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Friday, September 25, 2009

बदलाव के दौर से गुजर रही है भाजपा ......


भाजपा में आडवानी जी को लेकर एक बार फिर बहस चल रही है......८० के पड़ाव को पार कर चुके आडवानी की भूमिका क्या होगी इसका खाका संघ खीच चुका है .... २०१० की शुरुवात के आस पास पार्टी में उनकी भूमिका सीमित हो जायेगी ऐसी खबरे नागपुर से आ रही है.... इसी कारण आज आडवानी मीडिया में कोई भी बयान देने से परहेज कर रहे है .... क्या ऐसी उम्मीद कोई आडवानी सरीखे नेता से कर सकता है ...? लोक सभा चुनावो से पहले जो व्यक्ति अपने को पी ऍम इन वेटिंग के रूप में मीडिया में बड़ी जोर शोर के साथ पेश करता था साथ ही जो मनमोहन को कमजोर प्रधानमंत्री बताता था आज वह क्यों इतना असहाय हो गया है अब मीडिया में अपना मुह नही खोलता .... क्या एक हार ने आडवानी जी को इतना पंगु बना दिया है वह अब राजनीती के मैदान में वह पस्त हो गए है ....? ऐसे कई सवाल भाजपा से जुड़े लोगो के जेहन में भी आ रहे है....
क्या इस बात की आप उम्मीद कर सकते है महीनो पहले जो आडवानी जी मनमोहन सरकार को आतंकवाद और आतंरिक सुरक्षा जैसे मुद्दे पर घेरा करते थे आज हार ने उनको कमजोर कर दिया है.... दरअसल ऐसा नही है ..... संघ के इशारो पर यह सब किया जा रहा है ... मोहन भागवत अब भाजपा को नए ढंग से संगठित करना चाहते है .... इस बात पर सभी ने हामी भर दी है ... बस राजनाथ के कार्यकाल के पूरा होने का इन्तजार है ... उसके बाद भाजपा को नए ढंग से संगठित करने की कवायद शुरू हो जायेगी.....संघ यह मान चुका है २ हारो के बाद पार्टी को नए सांचे में ढाला जाए .... कांग्रेस के प्रति बदने वाले युवाओ के आकर्षण को कम करने का नुस्का भी ढूँढ लिया गया है.... आने वाले नगर निकायों , विधान सभा के चुनावो में भाजपा बड़ा दाव युवाओ को टिकेट देकर खेलेगी ... पार्टी में आडवानी की सलाहकार की भूमिका रहेगी.... वैसे वह जल्द ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक के अवतार में नजर आयेंगे ॥ अब यह अलग बात है उनके मन में पी ऍम बन्ने की एक इच्छा और बनी हुई थी .... सूत्र बताते है आडवानी जी चुनाव में भाजपा की करारी हार के बाद अपनी इस इच्छा का इजहार करने से सीधे डर रहे थे ... इस दौरान अगर वह इसका इजहार कर देते तो सभी उनकी हसी उडाते अतः उन्होंने चुप रहना मुनासिब समझा ...उन्होंने इसके लिए अपनी पसंद के उम्मीद वारो को मन माकिफ पदों पर बैठाना शुरू कर दिया .... लेकिन संघ को इस बात की भनक लग गई जिस कारण उसने शिमला के चिंतन के बाद उनकी भूमिका को सीमित करने का फैसला लेना पड़ा ...
आडवानी जी शुरू से भाजपा नेताओ के निशाने पर रहे है ... जसवंत , यशवंत , शौरी जैसे नेता बार बार इस बात को उठाते रहे है पार्टी में जवाबदेही तय नही की जाती जो सही नही है.... वह आडवानी जी को कठघरे में खड़ा करते रहे है.... इसी कारण संघ चाहता था आडवानी जी का नई भाजपा में कोई दखल नही हो ....वह भाजपा को नए नेताओं से संगठित करना चाहता था जिस कवायद में वह सफल साबित होता दिख रहा है ... बताया जाता है राजनाथ की विदायी के बाद नई भाजपा देखने को मिलेगी जहाँ आडवानी की धमाचौकडी का दखल नही होगा...इसी तर्ज पर राज्यों में भी अब युवा नेताओं को तरजीह दी जा सकती है .... अगर यह सब हुआ तो इसको भाजपा के भविष्य के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है ...संघ की दवा का असर धीरे धीरे होगा ..... रातो रात किसी चमत्कार की उम्मीद नही की जा सकती है...चमत्कार को सभी का नमस्कार करने में समय लगता है..हर किसी का कोई न कोई ख़राब समय चलता है ... भाजपा भी आजकल इसी दौर से गुजर रही है... जल्द ही पार्टी इस बुरे दौर का अंत होगा ऐसी उम्मीद है .......... वैसे भी यह दुनिया उम्मीद पर ही तो कायम है ......


हर्षवर्धन पाण्डे/ प्रवीण परमार

Wednesday, September 23, 2009

यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे....


यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे
शाम के धुंधलके में डराते से
सुबह हवा से लहराते से
धूप में छांव देने के मकसद से
पीपल से, कीकर से
बरगद से
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

सूरज की रोशनी से चमकते
चांदनी में चांदी से दमकते
तूफानों से झगड़ते
आंधियों में अकड़ते
इंसानों को बेहद प्यार करने वाले
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

उन डालियों पर
हम झूला करते थे
बैठते, कूदते थे
उन पर
कई बार खाईं थी
निबोंलियां भी तोड़ कर
बड़े घनेरे, शाम सवेरे
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

बारिश की बूंदे पत्तों पर ठहर कर
काफी देर तक
देती थीं
बारिश का अहसास
तब शायद दुनियावी समझ
नहीं थी अपने पास
अब जब अपने पास दुनिया है
दुनिया की समझ है
दुनिया की दौलत है
दुनिया की ताकत है
तब अपने पास धूप नहीं है
छांव नहीं है
पगडंडी और गांव नहीं है
आंधी और बरसात नहीं है
छत पे सोती रात नहीं है
खेत किनारे मेड़ नहीं है
कुछ भी नहीं है
पेड़ नहीं है....
सड़क किनारे
धूप से तपता
छांव को तकता
सोच रहा हूं
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे......

(कल संयुक्त राष्ट्र में विकसित देशों ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन पर ढोंग किया है....और कल ही जब तेज़ धूप से बचने के लिए कोई पेड़ न दिखा....केवल हॉर्न का शोर और गाड़ियों का धुआं था....तो ये कविता निकली.....अब भी याद है लखनऊ में जेल के पीछे का वो जंगल....जो एक सनकी मुख्यमंत्री की तुगलकी मूर्ति कला की भेंट चढ़ गया.....)
मयंक सक्सेना

वोडाफोन का सेक्स व्यापार....


यह मोबाइल सेवाओ का अविष्कार होने के बाद का सबसे बड़ा संचार घोटाला है और पहले भी अदालत के हुक्म पर पचास लाख रुपए का जुर्माना भुगत चुकी वोडाफोन कंपनी अब सीधे सीधे लड़कियों की दलाली पर उतर आई है। हजारों लड़कियां और गृहणियां हैं जिन्हें दिन में तीन घंटे कहीं से भी आने वाले फोन पर हर तरह की बातें करने के बदले पचास रुपए रोज दिए जाते हैं और इस सेवा को चैट सेवा के माध्यम से प्रचारित किया गया है। एक लड़की को तीन हजार रुपए महीने मिलते हैं और उसके लिए तीन घंटे रोज बात करना अनिवार्य है। वोडाफोन हर कॉल का दो रुपए प्रति मिनट लेता है यानी तीन घंटे में छत्तीस सौ रुपए कमाता है। मतलब साफ है कि इन गरीब लड़कियों से भी वोडाफोन छह सौ रुपए महीना कमा रहा है।वोडाफोन का यह मौखिक सेक्स व्यापार किसी को भी सकते में डाल देने के लिए काफी है।
इस घिनौने व्यापार के लिए मैंने खुद चैट सर्विस का सदस्य बन कर लंबी बाते की हैं और देश भर में की है। हर जगह फोन उठाने वाली लड़की को कंपनी ने रिया नाम दिया है। दिलचस्प बात यह है कि आम तौर पर वोडाफोन की कस्टमर केयर से जो बहनजियां बात करती है उनका भी आम नाम रिया है। अब आइए असली कहानी पर। वोडाफ़ोन एस्सार भारत में वोडाफ़ोन समूह की एक सहायक है और जब इसकी पूर्ववर्ती हचिसन टेलीकॉम मुंबई के लिए सेलुलर लाइसेंस हासिल कर कार्य शुरू किया। वोडाफ़ोन एस्सार अब हलकों में कई लाख ग्राहकों ;सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, की रिपोर्ट के अनुसार सेवाओं का संचालन कर रही है।, इन वर्षों में वोडाफ़ोन एस्सार में हच ब्रांड के तहत सबसे सम्मानित दूरसंचार कंपनी देश में सर्वश्रेष्ठ मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनी और ज्यादातर क्रिएटिव और सबसे प्रभावी विज्ञापनदाता वर्ष नाम दिया गया है।
ये तो हुआ वोडा फोन का परिचय अब थोडा उनकी कारगुजारियों पर भी नजर डाल ले फिर मै मुद्दे की बात पर आता हूं। वोडाफोन ने हाल ही में एक योजना चलाई थी जिसमें कंपनी ने रोजाना 20 मिनट से अधिक बात करने वाले अपने ग्राहकों को प्रति दिन सोने का एक सिक्का और ड्रा के आधार पर एक कार जीतने का मौका दिया था। इस योजना के तहत पुरस्कार पाने की लालच में कंपनी के ग्राहक मोबाइल फोन पर गैरजरूरी कॉल करने लगे हैं। एक संस्था ने यह शिकायत दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव ओमेश सहगल के माध्यम से की थी जिन्होंने इस मामले की पैरवी की। शिकायत पर दिल्ली राज्य के उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश जेए कपूर ने कहा कि प्रतिदिन 20 मिनट से अधिक बात करने वाले अपने ग्राहकों के लिए सोने के 10 सिक्के और मारुती एसएएएक्स कार की बंपर पुरस्कार की लुभावनी योजना चलाकर कंपनी अप्रत्यक्ष रूप से अपने कारोबार को बढ़ा रही है। यह उचित नहीं है। इसीलिए दिल्ली सरकार की उपभोक्ता अदालत ने मोबाइल फोन पर अधिक बातें करने वालों को सोने के सिक्के और कार जीतने के मौके देने की पेशकश के मामले में मोबाइल सेवा मुहैया करवाने वाली प्रमुख कंपनी वोडाफोन एस्सार पर 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। कपूर ने जारी अपने आदेश में कहा कि जुर्माने की रशि से 100,000 रुपये उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए काम करने वाली स्वयं सेवी संस्था सोसाइटी आफ कैटलिस्ट को दिया जाए और शेष राशि दिल्ली राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराई जाए।
पर शायद कंपनी ने इससे भी कोई सबक नहीं लिया और शरू कर दी अपनी कारगुजारिया एक बार फिर अपनी चैट सर्विस के माध्यम से पर इस बार वोडाफोन कंपनी बेशर्मी की और पैसे कमाने की दौड़ मै नीचता की सारी हदे पर कर गयी और उसने उपभोक्ता के साथ रच दिया एक अजीब सा तिलिस्म जिसे कोई भी शरीफ उपभोक्ता शायद ही समझ पाता। हुआ यूं कि मैने वोडाफ़ोन का एक नंबर अभी कुछ ही दिन पहले ही लिया था और शायद एक वजह इस नंबर को लेने की ये भी थी क्योकि इस चैट सर्विस के बारे मै यदा कदा मित्रो से सुनता रहा और ये भी सुना था की इसमें कोई घपला भी है..... मेरा पत्रकार मन भी थोडा जगा और कर डाला उद्धाटन इस चैट सर्विस का और जो तथ्य मुझे कल अपने नंबर पर एक हजार रूपये एक रात मै खर्च करके इस चैट सर्विस के बारे में मिले वो निम्न प्रकार से है
वोडा फ़ोन ने पूरे भारत वर्ष मै तकरीबन हज़ारों कनेक्शन मुफ्त में उन जरूरत मंद महिलाओ को दिए जिनके लिए तीन हजार रुपया महीने में कमाना संभव नहीं था, पर रुकिए, यहाँ वोडाफ़ोन का उद्देश्य उनकी मदद करना बिलकुल नहीं था बल्कि वोडाफ़ोन ने बिना किसी पेपर के उनसे एक सौदा किया के वो डेली चैट नो पर आने वाली सारी काल रिसीव करेंगी और उनका दिन का टारगेट होगा तीन घंटे लगातार बात करना। चाहे वो व्यक्ति कुछ भी कैसी भी बात करे, अपने फ़ोन नहीं काटना। इसके बदले मै आपको मिलेंगे। 50 रुपया रोज यानी महीने के 1500 रुपया लगभग कोई भी मजबूर लड़की और महिला जो गरीबी से जूझ रही हो उसके लिए ये शायद नियामत हे थी सो वोडा फोन का ये षडयंत्र कम कर गया। दूसरी और अहम् बात इस चैट न. से जब भी आप अपनी पसंद के नंबर जो कंपनी आपको देती है, मिलाएंगे तो सबसे पहले आपकी कॉल एसटीडी ही लगेगी। मेरी पहली कॉल लगी जम्मू, दूसरी शिमला, तीसरी चंडीगढ़, चौथी जयपुर और फिर दिल्ली । इन सभी औरतो या लड़कियों में से सबने अपना नाम मुझे रिया ही बताया, तो संभावना ये भी बनती है कि वोडाफोन ने कोई कॉल सेण्टर टाइप भी खोल लिया हो जिस पर बैठ कर ये लोगो को आसानी से मूर्ख बना सकता है और अपनी जेब गर्म कर सकता है।
इनमे से चंडीगढ़ वाली महिला ने ये भी बताया कि लोग रात में बात करने के लिए बार बार फ़ोन करते रहते है पर वे अपना फ़ोन बंद नहीं कर सकती क्योकि दो बार से ज्यादा फ़ोन बंद मिलने पर वोडाफोन इनके पूरे महीने के पैसे काट लेता है जो इनके लिए जरुरी है, सो ये चुपचाप लोगो की गन्दी गन्दी बाते भी मज़बूरी में सुनती हैं। शायद ये सर्विस अख़बार मै आने वाले उन खतरनाक विज्ञापनों से भी भयानक है जिसमे प्यार की मीठी मीठी बातो का झांसा दिया जाता है। शर्म आती है इस कंपनी की सोच पर जो पैसे कमाने के लिए इतना गिर गयी हो कि इस वहशियत पर उतरी। एक ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को गुलाम बनाया अगर इस प्रकार ये बाहर की कंपनिया देशी होने के ढोंग की पीछे धन कमाने के अपने उद्देश्य की पूर्ती करके हमे अपने जाल मै फंसा के कही फिर गुलाम न बना ले।
अरविंद सिंह 'सुधाकर'
(लेखक लम्बे समय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय हैं और सम्प्रति सीएनईबी न्यूज़ में कार्यरत हैं, अरविंद से आप arvind.sudhakar@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

Tuesday, September 15, 2009

दो कविताएं....सच्चे वीरों के लिए...आज के वक्त की....

कल हिंदी दिवस था....और हमने एक सुनियोजित निर्णय के तहत कोई लेख या रचना प्रकाशित नहीं की....हिंदी पखवाड़ा भी मनाने का इरादा छोड़ दिया....यह सब एक सांकेतिक विरोध के तहत था....दरअसल हिंदी दिवस की उपादेयता समझ में नहीं आ रही थी....और जब तक ये समझ नहीं आती तब तक बेहतर है कि हिंदी के लिए कोई दिवस न मनाया जाए.....रोज़मर्रा में ही शामिल रहने दिया जाए.....और फिर आज वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर जी ने अपनी दो कविताएं सौंपी तो लगा कि इनको ब्लॉग पर स्थान मिलना चाहिए....तो ये दो कविताएं प्रकाशित कर रहे हैं....ये कविताए उन सभी विश्व नागरिकों को समर्पित हैं जो अपने काम को बिना डरे कर रहे हैं....और दबावों से लड़ रहे हैं...दुनिया में जैसे भी जहां पर भी हैं......और आज के इन सचों का सामना कर रहे हैं....

कविता 1(सुनो)
तुम मुखर हो
तुम प्रखर हो
तुम निडर हो
तो सुनो चेतावनी
राज चालाक गूंगों का है
एक राजाज्ञा मिलेगी
तुम मुखर हो कर
तुम प्रखर हो कर
तुम निडर हो कर
भूखे ही मरोगे
झूठ के और नपुंसक दर्प के
जब कभी टेंडर खुलेंगे
राजपथ को गली में बदलने के
सभी ठेके इनको मिलेंगे
और तुम सीमा पार से
देखोगे स्वयंभू घोषित प्रखर
आत्म घोषीत मुखर
दयनीयता की हद तक निडर

कविता 2 (संदेश)
ये सन्देश है
उन नीच दासों के लिए
जिन्हें अपने हित, अपनी साधना,
अपने सत्य पर कुछ ज़्यादा ही भरोसा है...
जो समझते हैं बदल कर स्रष्टि को
खींच लायेंगे आकाशगंगा को धरा पर
बांध लेंगे नक्षत्र सारे
अपने घरों की पोटली में
उन नीच दासों को हुक्म है गूंगे राज का
वे हद में रहें
पाप झेलें, ताप झेलें
सब तरह संताप झेलें
पर किसी से ना कहें
कुछ कहोगे तो सहोगे
आत्म निर्वासन में रहोगे दास हो,
विश्वास कर लो दास हो
तुम नहीं अपनी सांस तक का
एक क्शंभ्गुर तनिक विश्वास हो
सच कहें तो आदमी तुम हो नहीं,
आदमी होने का महज़ आभास हो.
ना तुम सोचो न तुम समझो
हैं तुम्हारे लिए सोचने वाले बहुत
वे समझते हैं, हित तुम्हारा
और जो वे समझते हैं
वो ही हुक्म है, हित है तुम्हारा
फिर ना कहना कि हमने समय पर
तुमको ना पुकारा
तुम अपनी दासता में ही अमर हो
तुम राजमहलों में सिसकता मूक स्वर हो
तुम स्वयं के स्वामी नहीं हो
तुम समय के दास हो
याद रखो-- तुम दास हो
दास लोगों से भरा ये देश है
और दासों को यही सन्देश है....

Sunday, September 13, 2009

Gujral forced me to quit Fodder Scam probe: Joginder Singh

“Tackle ‘big fish’ firmly and without fear”, PM Manmohan Singh said recently at a two-day conference to discuss the workings of the CBI. It openly reflects the gravity of state of affairs at agency and the uncalculated consequences of political interference in CBI’s workings.

Even the recent revelations in Aarushi murder probe are shocking and have raised doubts on the credentials of India’s premier investigation agency. There are many pending cases which emphasise the need to complete inquiries against those of doubtful integrity; and then there are those which were never ‘solved’ satisfactorily.

Devika Chhibber of Zeenews.com chatted up with former Director of CBI, Joginder Singh, popularly known as Joginder ‘Tiger’ Singh, seeking answers on the existing scenario and possible remedial measures.

Here are the excerpts:

Devika: ‘Evidence tampering’ is another twist in Aarushi murder case. What went wrong in the probe? Is CBI to be blamed?
Joginder Singh: Aarushi case was initially handled by the Noida police and all the mess which you can see today is because of them and the doctors’ negligence. CBI came into the picture very late, i.e. after 2-3 weeks. So, all the evidence was already tampered with and CBI could do nothing else except to pick up the leftovers to carry on the investigation. But the blame of tampering cannot be laid on CBI’s shoulders.

Devika: If CBI carries out all the investigations properly, then why is it that so many cases are still pending?
Singh: CBI can only investigate. What can it do if the witness denies everything in court which he has accepted in front of the police, and let me tell you that this happens all the time! There is no punishment for those who lie in front of court. What can we do? We are simply helpless in such situations.

Devika: So you are telling me that all the pending cases till date are the result of people backing out at the last moment. That’s what you call ‘lack of evidence’?
Singh: : I agree that in some cases, CBI is lacking, but most of the unsolved cases are because of insufficient evidences i.e. people backing out or due to government’s interference.

Devika: Can you please elaborate. What did you mean by government’s interference?
Singh: : In most of the cases, CBI has to deal with those who have strong political holds, and because CBI is not an autonomous body, the officers are unable to probe any further because it is the government that actually sanctions things. Moreover, only then we are allowed to probe. Without their permission we cannot probe to a degree that is required to go deep into the matter.

Devika: Did any such political pressure create impediments when you were the director?
Singh: : Yes, of course. I won’t call it political pressure, but yes, in cases relating to politicians, government did not give me permission and did try to restrict my moves. Even my transfer during my tenure was for the same reason.

Devika: Will you please share some such experience?
Singh: : I remember very clearly when I was investigating the fodder scam in which the prime suspect was the then Bihar CM Mr Lalu Prasad Yadav, I was forced to stall my probe against him. Why, because he was close to the then United Front government. I even remember that conversation where the-then PM Mr Inder Kumar Gujral tried to stop my investigation by showcasing his power. He actually told me that he was ‘the PM’ and so I should listen to him. He forced me to leave the Fodder Scam Investigation.

Devika: This shows that CBI does not work freely….
Singh: : As stated earlier, CBI is never an autonomous body. It is just an image which is portrayed, but actually the functioning inside is not that liberal. You must be aware that CBI came into existence in 1943 when the Special Establishment Act was formed, which was once renewed in 1946. But that does not make it legal. We are still following those age old norms. Nothing has been done to renew the Act and the body, I must say today, is in the declining state of health.

Devika: Thank you so much sir but just one last thing. Now that you are out of the system, so as an outsider, what’s your take on CBI and the possible measures?
Singh: : I think that CBI can only perform well when it is not bound to follow the government. For this, a proper bill needs to be passed in the assembly, making it an autonomous body, and experts should be kept to guide juniors. The control can be vested in the hands of constitution directly. Unless this is done, a positive and concrete outcome cannot be accepted.

Here is the link: http://www.zeenews.com/news562134.html

Thursday, September 10, 2009

....नही हो सकती राजशेखर जैसे नेता की भरपाई.......

आन्ध्र प्रदेश के करिश्माई नेता राजशेखर रेड्डी की मौत से सभी सकते में है.... इस बात की किसी को उम्मीद नही थी , आन्ध्र का यह लोकप्रिय नेता एक विमान दुर्घटना में मारा जाएगा... उनकी मौत के बाद आन्ध्र प्रदेश में नया नेता चुनने की प्रक्रिया शुरू हो गई है... राजनीती कितने घटिया स्तर पर पहुच चुकी है अगर इसकी बानगी आपको देखनी है तो बीते कुछ दिनों से आन्ध्र प्रदेश में जो हो रहा है वह यह बताने के लिए काफ़ी है... हमारे देश के नेता आज किसी तरह से कुर्सी पाना चाहते है... उनमे सब्र नाम की कोई चीज ही नही है... बीते दिनों आन्ध्र में जो कुछ हुआ वह इस घटिया स्तर को बताने के लिए काफ़ी है... जहाँ एक ओर राजकीय शोक चल रहा था वही दूसरी ओर आन्ध्र के नेता दस जनपद पर डोरे डालने में पीछे नही थे.... हद हो गई ... यार... राज्य के मुख्यमंत्री की विमान दुर्घटना में मौत हो गई और वहां के नेता नया मुख्यमंत्री चुनने की तैयारी करने लगे... इस वाकये ने दिखा दिया आज सभी नेता कुर्सी पाने के लिए लालायित रहते है...नए मुख्यमंत्री के लिए कई नाम इस समय कांग्रेस में चल रहे है... जहाँ राज्य के विधायको का एक तबका राजशेखर के बेटे जगन्नमोहन को सी ऍम बनाना चाहता है वही कुछ कांग्रेस के दस जनपद के करीबी मानते है इस समय किसी अनुभवी मंत्री को सी ऍम बनाने की जरुरत है... कांग्रेस में कुछ नेता यह भी मान रहे है अभी कुछ महीनो तक नए नेता के तौर पर किसी की ताजपोशी नही कीजानी चाहिए... जहाँ तक राजशेखर के बेटे का सवाल है तो वह इसी बार सांसद चुनकर आए है..... लिहाजा उनका दावा मजबूत नजर नही आ रहा ... सी ऍम की रेस में राज्य के वित्त मंत्री के रोशैय्या अभी भी आगे बने हुए है... उनका प्लस पॉइंट यह है राजशेखर के साथ उन्होंने लंबे समय से काम किया है साथ ही राजनीती के मैदान का भरपूर अनुभव उनको है.... वही राजशेखर के बेटे को अभी राजनीती की समझ नही है... ऐसे में उनके लिए मुश्किलें तेज हो सकती है ... हालाँकि १०० से ऊपर विधायको का समर्थन उनको उपलब्ध हो जाएगा... पर इस समय कांग्रेस की सबसे बड़ी दुविधा यह है अगर उन्होंने राजशेखर के बेटे का सी ऍम के रूप में आगे कर दिया तो विपक्षी एक बार फिर इस बात को लेकर मुखर हो जायेंगे , कांग्रेस में वंशवाद की अमरबेल फिर से विकसित रही है... अतः यह सब देखते हुए कांग्रेस को फूक फूक कर कदम रखने की जरुरत है...... नया सी ऍम कौन होगा इसकी चाभी सोनिया के पास रहेगी..... सोनिया को यह ध्यान रखना होगा नए नेता के तौर पर ऐसे व्यक्ति को आगे किया जाए जो सभी को साथ लेकर चल सके .... साथ ही पार्टी की गुटबाजी थम जाए...... यहाँ बताते चले राजशेखर जैसे नेता की कमी कांग्रेस को अब आन्ध्र में बहुत खलेगी..... क्युकि उन्होंने अपने काम करने के ढंग से सभी को कायल कर दिया था.... जनता के दरबार में राजशेखर की मजबूत पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की इस बार के लोक सभा चुनावो में उन्होंने ४२ में से ३३ सीट कांग्रेस को अपने दम पर जिताई थी...... साथ ही विधान सभा चुनाव में तेलगु देशम और प्रजा राज्यम जैसी पार्टियों को बेक फ़ुट पर ला दिया था... अब देखते है नए सी ऍम की कुर्सी पर सोनिया किसको बैठाती है ? हर्षवर्धन पाण्डे\प्रवीण परमार

Monday, September 7, 2009

राजे का हठ

पार्टी हाईकमान के निर्देशों को जिस तरह से वसुंधरा राजे अनदेखा कर रही है उससे भाजपा की संरचनात्मक कमिया व दुर्बलता सामने आई है। मानो पार्टी के विचार व पॉलिसी रुपी शिवधनुस को तोड़ते हुए शीर्ष नेताओ के निर्देश रुपी परुशराम को वो "इएहा कुम्हड़बतिया कूऊ नाही "वाली बात कह रही हो और साबित कर रही हो की राजस्थान में भाजपा की पुरी जिम्मेदारी को अकेले केन्द्रीय रूप में रहकर करना चाहती है। अर्थात हनुमान के निष्कासन के बाद लक्ष्मण के हठ से भी भाजपा को निपटना होगा ।

Sunday, September 6, 2009

दोस्तों बहुत दिनों तक ब्लाग कि दुनिया से दूर रहा khandarbar.blogspot.com इस हेतु अपने शुभेच्छु मित्रों से क्षमा चाहता हूं...अब एक बार फिर आप और हम मुखातिब होंगे ...

Saturday, September 5, 2009

शिक्षक दिवस पर मुझे याद आता है

हम लोग उन दिनों मुंबई,गोवा और पूना के एजुकेशनल टूर पे जा रहे थे। संजीव गुप्ता जी के इनकार और अलोक चटर्जी पर बात न बनने के बाद टूर हमारे बाबा श्रीकांत सिंह सर के साथ जाने की बात तय हुई। श्रीकांत सर की छवि एक सख्त अनुशासक और एक परम्परानिष्ठ व्यक्ति की थी, इसलिए मुझे ही नही कईयों का मन शंकाग्रस्त था की कहीं एजुकेशनल टूर जिसमे की डिपार्टमेंट के ३५ क्षात्र पूर्ण रूपेण मस्ती के लिए जा रहे हैं और वो भी गोवा पूना और मुंबई जैसे शहर वहां श्रीकांत सर का सख्त रवैय्या कहीं अवरोध तो नही बनेगा। या कहीं क्षात्रों द्वारा उनके प्रतिवाद की स्थति तो नही बनेगी । लेकिन टूर के दस दिन मंज़र बिल्कुल अलग था। श्रीकांत सर के साथ होने के कारण जब रेल में हम सब केवल पढ़ाई और औपचारिक बातें कर रहे थे तो उन्होंने लगभग डांटने के अंदाज़ में सौरभ मिश्र से कहा की अरे यहाँ भी पढ़ाई लिखाई लाद लाये। कुछ गाना वाना गाओ पंडित जी। वो एक आश्चर्यजनक खुशी थी। उसके बाद तो गाने का दौर रेलों,ठेलो,बसों, जहाजो सब जगह चला। टूर ओपरटर आलोक को भी सर ने एक दम स्टुडेंट बना दिया। उसकी हर बात पे पड़ती डाट पर हम बड़े खुश होते थे। वो भी ओपेरटर न लग कर कोई क्षत्र ही लग रहा था। हर बात पूछ-२ कर। कितनी ही बार श्रीकांत सर ने बजट से बाहर होकर हमें मन का खाना खिलाया। हम्मे से जो साथी जैसे अंकुर, सौरभ और गुलशन बाहर नही खाते थे उनके लिए लग से इंतजाम। और जब मुंबई में कमरों की व्यवस्था ठीक नही थी तो होटल वाले और ओपरटर दोनों से लड़ाई और चढाई । यहाँ पर उन्हें बिल की दिक्कत के चलते आर्थिक नुक्सान भी हुआ जो उन्होंने किसी को नही बाताया। मुंबई में वो जिस तरह से एक एक कमरे में जाकर सब्जी, रोटी, चम्मच, चद्दर के बारे में पूछरहे थे मैं चमत्कृत था। खाना वाना निपटने के बाद मैं अपने दूरस्थ कमरों वाले अपने साथियों जैसे सौरभ जैन , अंकुर, आदि से मिलने जा रहा था तो उसी कोरिडोर में एक कमरे में श्रीकांत सर और शचीन्द्र भैय्या भी थे। सर का मुझे बुलाने का अंदाज़ देखिये- "अरे पंडित जी थोडी घास हमको भी दाल दीजिये" ये एक व्यंग्य था क्यूंकि सर को लगा और ठीक ही लगा की मैं लड़कियों से बतियाने जा रहा हूँ। उसके बाद मैं सुबह तक सर के साथ उसी कमरे में था और तमाम बातें हुई। जैसे मैंने कई लेक्चर इकट्ठे कर लिए हों। सर ने एक और व्यंग्य किया था की मुझसे शास्त्रार्थ करो ! और उसके बाद तुलसी दास और बच्चन पर जो विमर्श हुआ वो एक समय शास्त्रार्थ ही था। सर ने सभी के बारे में व्यक्तिगत मत बताया और कहा की जितने खुश मान बाप होते हैं बच्चों की उन्नति पर उससे ज्यादा टीचर होते हैं। जब मैंने उनके सिद्धांतवादी होने पर लगभग प्रश्न उठा दिया तो उन्होंने स्वयं मुझसे कहा की कोई भी सिध्धांत मानव से बड़ा नही है और धर्मशास्त्र में आपद धरम की अवधारणा बताई। इसके बाद उन्होंने मुझसे मेरे साथियों के बारे में राय पूछी और ये सिलसिला उनके मुह से एक पंक्ति निकलने के बाद ही थमा-

मत सराहिये मत सराहिये निन्दना पड़ेगा
मत निंदिये मत निंदिये सराहना पड़ेगा

श्रीकांत सर शिक्षक दिवस पर आपको नमन

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