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Thursday, August 28, 2008

अब के बिछडे हुए तो फिर कभी ख्वाबों में......



इससे पहले कि बेवफा हो जायें
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जायें
और फिर जब लगा कि ज़िन्दगी बेवफा होने लगी है ..... फ़राज़ साहब ने ज़िन्दगी से जुदा होने का फ़ैसला ले लिया। उर्दू अदब और कलम की दुनिया का वो सितारा बुझ गया जिसने न जाने कितने दिलों को तन्हाइयों में सुकून दिया और न जाने कितने दिमागों को रोशन कर दिया।
फ़राज़ साहब दरअसल एक शख्सियत नहीं थे, वो एक किताब थे जिसे पढ़कर न जाने कितने गुमनाम लोग शख्सियत बन गए, दावे से कहा जा सकता है कि आज के उर्दू के कई बड़े शायर ऐसे होंगे जिनको शायरी करने का पहला शौक अहमद फ़राज़ साहब को सुनकर या पढ़कर हुआ होगा। और ये हाल उनके मादर ऐ वतन पाकिस्तान का नहीं हिन्दोस्तान का भी था।
उर्दू के इस सितारे की पैदाइश हुई १९३२ में पाकिस्तान के नौशेरा में, वालिद ठहरे मामूली मदरसे के टीचर सो बहुत रईसी की हालत भी नही थी। एक बार इनके वालिद इनक्जे और इनके भाई के लिए कुछ कपड़े लाये और वो इन्हे पसंद ना आए, बगावती तेवर तब पहली बार दिखे जब ये इस बात पर नाराज़ हो कर घर से भाग निकले। एक शेर जो इन्होने अपने वालिद के नाम लिख छोड़ा था वो इस तरह था,
जबकि सबके वास्ते लाये हैं कपड़े सेल से,
लाये हैं मेरे लिए कैदी का कम्बल जेल से

खैर आगे की पढ़ाई लिखाई हुई पेशावर यूनिवर्सिटी से उर्दू और फ़ारसी में और बचपन की फकीरी को सहारा मिला शायरी का। जनाब लिखने लगे .... उम्दा शायरी करने लगे। कलम एक बार चल जाती है तो फिर मौत ही उसे रोकती है। फ़राज़ साहब मशहूर शायरों में से हो गए। शुरुआत में असर रहा अल्लामा इकबाल साहब का पर बाद में प्रभावित हो गए अली सरदार जाफरी और फैज़ अहमद फैज़ से ..... बस यहीं से चल निकला सिलसिला उर्दू की तरक्की पसंद शायरी का जो इतने मुकामों से गुज़रा की पूरी दुनिया उससे मुत्तास्सिर हुई। दुनिया ने जाना और माना की फ़राज़ मुशायरों की जान है।


अब और कितनी मुहब्बतें तुम्हें चाहिए फ़राज़,


माओं ने तेरे नाम पे बच्चों के नाम रख लिए।


अहमद फ़राज़ साहब साहब शायद आधुनिक उर्दू के उन गिने चुने शायरों में से हैं जिनको जितनी शिद्दत से पाकिस्तान में अवाम मोहब्बत करता है उतना ही इश्क हिन्दोस्तान की जनता को भी उनसे था। कई लोगों ने मुझसे उनके इन्तेकाल की ख़बर आने के बाद मुझसे पूछा की "क्या फ़राज़ साहब पाकिस्तान में रहते थे ?" हिन्दोस्तान का कोई भी बड़ा मुशायरा उनके बिना पूरा नहीं हुआ। आज वो महफ़िल सूनी हो गई है।


तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चिराग़


लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चिराग़


बगावत की जुर्रत ऐसी की फौजी हुकूमत के खिलाफ इतना लिखा - इतना बोला की पहले जेल में रहे और फिर मुल्क से बदर हो कर ब्रिटेन और कनाडा में ज़िन्दगी बसर की पर हमेशा दिखे मुस्कुराते हुए। आम धारणा है की किसी शायर की कुछ ही नज्में ऐसी होती हैं जो उसे यादगार कर देती हैं ..... मैं कहूँगा की ज़रा फ़राज़ साहब को पढ़ कर देखें। इतना कुछ और हर बार उतना ही कमाल ...


फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं


मगर क़रार से दिन कट रहे हों यूँ भी नहीं


ऐसे शेर कि आप याद कर कर के लाजवाब हो जाएँ ,


यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी


वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद


ऐसा साक़ी हो तो फिर देखिए रंगे-महफ़िल


सबको मदहोश करे होश से जाए ख़ुद भी


दिनकर जी अपनी एक कविता में कहते हैं कि पंछी और बादल भगवान् के डाकिये हैं जो एक मुल्क से दूसरे मुल्क में स्नेह का पानी बरसाने ...... बिना वीसा के ....... फ़राज़ साहब ज़िन्दगी में भले ही बिना वीसा के सरहदों को पार न कर पाये हो, उनका सुखन और अब उनकी यादें सरहदों की दीवारों की कैदी और सरकारों की रहमतों की मोहताज नहीं। उनका बदन अब ख़ाक के सुपुर्द है और उनकी रूह हम सब के अन्दर ......


जैसा कि वो ख़ुद कह गए


ख़्वाब मरते नहीं


ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसें के


जो रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जायेंगे


जिस्म की मौत से ये भी मर जायेंगे


ख़्वाब मरते नहीं


ख़्वाब तो रौशनी हैं, नवा हैं, हवा हैं


जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं


ज़ुल्म के दोज़ख़ों से भी फुँकते नहीं


रौशनी और नवा और हवा के आलम


मक़्तलों में पहुँच कर भी झुकते नहीं


ख़्वाब तो हर्फ़ हैं


ख़्वाब तो नूर हैं


ख़्वाब तो सुक़्रात हैं


ख़्वाब मंसूर हैं

Wednesday, August 27, 2008

बिंद्रा का अभिनव प्रदर्शन

हिन्दी पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर हैं एन डी टीवी के रवीश कुमार। रवीश जी नियमित तौर पर वेब के लिए अपने अनुभव और अपने विचार लिखते रहते हैं, प्रस्तुत लेख रवीश जी ने वेब दुनिया के लिए लिखा था। गौर फरमायें काफ़ी गहन विश्लेषण और सटीक कटाक्ष है .....

एकलव्य तीरंदाज़ नहीं बन सका, क्योंकि द्रोण ने उससे अंगूठा मांग लिया। अर्जुन सबसे बड़ा धनुर्धर बन गया, क्योंकि उसके पास द्रोण थे, और राजपाट था। एकलव्य की कहानी आज भारतीय खेलों की कहानी है। हालांकि सामाजिक दायरे में एकलव्य की कहानी सवर्ण मानसिकता की कहानी है। हमारी सरकारों ने द्रोण की भूमिका निभाकर न जाने कितने एकलव्यों को सुविधाओं की कमी में मार दिया। 112 साल गुज़र गए ओलिम्पिक में जाते हुए। एक अरब की आबादी वाले इस मुल्क में न तो एकलव्य को कामयाबी मिली, न अर्जुन को।
इतिहास शायद खुद को दोहरा रहा है। अभिनव बिंद्रा अर्जुन बन गया है। उसके पास भी अर्जुन की तरह अपने घर के पीछे शूटिंग रेंज है। तमाम तरह की सुविधाएं हैं। लक्ष्य वही है - सबसे बड़ा निशानेबाज़ बनना है। एकलव्य की कहानी ने हम सबको एक अपराधबोध में जीने के लिए मजबूर किया। द्रोण की नाइंसाफी आज तक टीस पैदा करती है कि अपनी मेहनत से पैदा हुए धनुर्धर को खत्म कर दिया गया।
लेकिन इस बदलती दुनिया में अर्जुन की तरह सुविधा और एकलव्य की तरह इरादा चाहिए। अभिनव के पास दोनों था। उसके पिता द्रोण की तलाश में नहीं भटके। बल्कि घर के पीछे ही एकलव्य की तरह साधना का हर सामान जुटा दिया। 13 साल के शूटिंग करियर में यह लड़का ओलिम्पिक में स्वर्ण पदक तक पहुंच गया। ज़ाहिर है, अभिनव की कामयाबी एक नई कहानी बना रही है। समझा रही है कि सुविधा और लगन दोनों चाहिए, दुविधा से काम नहीं चलेगा।
हम कब तक एकलव्य की कहानी पर रोते रहेंगे और अर्जुन की कामयाबी को शक से देखते रहेंगे। दोनों ही कहानियां कभी बदलेंगी नहीं, लेकिन आगे तो बढ़ना ही होगा। एक दलित की बेटी मायावती ब्राह्मणों को अपनी पार्टी में जोड़कर प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रही है। जिस मनुवाद के ख़िलाफ़ मायावती और उनकी पार्टी बीएसपी खड़ी हुई, उसी मनुवाद के प्रतीक ब्राह्मणों से हाथ मिलाया... सिर्फ इसलिए नहीं कि सत्ता हासिल करनी थी, बल्कि इस प्रक्रिया में इतिहास में पहली बार किसी अभियान में दोनों करीब भी आ गए। करीब आए होंगे तो जाति की कई वर्जनाएं ध्वस्त हुई होंगी। नाम के लिए ही सही, वोट के लिए सही, ब्राह्मण दलितों की रैली या उनकी पार्टी से जुड़े तो... यह एक बड़ा प्रयोग था।
चंडीगढ़ में अभिनव बिंद्रा के पिता एएस बिंद्रा ने भी कुछ ऐसा ही प्रयोग कर दिया। बता रहे थे, करना ही था। किसी न किसी को तो करना ही होगा। पैसे वाले बिंद्रा ने पैसे को निष्ठा और लक्ष्य के सामने टिकने न दिया। एकलव्य किसी जंगल में पैदा नहीं होगा। अर्जुन किसी शूटिंग कमेटी से पैदा नहीं होगा। अभिनव बनना होगा तो दोनों चाहिए।
एकलव्य की साधना, अर्जुन का निशाना और निशाना लगाने के लिए महंगे शूटिंग रेंज और मां-बाप का साथ। यह एक नया प्रयोग है। इस प्रयोग ने 112 साल की हताशा को खत्म कर दिया। मायावती के प्रयोग ने दलितों और ब्राह्मणों के बीच हज़ारों साल की दूरी को कम कर दिया। अभिनव बिंद्रा ने इसे शूटिंग में करके दिखा दिया।

रवीश कुमार
साभार: web duniya

भिवानी में हार-जीत के वो पल

(हिन्दी पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर हैं एन डी टीवी के रवीश कुमार। रवीश जी नियमित तौर पर वेब के लिए अपने अनुभव और अपने विचार लिखते रहते हैं,प्रस्तुत लेख रवीश जी ने NDTV Khabar के लिए लिखा था।)

भिवानी का देवसर गांव। ठीक चार बज रहे थे। बॉक्सर जितेंद्र कुमार के घर वालों ने मीडिया के लिए शामियाने का इंतज़ाम किया था। टीवी लगाया गया था। लाइव कवरेज के लिए 20 ओबी वैन से घर का हर रास्ता घिर चुका था। जितेंद्र कुमार के पिता जी ने कहा कि ढाई मणि की मन्नत मांगी है, मां भवानी से। कर्म और भाग्य की सीमा रेखा का लांघते, मिटाते अब सब कुछ उस मालिक पर निर्भर था जो सबका मालिक है। ढाई मणि यानी सौ किलो लड्डू की मन्नत। बीजिंग से एक फोन आता है। जितेंद्र कुमार अपने भाई सुरेंद्र कुमार को कहता है, मस्त हो कर मैच देखना। मीडियावालों का ख्याल रखना। कोई नाटक नहीं। सब कुछ सहज। देश का नेशनल मीडिया एक बार फिर से गांवों की खोज करने पहुंचा था। लोगों को लग रहा था कि यह एक उभरता भारत है। विकासशील देश में उभरने की तमाम संभावनाएं और कहानियां बची रहती हैं। जितेंद्र, अखिल और विजेंद्र उन बची हुईं लाखों कहानियों का हिस्सा हैं जो अभी कही जानी हैं।ख़ैर, जितेंद्र की हार होते ही उभरते भारत की कहानी कहने वाले अपने साज़ोसामान समेटने लगे। विजेंद्र कुमार के घर की तरफ रवाना हो गए। वहां उभरते भारत को देखने। टिके रहे तो सिर्फ गांव के बुज़ुर्ग। सबने कहा 20 साल की उम्र है जितेंद्र की। अभी तो सारी उम्र पड़ी है। हम हार से नहीं घबराते। ऐसे बुजुर्ग बड़े शहर वालों के पास नहीं होते। इसीलिए, वो नाकामी के क्षणों में अवसाद के शिकार हो जाते हैं। गांव के बुज़ुर्ग नाकामी के समय में भी साथ रहते हैं। लेकिन, मीडिया के लिए उभरता हुआ भारत तभी है जब वहां से कोई कामयाब होता है। देश के लिए। जिस देश के लोगों ने कमीशन और रिश्वत खाकर इन छोटे शहरों की कई पंचवर्षीय योजनाओं को गटक लिया है। सिर्फ 20 मिनट के फासले में जितेंद्र कुमार उभरते हुए भारत की कहानी बनते बनते रह गया। हार के साथ ही उसे भुला दिया गया। जिस तरह बड़े शहर वाले छोटे शहर को नाकाम समझ कर भुला देते हैं। ओबी वैन अब विजेंद्र कुमार के घर की तरफ दौड़ने लगी।कालुवास गांव। गांव के चौधरी, ताऊ और चाचा सब जमा हो गए थे। भोले शंकर और जय मां भवानी। इन्हीं के भरोसे छोटे शहर और गांव के लोग अपनी मन्नतों को छोड़ देते हैं। मां भवानी की कृपा होगी तो पूरी हो जाएगी। वरना कोई बात नहीं। मां भवानी के भक्त तब भी रहेंगे। उसी तरह से जैसे भिवानी की टूटी सड़कें, ध्वस्त ट्रैफिक व्यवस्था और लुटेरे प्राइवेट क्लिनिकों के बाद भी लोग इस छोटे शहर में रहते हैं। रहना पड़ता है।हवा में नारे गूंज रहे थे। वहां मौजूद एक-दो पत्रकार को छोड़ किसी को मालूम नहीं था कि बॉक्सिंग में स्कोर कैसे मालूम करते हैं। लोगों को मालूम था। वो हर पंच पर स्कोर का एलान कर देते और मां भवानी बोलने लगते। क्रिकेट के शब्दों की तरह बाउट यहां की भाषा का आम शब्द है। बाउट हो रही है। सब देख रहे थे और इंतज़ार कर रहे थे उस जीत का जिसे इतिहास के तमाम पन्नों में दर्ज होना था। विजेंद्र कुमार के घर की औरतों के लिए नज़ारा देखने के लिए किसी खिड़की और बालकनी में जगह नहीं बची थी। हर तरफ कैमरे लगे थे। बड़े शहर वाले अपने घरों में बैठे छोटे शहर को देख रहे थे। गांव का आदमी कैसे कर गया? क्या यह नया भारत नहीं है? ये असली इंडिया है। विजेंद्र कुमार ने साबित कर दिया है।तभी बिजली चली गई। विजेंद्र की जीत के साथ ही बिजली चली गई। शायद पूरी रात के लिए। घर अब इनवर्टर के भरोसे था या फिर टीवी कैमरों की लाइट से रोशन हो रहा था। घर की तमाम औरतें अब रसोई में थी। मीडिया और मेहमानों के लिए चाय बना रही थीं। तमाम होटल वाले, धर्मशाला वाले और सर्राफा बाज़ार वाले आकर मिठाई बांट चुके थे। कैमरों के सामने विजेंद्र के बचपन की कहानी गाकर जा चुके थे। गांव के एक व्यक्ति ने कहा जब आप आ ही गए हो तो इस गांव की समस्या भी उठा दो। भिवानी में नाले के पानी से बाढ़ आ गया। इसके बारे में उठा दो। यहां बिजली नहीं रहती, ये तो दिखा दो। मैंने कहा, अभी तो मुख्यमंत्री का फोन आया था बधाई के लिए। उनसे कहते कि समस्याओं को ठीक कीजिए। जवाब मिला जब मीडिया दिखाएगा तभी मिलेगा। आप हो तभी 25-50 लाख का एलान भी हो रहा है। वरना क्या पता इतना भी मिलता या नहीं। खिलाड़ी तो इस इलाके के बहुत से इंटरनेशनल खेले हैं। आप ही कुछ कर सकते हैं।मैंने उन्हें धोखे में नहीं रखा। कह दिया कि मीडिया कल चला जाएगा। आप लोगों को बिना बिजली और सड़क के ही रहना होगा। विजेंद्र एक कामयाब कहानी है। लेकिन वो भिवानी की कहानी नहीं है। वो कुछ लोगों की मेहनत और इरादे की कहानी है। शुक्र है भिवानी का समाज खिलाड़ियों को हताश नहीं करता। सब प्रोत्साहित करते हैं। शायद यही वजह रही होगी कि ओलिंपिक से पहले भी यहां खिलाड़ी सम्मान के साथ जीता होगा।फर्क सिर्फ इतना था कि विजेंद्र की कामयाबी को आज वो समाज अपनी कामयाबी भी मान रहा था। सरकार के नुमाइंदे हमेशा की तरह रेवड़ियों का एलान कर रहे थे। मैंने भिवानी के डीसी का इंटरव्यू करने से मना कर दिया। उनके नुमाइंदे को कह दिया कि उनके पास अगर घोषणाओं के अलावा कुछ है बताने के लिए तो फिर बात करता हूं। वरना उन सबसे कहिए कि बिजली का इंतज़ाम कर दें। बिजली नहीं आई और डीसी साहब जा चुके थे।विजेंद्र कुमार जैसों का छोटा शहर। उसके पिता महिपाल सिंह ने कहा बुरा लगता है जब कोई हमें छोटे शहर का कहता है। मैंने कहा मुझे भी बहुत बुरा लगता है। लोग भूल जाते हैं कि हर दिन छोटे शहरों के लाखों लोग सायकिलों, बसों, और ट्रेन की छतों पर लद-भर कर बड़े शहरों में जाते हैं और आबाद कर चले जाते हैं। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता ये सब महानगर छोटे शहरों, गांवों से आए लाखों करोड़ों लोगों की मेहनत से बसे हुए हैं।

रवीश कुमार
साभार:www.ndtvkhabar.com

मुकेश.....पल दो पल मेरी हस्ती है ....



आज २७ अगस्त है , हिन्दी फ़िल्म जगत के लिए एक कभी न भूलने वाला दिन । १९७6 में आज के ही दिन फ़िल्म जगत में "आम आदमी" की आवाज़ की लय अचानक खामोश हो गई थी । एक स्टेज शो के सिलसिले में अमेरिका गए सोज़ के बादशाह मुकेश हमें छोड़ गए । रह गई गहरी खामोशी .......

मुकेश चंद्र माथुर से मुकेश के तौर पर पहचाने जाने तक गम के इस मुतरिब ने लंबा सफर तय किया । पैदाइश २२ जुलाई १९२३ को हुई । उनके बड़े होने के साथ ही फ़िल्म संगीत में सहगल का दौर भी परवान चढा। मुकेश पर भी सहगल का खुमार था , लता , रफी की तरह । हलाँकि मुकेश ने पहली बार १९४१ में फ़िल्म निर्दोष के लिए अपनी आवाज़ दी ( उन्होंने इसमे अभिनय भी किया ) लेकिन उन्हें पहचान सहगल-शैली के गायन के जरिये फ़िल्म "पहली नज़र" के गीत दिल जलता है तो जलने दे .... से मिली । लेकिन जल्दी ही मुकेश ने अपनी एक शैली विकसित कर ली जो सादगी की शैली थी । ५० के दशक में उन्होंने राजकपूर के साथ जोड़ी बनाई जो वो शायद दिलीप और रफी से भी ज़्यादा बेजोड़ थी ..... यहाँ एक मज़े की बात और याद आती है की महबूब खान की अंदाज़ में रफी राजकपूर और मुकेश दिलीप कुमार के लिए गाते हैं ।

आग , आवारा , श्री४२० , अनारी, जिस देश में गंगा बहती है , संगम तो आपको याद ही होंगी ।
मुकेश ने गैर फिल्मी गीत भी बहुत गाये । उनके गले से निकला राम चरित मानस का पथ आज भी सर्वोत्कृष्ठ और सबसे ज्यादा लोकप्रिय है , खुसरो का कलाम जेहले मिस्कीं भी उनके गले से अनूठा लगता है .......


रफी , किशोर के साथ अक्सर हम मुकेश का नाम लेते हैं लेकिन शायद मुकेश को इन दोनों के साथ सुनने से ही हमें पता लगता है की जहाँ मुकेश हैं वहां केवल मुकेश हैं ..... रफी या किशोर की तरह मुकेश दिल में बहुत अधिक गति से भले न प्रवेश करें लेकिन दिल पर मुकेश का रंग जितना धीमे चढ़ता है वोह उतना ही पक्का होता है ॥

आज इकबाल का एक शेर याद आ रहा है -

जौहर-ऐ- इन्सां अदम से आशना होता नही
आंखों से ओझल तो होता है फ़ना होता नही

अहमद फ़राज़ -बुझ गया चिराग

१४ जनवरी १९३१ को नव्शेरा पाकिस्तान मे एक बच्चे की विलादत हुई .इस बच्चे की सलाहियतों ने इसे आम से ख़ास बना दिया .इनके वालिद ने इनका नाम अहमद रखा जो आगे चल कर अहमद फ़राज़ के नाम से मशहूर हुए .आप ने पेशावर यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल की .उर्दू और पर्शियन मे आपको महारत हासिल थी .आपकी शाएरी मे उस दौर के हालात का तफ्सेरा भी है और खुशनूदगी भी .अली सरदार जाफरी और फैज़ अहमद फैज़ जैसे शायेरों के साथ आपका नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है.२४ अगस्त २००८ को वाक़े अहमद फ़राज़ की वफ़ात अदबी माशरे के लिए ग़म का बाएस है ।
कठिन है राहगुज़र थोरी दूर साथ चलोबहुत करा है सफर थोडी दूर साथ चलो (kaThin : difficult; raahguzar : path) तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है मैं जानता हूँ मगर थोडी दूर साथ चलो नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नही बड़ा मज़ा हो अगर थोडी दूर साथ चलो ये एक शब् की मुलाक़ात भी ग़नीमत हैकिस है कल की ख़बर , थोरी duur saath chalo अभी तो जाग रहे हैं चिराघ राहों के अभी है दूर सहर थोडी दूर साथ चलो (sahar : dawn) तवाफे मंजिले जानां हमें भी करना है “फ़राज़ ” तुम भी agar थोडी दूर साथ चलो tavaaf-e-manzil-e-jaanaaN : circumabulation of the house of beloved) Ahmed Faraz

Tuesday, August 26, 2008

काश.....

हिमांशु की पोस्ट ने दिल को एक तसल्ली दी है कि जो आग हम लोगो में थी वो अभी ठंडी नहीं हुई है और हमारे सारे जुनिअर्स के सीनों में जल रही है। दरअसल जो कुछ हो रहा है वो इतनी नई बात नही है। हमारे परम आदरणीय कुलपति जी का यह रवैया बिल्कुल भी आश्चर्यचकित करने वाला नहीं है। इससे पहले हमारे अग्रज ( सीनिअर्स ) और फिर हम लोग भी इसी रवैये से जूझते रहे। हालांकि हम लोग आगे अपने इस तरह के अनुभव ब्लॉग पर बाँटेंगे ज़रूर पर अभी तो आप लोगों को शाबासी देते हुए मैंने फोटोशोप में कुछ खुराफात की है... इसे स्वीकारें।
हम आपके साथ हैं यह कहना कुछ औपचारिक लगता है मैं कहूँगा की हम सब साथ है !
कुलपति जी और बाकी निद्रा मग्न प्रशासन के लिए इतना ही कहूँगा,
पक चुकी हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं


एक गुजारिश और है कि इस तस्वीर को सब अपने ब्लोग्स और ऑरकुट प्रोफाइल पर लगा देवें, विश्वविद्यालय में लैब में वालपेपर लगा दे और Printout की तरह भी चिपका सकते हैं... बस इस पर क्लिक करें और इसका फुल साइज़ खोल कर सेव कर लें !

Monday, August 25, 2008

स्टूडियो का सवाल

केव्स में स्टूडियो का सवाल बड़ा है । ७ नंबर से शिफ्ट हो कर जब स्टूडियो नवीन परिसर में आया तो केव्स में नई उम्मीदें अंगडाई लेने लगीं । लेकिन नई जगह पर भी लाल - फीता शाही बिल्कुल नई नही थी । ठेके से लेकर अंदरूनी राजनीती जैसे कुछ पाटों के बीच स्टूडियो पहले सेमेस्टर से तीसरे तक पिस्ता रहा । लेकिन एक दिन.......पीर परबत सी हो गई और केव्स के भागीरथ निकल पड़े कोई गंगा लाने। त्रिलंगा की ओर। कुलपति ने जो जवाब दिया वो एक सुधी से ज़्यादा एक नेता का लगा । " काम हो रहा है " और फिर " समस्या है तो यूनिवर्सिटी छोड़ दो " देवदास याद आ गई । लेकिन एक आग जो सीनों में थी वोह कहाँ ठंडी होने वाली थी । अगले दिन रातों रात पूरी यूनिवर्सिटी "काश स्टूडियो बने " के गाँधी वादी पोस्टरों से पट गई । हमारे पित्र-पुरूष श्रीकांत सर भी साथ खड़े हो गए। कहा अब जो भी हो .....

अब सूत्रों के हवाले से ख़बर आई है की यूनिवर्सिटी प्रशासन में बेचैनी है । कल तीन बजे कुलपति ने आपात बैठक भी बुलाई थी । श्रीकांत सर अभी छुट्टी पर गए हैं पर जाते जाते कह गए की आगे के "एक्शन" के लिए तैय्यारी रखना ।

हम तैयार हैं ..............!

Sunday, August 24, 2008

जन्माष्टमी विशेष ...

आज जन्माष्टमी है ..... इसका पौराणिक और धार्मिक महत्त्व हम सभी जानते हैं पर वस्तुतः इस दिन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता और महत्त्व उस मानव के चरित्र के कारण है जो अपनी बुद्धि और दृढ़ निश्चय के कारण महा मानव की श्रेणी में जा खडा हुआ और वह महामानव है कृष्ण ! कृष्ण जो प्रतीक हैं चिर यौवन के, प्रेरणा हैं अन्याय के ख़िलाफ़ विद्रोह की और सिद्धांत हैं दृढ़ निश्चय की जीत की ..................


अभी तक ब्लॉग पर हम जिस तरह की सामग्री आपके लिए लाते रहे हैं, ज़ाहिर सी बात है की हम उस स्तर से नीचे नहीं जाना चाहते हैं और दूसरों से अलग और सबसे बढ़ कर अलग तरीके से और ज्यादा गहराई में आपको जानकारी देना चाहते हैं सो हमने निर्णय किया कि इस बार हम लोक साहित्य की उस महान परम्परा को अवतरित करेंगे जो कृष्ण का नाम लेते ही मन में गूँज उठती है। जी बिल्कुल, हम बात कर रहे हैं भक्ति काल की उस लहर की जो कृष्ण भक्ति शाखा के नाम से जानी जाती है और जिसने साहित्य को अब तक के सबसे उम्दा साहित्य से नवाजा। आज हम लेकर आए हैं कुछ ऐसे पद जो बचपन की याद ताज़ा कर देंगे ....... कुछ ऐसे जो हमने सुने नहीं हैं पर वे उत्कृष्ट हैं .......







सूरदास



कहा जाता है की कृष्ण भक्ति शाखा का इनसे बड़ा कवि कोई नहीं हुआ। जन्म १४७८ ईस्वी में मथुरा आगरा मार्ग के किनारे स्थित रुनकता नामक गांव में हुआ। सूरदास के पिता रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषया में मतभेद है। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। अष्टछाप कवियों में एक । सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में १५८० ईस्वी में हुई।



सूरदास के पाँच प्रमुख ग्रन्थ माने जाते हैं



१ सूरसागर



२ सूरसारावली



३ साहित्य-लहरी



४ नल-दमयन्ती



५ ब्याहलो



सूरदास ने जिस तरह का कृष्ण के बाल रूप का वर्णन किया है शायद ही कोई कवि किसी भी भाषा में उतना सुंदर और सहज बखान पाया है , यही वजह है कि आज भी हमारे जेहन में उनके पद गूंजते हैं ..... प्रस्तुत है बाल रूप और नटखट पन....







तेरैं लाल मेरौ माखन खायौ ।



दुपहर दिवस जानि घर सूनौं, ढूँढ़ि-ढँढ़ोरि आपही आयौ ॥



खोलि किवार, पैठि मंदिर मैं, दूध-दही सब सखनि खवायौ।



ऊखल चढ़ि सींके कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढरकायौ ॥



दिन प्रति हानि होति गोरस की, यह ढोटा कौनैं ढँग लायौ।



सूरस्याम कौं हटकि न राखै, तै ही पूत अनोखौ जायौ ॥







( (एक गोपी उलाहना देती है-) तुम्हारे लालने मेरा मक्खन खाया है । दिन में दोपहर के समय घर को सुनसान समझकर स्वयं ढूँढ़-ढ़ाँढ़कर इसने स्वयं खाया ( अकेले ही खा लेता तो कोई बात नहीं थी। किवाड़ खोलकर, घर में घुसकर सारा दूध -दही इसने सखाओं को खिला दिया । ऊखल पर चढ़कर छींके पर रखा गोरस भी ले लिया और जो अच्छा नहीं लगा, उसे पृथ्वी पर ढुलका दिया । प्रतिदिन इसी प्रकार गोरस की बरबादी हो रही है, तुमने इस पुत्र को किस ढंग पर लगा दिया । श्यामसुन्दर को मना करके घर क्यों नहीं रखती हो । क्या तुमने ही अनोखा पुत्र उत्पन्न किया है ?)



माखन खात पराए घर कौ।




नित प्रति सहस मथानी मथिऐ, मेघ-सब्द दधि-माट-घमरकौ ॥




कितने अहिर जियत मेरैं घर, दधी मथि लै बेंचत महि मरकौ ।




नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति, बड़ौ नाम है नंद महर कौ ॥




ताके पूत कहावत हौ तुम, चोरी करत उघारत फरकौ ।




सूर स्याम कितनौ तुम खैहौ, दधि-माखन मेरैं जहँ-तहँ ढरकौ ॥




( (माता समझाती हैं-) `तुम दूसरे के घर का मक्खन खाते हो ! (तुम्हारे घर में) प्रतिदिन सहस्त्रों मथानियों से दही मथा जाता है, दही के मटको से जो घरघराहट निकलती है, वह मेघगर्जना के समान होती है । कितने ही अहीर मेरे घर जीते (पालन-पोषण पाते) हैं, दही मथकर वे मट्ठे के मटके बेच लेते हैं । व्रजराज श्रीनन्द जी का बड़ा नाम है, उनके यहाँ प्रतिदिन नौ लाख गायें दुही जाती है । उनके तुम पुत्र कहलाते हो और चोरी करके छप्पर उजाड़ते (अपने घर की कंगाली प्रकट करते) हो । श्यामसुन्दर! तुम कितना खाओगे, दही-मक्खन तो मेरे घर जहाँ-तहाँ ढुलकता फिरता है ।' )

मैया मैं नहीं माखन खायौ ॥



ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ ॥



देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ ॥



हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसैं करि पायौ ॥



मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्हीं, दोना पीठि दुरायौ ॥



डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ ॥



बाल-बिनोद-मोद मन मोह्यौ, भक्ति -प्रताप दिखायौ ॥



सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ ॥



( (श्यामसुन्दर बोले-) `मैया ! मैंने मक्खन नहीं खाया है ॥ ये सब सखा मेरी हँसी कराने पर उतारू हैं, इन्होंने उसे मेरे (ही) मुखमें लिपटा दिया तू ही देख ! बर्तन तो छींके पर रखकर ऊँचाई पर लटकाये हुए थे, मैं कहता हूँ कि अपने नन्हें हाथों से मैंने उन्हें कैसे पा लिया ? यों कहकर मुख में लगा दही मोहन ने पोंछ डाला तथा एक चतुरता की (मक्खन भरा) दोना पीछे छिपा दिया ॥ माता यशोदा ने (पुत्र की बात सुनकर) छड़ी रख दी और मुसकराकर श्यामसुन्दर को गले लगा लिया ॥ सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु ने अपने बाल-विनोद के आनन्द से माता के मन को मोहित कर लिया। (इस बालक्रीड़ा तथा माता से डरने में) उन्होंने भक्ति का प्रताप दिखलाया ॥ श्रीयशोदा जी को जो यह (श्याम के बाल-विनोद का) आनन्द मिल रहा है, उसे तो शंकर जी और ब्रह्मा जी (भी) नहीं पा सके ॥







अब एक मेरे मन की ....



बचपन से ही सूर का एक पद मुझे परम प्रिय रहा है...इस प्रसिद्द पद में सूर बताते हैं कि किस तरह बाल कृष्ण यशोदा से चाँद को खिलौना समझ दिला देने की जिद करते हैं ,



मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं ।



जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं ॥



सुरभी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं ।



ह्वै हौं पूत नंद बाबा को , तेरौ सुत न कहैहौं ॥



आगैं आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहि न जनैहौं।



हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहिया दैहौं ॥



तेरी सौ, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं ॥



सूरदास ह्वै कुटिल बराती, गीत सुमंगल गैहौं ॥



(श्यामसुन्दर कह रहे हैं) `मैया! मैं तो यह चंद्रमा-खिलौना लूँगा (यदि तू इसे नहीं देगी तो ) अभी पृथ्वी पर लोट जाऊँगा, तेरी गोद में नहीं आऊँगा । न तो गैया का दूध पीऊँगा, न सिर में चुटिया गुँथवाऊँगा । मैं अपने नन्दबाबा का पुत्र बनूँगा, तेरा बेटा नहीं कहलाऊँगा ।' तब यशोदा हँसती हुई समझाती हैं और कहती हैं-`आगे आओ ! मेरी बात सुनो, यह बात तुम्हारे दाऊ भैया को मैं नहीं बताऊँगी । तुम्हें मैं नयी पत्नी दूँगी ।' (यह सुनकर श्याम कहने लगे-) ` तू मेरी मैया है, तेरी शपथ- सुन ! मैं इसी समय ब्याह करने जाऊँगा।' सूरदास जी कहते हैं--प्रभो! मैं आपका कुटिल बाराती (बारात में व्यंग करने वाला) बनूँगा और (आपके विवाह में) मंगल के सुन्दर गीत गाऊँगा ।



Thursday, August 21, 2008

पुण्य प्रसून बाजपेयी का ब्लॉग

वेब यानी कि इन्टरनेट की दुनिया की पत्रकारिता के प्रेमियों के लिए एक और उम्दा और बड़ी ख़बर है.....तमाम खांटी पत्रकारों के बाद अब मशहूर पत्रकार और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के सबसे ज्यादा पहचाने चेहरों में से एक पुण्य प्रसून बाजपेयी ने भी ब्लोगिंग की डगर पर कदम धर दिया है। प्रसून जी को शायद ये लगता है कि उनका नाम किसी और नाम से ज्यादा चलेगा सो ब्लॉग का कोई नाम न धर के अपने ही नाम पर धर दिया .... हालांकि यह अच्छा भी है इससे नए और आलसी लोगों को इसे खोजने में आसानी होगी
ब्लोगिंग एक सशक्त मीडिया बन चुका है और प्रसून जी का भी इसमे उतर जाना इसकी गवाही देता है। प्रसूनजी के ब्लॉग की पहली पोस्ट एक बहुत ही लम्बी चौडी प्रस्तावना सी है जिसमे दुनिया की आजकल के हांल चाल ....हानि लाभ जीवन मरण का विषद वर्णन है। पहली पोस्ट कुछ लोगों को उबाऊ लग सकती है पर यकीनन वे सामग्री में विशवास नहीं करने वाले होंगे क्यूंकि पोस्ट वाकई उम्दा है। अगली दो पोस्ट उनके हाल के विदर्भ के यवतमाल के अनुभवों पर आधारित है......आगे और बहुत है क्यूंकि नया ब्लोगर तो रोज़ पोस्ट लिखता है न सो वे भी नियमित लिख रहे हैं।
हाँ अभी ब्लॉग पर एक शानदार कविता डाली है....मत रो माँ के शीर्षक से सो उसे भी पढ़े
हाँ ब्लॉग का पर एक माइक भी दीखता है जो शायद इसलिए है की प्रसून जी अपनी पहचान टीवी वाली ही रखना चाहते हैं ..... ब्लॉग का वेब एड्रेस है http://www.prasunbajpai.itzmyblog.com/

Monday, August 18, 2008

अति आत्मविश्वास या अति आशावाद ?


मुक्केबाज़ी के 54 किलोग्राम वर्ग के क्वार्टर फाइनल में मॉलडोवा के मुक्केबाज़ वेसलाव गोजान ने भारतीय मुक्केबाज़ अखिल कुमार को हरा दिया। इस मुकाबले में अखिल कुमार की हार के साथ भारत की ओलम्पिक में एक और मैडल की बड़ी उम्मीद पर तुषारापात हो गया। क्वार्टर फाइनल में अखिल ने विश्व चैम्पियन मुक्केबाज सर्गेई वोदोप्यानोफ़ को हरा कर सनसनी मचा दी थी और इसलिए उनसे उम्मीदें काफ़ी बढ़ गई थी।
रिंग में उतरे अखिल कुमार शुरुआत में आत्मविश्वास से लबरेज़ दिखे पर जल्द ही समझ में आ गया कि ये अति आत्मविश्वास था। पहले राउंड में अखिल ने १-१ के साथ के साथ बढ़त बनाई पर यही स्कोर दूसरे दौर में भी रहा, पर तीसरे और चौथे दौर में वेसलाव गोजान ने ६ अंक ले लिए और उनकी बढ़त अजेय हो गई।
क्वार्टर फाइनल में जीत के बाद एक निजी समाचार चैनल के साथ बातचीत में अति उत्साहित अखिल ने कहा था कि उन्हें ना तो किसी से डर है और न ही कोई उनके मुकाबले में है। उन्होंने बड़ी आक्रामकता से कहा था कि वे स्वर्ण पदक से कम किसी भी चीज़ पर समझौता नहीं करेंगे। शायद यही हुआ अब उन्हें स्वर्ण नही मिला है तो कोई भी पदक नहीं मिलेगा।
अखिल को दुनिया का सबसे बड़ा मन्त्र याद रखना चाहिए कि
अति का भला न बरसना, अति की भली ना धूप
अति का भला ना बोलना, अति की भली न चुप
तो अखिल भइया इससे बड़ा सबक नहीं मिलेगा, आप महान खिलाडी हैं पर महानता को घमंड खा जाता है !

Friday, August 15, 2008

सिग्नल ... बच्चा...झंडे....मैं... और १५ अगस्त !




आज स्वाधीनता दिवस पर जो महसूस हुआ वो इस कविता में है ..... इसके बाद नहीं समझता की ज्यादा कुछ कहने की ज़रूरत रहेगी इसलिए आप लोगो को सुनना चाहूँगा सो कृपया टिपण्णी करें .... जो भी कहना हो कहें पर कहें ज़रूर !


सुबह सुबह एक लाल बत्ती पर रुका


झंडे को देख कर झुका


स्कूल से निकलते


मासूम छातियों


और नन्हे हाथों में


सजे तिरंगों को देखा


ये नन्हे हाथ ही लिखेंगे


भविष्य का लेखा



सोच कर थी मुस्कराहट


चेहरे पर आई


पर तभी किसी ने


पीछे से आवाज़ लगाई


" बाबू जी झंडा ले लो !


गाड़ी पर खूब सजेगा


मेज़ पर भी चलेगा !"



मुड़ते ही पीछे पाया


एक और नन्हा बदन


हाथ में ढेर तिरंगे


नंगे बदन


"बाबू जी घर में बच्चो को देना,


खुश होंगे !'


वे नन्हे होंठ फिर हिले


पर


मेरे होंठ रह गए सिले



ट्रैफिक छूटा


और


मैं चल पडा


वो बच्चा वही खडा रहा


देखता


स्कूल से निकलते अपने हमउम्रों को


और हम


हर सिग्नल पर


उनसे मिलते हैं


और


उन्हें छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं



फिर अगले स्ग्नल पर मुझे आवाज़ आती है


" बाबू जी एक रुपये का झंडा है !


इससे सस्ता नहीं मिलेगा ....


बस एक झंडा ले लो ......??? "


पीछे मुड़ने पर मिलता है बच्चा


फिर वही


इस बार एक झंडा ले लेता हूँ


और देखता हूँ उसकी आंखों में


कम उम्र में अधिक भार


नन्हे हाथों में जीवन का विस्तार


कमज़ोर कन्धों पर बड़ी जिम्मेदारियां


ज़िन्दगी की दुश्वारियां



पूछा " बड़े होकर क्या करोगे ?"


जवाब मिला " काम करूंगा !!"


मैंने पूछा "मालूम है आज कौन सा दिन है ?"


जवाब था " नहीं !"


और फिर


वो चल पडा और कहीं !



बच्चा पता नहीं वो


समझदार या नादान था ...


पर उसके हाथों में झंडा


और


हालातों में हिन्दोस्तान था



अगले सिग्नल पर फिर पीछे से


" बाबू जी झंडा ले लो"


की आवाज़ आ रही है


पर इस बार पीछे देखने की


हिम्मत नहीं है !

Thursday, August 14, 2008

प्रथम वंदन !


स्वाधीनता की आज ६२वी सालगिरह हैं ................. दिन भर ब्लॉग पर जुड़ी सामग्री आती रहेगी पर शुरुआत करने के लिए सबसे पहले एक ऐसी रचना जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं ! ये रचना राम प्रसाद बिस्मिल की है और इसमे गहन देश प्रेम की अभ्व्यक्ति है सो सबसे पहले राष्ट्र को शत शत नमन ....


हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में शिर नवाऊँ ।

मैं भक्ति भेंट अपनी, तेरी शरण में लाऊँ ।।

माथे पे तू हो चंदन, छाती पे तू हो माला ;

जिह्वा पे गीत तू हो मेरा, तेरा ही नाम गाऊँ ।।

जिससे सपूत उपजें, श्री राम-कृष्ण जैसे;

उस धूल को मैं तेरी निज शीश पे चढ़ाऊँ ।।

माई समुद्र जिसकी पद रज को नित्य धोकर;

करता प्रणाम तुझको, मैं वे चरण दबाऊँ ।।

सेवा में तेरी माता ! मैं भेदभाव तजकर;

वह पुण्य नाम तेरा, प्रतिदिन सुनूँ सुनाऊँ ।।

तेरे ही काम आऊँ, तेरा ही मंत्र गाऊँ।

मन और देह तुझ पर बलिदान मैं जाऊँ ।।


इसके बाद वंदना की प्रस्तुति है राष्ट्रकवि मैथिलि शरण गुप्त की ..... मातृभूमि !


नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।

सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥

नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।

बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।

हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।

घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥

परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।

जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥
हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।

हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।

तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?

तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।

बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥
फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।

हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥

निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।

शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥

षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।

हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥
शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।

हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥

सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।

भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥

औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।

खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥
जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।

हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥

क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है।

सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥

विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।

भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥
हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।

हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥

जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।

उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥

लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।

उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥
उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।

होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥

Monday, August 11, 2008

हिरोशिमा नागासाकी ..... कुछ और !

हिरोशिमा और नागासाकी को समर्पित इस सप्ताह में हम आज अपने वादे को निभाते हुए, आपके लिए लाये हैं और कुछ सामग्री ! उस विध्वंस को हुए आज ६३ साल बीत चुके हैं पर आज भी उसके निशाँ इस दुनिया के बदन पर बाकी हैं। उस विध्वंस का इतिहास आपको हम पहले ही उपलब्ध करा चुके हैं आज हम बात अपने वादे के अनुसार अफलातून जी की उपलब्ध कराई २ और कवितायें उपलब्ध करायेंगे ....... ये कवितायेँ युद्ध और उसके परिणामों पर आधारित हैं......

युद्ध : दो
जो युद्ध के पक्ष में नहीं होंगे
उनका पक्ष नहीं सुना जायेगा
बमों और मिसाइलों के धमाकों में
आत्मा की पुकार नहीं सुनी जायेगी
धरती की धड़कन दबा दी जायेगी टैंकों के नीचे

सैनिक खर्च बढ़ाते जाने के विरोधी जो होंगे
देश को कमजोर करने के अपराधी वे होंगे
राष्ट्र की चिन्ता सबसे ज्यादा उन्हें होगी
धृतराष्ट्र की तरह जो अन्धे होंगे
सारी दुनिया के झंडे उनके हाथों में होंगे
जिनका अपराध बोध मर चुका होगा
वे वैज्ञानिक होंगे जो कम से कम मेहनत में
ज्यादा से ज्यादा अकाल मौतों की तरकीबें खोजेंगे
जो शान्तिप्रिय होंगे मूकदर्शक रहेंगे भला अगर चाहेंगे

जो रक्षा मंत्रालयों को युद्ध मंत्रालय कहेंगे
जो चीजों को सही-सही नाम देंगे
वे केवल अपनी मुसीबत बढ़ायेंगे
जो युद्ध की तैयारियों के लिए टैक्स नहीं देंगे
जेलों में ठूँस दिये जायेंगे
देशद्रोही कहे जायेंगे जो शासकों के पक्ष में नहीं आयेंगे
उनके गुनाह माफ नहीं किये जायेंगे

सभ्यता उनके पास होगी
युद्ध का व्यापार जिनके हाथों में होगा
जिनके माथों पर विजय-तिलक होगा
वे भी कहीं सहमें हुए होंगे
जो वर्तमान के खुले मोर्चे पर होंगे उनसे ज्यादा
बदनसीब वे होंगे जो गर्भ में छुपे होंगे

उनका कोई इलाज नहीं
जो पागल नहीं होंगे युद्ध में न घायल होंगे
केवल जिनका हृदय क्षत-विक्षत होगा ।
- राजेन्द्र राजन



अगली कविता गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की लिखी हुई है ..... मूल बांग्ला कृति के साथ उसका महात्मा गांधी द्बारा किया गया हिन्दी अनुवाद भी है !


जे युद्धे भाई के मारे भाई
(बांग्ला)

जे युद्धे भाई के मारे भाई
से लड़ाई ईश्वरेर विरुद्धे लड़ाई ।

जे कर धर्मेर नामे विद्वेष संचित ,
ईश्वर के अर्ध्य हते से करे वंचित ।

जे आंधारे भाई के देखते नाहि भाय
से आंधारे अंध नाहि देखे आपनाय ।

ईश्वरेर हास्यमुख देखिबारे पाइ
जे आलोके भाई के देखिते पाय भाई ।

ईश्वर प्रणामे तबे हाथ जोड़ हय ,
जखन भाइयेर प्रेमे विलार हृदय ।
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

(हिन्दी अनुवाद)

वह लड़ाई ईश्वर के खिलाफ लड़ाई है ,
जिसमें भाई भाई को मारता है ।

जो धर्म के नाम पर दुश्मनी पालता है ,
वह भगवान को अर्ध्य से वंचित करता है ।
जिस अंधेरे में भाई भाई को नहीं देख सकता ,
उस अंधेरे का अंधा तो
स्वयं अपने को नहीं देखता ।
जिस उजाले में भाई भाई को देख सकता है ,
उसमें ही ईश्वर का हँसता हुआ
चेहरा दिखाई पड़ सकता है ।
जब भाई के प्रेम में दिल भीग जाता है ,
तब अपने आप ईश्वर को
प्रणाम करने के लिए हाथ जुड़ जाते हैं ।
मूल बांग्ला से अनुवाद : मोहनदास करमचंद



अफलातून जी को एक बार फिर कोटि धन्यवाद करते हुए अब प्रस्तुत है कुछ तसवीरें जो हमें हाल ही में मिली ........



जब इतिहास रचा गया.....




यह अद्भुत दृश्य था.....विहंगम...कुछ विशवास नहीं कर पा रहे थे, कुछ मुस्कुरा रहे थे, कुछ चीख रहे थे और बाकी आंसुओं से भीगे थे ! दृश्य ही कुछ ऐसा था, तिरंगा लहरा रहा था और वो भी बीजिंग में ! जी हाँ .... और इसलिए क्यूंकि ओलम्पिक में भारत ने १९८० के बाद पहला स्वर्ण पदक जीता है। आपको भी विशवास नही हो रहा ? पर यह सच है ! यह पदक हाकी के अलावा किसी भी खेल में भारत का पहला स्वर्ण पदक है और यह इतिहास रचा है भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने ! उन्होंने 10 मीटर एयर राइफ़ल में स्वर्ण पदक हासिल किया।
जहाँ पिछले दो दिनों में एक एक करके सारी भारतीय उम्मीदें टूटती जा रहीं थी, बिंद्रा ने न केवल लाज रखी बल्कि सर गर्व से ऊंचा कर दियाइस बार हालांकि यह उम्मीद थी की हम कोई न कोई पदक जीतेंगे पर तीसरे ही दिन स्वर्ण पदक मिलना वाकई उस देश के लिए अतीव गर्व की बात है जहाँ लोग क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों की तरफ़ आंशिक रूप से भी गर्दन नही हिलाते। हाकी टीम के ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई ना कर पाने से निराश देशवासियों के लिए ये वाकई बड़ी ख़बर है बल्कि बहुत बड़ी ख़बर !
बिंद्रा का स्कोर रहा BINDRA Abhinav 100 99 100 98 100 99 596
Final shots: 10.7 10.3 10.4 10.5 10.5 10.5 10.6 10.0 10.2 10.8 104.5
Total Score : 700.5
अभिनव बिंद्रा का यह पदक १०४ साल में देश को मिला पहला व्यक्तिगत पदक है और यह निश्चित रूप से उनकी कड़ी मेहनत का परिणाम है। भारतीय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके स्वर्ण पदक जीतने पर बधाई दी है। भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि "ये बहुत बड़ा दिन है और देश के लिए बहुत गर्व की बात है। उनका कहना था कि अभिनव बिंद्रा युवाओं के लिए एक मिसाल बन गए हैं और इससे भारतीय युवाओं को बहुत बढ़ावा मिलेगा।" "अभिनव बिंद्रा के जीतने से भारतीय राष्ट्रीय ध्वज चीन में लहराया और राष्ट्रगान बजा जिससे हम सबका सर गर्व से ऊंचा हो गया" "कलमाडी का कहना था कि इसमें कोई शक नहीं कि ये ऐतिहासिक दिन है और इसका श्रेय भारतीय शूटिंग महासंघ को भी जाता है."
ज्ञात हो कि खेल रत्न से सम्मानित इस खिलाडी को पदक के दावेदार के तौर पर बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया था और न ही इस बार उनकी चर्चा ज्यादा थी लेकिन तुलसीदास ने कहा है कि सूर समर करनी करहिकही न जनावही आपु मतलब कि वीर कहते नहीं करके दिखाते हैं !


बिंद्रा तुम शूरवीर हो !


तुम लड़े....ऐसे देश में जहाँ लड़ना दुष्कर है


तुम लड़े ..... परिस्थितयों से


तुम लड़े....... समय से


तुम लड़े ....... अपने लिए नहीं, हम सबके लिए


तुम लड़े ...... देश के लिए


तुम जीते ..... इन सबके लिए


तुमको मिला सम्मान हमको मिला गौरवबोध है !


बिंद्रा ......... जीते रहो !!!

Sunday, August 10, 2008

हिरोशिमा ?? इतिहास...झलक







हिरोशिमा और नागासाकी को समर्पित इस सप्ताह में दुनिया भर में शान्ति की दुआ करने के लिए हमने जैसा की वादा और प्राण किया था ..... हम आज भी लाये हैं सम्बाध सामग्री। आज हम आपके लिए लाये हैं कुछ पुराने अखबारों की वेब कटिंग जो दिखाते हैं की हिरोशिमा-नागासाकी की त्रासदी के अगले दिन अखबारों में क्या कुछ छापा था, उस समय ! यही नहीं हम आभार व्यक्त करते हैं अफलातून जी का जिन्होंने स्वतः स्फूर्त तरीके से हमें अपने ब्लॉग से कुछ युद्ध विरोधी कवितायेँ उपलब्ध कराइ हैं। अफलातून जी समाजवादी जन परिषद् की उत्तर प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष हैं, और उनके इस उपहार का धन्यवाद केवल उन कविताओं को हम इस श्रृंखला में सम्मिलित कर के ही कर सकते हैं।




सबसे पहले कुछ पुराने अखबारों की कतरनें ......















न्यू योर्कर











द न्यूयार्क टाईम्स



अब वो कविता जो अफलातून जी ने हमें भेजी हैं, कविता में तीखा व्यंग्य है धार महसूस करियेगा !

युद्ध : एक
हम चाहते हैं कि युद्ध न हों
मगर फौजें रहें
ताकि वे एक दूसरे से ज्यादा बर्बर
और सक्षम होती जायें कहर बरपाने में

हम चाहते हैं कि युद्ध न हों
मगर दुनिया हुकूमतों में बँटी रहे
जुटी रहे घृणा को महिमामण्डित करने में

हम चाहते हैं कि युद्ध न हों
मगर इस दुनिया को बदलना भी नहीं चाहते

हमारे जैसे लोग
भले चाहें कि युद्ध न हों
मगर युद्ध होंगे ।

- राजेन्द्र राजन

अफलातून जी को धन्यवाद देते हुए ..... एक और वादा की अफलातून जी ने ३ कवितायें भेजी थी सो बाकी दो कवितायेँ अगले दो अंकों में !

MAY PEACE PREVAIL ON EARTH !

AMEN ....

चूके तीर .... स्थिति गंभीर !



ओलम्पिक में भारत के पहले दिन को कल रात अधिकतर टीवी चैनल मिला जुला बताते नज़र आए पर अगर विश्लेषण करें तो ये दिन निराशाजनक अधिक था, न कि मिला जुला। हालांकि भारत के बजरंग लाल ने नौकायन का पहला दौर पार कर लिया और विजेंद्र कुमार ने मुक्केबाजी में पहले दौर में जीत हासिल की पर निराशा इसलिए हुई क्यूंकि जिन खेलों में सबसे ज्यादा पदक की उम्मीदें थी उनमे हमारा प्रदर्शन स्तरीय भी नहीं रहा।
ओलम्पिक के साथ ही सबसे ज्यादा आशावान हम सब भारतीय तीरंदाजों और निशानेबाजों को लेकर थे पर उम्मीदें टूटती नज़र आयीं। भारतीय निशानेबाज जहाँ दिन भर लक्ष्य से भटकते रहे वहीं तीरंदाज भी कोई ख़ास तीर नहीं मार पाये। अंजलि भागवत और अवनीत कौर सिद्धू 10 मीटर एयर राइफ़ल में मुख्य दौर के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकीं। क्वालीफाइंग दौर में अंजलि 29वें स्थान पर रहीं, जबकि अवनीत कौर 39वें स्थान पर। अंजलि ने 400 में से 393 अंक जुटाए, जबकि अवनीत सिर्फ़ 389 अंक ही जुटा सकी। पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में समरेश जंग फाइनल के लिए क्वालीफाई नहीं कर सके. मेलबोर्न राष्ट्रमंडल खेलों में कई स्वर्ण पदक जीतने वाले समरेश 600 में से 570 अंक जुटा सके और 48 निशानेबाजों की होड़ में 42वें स्थान पर रह गए।
तीरंदाजी में भारत का प्रदर्शन इस तरह का रहा कि कुछ कहने से अच्छा है कि स्कोर ही बताया जाए। विश्व चैम्पियन डोला बनर्जी क्वालीफाइंग दौर में ही बाहर हो गईं। डोला बनर्जी क्वालीफाइंग दौर में 31वें स्थान पर रहीं, जबकि बॉम्बयाला देवी २२ स्थान पर।
और खेलों में भी बुरा हाल था, जूडो में तो भारतीय जूडोका महिलाओं के 48 किलोग्राम भार वर्ग में तोम्बी कुमुजम देवी केवल ढाई मिनट में ही परास्त कर दी गई। जूडो में अब 78 किलो भार वर्ग में दिव्या तेवर इकलौती भारतीय चुनौती बची हैं।
खेलों में भारत के लिए अच्छी ख़बर वहां से आई जहाँ उम्मीदें कम थी, मुक्केबाजी में भारत के विजेंद्र कुमार ने ७५ किलोग्राम भार वर्ग में पहले दौर में १४-२ के शानदार पॉइंट्स से जीत हासिल की। नौकायन में बजरंग लाल ने पहला दौर आसानी से पार कर लिया तो भारत की बेडमिन्टन खिलाडी साइना नेहवाल ने भी प्री क्वार्टर फाइनल में जीत हासिल की।
अब बात दुनिया भर की तो ओलम्पिक बीजिंग का पहला स्वर्ण पदक चेक गणराज्य की कैटरीना इमोंस के नाम रहा। हालाँकि चीन ने महिलाओं की 48 किलो भारोत्तोलन स्पर्धा में पहला स्वर्ण पदक हासिल किया. चेन ज़िझिया ने 212 किलो वज़न उठाकर देश को पहला स्वर्ण दिलाया. चीन को दूसरा स्वर्ण पुरुषों की निशानेबाज़ी स्पर्धा में मिला. 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में पेंग वेई ने स्वर्ण पदक जीता.

Saturday, August 9, 2008

Nagasaki – A black page in the golden history




Today remembering Nagasaki atomic bombings on its 63rd anniversary I feel short of words. We use to read about this catastrophe in our history books but now actually visualizing that what would be the situation at that time seriously puts me in a panic situation.
Only because a country was proving too efficient in the skills of war, it was destroyed by the super powers reigning during World War II is highly disrespectable. Today more or less the same situation prevails but we are safe on the criteria that all countries are equally efficient and if one tries to follow the destructible path in order to gain supremacy then nobody can prevent us from havouc.

Those who killed many were never punished; those who were left were only sufferers of destiny because they were left to brood over their sadistic lives with no aim and nobody to confide in. `Lost lives in hell` that’s sound more of their gloomy way of structuring lives. Still they have the confidence to live for whatever they have got with them.

More than 60 years have passed but what about the families that were affected that time. People and families suffered badly. In wake of all this we still are not getting abreast of the fact that war is not the solution of all problems in fact it`s the beginning of collateral damage.

Whether the bombings of Hiroshima and Nagasaki constituted a needless tragedy or a pragmatic military decision is still not clear. Those who made the decision, as well as most of the survivors, are long gone. The effects, though the lasting curse of radiation, the memory of the ghastly civilian casualties, the psychological impact of simply knowing that such a destructive force exists do remain. One can only hope that those who now wield the tools of Armageddon will remember the lessons of Hiroshima and Nagasaki for a long time to come and will ask for peace forever and ever…………….

Amen!!!!!!!!






नागासाकी की याद में .............





यह वो बम था " फैट मैन"






नागासाकी पहले और बाद में



आज नागासाकी पर परमाणु हमले की ६३वीं बरसी है......१९४५ में आज ही के दिन जापान के इस बड़े बंदरगाह शहर पर .................. और इस हमले में कोई लगभग ८०,००० लोग तुंरत मारे गए थे ! क्या इंसान इतना निर्दयी हो सकता है ? हाँ शायद इंसान ही इतना निर्दयी हो सकता है !



पुरानी पोस्ट पर विस्तार http://cavssanchar.blogspot.com/2008/08/blog-post_06.html



आपसे वादा था की ये सप्ताह हिरोशिमा और नागासाकी तथा विश्व शान्ति को समर्पित रहेगा सो इसी कड़ी में प्रस्तुत है हिन्दी के प्रसिद्द कवि गोपाल दास नीरज की ये कविता जो विश्व नागरिकता की बात करती है !



जलाओ दिए !



जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये।



नयी ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उडे मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झडी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
उषा जा न पाये, निशा आ ना पाये।



जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये।



स्रजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूं ही,
भले ही दिवाली यहां रोज आये।



जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये।



मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अंधरे घिरे अब,
स्वय धर मनुज दीप का रूप आये।



जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये।



गोपाल दास "नीरज"



सम्बंधित लेखों और सामग्री के लिए जायें



http://cavssanchar.blogspot.com/2008/08/blog-post_06.html



http://cavssanchar.blogspot.com/2008/08/blog-post_8800.html

चीन ने रोके बादल ...... प्रकृति से जंग ?



बीजिंग में ८ अगस्त को ओलम्पिक उदघाटन समारोह में रोडा बनने की कोशिश में जुटे बादलों को चीन के मौसम विभाग ने रास्ता बदलने को मजबूर कर दिया। बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन समारोह के दौरान बारिश होने की प्रबल संभावना थी। मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान के मुताबिक रात्रि 9 से 10 बजे के बीच बारिश होनी थी पर चीन ने प्रकृति को फिलहाल विवश कर दिया।
बारिश को रोकने के लिए बीते दिन शाम ४ बजे से रात ११.३० के बीच सिल्‍वर आयोडाइड क्रिस्टल से भरे १००० से भी अधिक रॉकेट दागे गए। बीजिंग मौसम विभाग के प्रमुख गाओ हू के मुताबिक शहर के 21 स्थानों से शाम चार बजे से रात ११.३९ बजे तक कुल 1104 रॉकेट दागे गये, जिनकी बदौलत पानी बीजिंग के अन्य इलाकों और नजदीकी हेबई प्रांत में बरस गया।
हू के मुताबिक बारिश की संभावना 90 प्रतिशत थी। बादलों में एक छोटा बुलबुला भी बारिश का सबब बन सकता था। 9।35 बजे एक घंटे के भीतर स्टेडियम में बारिश की संभावना की चेतावनी जारी की थी, लेकिन आखिर चीन प्रकृति से लड़ने में कामयाब रहा और बारिश नहीं हुई।मौसम विभाग के मुताबिक हेबई के बाओदिंग शहर में रात्रि के दौरान करीब 100 मिलीमीटर और फेंग्शान जिले में 25 मिलीमीटर बारिश हुई।
चीन ने बारिश को तो काबू में कर लिया पर अब सवाल ये उठता है कि क्या ये सब पर्यावरण को नुक्सान तो नहीं करेगा ? प्रकृति से इस तरह की छेड़छाड़ क्या उचित है ? ओलम्पिक महत्वपूर्ण है पर ये सवाल भी कम महत्वपूर्ण नही !!
आप सब इस पर राय दें !

ओलम्पिक शुरू ............

कल शाम ज़बरदस्त आतिशबाजी और बेहतरीन रंगारंग कार्यक्रमों के साथ खेलो का सबसे बड़ा मेला ओलम्पिक चीन की राजधानी बीजिंग में शुरू हो गया। शाम ८ बजकर ८ मिनट और ८ सेकंड पर प्रारंभ हुए इस खेल महोत्सव के उदघाटन समारोह ने चीन के इस दावे को शुरुआत में ही साबित कर दिया की ये अब तक के सबसे बेहतरीन ओलम्पिक होंगे। दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्कों के सबसे बड़े नेताओं की उपस्थिति में अनाव्तरित हुए इस खेल मेले में ९१,००० दर्शक और १०,५०० खिलाडियो की उपस्थिति में करीब १०,००० कलाकारों ने ऐसे कार्यक्रम पेश किए जो पहले कभी कही नही देखे गए।
चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने समारोह का उदघाटन करते हुए कहा कि,"जिस एतेहासिक क्षण का हमें इन्तेज़ार था वह आ गया !" वहीं कार्यक्रम में अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के अध्यक्ष जैक्स रोग ने कहा कि इन खेलों से दुनिया को चीन को और चीन को दुनिया को समझने का मौका मिलेगा, वे बोले "दुनिया इन खेलों के ज़रिए एक ऐसे देश को समझने की कोशिश करेगी जिसका पाँच हज़ार साल का एक इतिहास और परंपरा है। वे चीन को एक अदभुत देश पाएंगे और मेरा ख़याल है कि इससे दुनिया भर में चीन के बारे में राय बदलेगी." प्रस्तुत है कुछ झलकिया,
और ये लहराया झंडा
पाँच छल्लो में गुंथी दुनिया
विहंगम.....
मुस्कुराती दुनिया
अद्भुत !
अधिक के लिए ज़रूर देखें http://www.khelduniya.blogspot.com/

Friday, August 8, 2008

नीला आसमान......

जैसे कि इस सप्ताह को हमने हिरोशिमा और नागासाकी की पीडा को समर्पित कर दिया है.....और आपसे वादा किया है कि रोज़ हम शान्ति और युद्ध विराम से जुड़ी सामग्री पेश करेंगे, तो उसी कड़ी में अभी प्रस्तुत है एक जापानी प्रार्थना, जो कहती है कि भविष्य शान्ति में ही है ............ हिरोशिमा हमें सिखाता है क्यूंकि यह विध्वंस ही नही प्रेरणा भी है ! इस कविता का अंग्रेज़ी अनुवाद जिम मेसन ने किया है उनका आभार ...

Aoi Sorawa ( नीला आसमान )
Let us leave our children skies of blue
That burning August morning
even shadows burnt away
That weight of fathers mothers brothers sisters lives
We carry and we hold.

Let us leave our children skies of blue.

That night the essence of thousands
vanished silent into space
Now float like lantern lights to sea
Let us leave our children skies of blue.

Put out the fires of war
from every nation in the world
May peace and love and liberty
and life glow in our handshakes
In our voices in our songs
Let us leave our children skies of blue.

अब जिम मेसन का आभार व्यक्त करते हुए इस कविता का हिन्दी अनुवाद करने का साहस में कर रहा हूँ.....

आओ हम अपने बच्चो के लिए एक नीला आसमान छोड़ चलें
वो अगस्त की जलती सुबह
जब छाया भी जल गई थी
तब से हम हजारों
माता पिता और भाई बहनों का बोझ लिए
फिरते हैं
इसलिए विरासत में अब
आओ हम अपने बच्चो के लिए एक नीला आसमान छोड़ चलें

वो रात जब हजारों
बिना आवाज़ खो गए सितारों में
उनकी खुशबू आज भी
समंदर के ऊपर तिरती है
इसलिए विरासत में अब
आओ हम अपने बच्चो के लिए एक नीला आसमान छोड़ चलें

दुनिया के हर मुल्क से
युद्ध की आग बुझा कर
हमारे मिलते हुए हाथों में
शान्ति, प्रेम, स्वतंत्रता
और जीवन चमक उठे
अपनी आवाजों और गीतों में
आओ हम अपने बच्चो के लिए एक नीला आसमान छोड़ चलें

ओलम्पिक आज से......

आज से चीन की राजधानी बीजिंग में दुनिया के खेलों के महाकुम्भ ओलम्पिक खेलों का शुभारम्भ हो रहा है। इस बार के ओलम्पिक खेल इस मायने में महत्वपूर्ण हैं कि चीन इन खेलों के सफल आयोजन के द्वारा अपनी छवि दुनिया के सामने सुधारना चाहता है, वहीं दूसरी ओर तिब्बतियों के लगातार विरोध प्रदर्शन के कारण पूरी दुनिया में चीन में मानवाधिकारों को लेकर भी बहस चालू हो गई है।
हालांकि इस बात पर भी चीन ने तिब्बत को लेकर अपना रुख नहीं बदला है और तिब्बत को अपना आतंरिक मामला बताया है पर पूरी दुनिया जानती है कि तिब्बत का सच क्या है और ज़ाहिर तौर पर इस से कम्युनिस्ट चीन कहीं ना कहीं साम्राज्यवादी चीन के तौर पर उभरा है। पूरी दुनिया में ओलम्पिक मशाल के घूमने के दौरान जिस तरह के विरोध प्रदर्शन हुए और जिस तरह ल्हासा और तिब्बत के अन्य इलाको में चीन ने दमनकारी कार्यवाहियां की उससे दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में आक्रोश व्याप्त है। आशंका जतायी जा रही है कि ओलम्पिक के दौरान भी इसी तरह के बल्कि इससे भी व्यापक पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं।
अब बात ओलम्पिक की......तो कहा जाता है कि दुनिया के पहले ओलम्पिक खेल ईसा के पहले सन ७७४ में एथेंस में हुए पर आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आगाज़ १८९६ में अथेन्स में हुआ और उसके बाद से ये हर ४ साल पर आयोजित किए जाते हैं। तब से अब तक २८ बार यह मेला लग चुका है और इस बार यह उन्तीस्वा ओलम्पिक है।




इन खेलो में जहाँ दुनिया भर के २०० देशों के हजारों खिलाड़ी भाग ले रहे हैं, करीब ३०२ इवेंट्स कराये जाएँगे .... इन देशों में सबसे बड़ी टीम अमरीका की है, जिसमे करीब ६०० सदस्य हैं।


खेलों के लिए जो प्रतीक डिजाईन किया गया है उसे डांसिंग बीजिंग का नाम दिया गया है, इसमे परम्परागत लाल चीनी मुहर दिखाई गई है.... वहीं इसके शुभंकर के तौर पर पाँच शुभ चीनी गुडिया दिखाई गई हैं जिन्हें चीनी भाषा में फुवा कहा जाता है। ये शुभंकर मछली, बड़ा पांडा, अग्नि, तिब्बती अन्टीलोप और स्वलो को प्रर्दशित करते हैं। इनका नामकरण बैबेयी, जिंगजिंग, हुअन्हुअन, यिंगयिंग और निनी रखा गया है।


खेलों के लिए चीन ने बीते ५ सालों में अपना सब कुछ झोंक दिया है.......चीन में बने शानदार स्टेडियम और इमारतें इसकी गवाही देती हैं पर इस बार के ओलंपिकों के साथ चीन में मानवाधिकारों को लेकर जिस तरह के सवाल उठे हैं वो बेचैन करने वाले हैं। तिब्बत के विद्रोही भी दुनिया भर में चीन और ओलम्पिक विरोधी प्रदर्शन कर रहे हैं। विडम्बना है कि ओलम्पिक को दुनिया में शान्ति, एकता, सदभाव और स्वस्थ भावना प्रतीक माना जाता है और ये ८ अगस्त को शुरू हो रहे हैं ..... ९ अगस्त को १९४५ में नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। खैर ओलम्पिक के पाँच छल्ले जो पाँच महाद्वीपों को दिखाते हैं और उनमे शान्ति, बंधुत्व और सहकार की स्थापना की बात करते हैं, हम दुआ करें की चीन के लिए भी नया संदेश लायें और तिब्बत पर चीन गंभीरता व सदभावना से विचार करे।


Wednesday, August 6, 2008

दुनिया एक दिन ......... बदलेगी

आज ६ अगस्त है ....... हम में से नहीं मालूम कितने लोगों को याद है पर आज ही के दिन १९४५ में जापान के शहर हिरोशिमा पर दुनिया का पहला परमाणु बम गिराया गया था। इसके दो दिन बाद जापान के दूसरे शहर नागासाकी पर भी ऐसा ही हमला हुआ था ............ हिरोशिमा में उसी समय 118,661 लोग मारे गए थे और नागासाकी में 74 हज़ार लोग मारे गए, यही नहीं इसके बाद फैले रेडियोधर्मी विकिरण में न जाने कितने अपंग हुए, कितने बीमार और कितने मरे ! आज तक वहाँ बच्चे बीमार और अपंग पैदा होते हैं ! इस पर शायद उन लोगों को भी अफ़सोस रहा जिन्होंने ये किया - करवाया और आज भी दुनिया इस दिन को याद कर के आंसू बहाती है.......... पर शायद इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि आज भी दुनिया भर में लड़ाई है, युद्ध है, हमले हैं - जवाबी हमले हैं और शायद उस वक़्त से कहीं ज्यादा .............



आज उस दुर्भाग्यशाली दिन की बरसी है ........ ६३वी बरसी ........ तब केवल एक देश के पास परमाणु बम था आज तकरीबन १६ मुल्कों के पास ...... तब विश्व युद्ध हुआ था...... आज पूरे विश्व में युद्ध हो रहा है ! वाकई हम काफ़ी तरक्की कर चुके हैं .................... आज CAVS संचार में हम प्रस्तुत कर रहे हैं इस विभीषिका से जुड़ी कुछ जानकारियाँ, तसवीरें और दस्तावेज़......


सबसे पहले कुछ तसवीरें जो बयान करेंगी उस दर्दनाक मंज़र को





वह बम जिसने विध्वंस किया .....

बम धमाके का दृश्य
हमले के बाद का हिरोशिमा

एक सहायता शिविर का दृश्य









मेरा क्या कुसूर था ?
ये तब से थमी हुई है और लाखों लोगों की दुनिया भी !
अब प्रस्तुत है कि उस के अगले दिन अमेरिका के समाचार पत्रों में क्या छपा था...
अमरीका के एक हवाई जहाज़ ने जापान के हिरोशिमा शहर पर पहला परमाणु बम गिराया है.
अमरीकी राष्ट्रपति हैरी. एस. ट्रूमैन ने अटलांतिक महासागर में "आगस्ता" जहाज़ी बेड़े से यह घोषणा करते हुए कहा है कि यह बम 20 हज़ार टन टीनटी क्षमता का था और अब तक इस्तेमाल में लाए गए सबसे बड़े बम से दो हज़ार गुना अधिक शक्तिशाली था.
हिरोशिमा शहर पर छाए धूल के घने बादल की वजह से अभी तक नुक़सान का ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना संभव नहीं है.
हिरोशिमा जापानी सेना को रसद की आपूर्ति करने वाले कई केंद्रों में से एक है।
यह बम स्थानीय समयानुसार 8.15 बजे "इनोला गे" कहे जाने वाले एक अमरीकी विमान बी-29 सुपरफोर्ट्रेस से गिराया गया.
विमान के चालकदल का कहना है कि उन्होंने धुएँ के बादल और तेज़ी से फैलती हुई आग देखी है.
राष्ट्रपति का कहना है कि परमाणु बम ने दुनिया की मूलभूत शक्तियों को इकट्ठा करने का काम किया है, और इस बम के द्वारा परमाणु उर्जा के इस्तेमाल से सबसे पहले हथियार बनाने की दौड़ में भी हमने जर्मनी को पछाड़ दिया है.
राष्ट्रपति ट्रूमैन ने चेतावनी देते हुए कहा है कि सहयोगी देश जापान की युद्ध करने की क्षमता को पूरी तरह से नष्ट कर देंगे.
राष्ट्रपति ने कहा कि 10 दिन पहले पॉट्सडैम घोषणा जारी की गई थी जिसमें जापान को बिना शर्त आत्मसमर्पण करने को कहा गया था, यह उसके लिए भारी विनाश से बचने का आख़िरी मौक़ा था.
राष्ट्रपति ने कहा था,"अगर अब वो हमारी शर्तों को नहीं मानते है तो उन्हें आसमान से विनाश की ऐसी बारिश का सामना करना पड़ेगा जैसी कि पहले कभी नहीं हुई. इसके बाद समुद्र और ज़मीन के रास्ते ऐसे हमले होंगे जैसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखे, लेकिन यह हमले उसी युद्ध क्षमता का परिचायक होंगे जिससे वो अच्छी तरह से परिचित हैं."
विंस्टन चर्चिल की जगह ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने क्लीमेंट ऐटली ने हाउस ऑफ कॉमंस में संसद सदस्यों को चर्चिल का बयान पढ़ कर सुनाया है.
इस बयान में कहा गया है कि परमाणु परियोजना इतनी अधिक प्रभावशाली है कि सरकार का मानना है कि इस संबध में शोध किया जाना चाहिए और अमरीका के परमाणु वैज्ञानिकों के साथ मिल कर जानकारी का आदान-प्रदान किया जाना चाहिए.
चूँकि ब्रिटेन जर्मनी के बमवर्षक विमानों की पहुँच में था, परमाणु बम बनाने के कारखाने अमरीका में लगाने का निर्णय लिया गया था.
इस वक्तव्य में आगे कहा गया है,"प्रभु की कृपा से ब्रिटेन और अमरीकी प्रयासों ने जर्मनी के सभी प्रयासों को पीछे छोड़ दिया है. हालांकि जर्मनी के प्रयास भारी पैमाने पर किए गए थे, लेकिन फिर भी वो पीछे रह गए. यदि यह शक्ति जर्मनी के पास होती तो वो कभी भी युद्ध के नतीजों को बदल सकता था."
चर्चिल के बयान में यह भी कहा गया कि जर्मनी की प्रगति को रोकने के लिए क़ाफी प्रयास किए गए, जिनमें उन कारखानों पर हमले करना भी शामिल था, जहाँ परमाणु बम के दूसरे हिस्से बनाने का काम होता था.
उन्होंने अपने व्यक्तव्य के अंत में कहा है,"हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि ये प्रभावशाली हथियार देशों के बीच शांति पैदा करने में सहायक होंगे और पूरे विश्व पर कहर बरपाने के बजाय वैश्विक संपन्नता का स्रोत बनेंगें."
( आज भी वही अमेरिका दुनिया में शान्ति लाने के लिए युद्ध कर रहा है.....)
अब कुछ तथ्य ....


  • हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम को पूर्व राष्ट्रपति रुज़वेल्ट के सन्दर्भ में "लिटिल ब्वाय" के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस बम के कारण 13 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में तबाही फैल गई थी।
  • शहर की 60 प्रतिशत से भी अधिक इमारतें नष्ट हो गईं थीं।
  • उस समय जापान ने इस हमले में मरने वाले नागरिकों की आधिकारिक संख्या 118,661 बताई थी।
  • बाद के अनुमानों के अनुसार हिरोशिमा की कुल 3 लाख 50 हज़ार की आबादी में से 1 लाख 40 हज़ार लोग इसमें मारे गए थे।
  • इनमें सैनिक और वह लोग भी शामिल थे जो बाद में परमाणु विकिरण की वजह से मारे गए। बहुत से लोग लंबी बीमारी और अपंगता के भी शिकार हुए.
  • तीन दिनों बाद अमरीका ने नागासाकी शहर पर पहले से भी बड़ा हमला किया.
    इस बार गिराए गए बम का नाम विस्टन चर्चिल के सन्दर्भ में "फ़ैट मैन" रखा गया था और इसका वज़न लगभग 4050 किलो था।
  • नागासाकी शहर के पहाड़ों से घिरे होने के कारण केवल 6।7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही तबाही फैल पाई.
  • लगभग 74 हज़ार लोग इस हमले में मारे गए थे और इतनी ही संख्या में लोग घायल हुए थे।
  • दो परमाणु हमलों और 8 अगस्त 1945 को सोवियत संघ द्वारा जापान के विरुद्ध मोर्चा खोल देने पर, जापान के पास कोई और रास्ता नहीं बचा था।
  • जापान ने 14 अगस्त 1945 को मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

अब अटल विहारी बाजपेयी की हिरोशिमा पर एक कविता जो मुझे बहुत संवेदनशील कर देती है .......

हिरोशिमा की पीड़ा

किसी रात को
मेरी नींद अचानक उचट जाती है,
आँख खुल जाती है,
मैं सोचने लगता हूँ कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था:
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण नरसंहार के समाचार सुनकर,
रात को सोये कैसे होंगे?.... क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही,
यह अनुभूति हुई कि उनके हाथों जो कुछ हुआ,
अच्छा नही हुआ ?
यदि हुई, तो वक्त उन्हें कटघरे में खडा नही करेगा।
किंतु यदि नही हुई तो इतिहास उन्हें कभी
माफ़ नही करेगा।

अटल बिहारी बाजपेयी ( १९९५ )

एक कविता अज्ञेय की भी दिमाग में गूंजती है जो हिरोशिमा पर ही है पर अभी याद नहीं पड़ती ....... निवेदन है कि यदि किसी सुधि पाठक के पास वो कविता हो तो उपलब्ध कराने की महान कृपा करें !

बाकी यह कि मुझे पूरी आशा है कि ये प्रयास जो केव्स संचार की टीम की ओर से किया गया .... दुनिया को बदलने के लिए खींची गई बड़ी लकीर का एक छोटा बिन्दु बन पाएगी ...... इतना भी हो तो यह सब सार्थक है .... फिलहाल हम आज का दिन और यह हफ्ता समर्पित करतें हैं उस दिन को ......... दुनिया की शान्ति को ...... आमीन !

http://www.pcf.city.hiroshima.jp/top_e.html इस वेब पन्ने को ज़रूर देखें ......

अंत में एक बार फिर कि ये हफ्ता हम समर्पित करते हैं दुनिया की शान्ति को ...... कि फिर ऐसा कभी न हो ..... हम इस सप्ताह अपने ब्लॉग का हेडर का रंग हल्का नीला कर रहे हैं जो शान्ति का प्रतीक है और इस हफ्ते प्रयास होगा कि रोज़ शान्ति और अहिंसा पर कुछ सामग्री दे पाएं ....... आप सबके लेख-कविता आदि भी सादर आमंत्रित हैं !

Tuesday, August 5, 2008

Welcome my new friends

Dreams are what? -- An insight of your persona. They help you in achieving what might be quite difficult if you look otherwise. What`s my dream. If anybody would have asked me this question a year back I might have fallen short of words and may be you could have found me guessing. But today I am very clear about my goals and especially my dreams. I know where I have to reach and for this all thanks to Makhanlal University. The university has basically given me confidence, dareness and an attitude to survive in the media industry. So I wish for all the new students of my CAVS that they also get a bright future ensuring immense success in their lives.

Enjoy yourselves considering the fact that you are enjoying your dreams, then I can guarantee that you will never distract nor would ever fail.

I wish all the new chickens a bright future ahead as now the eggs have hatched and lets see who all will evolve out as ugly ducklings or transform themselves into beautiful swans.

God bless you all.

If anybody wants to contact me--
Devika Chhibber
F-104, Sector-27, Noida (UP)
Contact No.- 09310953590
devikachhibber@gmail.com

Kishore – Kabhi Alvida Na Kehna


Versatile singer and a man of different moods Kishore Kumar or otherwise called `Kishor Da` would have celebrated his 79th birthday today. An actor, playback singer and comedian Kishore Kumar still reign the industry`s heart and also those who still cherish his melodious voice. His voice was like a fresh air for all those who understood his vivacious creations. His artistic voice was like a mystic appeal that generated scores of waves for those interested in music and genuineness. The artist had always delivered his best be it his musical display or his artistic capabilities. He was surely a man who was ahead of his time.

He was born in Khandwa (MP), his father Kunjalal Ganguli was a pleader, an advocate and mother Gouri Devi was a simple housewife who belonged to a wealthy family.

His was the voice that sang unforgettable numbers like the joyous 'Paanch rupaiya baara aana', the soulful 'Zindagi ka safar', the romantic 'Pal, pal dil ke pas' and the foot tapping 'Eena meena deeka' that has people doing the twist even 50 years later. Mere Sapno Ki Rani and Roop Tera Mastana, which became smash hits are one of many which we all humm in our private moments. U can easily check his remix songs on any of the charts. Such was his profoundness for music that the scores are still relishable by the younger generation. Once music director Anu Malik regarded him by saying, "One can only copy him, none can innovate like him,"

However, to call Kishore Kumar only a singer would be underestimating his talent. He was a multi-faceted personality who was at once a lyricist, composer, producer, director, screenwriter and scriptwriter. And in all these areas he has left his unique mark. He is an idle for all the music directors in our country today.

Noticeable fact: Anand originally was supposed to star Kishore Kumar and Mehmood but due to some misunderstandings between him and Hrishikesh Mukherjee due to which the idea was dropped and new stars Rajesh Khanna and Amitabh Bachchan were casted.

Etymology

He has sung in many languages including Marathi, Assamese, Gujarati, Kannada, Bhojpuri, Malayalam and Oriya.
He holds the record for most number of Filmfare Awards won for Best Male Playback Singer.
His first film as an actor was Shikari (1946), first song Marne ki duayen kyon mangu for the film Ziddi (1948
First filmfare as Male playback singer for Roop Tera Mastana.
He was a genius when it came to singing be it roop tera mastana, Humein aur jeene ki, Saagar Kinare or the energetic Khaike Paan Banaras Wala

And as one song sung by him, states itself….
Chalte Chalte mere ye geet yaad rakhna……. Kabhi alvida na kehna-kabhi alvida na kehna

Kishore Kumar We wish you a Very Happy Birthday You live forever with us in your music.....................

स्वागत ...

महीना है अगस्त का..... और वक़्त है नए पंछियों के आगमन का और उसी सिलसिले को जारी रखते हुए हमारे विभाग में भी नए पंछियों का आगमन हो गया है ..... अलग अलग प्रान्तों, शहरों और संस्कृतियों से आने वाले ये नए पंछी भले ही अलग अलग बोलियों में चहकते हो पर बोलियाँ बदलने से भावना नहीं बदलती ........ ये सब एक साथ रहेंगे एक घोंसले में जो है केव्स ..... दृश्य श्रव्य अध्ययन केंद्र और इस बड़े वृक्ष का नाम है माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय !
अलग अलग राज्यों से आए और विभिन्न बोलियाँ बोलने वाले ये हमारे केव्स परिवार के नए सदस्य उम्मीद है कि विभाग को एक मिनी इंडिया या छोटा भारत बना देंगे ....... जहाँ रंग रूप, भेष - भाषा अलग होते हुए भी हम सब एक हैं एक दूसरे के लिए हैं ! जब तक यहाँ रहेंगे एक परिवार की तरह रहेंगे ...... लड़ाई झगडा होगा तो मान मनुहार भी .... और जब आंखों में आंसू लिए विदा होंगे तो भी एक दूसरे के साथ रहेंगे नैतिक और मानसिक रूप से !
हानि लाभ ...... सुख दुःख हर क्षण में साथ रहेगा केव्स ये शपथ लें और अच्छे पत्रकार बनें ...... क्यूंकि आप सब शायद इसीलिए घर से दूर आयें हैं इस नए परिवार में और हम यकीन दिलाते हैं कि ये आपका हमेशा साथ देगा ...... क्यूंकि परिवार हमेशा साथ रहता है !
बाकी बस यही कि हमेशा गुरुजनों का सम्मान करें ........ सीनिअर्स को पराया ना समझे और आपस की एकता कभी खंडित ना होने दें ................ एक दिन आप सब अपने माता पिता, गुरुजनों, विभाग का, देश का, पत्रकारिता और सबसे बढ़कर मानवता का सर ऊंचा कर दें यही हम सबकी शुभ कामना है !
आप सबका केव्स में स्वागत है ........ आशा है ये घर से दूर एक और घर बन पायेगा !
तो आज हम केव्स के सभी पूर्व विद्यार्थी और चिर परिवार जन अपनी गौरवशाली परम्परा आपको सौंपते हैं और निश्चिंत होते हैं कि आप इसके योग्यतम उत्तराधिकारी हैं !
और कुछ कहने की जगह साहिर लुधियानवी का एक गीत जो नया दौर फ़िल्म में भी था ....... ये सब कुछ बयान करता है ,

साथी हाथ बढ़ाना
एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना।
साथी हाथ बढ़ाना।
हम मेहनत वालों ने जब भी, मिलकर कदम बढ़ाया
सागर ने रास्‍ता छोड़ा, परबत ने सीस झुकाया
फ़ौलादी हैं सीने अपने, फ़ौलादी हैं बाँहें
हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें
साथी हाथ बढ़ाना।
मेहनत अपने लेख की रेखा, मेहनत से क्‍या डरना
कल गैरों की खातिर की, आज अपनी खातिर करना
अपना दुख भी एक है साथी, अपना सुख भी एक
अपनी मंज़‍िल सच की मंज़‍िल, अपना रास्‍ता नेक
साथी हाथ्‍ा बढ़ाना।
एक से एक मिले तो कतरा, बन जाता है दरिया
एक से एक मिले तो ज़र्रा, बन जाता है सेहरा
एक से एक मिले तो राई, बन सकती है परबत
एक से एक मिले तो इंसाँ, बस में कर ले किस्‍मत
साथी हाथ बढ़ाना।


मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com
9311622028

केव्स पताका फहराओ ......... शुभकामनाएं

हर्ष और गौरव दोनों के ही अनुरूप विषय है यह कि हमारे विभाग के १६ होनहारों का चयन जी न्यूज़ के आने वाले छत्तीसगढ़ न्यूज़ चैनल के लिए हुआ था और वे सभी रायपुर में ज्वाइन कर चुके हैं और आज से अपना काम शुरू कर देंगे या कर चुके होंगे। हर्ष की बात ये है कि सभी अत्यन्त प्रतिभाशाली हैं और योग्यता अनुरूप इन्हे बड़े नेटवर्क में काम मिला और गर्व का विषय यह कि विश्वविद्यालय में इतने बड़े नेटवर्क में कैम्पस चयन के द्वारा चयनित होने वाली यह रिकार्ड संख्या है ....... सो विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाने वाले इन केव्स वीरों को बधाई और इनके पत्रकारिता के उज्जवल भविष्य के लिए पूरे केव्स परिवार की ओर से शुभकामनाएं ........ ईश्वर करे कि ये सभी पत्रकारिता के दिन पर दिन स्वरुप में सुधार लायें और कीर्तिमान गढे....................
साथ ही सबसे ज़्यादा बधाई के पात्र हैं डॉ अविनाश बाजपई और डॉ श्रीकांत सिंह

Saturday, August 2, 2008

एक युग बीता ......




१८ मई, 2008 की रात, जगह थी नॉएडा के सेक्टर १२ के मेट्रो हॉस्पिटल का क्रिटिकल केयर सेंटर ......... मैं शांत और स्तब्ध खडा एक युग को अपने अवसान की ओर जाते देख रहा था........ देख रहा था एक भीष्म को शैया पर पड़े .... और सोच रहा था कि हाँ ये वाकई एक युग का अंत है। मैं तो मैं हूँ ही और यहीं हूँ पर वो युग आज बीत गया, भीष्म आज इच्छा मृत्यु को प्राप्त हो गया ........ और वो भीष्म थे हरकिशन सिंह सुरजीत...... भारतीय वामपंथ के पितामह ! मैं तब नोइडा में एक अदद मीडिया की नौकरी के लिए मन मार रहा था और तभी पता चला कि सुरजीत जी मेट्रो में भरती हैं...... पुराना सोशलिस्ट मन जोर मार गया और रात के ९ बजे मोटर साइकिल का हैंडिल अपने आप ही मुड गया मेट्रो हॉस्पिटल की ओर .... गेट पर गार्ड से पूछा कि सुरजीत जी यहीं भर्ती हैं ...... सर हाँ में हिला इशारा किया रिसेप्शन की ओर , रिसेप्शन पर कहा गया कि ऊपर दूसरी मंजिल पर क्रिटिकल केयर सेंटर में हैं ! ऊपर पहुंचा तो अजीब सी शान्ति मिली, बहुत भीड़ भाड़ नहीं, कोई उत्साही समर्थक नहीं; ना ही पार्टी नेताओं का जमावडा ....... सिर्फ़ दो घरवाले और लुधियाना से आए दो रिश्तेदार ! पहले बाहर बैठने को कहा गया तो मुलाक़ात हुई सुरजीत जी के बड़े बेटे से जो ब्रिटेन के ग्लासगो शहर से आए थे और आजकल वही रहते हैं ........ पता चला कि स्थिति ज्यादा नाज़ुक है ....... सुरजीत जी कोमा में हैं ही और फेफडे तथा गुर्दे दोनों ही काम नही कर रहे थे। उनके रिश्तेदारों से भी उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ चर्चा हुई और बेशक वे उनके राजनीतिक जीवन के बारे में बहुत नही जानते थे पर उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में ज़रूर जानकारी मिली।


तभी बाहर आए उनके पौत्र जो उनकी देखरेख कर रहे थे ....... मेरे ये बताते ही कि छात्र जीवन में स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया से जुडा रहा था तुंरत उन्होंने कहा कि आप साथ आयें और मुझे अन्दर ले गए, सामने की शैया पर मैंने वो देखा जो अब तक किताबो में पढा था ........ एक युग का अंत ! बिस्तर पर तमाम तरह की नलियों और उपकरणों के बीच में कुछ साँसे संघर्ष कर रही थी ....... पहली बार सुरजीत जी को बिना पगड़ी के देखा, देख रहा था एक युग को अचेतन अवस्था में और याद कर रहा था जब पहली बार उनको लखनऊ में और फिर सैकडो बार टीवी पर देखा था।


जितना जानता हूँ उनके बारे में वो सब आज याद आ रहा है क्यूंकि आज १ अगस्त २००८ को अब वे हमारे बीच नहीं हैं ........... एक आम नागरिक के तौर पर हम सब उनके बारे बस यही जानते हैं कि वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) के भूतपूर्व महासचिव और सबसे बुजुर्ग कम्युनिस्ट थे, कई लोग उन्हें वयोवृद्ध कामरेड के या कामरेड सुरजीत के नाम से भी जानते थे। उनको लेकर कई विवादित मुद्दे भी रहे और बिल्कुल ये दूसरो से और भीड़ से अलग होने की कीमत भी है कि आपको प्रसिद्द होने के साथ विवादित भी होना पड़ेगा। कामरेड सुरजीत का जन्म २३ मार्च १९१६ को जालंधर जिले के बुन्दाला में एक बस्सी जाट परिवार में हुआ, इसे संयोग कहें या विधि की भगत सिंह के इस कट्टर अनुयायी का जन्म १९२६ में उसी दिन हुआ जिस दिन १९३१ में भगत सिंह को फांसी दी गई। १९३० में सुरजीत ने किशोरावस्था में ही भगत सिंह की नौजवान भारत सभा की सदस्यता ले ली और आज़ादी की क्रांतिकारी आन्दोलन में कूद पड़े। २३ मार्च १९३२ को भगत सिंह के पहले शहादत दिवस पर सुरजीत ने होशियारपुर कचहरी परिसर में तिरंगा लहरा दिया जिसमे इन्हे दो गोलियाँ मारी गई, अदालत में पेश किए जाने पर जज को इन्होने अपना नाम लन्दन तोड़ सिंह बताया।


रिहाई के बाद सुरजीत पंजाब के साम्यवादियों के संपर्क में आए और १९३६ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली, १९३८ में सुरजीत किसान आन्दोलन से जुड़ गए जब पंजाब किसान संघ की नींव पड़ी और वे उसके महासचिव बनाए गए। उसी साल उन्हें ब्रिटिश सरकार ने पंजाब से बाहर जाने का फरमान सुना दिया, यहाँ से वे पहुंचे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और वहां से चिंगारी नाम की इंकेलाबी पत्रिका निकालने लगे। तभी द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और उनको भूमिगत होना पड़ा। फिर उन्हें गिरफ्तार करके लाहोर किले में क़ैद कर दिया गया। १९४४ में वे वहाँ से रिहा हुए और दोबारा किसान आन्दोलन में जुट गए। तभी देश आजाद हो गया ....... इस दौरान बंटवारे को लेकर हुए दंगो में हिंसा रोकने और सदभाव फैलाने की सुरजीत की कोशिशों को लोग आज भी याद करते हैं। १९५४ में भाकपा के तीसरे अधिवेशन में वे पार्टी की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में चुने गए। वो इन पदों पर १९६४ में पार्टी के टूटने तक रहे फिर १९६४ में विवादित घटनाक्रम में भाकपा मार्क्सवादी की स्थापना हुई और तब से अप्रैल २००८ तक वे पार्टी के वरिष्ठतम क्रम पर रहे। यही नही पिछले दस सालो में गठबंधन की राजनीती में भी सुरजीत हमेशा धुरी बने रहे। अप्रैल २००८ में गिरते स्वास्थ्य की वजह से सुरजीत ने पार्टी के तमाम पदों से इस्तीफा दे दिया।


१९६२ में (कथित साम्यवादी) चीन के हमले के दौरान चीन का समर्थन करने वाले नेताओं में सुरजीत भी शामिल थे और ये विवाद जीवन पर्यंत उनके साथ जुड़े रहे। सुरजीत का ये कदम उनके पूरे राजनैतिक जीवन का सबसे ग़लत कदम माना जा सकता है पर फिर भी इसे सबसे दुस्साहसिक कदम भी कहेंगे ....... ऐसा दुस्साहस सुरजीत हमेशा करते रहे !
सुरजीत उन साम्यवादियों में रहे जो विवादित तो रहे पर कई मामलो में उनके विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। वैसे भी कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नहीं पर उसके कुछ महान काम उसकी तमाम गलतियों पर भारी पड़ते हैं। उनका दुस्साहस यह भी था कि एक ज़बरदस्त विवाद की आधार भूमि पर एक नयी पार्टी बना दी और आज वो देश की सबसे बड़ी साम्यवादी राजनैतिक पार्टी है .......... ये श्रेय उनसे नहीं छीन सकते हम .......... हम में से कितने लोग एक झंडा फहराने के लिए सीने पर गोलियाँ खाने को तैयार हैं ? ...... हम में से कितने किसानो के हक के लिए अपनी जायदाद बेच देंगे ? हम में से कितने लोग खालिस्तान अलगाववादियों के ख़िलाफ़ खुल कर खड़े हो गए था ?



१८ मई की रात मेट्रो हॉस्पिटल में मेरे सामने सुरजीत जी कोमा में पड़े मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे ................ और मैं पहुँच गया था लखनऊ के उस वक़्त में जब मेरी उनसे पहली और चेतन अवस्था में आखिरी भेंट हुई थी ! ...... तब मैंने उनसे अभिवादन करते हुए कहा था
' कामरेड लन्दन तोड़ सिंह को मेरा सलाम '
और उधर से जवाब आया कि
" लन्दन क्या जो भी चीज़ तुम पर ज़बरदस्ती थोपी जाए उसे तोड़ डालो ! "


यादों से लौट कर मैं फिर हॉस्पिटल में था........और सोच रहा था कि क्या उनसे ऐसी ही दो मुलाकातें होनी थी .... एक जिसमे ऐसा जोश था और एक में जिंदगी के अंत का सन्नाटा ?
फिर अचानक देखा कि सुरजीत जी ने अवचेतन अवस्था में एक बार ज़ोर से साँस ली .... जैसे कहना चाहते हों कि लड़ाई तो हमेशा ही है, चाहे दुनिया से या ख़ुद से ! मैं फिर शांत था क्यूंकि देख लेना चाहता था पूरे ध्यान से और चाहता था कि हमेशा के लिए हिस्सा बन जाऊ उस युग का जो अब ख़त्म हो गया...........


मेरे सामने भीष्म की भांति एक युग और वाकई भारतीय राजनीति शर शैया ही है ..... एक महागाथा अपनी परिणिती की ओर थी .............. आज वो पूर्ण हुई ! विवाद तो होंगे ही ..... गलतियां भी होनी ही हैं पर युग तो युग है ........ यह एक युग की समाप्ति थी ....भारतीय साम्यवाद के !


मयंक सक्सेना
9311622028 mailmayanksaxena@gmail.com

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