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Thursday, December 22, 2011

पहिए सी चलती ये जिंदगी

तब धूप कंबल से भी रास्ता बनाकर आंखों के धो डालती, गाय रंभाकर बछड़े को पुकारने लगती, छाछ बनाती दादी दो रस्सियों को पकड़ नाचती सी। दातून के लिए बबूल की डालियों से झूलते ग्रामीण। सार (गौशाला) में घुसकर हरवाया जैसे गायों को गालियों से गुडमॉर्निंग कहता। सूं..सूं.. की आवाज और फिर ढिर..ढिर जैसे दूध लगना शुरू हुआ और जब पतीला पूरा भरने को है, तो आई आवाज। सुबह रामायण के पाठ की गूंज, दाज्जी (ताऊ) का जेहि सुमरत सिद्ध होई.. आगे कुछ न समझ आता। और फिर बारी होती स्कूल की तैयारी होती। मंजन, बस्ता, बस्ती, नहाना धोना, किताब कापी और स्लेट बत्ती रखने में हो जाता टाइम। जल्दी से खाना खाना रोज लेट होना दौडक़र घंटी बजने से पहले स्कूल में पहुंचना। टन-टन की आवाज और प्रार्थना वह शक्ति हमें दो दान कर्तव्य मार्ग पर डट जावें.. और फिर वही स्कूल, स्लेट, बत्ती, ब्लैक बोर्ड, मास्टर, कुंजी, कापी, फट्टी, किवाड़ और कुर्सी जैसे बार-बार आंखों को छूकर निकलते से हैं। रोटी खाने की छुट्टी (लंच) फिर मास्टसाब के लिए चाय। फिर दो अन्य विषयों भूगोल और सामाजिक अध्ययन की पढ़ाई और बस फिर छुट्टी। 4 बजे घर खेल, खलिहान, खेत और गलियारा। गुल्ली, गोली, गोवर और मिट्टी के खिलौने। बस यही जीवन। एक दम असली सा।
अब कोलगेट, वेस्टर्न टॉयलेट, यूरोपियन बाथरूम, म्यूजिक, गीजर, वाशिंग मशीन, बड़ा सा आइना और झम-झम करके बरसता शॉवर। कपड़े, टाई, बेल्ट, कोट, जूते न जाने कितने बंधन। नाश्ता, डायनिंग। न जाने क्या-क्या। अटैची, कागज, मोबाइल, आईपैड, लैपटॉप, चश्मा और फिर कार। सीट बेल्ट, लाइसेंस, कार के कागज और सरपट तारकोल को रौंदते टायर। ऑफिस, नमस्ते, सलाम साब, लेट, अरे इतने जल्दी, तुम्हारा कल का काम, आज यह नहीं वह, कल फिर से वही। साहिब चाय। फोन, ट्रिन. ट्रिन। मेल का क्या हुआ, जवाब दो। मुझे आज के आज सब कुछ चाहिए। जमीन। महत्वाकांक्षाएं, स्पर्धा, सर्वश्रेष्ठ, पिछड़ापन आदि। चंदना, वंदना, शीला, मुन्नी, मोहन, रोहन, सोहन न जाने कितने कौन, क्या उनका काम, कैसा अच्छा बुरा, खराब, नया पुराना और बस लैपटॉप बंद फिर वही शाम के 8 बजे। घर से फोन कब, कहां डिनर में क्या लोगे। घर, बेटा, बीवी, टीवी, ऑफिस की फाइलें, सुबह की प्लानिंग, एडमिशन, स्कूल, परेशान बेटा, चिंतित पत्नी। वीडियो गेम और न्यूज चैनल, सास बहु साजिश, दिल्ली में दो हत्या मुंबई में बलात्कार, विधायक एक करोड़ का, बाबू के पास 10 कारें, सोने के हार, अंधेरे को चीरती कुछ सनसनी सी, हीरा, हार, मोती, ज्योतिष मंगाए, खुश हो जाएं। मंगल को व्रत रखें, अंगूठी पहनें दांयी उंगली में ऑफर के साथ और न जाने कब आंख लग सी गई। बस यही जिंदगी। एक दम नकली सी।
- वरुण के सखाजी, चीफ रिपोर्टर, रायपुर दैनिक भास्कर

Sunday, December 11, 2011

अन्ना की आंधी............!

अन्ना की आंधी का एक और नजारा दिल्ली के जंतर मंतर में देखने को मिल रहा है। मीडिया के लिए अन्ना एक ऐसा हथियार बने चुके हैं,जिसे वो महज टीआरपी के लिए ही अपनाना चाहती है।इस संदर्भ में अगर बात अन्ना के जन लोकपाल बिल की करें तो साफ है,इस बिल को सरकार भी लाना चाहती है,पर अपने बनाए नियमों के अनुसार वही अन्ना का कहना है कि स्थाई समिति ने कमज़ोर लोकपाल बिल संसद में भेजा है और ये देश के साथ धोखा है,स्टैडिंग कमेटी की रिपोर्ट में लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की सिफ़ारिश की गई है,स्थाई समिति के अध्यक्ष अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक लोकपाल को अभियोजन प्रक्रिया शुरू करने के लिए किसी भी तरह की पूर्व-अनुमति नही होनी चाहिए पर लोकपाल के चुनाव के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायधीश, लोकसभा के अध्यक्ष और लोकसभा में नेता विपक्ष के अलावा एक चौथा व्यक्ति भी होगा, लेकिन सीबीआई की तहक़ीक़ात और लोकपाल की अभियोजन प्रक्रिया अलग-अलग होंगी, प्रधानमंत्री को लोकपाल में शामिल किए जाने पर ये सुझाव रखे गए हैं, लोकपाल के दायरे में लेकिन सुरक्षा के प्रावधानों के साथ, लोकपाल के दायरे में लेकिन अभियोजन प्रक्रिया पद छोड़ने के बाद ही या लोकपाल के दायरे से बाहर, लेकिन अन्ना का कहना है कि ये मसौदा बेहद कमज़ोर है और इससे भ्रष्टाचार घटने के बजाए बढ़ जाएगा.अन्ना के जन आंदोलन की गूंज भारत के साथ ही विदेशों में भी रही। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को टाइम मैगज़ीन ने साल 2011 की दस सबसे बड़ी खबरों में शामिल किया है।इसके साथ ही मैगज़ीन ने लिखा है, "हज़ारे की भूख हड़ताल, और उनको मिले जन समर्थन ने लोगों को एक देशभक्ति का जज्बा दिया है जो कि भारत की आजादी के बाद ऐसा लगता था कि आज के युवाओं में वो जोश शायद ही रहा हो जिसके चलते भारत के कई बड़े शहरों में लोगों ने प्रदर्शन किए। इससे सरकार पर स्वतंत्र लोकपाल संस्था बनाने का दबाव बढ़ा जो प्रधानमंत्री तक की जांच कर सकता है और भ्रष्ट लोगों को सज़ा दिलवा सकता है."

साभार-बी.बी.सी.हिन्दी

Saturday, August 27, 2011

संसद एक बाजार

भैया संसद बाजार में दुकानें लग गई, एतिहासिक बाजार था। पूरे देश की टकटकी लगी थी। तो कौन है जो अपना माल कम बेचने पर राजी हो। हो गए शुरू इकतरफा। सुषमा ने बेचा अपना अनुभव, भाषाई प्रभावोत्पादकता, सबको ऑबलाइज कर पार्टी हाई कमान और संघ को संदेश कि वह पीएम के लिए आडवाणी से ज्यादा परफैक्ट है। संदीप ने दिखाई अपनी साफगोई। साथ यह संदेश कि जितना मिलना था, कांग्रेस में रहकर वो मम्मी शीला दीक्षित को मिल चुका है, अब कांग्रेस परिवार के नाम पर सोनिया के अलावा किसी को बर्दाश्त नहीं करती। आंध्रा का उदाहरण है सामने, तो संदीप ने बेचा अपना सुर कांग्रेस की खोल से भाजपा की बातों का। यह सब तो थे राष्ट्रीय ब्रांड जो बाजार को बेच रहे थे, अपने उत्पाद। लेकिन वहां बाजार में स्ट्रीट वेंडर्स भी शामिल थे। आ गए बहुजन समाज के उन्होंने जो बेचा वो तो और भी हास्यास्पद था। कहा कि सामाजिक विषमता की बात नहीं करता जन लोकपाल। सही है, उसे पहले भारतीय राजनीति की बेसिक शर्तें मसलन सेकुलरिज्म, जय पिछड़े कभी न हों पाएं अगड़े, जय दलितम कभी न होना अगलम। पांच लोगों की सिविल सोसाइटी में दो मुस्लिम एक क्रिश्चियन, एक बुद्ध और सिख होना जरूरी है, बाकी अन्य धर्म के लोग हों। का भी तो ख्याल रखना था। अब आए एक और लोक उत्पाद के विक्रेता शरद यादव। वो इनसे आगे के सामान बेच गए, मंच सजा देख, जुबान पैनी करली। टीवी को डिब्बा और अन्ना के समर्थकों को कुत्ता घुमाने आने वाले इवनिंग मॉर्निंग वॉकर्स कहा। बहुत खूब सजी महफिल ए संसद बाजार।
अरे सबसे अच्छी बात तो यह रही कि कर्ता धर्ता जान गए, समझ गए, जनता का गुस्सा संसद पर मोड़ो, वरना कांग्रेस पर फूट रहा है। मोडक़र चुपके से निकल पड़े वार्ता सैर पर। करेंगे। बाबा अन्ना मर गया तो हल्ला बच गया तो अपनी बला से। लेकिन कहीं संसद में कुछ ऐसी बात न होने लगे कि सचमुच का लोकपाल बिल लाना ही पड़ेगा, तो स्थिति संभालने पहुंच गए। सबको पीछे किया कौन श्री-श्री, भय्यू आदि।
अभी जारी है, किस्सा ए अन्ना और लोकपाल की लोक गाथा। देखते हैं, क्या होना है।
संसद के बाजार में किसका माल किसके मुकाबले कितना बिका यह ट्रेंड्स आने बाकी हैं। हाल में मिले झुकावों के मुताबिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों (कांग्रेस-भाजपा) के उत्पादों को अच्छी टक्कर दे रहे हैं, नकली, लोकल, मिलावट खोर कंपनियों के उत्पाद (जदयू, बसपा)-
देख तमाशा दुनिया का।
- सखाजी

Thursday, August 25, 2011

सुनो देश पर काबिज लोगों...

मैं भारत की युवा बोला रहा हूं। मेरे जैसे इस देश में सबसे ज्यादा हैं। लेकिन मेरा नेता 74 साल का अन्ना है। मैं अब तक अपना नेता नकली नेता को मानता रहा। विधायक, सांसद को मानता रहा। मगर यह सब तो एक थोथली व्यवस्था के अंग निकले। अन्ना लड़े, लड़ते रहे। मर गए। मर गए। मर गए।
अब क्या करूं। मैं। मैंने तो देख लिया गांधी के अहिंसा मार्ग को भी। मैं तो चल भी पड़ा अन्ना के साथ भी। मगर क्या बदला। क्या हुआ बड़ा काम। उल्टा सरकारी सुर और घातक हुए। कुछ नहीं होता यार ताकत उनके ही पास रहती है। अब झुके भी तो क्या अब मान भी जाएं तो क्या। नाम की संसद विधायक हैं। भैया वे सब मूल रूप से भेडिय़े हैं। सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज मैं युवा सालों से अच्छा सोचता रहा। मगर अब तक मुझे अच्छा मिला नहीं। अब मैं आपक अहिंसा मार्ग त्याग दूं तो मुझे पथभ्रष्ट न कहना। अन्ना की एक-एक सांस मेरी रगों में तैर रही है। अहिंसा की इज्जत कर रहा हूं। मगर अब कुछ हो जाए तो मत कहना। बसों को जलाकर मैं कोई रैली. तूफान नहीं लाना चाहता। मैं जंगलों में घुसकर कोई लाल गाल नहीं करना चाहता। मैं इस व्यवस्था में रहकर इसके ही खिलाफ कुछ करना चाहता हूं। हां अगर कुछ यानी अच्छा करने में दिक्कत हुई, तो मुझे जंगलों में जाकर बम बरसाने में भी बुराई नहीं लगेगी। मैं कहता हूं बार-बार। अगर हो जिम्मेदार। सरकार।
तो अभी भी वक्त है, अपना तथाकथित इगो छोड़ दो नेताओं। वरना देश में आग लग जाएगी। आज नहीं सही कल लग जाएगी। कल नहीं सही परसो मैं खून खराबा कर दिखाऊंगा। किसी मंत्री को निकाल लाल बत्ती से बीच रास्ते पर गोलियों से भून दूंगा। किसी अरुंधति, अरुणा का पकडक़र चित्रशाला की सियासत तोड़ डालूंगा। मैं इस जंग में किसी अन्ना से भी फिर इत्तेफाक नहीं रखूंगा। क्या मुझ युवा की मनशक्ति को इस दिशा में जाने से रोकने वाला कोई है।
( यह मनोवेग अब युवाओं और अन्ना समर्थकों के मन में आए हैं अगर आप सच्चे हैं, तो जरूर कुछ इतना ही क्रोध महसूस कर रहे होंगे। और हां आप अगर गलत हैं जरूर ही इन पंक्तियों से आप डर कर खारिज करने कुछ सोच रहे होंगे। और अगर आप कुछ भी कर ना चाहें तो बंदूक ही एक रास्ता आपको लग रहा होगा। - भारत का युवा)

Saturday, August 13, 2011

जनक्रांति या भ्रांति?????

अन्ना आंदोलन को पूरा देश टकटकी लगा कर देख रहा है। ऐसा लग रहा है, मानो लोकपाल बिल पारित होते ही, संपूर्ण संसार में सतयुग आ जाएगा। देश का हरेक व्यवस्था का बंदा बेईमान है। हर अधिकारी, नेता, चापलूस मालामाल हैं। कुछ-कुछ फ्रांस की क्रांति से माहौल हैं। फेसबुक में लेट्स सपोर्ट अन्ना, एंटी गवर्नमेंट माहौल देखा जा रहा है। देश के विभिन्न प्रांतों में टीवियों के माध्यम से क्रांति सुगबुगा रही है। ऐसा लगता है, कि अब तो बस अन्ना अनशन करेगा और सरकार मान जाएगी।
कुल मिलाकर सरकार बन गई विलैन और अन्ना बन गए हीरो। वाकई अन्ना हीरो हैं, वे अच्छे काम के लिए अच्छे प्रयास कर रहे हैं, बाबा की तरह ओवर रिएक्टिव सेना नहीं बना रहे। उनकी इन भावनाओं की कद्र की जानी चाहिए। मगर अफसो है, कि इस जनक्रांति में एक भ्रांति सतत चल रही है। अन्ना के इस आंदोलन को उन लोगों का सपोर्ट है, जो थिंक वोट हैं, न कि ईवीएम बटन दबाने जैसे छोटे काम करने वाले लोग। इस क्रांति में ड्रॉइंग रूप के प्लानर्स हैं। जमीन पर जमीन के लिए जमीन से काम करने वाले लोग इस पर अपना साफ सुथरा मत जाहिर नहीं कर पा रहे हैं, या फिर नहीं कर रहे हैं। सीधी सी बात है, अन्ना के इस आंदोलन को कुचलने के लिए कांग्रेस जो भी कर सकती है, करेगी और कर रही है। अभी क्या है, हो सकता है कोई ऐसा मुद्दा सामने आए जो इस पूरे आंदोलन से मीडिया का ध्यान हटाए और सूरत पूरी बदल जाए। कुछ भी हो सकता है। बहरहाल अन्ना के इस आंदोलन को नीचे बिंदुओं से होकर देखना चाहिए।-
क्यों सही है आंदोलन: अन्ना का आंदोलन मुख्य रूप से भ्रष्टाचार की बात करते हुए, वास्तव में व्यवस्थी की पोल सी खोलता है। लोकतंत्र की आड़ में पल रहे दुनिया के इकलौते 10 जनपथ के राजतंत्र की बात कहता है। आम आदमी की तमाम मिनी रिश्वतों से सजी जिंदगी की कहानी है, अन्ना की भाषा और केजरीवाल का विज्ञान और प्रशांत, शांति का कानून भूषण। आम आदमी महंगाई, भ्रष्टाचार, बेईमानी और लाल बत्तियों के भीतर के भेडियों से कम सिविल सर्वेंट्स की सिंगापोर, यूएस, टूर से ज्यादा त्रस्त है। वहीं बाबुओं की टेबल टेनिस से भी परेशान है, जहां बिना पैसे के कोई फाइल एक टेबल से दूसरे टेबल का सफर ही तय नहीं कर पाती। इसलिए इस आंदोलन को जन समर्थन मिल रहा है।
क्या होगा नतीजा: यह अहम प्रश्न है, कि नतीजा क्या होगा। केजरीवाल गीताई भाषा में कहते हैं, जन समर्थन मिला तो मानेंगे लोग साथ में हैं, नहीं तो हम जो कर रहे थे, वही करने लगेंगे। इस बात में एटीट्यूड है, घमंड और जनता पर अहसान है। लेकिन सब स्वीकार्य है, क्योंकि जनता परेशान है। नतीजे अच्छे होंगे। आंदोलन तेजी से ऊंचाई पर जाएगा। पूरे देश में जनाक्रोश बढ़ेगा। सियासी उल्लुओं काठों पर बैठ रजनी दर्शन करेंगे। जागते हुए, स्वप्न में जीने वाले मृग सी मारीच बढ़ेंगे। सब कुछ अन्ना के फेवर में ही होगा। सरकार हिल जाएगी, लेकिन कहां???
फेसबुक पर सरकारें औंधे मुंह गिर पड़ेंगी। अखबारों में नेताओं के बयान और नजरिए रंगे होंगे, टीवी पर अन्ना शादी का बन्ना होंगे। मगर...
क्या करेगी कांगे्रस: यूपीए की खाल में बैठी असली दागदार पार्टी कांग्रेस क्या करेगी। निश्चित रूप से सिब्बलिया सब्बल नहीं चलाएगी। शीलाई शिलाएं नहीं फेंकेगी, चिदंबरमिया भ्रम नहीं फैलाएगी। न अन्ना को मनाएगी, न अन्ना की मानेगी। बस चुप रहेगी। 2 दिनों बाद दबाव बढ़ेगा, तो कसाब को आर्थर से तिहाड़ शिफ्ट करेगी और वह बीच में भाग निकलेगा, या फिर अफजल पर सोनिया कुछ ऐसा बोलेंगी, जो कभी नहीं बोलीं, मनमोनह को इस इल्जाम के साथ हटा दिया जाएगा और राहुल जैसा का तैसा लोकपाल लाकर अन्ना के लोकपाल को लोकप्रियता का लोकपाल बनाकर पीएम बन जाएंगे, कोई विमान हाई जैक हो जाएगा, कहीं बॉम ब्लास्ट हो जाएगा, गस्से से तमातमाते हुए, सोनिया दो या तीन मंत्रियों की बली ले लेंगी, विदर्भ के किसानों, पुणे के किसान भट्टा परसौल के किसान एक होकर चिल्लाते हुए पीएमओ की सुरक्षा में सेंध लगाएंगे या फिर कोई दिज्विजय कहेगा हिंदुओं में है दम मुस्लिमों ने किया नाक में दम... और विपरीत होगी मीडिया की हवा, खत्म हो जाएगा अन्ना का धरना। रह जाएगा महज कुछ मुद्दों में बेदिशा उलझा मीडिया।
अगर सफल नहीं हुआ यूपीए तो क्या: कहीं किसी हाल में कोई चाल नहीं ठीक बैठी तो, राहुल भैया का पीएम बनना कांग्रेसियों का रुदनालाप, और बेचारे 8 सालों के सीधे, कठपुतली, विचारात्मक पुरुष की बली चढ़ जाएगी। संकल्प लेंगे राहुल, मैं बनवाऊंगा लोकपाल। सख्त लोकपाल ही देश की सच्ची आवाज है। और बात हो जाएगी आई-गई। मीडिया में जी न्यूज दिखाएगा बतौर पीएम राहुल के संकल्प, तो एनडीटीवी दिखाएगा गो ग्रीन कंट्री थू्र यंगर पीएम, वहीं इंडिया टीवी पर होगा राहुल बाबा का झाड़ फूंक मंत्र, स्टार न्यूज कराएगा पहली बार न्यूज रूम में पीएम। और इन सबके बाद भी नहीं बनेगा लोकपाल फिर क्या???
खेल खतम पैस हजम: थिंकवोटर टीवी देख-देख सरकारों को गालियां देगें, तो कहेंगे फेसबुक में हमने उखाडऩे की कोशिश तो की सरकार को लेकिन देश की जनता ही मूर्ख है। हां यह सब अपने पीसी, लैपटॉप या कैफे में बैठकर करेंगे। लेकिन ईवीएम वाले बूथ, कैफै में नहीं जाएंगे। वे सभी चित्रशाला में बैठकर मनाएंगे शोक।
फिर जीत जाएगा यूपीए: अन्ना के सच्चे शागिर्द थिंक वोटर्स हल्ला मचाएंगे, सडक़ों पर नहीं, सोशल साइटों पर। चिल्लाएंगे, मंचों पर नहीं अपने ड्रॉइंग रूम से। चीखेंगे चेंज। मगर मजाल कि वे वोट डालने जाएं। जिन थिंक वोटर्स के दम पर अन्ना बन्ना बने हैं, वह उनके साथ जिस्मानी तौर पर नहीं जेहनी तौर पर है। और ईवीएम में जिस्म की ही एक उंगली लगती है, दबाने के लिए।
-सखाजी

Thursday, August 4, 2011

सच कड़वा क्यों होता है...?

इस बात को बचपन से ही सुनते चले आ रहे हैं, कि सच एक दम कड़वा होता है। इसका कोई पुख्ता इतिहास नहीं कि सच कड़वा क्यों होता है? एक स्वघोषित अच्छी व्यंज्यकार मुहतरमा की व्यंज्य श्रंृखला पढ़ते हुए, एक शब्द दिमाग में कूद पड़ा, कि सच थोड़ा अटपटा होता है। मुझे समझ में दो चीजें नहीं आई, कि सच अटपटा क्यों होता ? और दूसरी चीज कि अटपटा क्या होता है ? बस इन दोनों के उत्तर खोजते हुए ब्लॉग पे आया। शायद इनका उत्तर यहां मिले। सच तो सच है, और यह भी सच है कि जीत अंत में इसी की होनी है। फिर यह अटपटा या कड़वा या कठिन या ढिमका, फलां क्यों होता है। प्रश्नों ने क्रिया की और प्रतिक्रिया में कई प्रश्न जवाब की तलाश में शादी सम्मेलन में दूल्हा बनकर खड़े हो गए। सबसे पहले इन तमाम प्रश्नों के अम्मा पिताजी से बात करता हूं, शायद वे कुछ कहें। तो भैया प्रश्न पिताजी अटपटा क्या होता है, बताइए तो सही। अटपटा यूं तो जो चटपटा न हो या खटपटा न हो या फिर जो बिल्कुल भी किसी स्थान से हटा न हो को कह सकते हैं। लेकिन इससे भी प्रश्न पिताजी शांत नहीं हुए। अटपटा शायद वो जो कम होता हो, अटपटा शायद वो जो होता ही न हो या फिर अटपटा वो जो कुछ होकर भी कुछ न हो। क्या है अटपटा????
तो अटपटा मोहनजोदड़ो की खुदाई का कोई नगीना या फिर बर्तन है, क्या? या फिर समुद्रगुप्त की जीत का जरिया। या फिर शक, हूड़ों की संतान है, या फिर पृथ्वी और गजनवी की जंग। या फिर यह अकबर है, या तुलसीदास। अंग्रेजों का कोलकाता है, या फिर औरंगजेब का अंत। अटपटा कोई बहादुर शाह की सल्तनत है, या झांसी की रानी का बिगुल। यह लॉर्ड कर्जन का बंग भंग है, या फिर विलियम वेटिंज्स के सुधार, यहा नेहरू की चपड़ चुपड़ी अंग्रेजी है, या फिर गांधी का सीधापन, यह सुभाष की टोपी है, या फिर हिटलर की मख्खमूंछें, यह है राजेंद्र प्रसाद की प्रेसीडेंसी है, या लाल बहादुर की ईमान लाली। इंदिरा का मर्दाना है, या फिर चौधरी का अवसरवाद, बीपी की शरारत है, या राजीव की बोफोर्स। नरसिम्ह का इनसाइडर है, या सीताराम की बेआबरू विदाई, देवगोड़ा की किस्मत है, या गुजराल की विदेश यात्राएं, अटल का 13 दिनी 13 महीनी है, या प्रमोद का शाइनिंग इंडिया। अटपटा यह सबकुछ है। तब आप समझ तो गए ही हैं, कि अटपटा क्या है। मैं भी समझ गया। क्या है अटपटा। चलो कम से कम अब नए प्रश्न नहीं हो पाएंगे, क्यंोंकि प्रश्न पिता को मैंने खत्म कर दिया।
अब प्रश्न माता के रूप में सच अटपटा क्यों है मुंह बाए खड़ा हो गया। अगर वो सबकुछ जो कभी कभी हो वह अटपटा है, तो सच अटपटा क्यों है, यह ब्रह्मांड का सत्य है। सीता का सतित्व है, राम की प्रतिज्ञा, कृष्ण का संकल्प है, तो पांडवों की साफगोई। मनु का तप है, सतरूपा का समर्पण। सिंधु घाटी का विकसित आर्य नगर है, तो गीता का पर्व है, कुरान की आयत है, तो बाइबिल की लाइने है। सच चाणक्य सा गुरु है, तो अशोक सा विरक्त अनुराग है, राजा भोज का न्याय है तो, बास्कोडिगामा की इकलौती अव्यापारिक यात्रा है, सूरदास की कृष्ण भक्ति, है तो मीरा का पागलपन, एओ ह्यूम है, तो रविंद्र सा संगीत सच है। असहयोग आंदोलन है, तो भारत छोड़ो है। कश्मीर की अधूरी ख्वाहिश है, तो लडख़ड़ाता भारत का पहला प्रधानमंत्री है, गुलजारी सी घरेलू नौकरियत है, तो जेपी सी दूब है, सच जनता पार्टी है, तो मनमोहन का उदारवाद है, देश का टीवी मीडिया है, तो स्टिंग ऑपरेशन है। सच औंधे मुंह गिरी शाइनिंग इंडिया की चमक है, तो सच आखिर संसद का नोट कांड है। तो समझ में आया किस तरह से कम ही तो है, सच। तो अटपटा तो होगा ही।
लेकिन यह सच भी तो नहीं है, न इसे सच कहा जाए।
दरअसल इंसानी दिमाग में सच को लेकर बड़े भ्रम है, अध्यात्म कहता है, दुनिया झूठी है। तो फिर सच्ची बातें खुद ब खुद अटपटी सी हो गईं। भौतिक कहता है, जिंदगी को सुखद बनाओ खुशियां यही हैं, तो फिर सच अटपटा हो गया, चूंकि जिंदगी भौतिक में कहा सुखद होती है। व्यवहारिक बात कहती है, जिंदगी में सच का अनुसरण करो, तो यह होता कहां है, अब बताओ एक बार फिर सच अटपटा हुआ कि नहीं।
आध्यात्मिक नजरिए में वास्तव में सच वो है, जो नहीं है। और झूठ वो है, जो है। यानी संसार निरा झूठा है, तो सच अपने आप अटपटा तो होगा ही। और जब अटपटा कोई जबरन कानों में डलेगा, तो यह आप से आप ही कड़वा भी हो जाएगा। लेकिन यह भी सच है कि हम झूठ के इतने आदी हो चुके हैं, कि सच अटपटा लगता है।
अत: सच वास्तव में अटपटा और कड़वा होता है।
लेकिन प्रश्न पिता की अवैध संतान के रूप में फिर कई प्रश्न दिमाग की भ्रम संपत्ति पर अपना दावा ठोकने आत्मा के सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने पहुंच गए हैं। आखिरी समाचार मिलने तक सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई की तारीख मुकर्रर कर दी थी।
- सखाजी

Tuesday, August 2, 2011

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मेरे अतिप्रिय मित्र प्रसून पुरोहित के पिता का एक दुर्घटना में देहांत हो गया। मैं स्व. जुगल किशोर पुरोहित अंकल समेत इस दुर्घटना के शिकार सभी लोगों की आत्मा की शांति के लिए कामना करता हूं। इस विषद दुर्घटना से आहत लोगों और रिश्तेदारों को ईश्वर साहस दे। यह दुर्घटना भोपाल से जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-12 जयपुर-जबलपुर पर पडऩे वाले बारना नदी के पुल पर हुई। यह पुल 60 सालों से कई लोगों को निगलते आ रहा है। लेकिन रायसेन जिले के पैदाइशी तमाम नेताओं और प्रबुद्ध लोगों के सिर में जूं भी नहीं रेंगता। देखें इस जिले से किनका ताल्लुक कैसा रहा है:
- अटल बिहारी बाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री, 1989 में विदीशा से सांसद (पहले यह क्षेत्र विदीशा लोकसभा में आता था)
- स्व. डॉ. शंकर दयाल शर्मा, पूर्व राष्ट्रपति, इसी क्षेत्र की पैदाइश हैं, बाद में बेगम बिया के कहने पर भोपाल शिफ्ट हो गए।
- रामपाल सिंह, पूर्व सांसद, विधायक, मंत्री भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष (शिवराज सिंह के दांए हाथ)
- शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री एवं पूर्व सांसद विदीशा
- जसवंत सिंह, पूर्व मंत्री, दिज्विजय सिंह के पहले कार्यकाल में मुख्यमंत्री के बेहद करीबी।
- डॉ. गौरीशंकर शेजवार, मंत्री, उमाभारती के बेहद करीबी, आडवाणी के नजदीकी।
- आशुतोष राणा, फिल्म कलाकार, (इसी जिले में इनकी पुस्तैनी जमीन है, हालांकि 7 साल की उम्र में गांव छोड़ा।
- आचार्य रजनीश, ओशो के नाम से मशहूर शख्शियत की जन्मस्थान इसी जिल में आता है।
- देश दुनिया में ऐसे कई और लोग हैं, जो यहां से ताल्लुक रखते हैं।
लेकिन मुझे अफसोस है, कि इस छोटी सी पुलिया को बनवाने की किसी में भी पुरुषता नहीं है। इन लोगों को लानत है।
-सखाजी

Tuesday, July 19, 2011

खो गया मेरा स्कूल


घर से स्कूल की दूरी महज आधा किलोमीटर, लेकिन पहुंचने में पसीना निकल जाता। अंग्रेजी कबेलुओं से बना, स्कूल किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं लगता था। जुलाई में कीचड़ का सामना करते हुए स्कूल पहुंचने चांद पर कदम रखने से कम नहीं था। पहुंचते ही, पहला काम जूते बाहर उतारकर अपनी क्लास में जाना, पहले तो कमरे का झाड़ू लगाना और फिर टाट पट्टियां बिछाना। इसके बाद बजती थी, घंटी कि अब चलो प्रार्थना होगी। यह सब कुछ महज 10 मिनिट का होता था। प्रार्थना में कोई अंग्रेजीदां शब्द या शैली नहीं, बल्कि साधारण वह शक्ति हमें दो द्यान दे कर्तव्य मार्ग पर डट जाएं। पंक्तिवार अपनी कक्षाओं में जाना और फिर बैठना, बिना कोई समय गंवाए। गुरुजी के कक्षा में दाखिल होते ही, उनके पैर छूना और नकल की कॉपी चेक करवाना। गुरुजी के नोट का इंतजार करना कि वे क्या लिखने जा रहे हैं। मुझे तो वे हमेशा एक ही नोट देते थे, लिखावट सुधारो प्रतिदिन एक पृष्ठ लिखें और नीचे दस्तखत शिवकुमार शर्मा। हिंदी की कक्षा पहली होती थी। क्लास टीचर शब्द तो नहीं लेकिन पहला घंटा जरूर जानते थे। भारत माता का आह्वान तेरी जय हो सदा विजय, पीछे न पैर डालू चाहे महाप्रलय हो। और फिर वक्त आता था गणित का। गणित पढ़ाने वाला अक्सर पढ़ाता कम मारता ज्यादा है। ऐसी ही होता था, जब लंगड़ा मास्साब पढ़ाते थे। यकीन मानिए जब हम पांचवी कक्षा की मार्कशीट लेने गए तब हमें पता चला कि गणित पढ़ाने वाले मास्साब का नाम लंगड़ा मास्साब नहीं बल्कि राघवेंद्र मास्साब है। यह जानकर बालमन को जितना आश्चर्य हुआ वह आज युवा मन को नोवल प्राइज मिलने पर भी न हो, क्योंकि नहीं पता था, कि हम उनका यह नाम क्यों नहीं जानते थे। रोटी खाने की छुट्टी और फिर चालीस मिनिट बाद स्कूल की कड़ी परीक्षा। कोई अंग्रेजी नहीं, कोई हैलो हाय नहीं। कोई पालक मीटिंग नहीं, कोई फीस का झंझट नहीं। कोई पढ़ाई, कोर्स का लफड़ा नहीं। सबकुछ एकदम गुरुकुल की तरह। एक बार सौंपा तो पालक सालों बच्चे की सुनते भी नहीं थे। पूरी अजादी से मास्साब पढ़ाते थे। हालांकि उस दौर की कुछ बातें बड़ी बेजा लगती थी। मसलन टेकरा वाले बाबा का कहना था, अब तो फिर भी मास्साब ठीक हो गए, पहले जमाने में हमें तो ऐसे पीटते थे, जैसे कसाई। दूनिया (टेबल) नहीं आया तो कुर्सी के नीचे दोनों हाथों पर कुर्सी के पैर रख कर बैठ जाते थे। पढ़ाते रहते थे। तब बाल मन को बड़ी शांति मिलती, चलो अच्छा हुआ भगवान ने लेट पैदा किया नहीं तो मैं तो मर ही जाता। रोटी की छुट्टी के बाद सामाजिक अध्ययन आता, बड़ा आसान जैसे आसपास की तलाश की तरह लगता था। इसे पढ़ाने गेंदालाल मास्साब साईंखेड़ा से कुंजी लेकर आते थे। मुझे नहीं पता क्यों लेकिन वे लिखवाते बहुत थे। ऐसी प्रश्न जैसे ऊंटा 30 दिनों तक बिना पानी के रह सकता है, इसलिए उसे रेगस्तान का जहाज कहते हैं। इसमें भी कुछ छात्र पीछे रह जाते थे, जैसे मास्साब जी तनक पीछे से बोल दइयो...।
वक्त गुजरा, जमाना गया और संस्कार के यह स्कूल सरकारी मकडज़ाल में ऐसे फंस गए कि मास्टर के पास काम तो रहा लेकिन सिर्फ लोगों को गिनने, दवा पिलाने, बूढ़ों को पढ़ाने, चुनाव करवाने, सर्वे करने और बच्चों की गिनती करने का। अगर कुछ छिना तो बच्चों को पढ़ाने का काम। और तो और मध्यप्रदेश में तो और भी अति हो गई। जिस मास्साब को कभी हम जीवन का परमात्मा मानते रहे वह लाचारी बेबशी की जिंदगी गुजार रहा है। इसे लोग संविदाजीवी के नाम से जानते हैं। पता नहीं कब कहां किन हालातों में उसे अपनी नौकरी छोडक़र पंक्चर जोडऩे पड़ें। सारे अनुशासन निजी स्कूलों में चले गए, समय पर आना, खाना, प्रार्थना और यह मैम नो मैम, जॉनी जॉनी यस पापा, वाट्स योर नेम और फिर बच्चे के बारे में लोगों से कहना अंग्रेजी माध्यम में पढ़ रहा है। सरकारी स्कूल मास्टरों यानी पढ़ाई छोडक़र सबकुछ करने वाले स्कूल बन गए। और खो गए कहीं गुरु और खो गए कहीं छात्र।
वरुण के सखाजी

Thursday, June 30, 2011

चवन्नी की रुखसती...


चवन्नी की विदाई का वक्त है पूरे मुल्क के साथ लखनऊ का दिल भी बुझा-बुझा सा है. क्योंकि ये वो अमीर शहर है जिसने हमेशा चवन्नी को भी सर आंखों पर उठाया है. सुबूत चाहिए तो आफताब लखनवी के कुछ अश्आर आपकी खिद्मत में पेश किए दे रहा हूं-

मै अगर छू लूं चवन्नी को अधन्ना हो जाए

‘वो’ अगर बांस को छू ले तो गन्ना हो जाए (वो=महबूबा)

***

मेरे वालिद अपना बचपन याद करके रो दिए

इतनी सस्ती थी कि विद नमकीन चार आने की पी

पूरी बोतल मेरा छोटा भाई तन्हा पी गया

मैने मजबूरी में लस्सी भर के पैमाने में पी

ये अलग बात है कि नए दौर के लखनऊ ने आफताब लखनवी को ज़मानों पहले भुला दिया और दस बीस बरस में चवन्नी भी उसके ज़हन से गैर हाजिर हो जाएगी. वो चवन्नी जो कभी लखनऊ की ज़बान और बयान के आगे आगे चलती थी. लखनऊ के मकबूल तहज़ीबी जुमलों में चवन्नी का अच्छा खासा दखल था.

अगर किन्ही हज़रत में मर्दानगी कम है तो उनके लिए कहा जाता था कि ‘अमां उनकी चवन्नी कम है’. अगर कोई मोहतरम अक्ल से पैदल हैं तो उनके लिए गढ़ा गया जुमला था कि ‘अमां फुलां साहब चवन्नी गिराए घूमते हैं.’ और अगर कोई कंजूस है तो उसके लिए- ‘अमां छोड़िए वो तो रूपए में पांच चवन्नी बनाते हैं.’ हालांकि तमाम लखनवी तहज़ीब के इन तमाम एजाजो-इकबाल के बावजूद चवन्नी के फेयरवेल के दिन जो मुहावरा मैने सबसे ज्यादा सुना वो‘चवन्नीछाप’ का था, जिसे सुनकर शायद चवन्नी भी दिल शिकस्ता (टूटे हुए दिल वाली) हो जाती होगी.

जहां तक मेरी जानकारी है ये मुहावरा 80 के दशक में कानपुर में उपजा और बाद में पूरे हिन्दोस्तान में बीमारी की तरह फैला. होता यूं था कि कानपुर से एक दौर में नौटंकी की पार्टियां पूरे देश में जाती थीं. इनमें उत्तेजक प्रसंग आने पर दर्शक मंच की तरफ चवन्नियां उछालते थे. बाद में ये चलन सिनेमा हाल तक जा पहुंचा. इन्ही लोगों को चवन्नी छाप कहा जाता था. मुहावरा पूरी तरह इंसानी मेयार बताने के लिए था लेकिन बाद में चवन्नी का मेयार भी इसी से तय होने लगा. दुनिया ये भूल गई कि इसी चवन्नी से बचपन अपने बेशुमार ख्वाब खरीद लेता था.

बहुत पुरानी बात नहीं है जब लखनऊ में चिच्चा(पन्नी की छोटी पतंग) और डग्गा(कागज की छोटी पतंगें जिनके पीछे छोटी सी पूंछ लगी होती है.)पतंगों की कीमत चवन्नी हुआ करती थी. दो चवन्नी मिलाकर मै और मेरा भाई सुपर कमांडो ध्रुव नागराज या डोगा की एक कामिक्स किराए पर लाते थे,जिसे पढ़ते पढ़ते ही मै निराला, मीर और तहलका तक पहुंचा. 25 पैसे में इनाम खोलने का एक कूपन मिलता था जिसमें कभी कभी घड़ी और मिथुन या धरमिंदर का बड़ा पोस्टर तक हाथ लग जाता था. शक्तिमान का स्टिकर भी चवन्नी में ही दस्तयाब था. मांएं अपने बच्चों को नज़र और हाय से बचाने के लिए चवन्नी की शरण में ही जाती थी. फिर बच्चे अपनी करधनी और गले से चवन्नी लटकाए घूमते थे. यही नहीं आंख दुखने पर मां जो देसी ट्यूब (जिसे आम जुबान में गल्ला कहते हैं,) बच्चे के लगाती थी वो भी चवन्नी का मिलता था. इसके साथ ही संतरे की वो सदाबहार टाफियां भी याद आती हैं जो मेरे पूरे बचपन भर ‘चवन्नी की दो वाली’ संज्ञा से ही नवाज़ी जाती रहीं. (अंग्रेजी में मजबूत कुछ बच्चे इन्हे आरेंज वाली टाफी भी कहते थे). इसी तरह कुछ टाफियों का नाम 'चवन्नी वाली' भी था. संतरे की फांक जैसा लैमनजूस या लैमनचूस (पता नहीं इसका सही नाम क्या होता है,) भी चवन्नी का ही मिल जाता था.

बचपने का रिजर्व बैंक यानि गुल्लक को तोड़कर अपनी अमीरी दिखाने के लिए जब सिक्कों की कुतुब मीनार बनाई जाती थी तो उसकी सबसे ऊपरी मंजिल भी चवन्नी से ही बनती थी. ये भी कहा जाता था कि चवन्नी को अगर कड़वे तेल में डुबो कर रेलगाड़ी के नीचे रख दो तो वो चुम्बक बन जाती है, कई दफा ये प्रयोग मैने भी सिटी स्टेशन और चारबाग की पटरियों पर आजमाया लेकिन सफल नहीं रहा. चवन्नी को उंगली की चोट से देर तक घुमाने की प्रतियोगिताएं भी खूब होती थी जिसमें इनाम वही चवन्नी होती थी. स्कूल के बाहर काला वाला तेज़ाब मिला हुआ चूरन भी चवन्नी में एक पुड़िया मिल जाता था जो कि जबान पर छाला निकालने के लिए काफी होता था. इसी तरह आइसक्रीम के ठेलों पर डिस्को नाम की एक आकर्षक चीज (पन्नी में भरा ठंडा रंगीन मीठा पेय) का दाम भी 25 पैसे था.

लेकिन फिर एक वक्त और भी आया जब इसी चवन्नी के दिन ऐसे बदले कि सफर पर जाते वक्त ढूढ ढूढ के चवन्नियां रखी जाने लगी. भिखारियों को देने के लिए. और भिखारी भी इन्हे, देने वालों को चवन्नीछाप कहके वापस कर देने लगे. बच्चों ने चवन्नी लेकर दुकान जाना

बंद कर दिया और अगर कोई बच्चा पहुंच गया भी तो दुकानदार ने बनियागिरी दिखाते हुए उसका दिल तोड़कर उसे ये कहते हुए लोटा दिया कि चवन्नी नही चलेगी. जबकि मुझे घर के पास वाला बनारसी आज भी याद है जिसने मुझे 25 पैसे की इमली की गोली एक बिस्सी यानी 20 पैसे में इस शर्त के साथ दी थी कि मै पंजी या 5 पैसे उसे बाद में दे दूंगा. हालांकि मै उन्हे कभी दे नहीं पाया और पता नहीं बनारसी दादा कहां चले गए. चवन्नी के बंद होने पर व्यवहारिक रूप से कोई क्षोभ जरूरी नहीं है. लेकिन फिर भी चूंकि ये घटना अतीत के खूबसूरत पन्ने दोबारा पलट गई है इसलिए माहौल का जज्बाती होना लाजिमी है. पहले बनारसी दादा गए, फिर बचपन गया और आज बचपन के खजाने का सबसे बड़ा सिक्का यानि चवन्नी भी रूखसत हो गई.



हिमांशु बाजपेयी
(CAVS
के छात्र रहे
लेखक युवा पत्रकार और कवि हैं. देखने में तो नहीं पर लिखने में बेहद खतरनाक और मारक हैं. हालांकि ज्यादा जाने जाते हैं, जज्बाती और इश्किया शायरी के लिए. पर मुझे लगता है कि
नौस्टेल्जिया आधारित लेख लिखने वाले सबसे अच्छे लेखकों में से हैं. लखनऊ में रहते हैं और लखनऊ शहर को लेकर बेहद जज्बाती बल्कि ओब्सेस्ड टाइप हैं. फिलहाल लखनऊ में ही तहलका हिंदी के संवाददाता हैं.)

Monday, June 13, 2011

कर्तव्यों का अतिरेक तो नहीं...

दोस्तों यह बात शेयर करने की तो नहीं लेकिन क्या करूं मन में लगी नहीं रखना चाहता। एक पत्र ने धमतरी में बाबा के आंदोलन के दौरान जुआ खेलते कुछ आंदोलनकारियों की खबर छापी। जब इस पत्र की खबर छपी तो सेंट्रल टीम इसे अपने मुख पृष्ठ पर न ले पाने के लिए मलाल करने लगा। भैया मुझे यह बात समझ में नहीं आई कि जब कोई पत्र अपने क्लाइंटों की बड़ी से बड़ी करतूतों को छुपाते हैं। क्या कह कर? सिर्फ इतना कि वह हमारे क्लाइंट हैं, विज्ञापनदाता हैं, तो बाबा को बदनाम करने वाली इस छोटी से खबर को क्यों नहीं छुपा सकते। वह काम पत्र के मार्केटिंग प्रभाग वाले करते हैं, बाबा को बदनाम करने वाले ऐसे घटनाक्रमों को एडिटोरियल वाले छुपा सकते हैं। यह पाप नहीं बल्कि पुण्य है, क्योंकि बाबा का लक्ष्य अच्छा है। यह नैतिक आधार पर ईमानदारी का काम है, न कि पाप। यही भेद पत्रकारों में होना जरूरी है। कई विद्वान तो यहां तक कहते हैं, कि दुनिया में कोई भी पाप पुण्य जैसी चीजें नहीं है, बल्कि हमारा इन्हें पहचानने का बल नहीं है। सही गलत के ज्ञान को ही आत्मज्ञान या परम पॉवर कहते हैं। बाबा रामदेव का अनशन खत्म हुआ, ड्रामा, नौटंकी, सरकार की अख्खड़बाजी और योग मिजाज सबकुछ ठंडा हो गया। सबसे दुखद है, कि अब मीडिया के पास हैपनिंग नहीं बचीं। इससे अगर किसी को फायदा हुआ तो वह अमिताभ बच्चन को। क्योंकि वे 13 साल के ओरो से पीडि़त बच्चे को रोल में फैल होने के बाद अब बुढ्ढे की भूमिका वाली बुढ्ढा होगा तेरा बाप फिल्म लेकर आ रहे हैं। अगर यह न्यूज मीडिया बाबा में लगा रहता तो अमिताभ बाबा का क्या होता?
सबकी बात एक बात अच्छे के लिए किए गए

नांतर बहती हुई समुद्र में गिर जाती हैं। इस बीच वे जमीन को रिचार्ज भी करती हैं। वह गंदगी गौढ़ हो जाती है।
सखाजी

Tuesday, June 7, 2011

बहुमत किसी का गला घोंटने की इजाजत नहीं देता

तकरीबन रात के 1 बजे थे और मैं सोने जा रहा था तभी हमारे सहयोगी ने कहा यार एसएमएस आया है जिसमें कहा गया है कि बाबा रामदेव के समर्थकों पर पुलिस लाठी चार्ज कर रही है।पहले तो यकीन नहीं हुआ क्योंकि स्वामी रामदेव का आंदोलन तो शांतिपूर्ण था और रात में जब 75000 लोगों से ज्यादा सत्याग्रही लोग एक साथ सोए तो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसी घटना की उम्मीद नहीं की जा सकती थी लेकिन मन नहीं माना और हमने टेलीविजन टर्न ऑन किया।यकीन मानिए जो उसके बाद देखा मेरे मन में सरकार के प्रति सहानुभूति खत्म हो गई।एक मामूली पढ़ा लिखा और जिसे इस दुनिया की समझ हो वह दिल्ली के रामलीली मैदान में हुए घटना की निंदा करेगा.. लेकिन केंद्र सरकार और उसके मंत्रियों ने इसे भी जायज ठहराया।सवाल है कि आखिर रामदेव ने ऐसा क्या किया जिससे सरकार इतनी नाराज थी..

रामदेव के समर्थकों को डंडे से पीटना,उन्हें जूते तले रौंदना और आंसू गैस के गोले छोड़ना क्या ये किसी तरह न्यायोचित था।यह लोकतांत्रिक देश है और यहां किसी भी व्यक्ति को बोलने का पूरा हक है और बाबा रामदेव तो 1 अरब 21 करोड़ हिंदुस्तानियों की बात कर रहे थे।विदेशी बैंको में पड़े 400 करोड़ रूपये को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की मांग नाजायज है,क्या भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कड़े प्रावधान करने की मांग जायज नहीं थी।कौन नहीं जानता है कि 1 लाख 76 हजार करोड़ का घोटाला इसी सरकार की अगुआई में हुआ,कौन नहीं जानता कि 70000 हजार करोड़ रूपये का राष्ट्रमंडल घोटाला इसी सात सालों में हुआ।रामदेव और उनके समर्थकों में जिस तरह बर्बरता से जुल्म ढ़ाया वह हिटलर और मुसोलिनी द्वारा किये गए कुकर्मों की याद दिलाता है।आज जो दिग्विजय सिंह रामदेव के खिलाफ उगल रहे हैं उन्हीं दिग्विजय सिंह ने 10 साल में मध्यप्रदेश के लिए क्या किया किसी से छिपा नहीं है।यही दिग्विजय सिंह हैं जो कहा करते थे कि चुनाव विकास से नहीं मैनेजमेंट से लड़े जाते है ।दिग्विजय सिंह और कांग्रेसी नेता को पूरी घटना पर मांफी मांगनी चाहिए नहीं तो देश उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।इतिहास बड़ी निर्दयी होता है और उसने नहीं तो इंदिरा गांधी,नही तो मुसोलिनी और न ही सद्दाम हुसैन या और किसी आततायी को बख्सा है।

क्या इस देश में सत्याग्रह करना गुनाह है और क्या निहत्थों और भूखे बेबस लोगों पर लाठियां चलाना जायज है।मेरा सवाल है कि आखिर कब तक एक आम भारतीय भूखे ,नंगे ,भ्रष्टाचार,घूसखोरी और दरिद्रता की जिंदगी जीते रहेंगे।क्या सरकार नहीं जानती की अरबों रूपये प्रत्येक साल इस देश से टैक्स हेवन कंट्री में रखे जाते है .और सरकार इस बात को जानती है तो उसने अभी तक इस मुद्दे पर क्या कार्रवाई की।क्यों नहीं देश का पैसा देश में आ सका।पिछले 60 सालों में हमें दरिद्री,भूखमरी,लाचारी और बेजारी के सिवा हमें इस सरकार से मिला क्या और अगर कोई व्यक्ति लीक से हटकर देश और समाज के लिए भलाई की बात करता है तो क्या यह गलत है क्या एक संन्यासी मंदिर या सड़कों पर भीख मांगे तो यह सरकार को अच्छा लगेगा और कोई अगर देश से संबंधित मुद्धों पर अनशन करता है तो उस पर लाठियां चलायी जाए।रामदेव को ठिकाने लगाने पर अब सरकार के निशाने पर अन्ना हैं और वह अन्ना की टीम के साथ भी करने का इरादा करती है खैर बहुमत आपके साथ है । सत्याग्रहियों पर आंसू गैस की गोलियां चलवाइए, निहत्थों ,महिलाओं और औरतों की कपड़े फाड़ना अगर अब आपका यह काम है तो करते जाइए लेकिन याद रखिएगा जनता एक पंडित है जो अगर किसी की शादी करवाता है तो वह श्राद्ध भी करवाता है जिस जनता ने आपको बहुमत से जिताया है वही जनता आपको सत्ता से बाहर भी कर देगी..याद रखिए मनमोहन सिंह जी चुनाव में जनता आपसे हिसाब मांगेगी दिग्विजय सिंह जैसे चंद लफ्फाजों से नहीं जिसके बात पर शायद ही कोई विश्वास करता है।दिग्विजय सिंह एक पागल कुत्ते की तरह हैं जो किसी पर भी भौकने और कांटने के लिए दौड़ता है....क्रमश..

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