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Tuesday, July 19, 2011

खो गया मेरा स्कूल


घर से स्कूल की दूरी महज आधा किलोमीटर, लेकिन पहुंचने में पसीना निकल जाता। अंग्रेजी कबेलुओं से बना, स्कूल किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं लगता था। जुलाई में कीचड़ का सामना करते हुए स्कूल पहुंचने चांद पर कदम रखने से कम नहीं था। पहुंचते ही, पहला काम जूते बाहर उतारकर अपनी क्लास में जाना, पहले तो कमरे का झाड़ू लगाना और फिर टाट पट्टियां बिछाना। इसके बाद बजती थी, घंटी कि अब चलो प्रार्थना होगी। यह सब कुछ महज 10 मिनिट का होता था। प्रार्थना में कोई अंग्रेजीदां शब्द या शैली नहीं, बल्कि साधारण वह शक्ति हमें दो द्यान दे कर्तव्य मार्ग पर डट जाएं। पंक्तिवार अपनी कक्षाओं में जाना और फिर बैठना, बिना कोई समय गंवाए। गुरुजी के कक्षा में दाखिल होते ही, उनके पैर छूना और नकल की कॉपी चेक करवाना। गुरुजी के नोट का इंतजार करना कि वे क्या लिखने जा रहे हैं। मुझे तो वे हमेशा एक ही नोट देते थे, लिखावट सुधारो प्रतिदिन एक पृष्ठ लिखें और नीचे दस्तखत शिवकुमार शर्मा। हिंदी की कक्षा पहली होती थी। क्लास टीचर शब्द तो नहीं लेकिन पहला घंटा जरूर जानते थे। भारत माता का आह्वान तेरी जय हो सदा विजय, पीछे न पैर डालू चाहे महाप्रलय हो। और फिर वक्त आता था गणित का। गणित पढ़ाने वाला अक्सर पढ़ाता कम मारता ज्यादा है। ऐसी ही होता था, जब लंगड़ा मास्साब पढ़ाते थे। यकीन मानिए जब हम पांचवी कक्षा की मार्कशीट लेने गए तब हमें पता चला कि गणित पढ़ाने वाले मास्साब का नाम लंगड़ा मास्साब नहीं बल्कि राघवेंद्र मास्साब है। यह जानकर बालमन को जितना आश्चर्य हुआ वह आज युवा मन को नोवल प्राइज मिलने पर भी न हो, क्योंकि नहीं पता था, कि हम उनका यह नाम क्यों नहीं जानते थे। रोटी खाने की छुट्टी और फिर चालीस मिनिट बाद स्कूल की कड़ी परीक्षा। कोई अंग्रेजी नहीं, कोई हैलो हाय नहीं। कोई पालक मीटिंग नहीं, कोई फीस का झंझट नहीं। कोई पढ़ाई, कोर्स का लफड़ा नहीं। सबकुछ एकदम गुरुकुल की तरह। एक बार सौंपा तो पालक सालों बच्चे की सुनते भी नहीं थे। पूरी अजादी से मास्साब पढ़ाते थे। हालांकि उस दौर की कुछ बातें बड़ी बेजा लगती थी। मसलन टेकरा वाले बाबा का कहना था, अब तो फिर भी मास्साब ठीक हो गए, पहले जमाने में हमें तो ऐसे पीटते थे, जैसे कसाई। दूनिया (टेबल) नहीं आया तो कुर्सी के नीचे दोनों हाथों पर कुर्सी के पैर रख कर बैठ जाते थे। पढ़ाते रहते थे। तब बाल मन को बड़ी शांति मिलती, चलो अच्छा हुआ भगवान ने लेट पैदा किया नहीं तो मैं तो मर ही जाता। रोटी की छुट्टी के बाद सामाजिक अध्ययन आता, बड़ा आसान जैसे आसपास की तलाश की तरह लगता था। इसे पढ़ाने गेंदालाल मास्साब साईंखेड़ा से कुंजी लेकर आते थे। मुझे नहीं पता क्यों लेकिन वे लिखवाते बहुत थे। ऐसी प्रश्न जैसे ऊंटा 30 दिनों तक बिना पानी के रह सकता है, इसलिए उसे रेगस्तान का जहाज कहते हैं। इसमें भी कुछ छात्र पीछे रह जाते थे, जैसे मास्साब जी तनक पीछे से बोल दइयो...।
वक्त गुजरा, जमाना गया और संस्कार के यह स्कूल सरकारी मकडज़ाल में ऐसे फंस गए कि मास्टर के पास काम तो रहा लेकिन सिर्फ लोगों को गिनने, दवा पिलाने, बूढ़ों को पढ़ाने, चुनाव करवाने, सर्वे करने और बच्चों की गिनती करने का। अगर कुछ छिना तो बच्चों को पढ़ाने का काम। और तो और मध्यप्रदेश में तो और भी अति हो गई। जिस मास्साब को कभी हम जीवन का परमात्मा मानते रहे वह लाचारी बेबशी की जिंदगी गुजार रहा है। इसे लोग संविदाजीवी के नाम से जानते हैं। पता नहीं कब कहां किन हालातों में उसे अपनी नौकरी छोडक़र पंक्चर जोडऩे पड़ें। सारे अनुशासन निजी स्कूलों में चले गए, समय पर आना, खाना, प्रार्थना और यह मैम नो मैम, जॉनी जॉनी यस पापा, वाट्स योर नेम और फिर बच्चे के बारे में लोगों से कहना अंग्रेजी माध्यम में पढ़ रहा है। सरकारी स्कूल मास्टरों यानी पढ़ाई छोडक़र सबकुछ करने वाले स्कूल बन गए। और खो गए कहीं गुरु और खो गए कहीं छात्र।
वरुण के सखाजी

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