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Thursday, August 4, 2011

सच कड़वा क्यों होता है...?

इस बात को बचपन से ही सुनते चले आ रहे हैं, कि सच एक दम कड़वा होता है। इसका कोई पुख्ता इतिहास नहीं कि सच कड़वा क्यों होता है? एक स्वघोषित अच्छी व्यंज्यकार मुहतरमा की व्यंज्य श्रंृखला पढ़ते हुए, एक शब्द दिमाग में कूद पड़ा, कि सच थोड़ा अटपटा होता है। मुझे समझ में दो चीजें नहीं आई, कि सच अटपटा क्यों होता ? और दूसरी चीज कि अटपटा क्या होता है ? बस इन दोनों के उत्तर खोजते हुए ब्लॉग पे आया। शायद इनका उत्तर यहां मिले। सच तो सच है, और यह भी सच है कि जीत अंत में इसी की होनी है। फिर यह अटपटा या कड़वा या कठिन या ढिमका, फलां क्यों होता है। प्रश्नों ने क्रिया की और प्रतिक्रिया में कई प्रश्न जवाब की तलाश में शादी सम्मेलन में दूल्हा बनकर खड़े हो गए। सबसे पहले इन तमाम प्रश्नों के अम्मा पिताजी से बात करता हूं, शायद वे कुछ कहें। तो भैया प्रश्न पिताजी अटपटा क्या होता है, बताइए तो सही। अटपटा यूं तो जो चटपटा न हो या खटपटा न हो या फिर जो बिल्कुल भी किसी स्थान से हटा न हो को कह सकते हैं। लेकिन इससे भी प्रश्न पिताजी शांत नहीं हुए। अटपटा शायद वो जो कम होता हो, अटपटा शायद वो जो होता ही न हो या फिर अटपटा वो जो कुछ होकर भी कुछ न हो। क्या है अटपटा????
तो अटपटा मोहनजोदड़ो की खुदाई का कोई नगीना या फिर बर्तन है, क्या? या फिर समुद्रगुप्त की जीत का जरिया। या फिर शक, हूड़ों की संतान है, या फिर पृथ्वी और गजनवी की जंग। या फिर यह अकबर है, या तुलसीदास। अंग्रेजों का कोलकाता है, या फिर औरंगजेब का अंत। अटपटा कोई बहादुर शाह की सल्तनत है, या झांसी की रानी का बिगुल। यह लॉर्ड कर्जन का बंग भंग है, या फिर विलियम वेटिंज्स के सुधार, यहा नेहरू की चपड़ चुपड़ी अंग्रेजी है, या फिर गांधी का सीधापन, यह सुभाष की टोपी है, या फिर हिटलर की मख्खमूंछें, यह है राजेंद्र प्रसाद की प्रेसीडेंसी है, या लाल बहादुर की ईमान लाली। इंदिरा का मर्दाना है, या फिर चौधरी का अवसरवाद, बीपी की शरारत है, या राजीव की बोफोर्स। नरसिम्ह का इनसाइडर है, या सीताराम की बेआबरू विदाई, देवगोड़ा की किस्मत है, या गुजराल की विदेश यात्राएं, अटल का 13 दिनी 13 महीनी है, या प्रमोद का शाइनिंग इंडिया। अटपटा यह सबकुछ है। तब आप समझ तो गए ही हैं, कि अटपटा क्या है। मैं भी समझ गया। क्या है अटपटा। चलो कम से कम अब नए प्रश्न नहीं हो पाएंगे, क्यंोंकि प्रश्न पिता को मैंने खत्म कर दिया।
अब प्रश्न माता के रूप में सच अटपटा क्यों है मुंह बाए खड़ा हो गया। अगर वो सबकुछ जो कभी कभी हो वह अटपटा है, तो सच अटपटा क्यों है, यह ब्रह्मांड का सत्य है। सीता का सतित्व है, राम की प्रतिज्ञा, कृष्ण का संकल्प है, तो पांडवों की साफगोई। मनु का तप है, सतरूपा का समर्पण। सिंधु घाटी का विकसित आर्य नगर है, तो गीता का पर्व है, कुरान की आयत है, तो बाइबिल की लाइने है। सच चाणक्य सा गुरु है, तो अशोक सा विरक्त अनुराग है, राजा भोज का न्याय है तो, बास्कोडिगामा की इकलौती अव्यापारिक यात्रा है, सूरदास की कृष्ण भक्ति, है तो मीरा का पागलपन, एओ ह्यूम है, तो रविंद्र सा संगीत सच है। असहयोग आंदोलन है, तो भारत छोड़ो है। कश्मीर की अधूरी ख्वाहिश है, तो लडख़ड़ाता भारत का पहला प्रधानमंत्री है, गुलजारी सी घरेलू नौकरियत है, तो जेपी सी दूब है, सच जनता पार्टी है, तो मनमोहन का उदारवाद है, देश का टीवी मीडिया है, तो स्टिंग ऑपरेशन है। सच औंधे मुंह गिरी शाइनिंग इंडिया की चमक है, तो सच आखिर संसद का नोट कांड है। तो समझ में आया किस तरह से कम ही तो है, सच। तो अटपटा तो होगा ही।
लेकिन यह सच भी तो नहीं है, न इसे सच कहा जाए।
दरअसल इंसानी दिमाग में सच को लेकर बड़े भ्रम है, अध्यात्म कहता है, दुनिया झूठी है। तो फिर सच्ची बातें खुद ब खुद अटपटी सी हो गईं। भौतिक कहता है, जिंदगी को सुखद बनाओ खुशियां यही हैं, तो फिर सच अटपटा हो गया, चूंकि जिंदगी भौतिक में कहा सुखद होती है। व्यवहारिक बात कहती है, जिंदगी में सच का अनुसरण करो, तो यह होता कहां है, अब बताओ एक बार फिर सच अटपटा हुआ कि नहीं।
आध्यात्मिक नजरिए में वास्तव में सच वो है, जो नहीं है। और झूठ वो है, जो है। यानी संसार निरा झूठा है, तो सच अपने आप अटपटा तो होगा ही। और जब अटपटा कोई जबरन कानों में डलेगा, तो यह आप से आप ही कड़वा भी हो जाएगा। लेकिन यह भी सच है कि हम झूठ के इतने आदी हो चुके हैं, कि सच अटपटा लगता है।
अत: सच वास्तव में अटपटा और कड़वा होता है।
लेकिन प्रश्न पिता की अवैध संतान के रूप में फिर कई प्रश्न दिमाग की भ्रम संपत्ति पर अपना दावा ठोकने आत्मा के सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने पहुंच गए हैं। आखिरी समाचार मिलने तक सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई की तारीख मुकर्रर कर दी थी।
- सखाजी

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