ति भी होगा, लेकिन सीबीआई की तहक़ीक़ात और लोकपाल की अभियोजन प्रक्रिया अलग-अलग होंगी, प्रधानमंत्री को लोकपाल में शामिल किए जाने पर ये सुझाव रखे गए हैं, लोकपाल के दायरे में लेकिन सुरक्षा के प्रावधानों के साथ, लोकपाल के दायरे में लेकिन अभियोजन प्रक्रिया पद छोड़ने के बाद ही या लोकपाल के दायरे से बाहर, लेकिन अन्ना का कहना है कि ये मसौदा बेहद कमज़ोर है और इससे भ्रष्टाचार घटने के बजाए बढ़ जाएगा.अन्ना के जन आंदोलन की गूंज भारत के साथ ही विदेशों में भी रही। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को टाइम मैगज़ीन ने साल 2011 की दस सबसे बड़ी खबरों में शामिल किया है।इसके साथ ही मैगज़ीन ने लिखा है, "हज़ारे की भूख हड़ताल, और उनको मिले जन समर्थन ने लोगों को एक देशभक्ति का जज्बा दिया है जो कि भारत की आजादी के बाद ऐसा लगता था कि आज के युवाओं में वो जोश शायद ही रहा हो जिसके चलते भारत के कई बड़े शहरों में लोगों ने प्रदर्शन किए। इससे सरकार पर स्वतंत्र लोकपाल संस्था बनाने का दबाव बढ़ा जो प्रधानमंत्री तक की जांच कर सकता है और भ्रष्ट लोगों को सज़ा दिलवा सकता है."
साभार-बी.बी.सी.हिन्दी