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Friday, December 31, 2010

नए साल पर एक कविता...

गया और नया साल

हो कल की जैसे बात,
या कि नींद भरी रात,
किसी अपने की बारात,
बिना लड़े कोई मात।
शायद ऐसे गया, गया साल।।

आये नींद सुनकर गीत,
किसी बेदर्दी की प्रीत,
या कि चुटकी का संगीत,
वर्तमान सा अतीत।
शायद ऐसा ही था वो गया साल।।

चाहे जैसा भी था वो गया साल,
इस बात का किसे है मलाल,
वक़्त आया बनके फिर से द्वारपाल,
आओ सोचें कैसा होगा नया साल?
ज़रा करके देखें खुद से ये सवाल।।

जैसे शादी का हो पत्र,
मिले वर्षों बाद मित्र,
या पुराना कोई इत्र,
कोई ख़बर हो विचित्र।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे ग़ज़ल इक हसीन,
कोई सफ़र बेहतरीन,
जैसे दर्द हो महीन,
जैसे साफ हो ज़मीन।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।

जैसे घुँघेरू वाली पायल,
या हो जाये कोई क़ायल,
जैसे शेरनी हो घायल,
या कि 'मम्मी जी' का आँचल।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे कामगार का पसीना,
बिन श्रृंगार के हसीना,
कोई चुटकुला कमीना,
या फिर मार्च का महीना।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे साफ-स्वच्छ दर्पण,
या धुला हुआ बर्तन,
पतिव्रता का समर्पण,
या व्यक्तित्व का आकर्षण।
शायद ऐसा हो वो नया साल।

ये सब थे मान्यवर, मेरे ही उद्‌गार।
कैसा हो नव वर्ष ये, आप ही करें विचार।।
आप ही करें विचार हमें बस इतना कहना।
नया साल मंगलमय हो, प्रतिदिन और रैना।।

आइए कुछ ऐसा करें।


अक्सर पुराने साल में जो नहीं कर पाए उसकी शिकायत और नए साल के संकल्प। शायद यही तो है, थर्टी फस्र्ट। लेकिन मुझे लगता है, ऐसा कुछ भी नहीं है। मेरे लिए 2010 वेरी प्रॉसपेरस रहा। हर कदम पर एक नया अनुभव और मेरी यूएसपी सकारात्मकता में बेइमतहां इजाफा हुआ है। 2010 से मुझे न कोई शिकायत रही न रहा कोई गिला। नए साल के लिए कुछ प्लानिंग होनी चाहिेए। लेकिन इस तरफ कुछ करने की योजनाएं हैं। दोस्तों इस साल इस बात पर ध्यान दिया जाएगा कि हम सब मिलकर एक ऐसा ग्रुप बनाएं, जो सोशल स्टडी के साथ ही साथ सिस्टम की खामियों को दूर करने के लिए शोध करे और ऑल्टरनेटिव्स खोजे। आम लोगों की व्यवस्था। सियासी गंदगी को साफ करने के लिए की जाने वाली व्यवस्था के लिए किसी और को छोड़ दें। बाकी के लिए हम रहें. यानी वेरी प्रैक्टिकल सॉल्यूशन। इनमें हमें भारतीय चुनाव प्रणाली से घृणा करने की बजाए एक वैकल्पिक इससे अच्छी व्यवस्था देने की तरफ ध्यान देना है। इस सिलसिले में जल्द ही हम कुछ चुनिंदा लोग मिलकर इस तरह का प्रयास करने जा रहे हैं, जिसमें सारी बातें बहुत ही औपचारिक और कार्यरूप में परिणित होने वाली की जाएंगी। यह पूरी तरह से वर्चुअल वेबसाइट होगी। इसके सदस्यों को हर विषय पर बोलने का हक और उसपर काम करने का आजादी होगी। दोस्तों मुझे भरोसा है इस काम में आपको मजा भी आएगा और अपने अंदर की बात को कार्यरूप में परिणित होते देखकर खुशी भी होगी। हमारा मकसद होगा सिर्फ और सिर्फ प्रैक्टिकल बाते करना और उन्हें कैसे भी करके इंप्लीमेंट करवाना। इस काम में मेरे सीनियर (प्रोफेशनली और एकडेमिक) प्रसून जी का विशेष योगदान मिलने की आशा है। साथ में मेरे अभिन्न रोहित मिश्र की वैचारिक संपदा का हमें सदैव सहयोग मिलेगा। इसकी शुरुआत भले ही यूनिवर्सिटी के पूर्व और वर्तमान छात्रों के संगठन के रूप मे की जाएगी, लेकिन यह वास्तव में देश के हर युवा विचारवान व्यक्ति का अपना मंच होगा।
भाइयों इस विचार के साथ कि जरूर हम इसे वास्तु रूप में बदल पाएंगे। इस विषयक जनवरी में पूरी तैयारी करने और मार्च तक विधिवत लॉन्च करने की तैयारी है। आगे तो फिर मेरी उम्र रही तो जरूर कुछ करेंगे। आपके वैचारिक, निर्देशात्मक और सुझावात्मक सहयोग की अपेक्षा है। इसे लेकर मेल करें या फोन करें या आप एसएमएस भी कर सकते हैं। ०९००९९८६१७९ इ-मेल sakhajee@gmail.com

बधाई

सभी साथियों को नव वर्ष २०११ की ढेरो शुभकामनाय ।
महेश सिंह
ईटीवी यूपी डेस्क, हैदराबाद।

Wednesday, December 8, 2010

अंजाम तक पहुंचाने वाली सीढ़ी।


भैया आज बड़ी कहानी लिखने का मन हुआ, अजी कोई साहित्यकारों की तरह नहीं बल्कि शानदार कुछ कुछ सच्चा, कुछ ऐसा जो करीब हो किसी सच के। कहानी के फ्लैश बैक में ले जाने से पहले में मिथुन की फिल्मों जैसी सीन क्रिएट करना जरूरी मानता हूं। दरअसल कहानी में कुछ खास तो नहीं है, लेकिन प्रेरणा लेने लायक जरूर है। आपको अगर सोने से भरपूर खजाना मिल जाए, और उसके लिए आपको सिर्फ कहना हो कि खुल जा सिम सिम तो क्या आपको लगेगा नहीं कि यह तो जिंदगी है। वॉह करेंगे, या कहेंगे एन एक्सेलेंट या फिर कहेंगे जरूर मजा आ गया और आप तो यह भी कह सकते हैं, कि फैंटेस्टिक। लेकिन इसके ठीक उलट भी कुछ कहा जा सकता है। क्या कहते हैं यार आपका दिमाग भी खराब हो सकता है। अब यह पूछने की जरूरत कहां है कि कैसे होगा दिमाग खराब। दिमाग खराब भी कई तरीकों से होता है, पूछिए मत कैसे?
कार्यालय में एक जूनियर रिपोर्टर ने कहा भैया फलां खबर लगा लेना, क्योंकि वो उनकी है। यह बात तो ठीक थी खबर लगा लेना लेकिन उनकी विश्लेषण जरा सोचने वाला था। क्या? देखो भैया आगे पढऩे से पहले यह जान लो हम आखिरी तक कोई नाम नहीं बताएंगे, कौन है उनकी न खबर की हेडिंग ही बताने वाले हैं। चले यहां तक पढ़ा है तो आगे की कुछ लाइनें और पढ़ ही लो। क्या हुआ उनकी खबर तो लगा दी लेकिन दिल में बड़ी इच्छा हुई कि क्यों न उनसे हमारी भी किसी इसी तरह की खबर के सिलसिले में मुलाकात या यूं कहिए मुकालात हो जाए।
कहानी शुरू होती है, पुराने हमारे संस्थान से यहां पर भी उनकी उनकी की बहुत चलता था। हर बार कोई न कोई उनकी कह कर कुछ न कुछ उंगली किया करता था। वे हैं तो साधारण से राज्य की सिविल सेवा के मुलाजिम। लेकिन आधे से ज्यादा छत्तीसगढ़ को उनके बारे में यही गलतफहमी है कि वे आईएएस हैं। दरअसल उन्होंने ऐसा आभामंडल अपने पास रखा है, जो साफतौर से उनके सामने पूरे राज्य की सरकार और ब्यूरोक्रेट्स को झुका सा दिखाई देता है। साहब की धर्म मैं श्योर नहीं हूं, कि धर्म लेकिन कहा धर्मपत्नी आती थीं, थीं तो हमारी ही तरह की मुलाजिम वो भी। लेकिन उनके अपने जलवे थे। आती थीं, सीधे स्टूडियो में मेकअप आर्टिस्ट जाकर मेकअप करती थी, चार गाड़ीवान आगे पीछे, पूरा स्टाफ, ऑउटपुट हेड तो अपने कद से भी ऊपर उठकर उनके लिए बड़प्प दिखाते थे। वहां तो खैर कुछ था ही नहीं पता कि वे क्या हैं, और उन्हें इनता स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों मिलता है। भैया धान ने जब पूरे राज्य के अधिकारियों और क्षेत्र के कर्मठ जुझारुओं को धन से भरपूर कर दिया तो मामला मीडिया ने उठाने की जेहमत उठाई। तो क्या था फिर वही हुआ जो होता था, क्या मैडम नहीं आती, मुख्यमंत्री ने रोश में आ गए। तब मामला समझ आया कि मैडम दरअसल ऐसे ही आम आदमी की वाइफ हैं, जो आम की खोल में खाम ठोक कर राज्यभर की असली सियासत चलाता है। ऐसा कौन सा पावर प्लांट है, कौन सा ऐसा काम है राज्य में जिसकी रिश्वत सीढ़ी इनसे शुरू न होती है। अब जब नए ऑफिस में आए तो फिर वही हाल देखा। हां लेकिन इस बार उनके साथ किसी पॉवर प्लांट की ठसक नहीं थी, बल्कि एक, दो कॉलम की खबरों में भी अपनी ब्रॉड इमेज थी। रिपोर्टर बोला भैया उनका फोन आया था बोले कि मुझसे मिलोगे तो जान जाओगो कौन हूं। वो डरा तो नहीं था, लेकिन कुछ कुछ सहमा था, क्योंकि वो पत्रकार बनने आया था और उसे पता ही नहीं था कि यह भी एक पत्र का ही हिस्सा है।
रिश्वत की पहली यह सीढ़ी हैं उनकी साहब।
कहानी में पात्रों के नाम, स्थान, समय, घटनाएं सजीव नहीं हैं। कृपया अपने आसपास नजर दौड़ाएं वास्तव में पाएंगे कुछ ऐसे ही लोग। आपको सफोकेशन नहीं होता दम नहीं घुटता। बड़ी तमन्ना है एक बार किसी खबर के सिलसिले में उनसे मुठभेड़ हो। हो सकता है, उन्हें मैं ज्यादा नहीं जानता सुना ही है इसलिए ऐसा सोचते हैं। वास्तव में वह बहुत सज्जन हों। बहरहाल इतना पक्का है वे हैं छत्तीसगढ़ में कोई भी एक करोड़ की रिश्वत से ऊपर का काम करवाने वाली पहली, दूसरी, तीसरी और अंजाम तक पहुंचाने वाली सीढ़ी।
तेरी तो...... रिश्वत की सीढ़ी
आओ भैया कुछ कहो sakhajee@gmail.com
९००९९८६१७९

Saturday, December 4, 2010

राजदीप की बेचारगी....

मीडिया इंडस्ट्री में सबसे कमजोर, लाचार और निरीह कोई है,

तो वो हैं राजदीप सरदेसाई। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि सैलरी, शख्सीयत और शोहरत के लिहाज से जिस टेलीविजन पत्रकार को सबसे मजबूत माना जाता है, जिनकी लोगों के बीच इसी तरह की इमेज है, वो अपने को पिछले एक साल से सबसे मजबूर और लाचार बताता आ रहा है। मौका चाहे जगह-जगह मीडिया सेमिनार के नाम पर स्यापा करने और छाती कूटने का हो या फिर 2G स्पेक्ट्रम घोटाला मामले में दिग्गज मीडियाकर्मियों के नाम आने पर मीडिया की साख मिट्टी में मिल जाने पर सफाई के मकड़जाल बुनने का, राजदीप सरदेसाई सीधे तौर पर मानते हैं कि अब एडिटर मजबूर है। यह भी कि मीडिया के भीतर जिस तरह के ऑनरशिप का मॉडल बना है, उसमें एडिटर बहुत कुछ करने की स्थिति में नहीं है।

मैं उनके श्रीमुख से मालिकों के आगे एडिटर के मजबूर हो जाने की बात पिछले छह महीने में चार बार सुन चुका हूं। उदयन शर्मा की

याद में पहली बार कंस्‍टीच्‍यूशन क्लब में सुना, तो एकबारगी तो उनकी इस ईमानदारी पर फिदा हो गया। लगा कि इस शख्स को इस बात का मलाल है कि जैसे-जैसे गाड़ी और फ्लैट की लंबाई बढ़ती जाती है, पत्रकार होने का कद छोटा होता जाता है। फिर दूसरी बार सुना तो लगा कि आजकल फैशन में इसे चालू मुहावरे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं कि अपनी ही पीठ पर आप ही कोड़े मारो ताकि लोग ईमानदारी पर लट्टू हो जाएं। लेकिन सवाल है कि इस स्वीकार के बाद राजदीप सरदेसाई या फिर उनके जैसा कोई भी पत्रकार सुधार की दिशा में क्या कर रहा है। जवाब है, कुछ भी नहीं। तो यकीन मानिए कि आज जब राडिया और मीडिया प्रकरण पर प्रेस क्लब में हुई एडिटर्स गिल्ड की बैठक की फुटेज में राजदीप सरदेसाई को बोलते हुए एक बार फिर सुना तो लगा कि बेहया हो जाना आज के जमाने की सबसे खूबसूरत और कारगार शैली है। इसी बीच जब IBN7 चैनल पर एक बार फिर आशुतोष के सवालों के जवाब देते उन्‍हें सुना तो लगा कि राजदीप सरदेसाई ने मीडिया पर गंभीरता से सोचना-समझना पूरी तरह बंद कर दिया है और इस बंद कर देने में अपने नाम के दम पर यकीन रखते हैं कि वो जैसे चाहें, मीडिया के प्रति लोगों की समझ को ड्राइव कर ले जाएंगे।

आप याद कीजिए, ये आज के वही मजबूर राजदीप सरदेसाई हैं, जिन्होंने नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर हुए टॉक शो में लगभग दहाड़ते हुए कहा था कि हमें सरकार से कोई लेना-देना नहीं है जिसका समर्थन कांग्रेस के मुखौटा पत्रकार और मौजूदा नयी दुनिया के संपादक आलोक मेहता ने यह कहकर दिया कि टेलीविजन का मतलब सिर्फ खबर और राजनीतिक खबर नहीं है। भला हो दूरदर्शन का कि अपने 50 साल को याद करते हुए जब “The Golden Trail, DD@50 :Special feature o Golden Jubilee of Doordarshan” नाम से आधे घंटे का फीचर बनाया, तो इस बातचीत को शामिल किया। राजदीप सरदेसाई ने निजी मीडिया की मार्केटिंग इसी तरह से की और निजी चैनलों को दूरदर्शन के विपक्ष के तौर पर खड़ा करने की कोशिश की। इसकी ताकत को इसी रूप में भुनाने की कोशिश की कि वो सरकार से पूरी तरह मुक्त है और दूरदर्शन से अलग सबसे मजबूत और स्वतंत्र माध्यम है। आज वही राजदीप सरदेसाई, जिन्हें कि सरकार से कुछ भी लेना-देना नहीं था, पूरी तरह आजाद थे, कॉरपोरेट की गोद में गिरते हैं और बनावटी तौर पर ही सही, बिलबिलाने और मजबूर होने का नाटक करते हैं। निष्कर्ष ये है कि न तब मीडिया आजाद और मुक्त था और न आज है। तब उसे सरकार ने अपना भोंपू बनाया और आज ये कॉरपोरेट का दुमछल्लो बना हुआ है।

राजदीप सरदेसाई बहुत ही खूबसूरती से ये बात मानते हैं कि 2G स्पेक्ट्रम घोटाला और नीरा राडिया के मामले में मीडिया के कुछ लोगों ने लक्ष्मण रेखा तोड़ी है। उन्होंने पत्रकार के तौर पर वो किया है, जो कि उन्हें नहीं करना चाहिए। लेकिन इसके आगे जो वो कहते हैं, वो वही एजेंडा है जो कि सबसे पहले 30 नवंबर को NDTV 24X7 का बरखा दत्त के जरिये अपना पक्ष रखने की बात के दौरान का एजेंडा था। राजदीप का कहना है कि हालांकि जो कुछ भी हुआ है, उसमें मीडिया पर उंगलियां उठ रही हैं लेकिन ये पूरे खेल का बहुत ही छोटा हिस्सा है। बड़ा हिस्सा है कि कैसे कॉरपोरेट चीजों को अपने तरीके से बदलना चाहता है। हम सब उसमें बंधे हैं। फिर वो मीडिया के खर्चे, स्‍पांसरशिप और मॉडल पर बात करते हैं, जिसका निष्कर्ष ये है कि हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। यहीं पर आकर एडिटर सबसे लाचार हो जाता है। आज चैनल के रिपोर्टर्स पर अगर प्रेशर है, तो वो इसलिए कि वो चाहकर भी मुस्तैदी से अपने तरीके से स्टैंड नहीं ले सकता। नहले पर दहला आज आशुतोष के भीतर पीपली लाइव के संवाददाता दीपक की आत्मा घुस आती है और ताल ठोंककर कहते हैं कि ये भी तो देखिए कि आज इसी मीडिया ने ए राजा और स्पेक्ट्रम घोटाला की बातें आप तक पहुंचाने का काम किया।

थोड़ी गंभीरता से विचार करें तो एक ही मीडिया हाउस का एक एडिटर कह रहा है कि वो कॉरपोरेट के आगे मजबूर है लेकिन उसी मीडिया हाउस के एक चैनल का मैनेजिंग एडिटर कह रहा है कि इस मजबूरी में भी वो तीर मार लेने का काम कर ले रहा, ये क्या कम है? राडिया और मीडिया को लेकर आज तक न्यूज चैनलों पर इसी तरह के कर्मकांड जारी हैं और शुरू में बरखा दत्त ने 30 नवंबर को जब अपनी बात हमसे साझा करने की कोशिश की तो लगा कि वो सचमुच हमारी गलतफहमियों को दूर करना चाहती है लेकिन अब एक के बा

द एक चैनल जिस तरह से तुम मेरी खुजाओ, मैं तुम्हारी खुजाऊं का काम कर रहे हैं, साफ लग रहा है कि एक नये किस्म की लाबिंग कर रहे हैं, जिसमें इरादा है कि सब झाड़कर खड़े हो जाओ और साबित कर दो कि या तो हमाम में सब नंगे हैं या फिर हम बेदाग हैं। आप बस अपने को बेदाग साबित करने की इस जुगलबंदी पर गौर कीजिए, आपको मीडिया बेशर्मी के इस नये अध्याय से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

3 दिसंबर 2010 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में 11 बजे एडिटर्स गिल्ड की आम पत्रकारों से राडिया और मीडिया को लेकर बातचीत हुई। विनोद मेहता ने कहा कि हमें अलग से एथिक्स की बात करने और नियम की चर्चा करने की क्या जरूरत है, सब कुछ साफ है कि एक पत्रकार को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। पीआरओ अगर अपने एजेंडे के साथ आ रहा है, तो हमें किस तरह से समझना है। प्रसार भारती बोर्ड की अध्यक्ष मृणाल पांडे जिन्होंने पिछले दिनों एफएम गोल्ड मामले में द हिंदू अखबार से कहा था कि फ्रीक्वेंसी बदले जाने की बात उन्हें किसी ने नहीं बतायी और ये बात उन्हें मीडिया के जरिये पता चली, उन्‍हीं मृणाल पांडे ने इस एडिटर्स गिल्ड और पत्रकारों की

बातचीत में कहा कि आज दरअसल अंग्रेजी मीडिया के एडिटर मालिक हो गये हैं और हिंदी मीडिया के मालिक एडिटर हो गये हैं।

इतने दिनों से चुप रहने के बाद जब NDTV 24X7 ने बरखा दत्त पर लगे आरोप को लेकर एडिटर्स के साथ शो कराया, तो फिर हेडलाइंस टुडे ने भी इसी तरह के शो कराये। उसके बाद तो समझिए कि इन दिनों चैनलों पर एक एक पैटर्न ही बन गया है कि मीडिया को लेकर स्पेशल स्टोरी की जाए। लिहाजा तीन दिसंबर की अधिकांश फुटेज और ओपन और आउटलुक पत्रिका की स्टिल फोटो का इस्तेमाल करते हुए आजतक ने प्राइम टाइम पर स्पेशल स्टोरी चलायी – “मीडिया की लक्ष्मण रेखा। चैनल ने इस स्टोरी के जरिये ये साबित करने की कोशिश की कि मीडिया को लेकर जो कुछ भी कहा जा रहा है, वो दरअसल कुछ लोगों के इसके एथिक्स के फॉलो नहीं किये जाने की वजह से हुआ है, नहीं तो मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी बहुत ही ईमानदारी से निभायी है, चाहे वो 2G स्पेक्ट्रम घोटाला मामला ही क्यों न हो।

इससे ठीक पहले IBN7 पर आशुतोष ने एजेंडा कार्यक्रम में मीडिया ट्रायल पर शो किया, जिसमें कि श्रवण गर्ग(समूह संपादक, दैनिक भास्कर), एनके सिंह (अध्‍यक्ष, एनबीए) और राजदीप सरदेसाई (अध्‍यक्ष, एडिटर्स गिल्‍ड / एडिटर इन चीफ, सीएनएन आईबीएन) को बहस के लिए शामिल किया। इस पूरी बातचीत में करीब 30 फीसदी आशुतोष बोले, 40 फीसदी राजदीप और बाकी तीस फीसदी में दोनों अतिथि पत्रकारों को निबटा दिया गया। आशुतोष के भीतर आज नब्बे के दशक के पत्रकारों की सिम लगी थी। लिहाजा जिस तरह के सवाल उन्‍होंने किये, वो सारे सवाल एक टेलीविजन ऑडिएंस के मन में स्वाभाविक तौर पर उठनेवाले सवाल हैं। आशुतोष ने राजदीप सरदेसाई से साफ तौर पर पूछा कि मीडिया किसी भी तरह का फैसला आने के पहले ही अपनी तरफ से फैसला नहीं दे देता है क्या, उसकी इमेज को, उसके करियर को पूरी तरह खत्म नहीं कर देता क्‍या? ए राजा के मामले में भी मीडिया ने खुद वही किया, तो फिर मीडिया अपने मामले में ऐसा होने पर क्यों परेशान है? इस पर राजदीप सरदेसाई ने कहा कि जब तक आरोप दाखिल नहीं हो जाते, मीडिया ऐसा नहीं करता। हम सुनते हुए साफ तौर पर महसूस कर रहे थे कि वो बचाव करने की मुद्रा में बात कर रहे हैं। कल ही हमने स्टार न्यूज पर सेक्स का सॉफ्टवेयरस्टोरी देखी, जिसमें चैनल ने मॉडल भैरवी के लड़की सप्लाय के धंधे में होने की बात की और कहा कि हालांकि बातचीत का टेप अभी सीबीआई के पास भेजा गया है कि ये उनकी और उसके पति विनीत कुमार की आवाज है या नहीं। लेकिन आधे घंटे की स्टोरी में चैनल ने कहा कि बिना किसी बिजनेस बैकग्राउंड के वो शेयर की कंपनी की सीईओ कैसे बन सकती है और लगभग साबित कर दिया कि भैरवी ने वही सब किया है, जिस बात के आरोप लगे हैं।

इसलिए राजदीप सरदेसाई हों या फिर कोई और ये बात दावे के साथ नहीं कह सकते कि चैनल जो कुछ भी दिखाते हैं, उनकी सत्यता की जांच पूरी तरह कर ली जाती है। आज वो ओपन और आउटलुक के मामले में मीडिया एथिक्स की बात कर रहे हैं। क्या कभी सिस्टर चैनल IBN 7 ने आये दिन ऑनएयर दिखाये जाने वाले स्टिंग ऑपरेशन में शामिल लोगों को बताया कि वो उनके साथ क्या करने जा रहे हैं? घंटों यूट्यूब से फुटेज काटकर स्टोरी चलानेवाले चैनल, जिसमें कि वर्ल्ड न्यूज के नाम पर भी चीजें शामिल होती हैं, कभी उस आवारा वीडियो की ऑथेंटिसिटी पर बात की?

श्रवण गर्ग ने साफ तौर पर कहा कि मीडिया इंडस्ट्री के भीतर बहुत सारे पत्रकार दलाली और लॉबिइंग के काम में लगे हैं, ये अलग बात है कि सबके सब वैसे नहीं है। मुझे आशुतोष के सवाल पर हंसी आयी कि वो पूछते हैं कि ऐसे कितने पत्रकार हैं? जैसे श्रवण गर्ग दलाल पत्रकारों की जनगणना में लगे हों। इतना होने पर भी श्रवण गर्ग को आज के मीडिया में उम्मीद दिखाई देती है। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सब कुछ पूरी तरह खत्म हो गया है। उनकी इस बात को मजबूती देते हुए एनके सिंह ने कहा कि अच्छे पत्रकार आज की पत्रकारिता को नयी दिशा दे सकते हैं, जिस पर कि आशुतोष ने संतोष जताते हुए कहा कि आज जबकि पिछले छह महीने में मीडिया ने बड़े-बड़े खुलासे किये लेकिन खुद संकट के दौर में आ गयालेकिन मानना होगा कि इसी मीडिया ने 2G स्पेक्ट्रम घोटाले का पर्दाफाश किया। बातचीत करण जौहर और यश चोपड़ा की हैप्पी एंडिंग सिनेमा की तरह खत्म हो जाती है।

2G स्पेक्ट्रम घोटाला और मीडिया को लेकर न्यूज चैनलों पर जितने भी शो चले, सबके सब इसी तरह कुछ कमेटी गठित करने, आदर्श बघारने और सेल्फ जजमेंट जैसे फफूंदी लगे शब्दों की रिपीटेशन के साथ खत्म हो जाते हैं। नतीजा कुछ भी निकलकर नहीं आता है। उल्टे ऑडिएंस को गहरी साजिश का एहसास होता है कि पूरे मामले को पूरी तरह सॉफ्ट किया जा रहा है। अब बताइए कि जो मीडिया किसी का नाम भर आ जाने से उसका पूरा जीवन, करियर, परिवार, सोशल लाइफ सबकुछ लील जाता है, श्रवण गर्ग जैसे दमदार माने जानेवाले पत्रकार कहते हैं कि तो क्या इन पत्रकारों को नौकरी छोड़ देनी चाहिए, करियर छोड़ देना चाहिए? अर्थात नहीं। गर्ग साहब! तो क्या इन पत्रकारों को थाने में अठन्नी जमाकर करके सिर्फ सॉरी बोल लेना चाहिए कि मैंने एरर ऑफ जजमेंट का काम किया है, आगे से नहीं करुंगा?

मैंने पहले भी कहा था और अब भी कहता हूं कि जिस नैतिकता की बात राजदीप सरदेसाई से लेकर एमजे अकबर, श्रवण गर्ग और बाकी के पत्रकार बघार रहे हैं, उस नैतिकता में जब तक वो पूरी तरह पाक-साफ करार नहीं दे दिये जाते, उन्हें कहानी-कविता-चुटकुले के बीच अपना समय बिताना चाहिए। किसी से सवाल करने का न तो उन्‍हें हक है और न ही किसी को उनका जवाब देने की अनिवार्यता। उन्हें समझना चाहिए कि उन्होंने सोशली अपना एक बहुत बड़ा अधिकार खो दिया है। इस तरह की नैतिकता की बात करके हमारे ये महान मीडियाकर्मी जिस तरह से पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए बेचैन हो रहे हैं, उसमें ये भी चिंता शामिल है कि अभी दो मामला दो-तीन पत्रकारों के नाम भर आने का है, आये दिन लाबिइंग और दलाली के बीच होनेवाली पत्रकारिता की शक्ल उघड़कर सामने आ जाएगी तो क्या होगा? हमें ये लोग जो मीडिया को कॉरपोरेट से अलग बता रहे हैं, आज मीडिया खुद कॉरपोरेट है। कॉरपोरेट का पक्ष लेते हुए वो एक तरह से अपना ही पक्ष ले रहे होते हैं। इस मामले में तीन दिसंबर 2010 को पी साईनाथ का दि हिंदू में लिखा लेख THE REPUBLIC ON A BANANA PEEL पढ़ा जाना चाहिए। कुल मिलाकर मेरी अपनी समझ है कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जैसी गभग अब फर्जी हो चली बात को छोड़कर मीडिया एथिक्स के बजाय मीडिया बिजनेस एथिक्स की बात करनी चाहिए और हमें एक रीडर और ऑडिएंस के बजाय एक कनज्‍यूमर के तौर पर ईमानदारी से प्रोडक्ट मुहैया कराना चाहिए।

(विनीत कुमार - दिल्ली विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन के शोधार्थी, टीवी और रेडियो की वर्तमान प्रवृत्ति पर सतत लेखन, मीडियाकर्मियों से मालिकों तक के बीच अपने धारदार ौर विश्लेषणपरक लेखन के लिए जाने और माने जाते हैं। एक उम्दा वक्ता और एक अच्छे श्रोता के साथ मित्र भी।)

Wednesday, December 1, 2010

क्योंकि वो लोग बड़े उंगलीबाज होते हैं।


खुलासों और खुल्लमखुल्ला का दौर है, भैया ने कहा था, जो करो वो करो और उसका समर्थन इसलिए मत करो क्योंकि आपने किया है, बल्कि इसलिए करो ्कयोंकि आपके मन ने कहा वो सही है। विकीलीक्स के खुलासे और बिग बॉस में पॉमेला के कपड़े सबकुछ ऊपर दोनों लाइनों से ही उपजा है। भैया ने यह भी कहा था, बेटा शहर के लोग तेजी से बढ़ रहे हैं, थोड़ा अपने आसपास के लोगों की उंगलियां भा थामने की कोशिश करना। क्योंकि वो लोग बड़े उंगलीबाज होते हैं। विकीलीक्स ने खुलासा किया, अरे या यूं कहिए कुछ कही हुई बात को कहा, कुछ सुनी हुई घटनाओं को कंप्यूटर के माथे पर चिपकाया है। लेकिन मुझे इस बात की बड़ी खुशी हुई कि अबतक छुपकर लादेन, जैश ए मुहम्मद, ही अफगानी यानी पाकिस्तानी पहाडिय़ों से दुनिया को ललकारते थे, चंबल के बीहड़ों में छुपकर डाकू अमीरों को धमकाते थे, सत्यम के जंगलों से लंबी, घनी, काली मूंछों वाले दुनियाभर के लोगों को चंदन लगाते थे, सचमुच के शेर को नोंच कर उसकी खाल संसार में बेंचते थे। छत्तीसगढ़, प.बंगाल के हरियर को सिस्टम बदलने की तपोभूमि बनाते थे। सबके सब निगेटिव एफट्र्स लगा रहे है और निगेटिव नतीजे चाहते हैं। मगर पहली बार कोई ऐसा भी है, जो छुपकर कहीं से अपना सबसे बड़ा पॉजिटिव नेटवर्क चला रहा है। वो है विकीलीक्स। भैया ने कहा था ईमानदारी के लिए किए गए हरेक एफट्र्स स्वर्ग की ओर जाते हैं। हां लेकिन उन्होंने यह भी कहा था, कि भीख देने के लिए की गई चोरी ठीक नहीं है, क्योंकि भीख देना किसी संविधान की अनुसूची छठवीं के आर्टिकिल 345 क के च के अनुसार जरूरी है कहीं नहीं लिखा। संविधान और कानून की लंब-लंबी बतियां और इस तरह की पेचीदगियां भला किसी को समझ में आ सकती हैं। और फिर अगर जो समझ में आ गया और आपको पता चल गया तो आपको कोई अपराधी ही साबित नहीं कर पाएगा। भैया विकीलीक्स ने अच्छे काम के लिए ऐसा किया है, तो क्या अच्छा है। पहली बार कोई ऐसा नेटवर्क कम से कम मेरी जानकारी में तो पहली ही बार आया है, जो वाकई अच्छा काम कर रहा है। इसके मालिक को मानना पड़ेगा, उसे रॉबिन हुड कहें या फिर तथाकथित बुद्धिजीवियों की नजरों में नक्सली जो भी कहिए कह दीजिए। लेकिन प्लीज विकीलीक्स से कहिए अपनी सूचनाएं कमर्शियली बाउंड न ही करे। यहां एक बात का जिक्र करना बेहद जरूरी है, कि अखबार, टीवी, इंटरनेट इन्हें तब तक नहीं चलाया जा सकता जबतक कि विज्ञापन का भूसा न भरा जाए। तब यह सभी माध्यम कहां ईमानदार रह जाएंगे। आप सब तो समझदार हैं, मैं तो अपने आपको अपडेट करने के लिए ऐसा कह रहा था। अजी क्यों न कहें विचारों की अभिव्यक्ति का जो मामला है। जनाब कुछ दिनों से मीडिया के चालचलन पर कई किस्से कहानियां और बात बतंगियां बाजार में प्रचलन में हैं, उनमें कभी महंगाई की तरह हाई राइजिंग स्पीड आ जाती है, तो कभी शेयरों के सूचकांक बनकर नीचे लुढकते जाती हंैं। लेकिन विकीलीक्स ने नई राह दिखाई है। हां कम से कम उनके लिए तो है ही जो सियासत के जरिए हिताहित की बात तो करते हैं, लेकिन रोटी के चारों ओर ऐसे घूमते हैं, जैसे कोई चखरी हो। हां याद आया वो चखरी जो बच्चों को दीवाली के वक्त और बुजुर्गों को बच्चों के मैरिड होने के बाद याद आती है। वो चखरी जो बिटिया के बाप को बिटिया के पीले रंग से हाथ रंगने के वक्त याद आती है। वही चखरी जो गांधी जी ने घुमाई की सूत कत गया और उस सूत में सबके सब बंध गए, वही चखरी जिसे तिरंगे ने बीच में लगाकर चौबीसों घंटे जागते रहने की दलील दी है। वही चखरी तो है यहंा जो कभी मेले ठेले में घूमती थी और अम्मा पापा के दिए पैसों में अपने ऊपर बैठने नहीं देती थी, कहती थी इसमें बैठने के लिए तीन बार मेले का इंतजार करना होगा। चलोअच्छा हुआ कोई तो कहीं से अच्छे काम कर रहा है, विकीलीक्स को सलाम करते हैं, उसके साथ आम आदमी तो रहेगा, लेकिन पूरा सिस्टम समूह नहीं चलेगा। अमेरिका है, भैया ने कहा था अमीरों के चोचले होते हैं, वे कभी भी अपनी कुछ भी करतूत की दलील नहीं देते बल्कि उसे समाज में स्टेटस सिंबल के तौर पर परोस देते हैं, और हम और हमारा समाज अंधभक्त होकर स्वीकारता जाता है। भैया ने इस बार फिर कहा चलो कोई तो है जो भूमिगत किसी अच्छे कारण से हुआ है। हां लेकिन इस बार भैया ने यह सीधे सामने बैठकर नहीं कहा बल्कि मोबाइल पर समस करके कहा है, यानी अखबार, फिल्म, न्यूज चैनल्स, वेब जर्नलिज्म, नारदिज्म, मंथराइज्म, हुनमानिज्म आदि के बाद अब आ रहा है, ऐसा मीडिया जो पत्रकारों को जर्नलिस्ट, संपादक आदि के पारंपरिक तमगों और खोलों से बाहर निकालकर सीधा सच्चा भूमिगत भू-सुधारक वेबिस्ट बना देगा। जय हो विकीलीक्स।।।।।।।।
सादर आमंत्रित हैं, भैया चाहें तो अंग्रेजी में या हिंदी में मेल (पुरुष) कर सकते हैं। समस के लिए भी नंबर दे रहा हूं, आगे तो आपकी ही मर्जी चलेगी न, क्योंकि गोविंदा अंकल ने कहा है मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्जी। जी सर्जी।।।।.
वरुण के सखाजी, ०९००९९८६१७९.sakhajee@gmail.com

Wednesday, November 24, 2010

आत्महत्या, मौत की गुजारिश और मृत्यु महोत्सव



सांवरिया के घोर हादसे से उबरकर आखिर संजय लीला भंसाली अपने पुराने फार्म में लौट ही आये...मर्सी किलिंग की पृष्ठभूमि पर बेहतरीन सिनेमा का निर्माण कर जता दिया की जीनियस लड़खड़ा तो सकते हैं पर उन्हें चित नहीं किया जा सकता। मौत की गुजारिश करते एक अपंग सितारे जादुगर की कथा अंततः सिखा जाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों but life is good yar....

फिल्म देखते समय समझ नहीं आता कि मजबूरियां जिन्दगी पे हस रही हैं या जिन्दगी मौत को चिड़ा रही है...नायक को मोहब्बत है जिन्दगी से, लेकिन गुजारिश है मौत की...और इसी कारण ये मौत, महज मौत न होकर महोत्सव बन जाती है। मौत की ये गुजारिश आत्महत्या नहीं है क्योंकि नायक किसी से छुपकर जैसे-तैसे मरने का प्रयास नहीं करता, वो बाकायदा कोर्ट से मरने की इजाजत चाहता है। उसने अपनी इसी अपंग अवस्था में रहते हुए जज्बे के साथ जिन्दगी के १२ साल गुजारे हैं..और खूबसूरती से एक रेडियो चेनल का संचालन करते हुए कई अपाहिज, हताश लोगों के लिए प्रेरणा का काम किया है। उसका तो ये मानना है कि जिन्दगी चाहे कितनी भी क्यों न हो...वो १०० ग्राम हो या १०० पौंड, वो खूबसूरत ही होती है........

लेकिन अब उसमे और ताकत नहीं है कि इस घुटन को सह सके...और नाही उसके फिर से वापस पुरानी स्थिति में लौट सकने की उम्मीद है...इन हालातों के बीच अब जिन्दगी नहीं, मौत उसके लिए वरदान बन गयी है...और इसी वरदान को वो समाज और कानून से पाना चाहता है...कथानक का विकास कुछ इस तरह से किया गया है कि सिनेमाहाल में बैठा हर दर्शक इथन (हृतिक रोशन) के मौत की गुजारिश करने लगता है...

नायक की लड़ाई है समाज और हमारी संस्कृति द्वारा थोपी गयी उस अवधारणा से..जो हमें हर हाल में जिन्दा रहने की नसीहत देती है...फिल्म के एक दृश्य में नायक से कहा जाता है कि 'तुम्हे god के द्वारा दी गयी इस जिन्दगी से खेलने का कोई हक नहीं है'...जहाँ नायक का प्रत्युत्तर में कहना कि 'god को हमारी जिन्दगी से खेलने का हक किसने दिया'। समाज की सहानुभूतियाँ नायक के दर्द को न तो कम कर सकती हैं न ही महसूस कर सकती..उसकी जिन्दगी और उसका दर्द उसका अपना है...समाज उसे मजबूरन जीने के लिए विवश नहीं कर सकती...नायक शरीर से अपाहिज होने के चलते मौत की गुजारिश कर रहा है, वो हौसलों से अपाहिज नहीं है...दुनिया के अधिकतर आत्महत्या करने वालों के हौसले अपंग होते हैं...ये मौत की गुजारिश आत्महत्या नहीं है।

भारतीय दर्शन में भी कई जगह इस तरह की मौत के प्रावधान हैं..जैनधर्म में तो विधिवत सल्लेखना के नाम से इसका प्रकरण उद्धृत किया गया है...तत्संबंधी ग्रंथो और साहित्य से इस विषय में जानना चाहिए। फिल्म के कथानक में इन सबके बीच एक प्रेम-कथा भी तैर रही होती है...जो प्रेम भंसाली निर्मित पहले की फिल्मो वाली शैली का ही है...जिस प्रेम में कुछ हासिल करने की शर्त नहीं होती, उसमे तो बस लुटाया जाता है। जिस प्रेम का सुखद अहसास पाने के कारण नहीं देने के कारण है। ताउम्र नायक की सेवा एक नर्स बिना किसी बोझ के करने को तत्पर है..इसके लिए वो अपने पति से तलाक लेती है...ये सेवा बिना प्रेम के नहीं हो सकती। अंततः १२ साल के लम्बे साथ के बाद मरने से एक रात पहले इथन, सोफिया(ऐश्वर्या राय) को शादी के लिए प्रपोज करता है...ये प्रेम कुछ उसी तर्ज का है जो 'हम दिल दे चुके सनम' में एक पति अपनी पत्नी को उसके पुराने प्रेमी को सौपकर प्रदर्शित करना चाहता है...या 'देवदास' में चंद्रमुखी द्वारा प्रदर्शित है जो देवदास को पारो के बारे में जानते हुए भी चाहती है..या फिर इसे हम 'ब्लेक' के उस अध्यापक के प्रयास में देख सकते हैं जो सारा जीवन अपनी अंधी-बहरी और गूंगी शिष्या को जीवन जीने लायक बनाने के लिए करता है। इन सभी में प्रेम है पर हासिल करने की मोह्ताजगी नहीं..और ये आज के सम्भोग केन्द्रित इश्क से परे है...इस प्रेम में तो बस सच्चे दिल से दुआएं निकलती है, और एक silent caring होती है...जो आज की नवसंस्कृति में बढ़ रहे युवा के समझ में नहीं आ सकता, क्योंकि आज प्रेम आदर्श है और सेक्स नवयथार्थ...इस प्रेम में करुणा है, दया है, संवेदना है और इसी के चलते इथन अपने उस प्रतिस्पर्धी जादुगर के पुत्र को अपना कौशल सिखा जाता है जिसने उसे अपंग बनाया था... नफरत के लिए इसमें कोई जगह नहीं...

बहरहाल, एक बेहद गुणवत्तापरक फिल्म है...जो कदाचित कुछ मनचलों को रास न आये, क्योंकि यहाँ हुडदंग नहीं है और न यहाँ शीला की जवानी है..नाही यहाँ मुन्नी बदनाम हुई है। हृतिक और ऐश्वर्या के बेजोड़ अभिनय ने फिल्म को जीवंत बना दिया है..रवि के.चंद्रन की सिनेमेटोग्राफी कमाल की है...सेट डिज़ाइनिंग भंसाली की अन्य फिल्मों की तरह प्रतिष्ठानुरूप है... संगीत अलग से सुनने पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ता, लेकिन फिल्म के साथ जुड़कर सुनने पर अद्भुत अहसास कराता है...कुछ दृश्य तो बेमिसाल बन पड़े है, जैसे-'हृतिक द्वारा नाक पर बैठी मक्खी हटाना, छत से टपकने वाले पानी से हृतिक की जद्दोजहद या 'उडी-उडी' गाने पर ऐश्वर्या का नृत्य आदि...

खैर..एक उम्दा पैकेज है...सार्थक सिनेमा के शौक़ीन लोगों को इसे जरूर देखना चाहिए...इस तरह की फिल्मों के कारण ही बालीवुड की प्रतिष्ठा बची हुई है...दबंग, वांटेड और कमबख्त इश्क जैसी फिल्मे पैसा तो कमा के दे सकती है...पर इज्जत नहीं बढ़ा सकती...

Sunday, November 21, 2010

बरखा और वीर... हमें आपसे सफाई नहीं चाहिए

लेख के शीर्षक से ज़रा भी हैरान न हों क्योंकि हम जो नई पीढ़ी से आते हैं, अपनी पिछली पीढ़ी के कुत्सित सचों से अब ज़रा भी हैरान नहीं होते हैं। हम जानते हैं कि वो जो कहते हैं, जो दिखते हैं और जो करते हैं उसमें एक परस्पर विरोधाभासी अंतर है और हम उनको इसके लिए माफ़ नहीं करते हैं पर उनसे सफाई भी नहीं चाहते हैं। हमें पता है कि मूर्ति पूजन का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन सबकी मूर्तियां समय अपने आप ध्वस्त करता जा रहा है फिर चाहें वो बड़े पत्रकार हों, महान समाजसेवी या फिर वो नेता ही क्यों न हों। और एक ऐसे युग में जब सूचना प्रकाश से तेज़ गति से चलती हो, बरखा दत्त या वीर सांघवी किसी के भी सच हमसे छुपे नहीं रह सकते हैं और हम जानते हैं कि कोई भी जो चीख-चिल्ला कर दूसरों से सवाल पूछ रहा हो, उसके अपने भेद ब्लैक होल सरीखे गहरे हो सकते हैं।

अब बात कर लेते हैं मुद्दे पर, तमाम टिप्पणियां आती हैं, कई लोग बरखा दत्त और वीर सांघवी को अपना आदर्श बताते हुए निराश दिखते हैं, कुछ को पत्रकारिता के हाल को देख कर दुख होता है, कुछ पूरे सिस्टम को ही भ्रष्ट बताते हैं तो कुछ कहते हैं कि बरखाओं और वीरों का पक्ष भी सुनना चाहिए। पर सवाल है कि क्यों आखिर हम निराश हों, क्यों सिस्टम को कोसें, क्यों हम किसी से सफाई मांगें....क्या हम इतनी समझ नहीं रख सकते हैं कि इस देश मैं, समाज में और समय में क्या क्या हो सकता है? दरअसल इससे भी मज़ेदार बात ये है कि हम ये क्यों न समझें कि बरखाओं और वीरों के पास इन सब के जवाब में कोई तर्क नहीं है लेकिन वो न तो शर्मिंदा हैं और उन्हें इस देश की न्याय व्यवस्था में पूरा भरोसा है कि वो कुछ भी करें कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा।

कुछ लोग इस विचार को नकरात्मक ठहरा देंगे पर दरअसल नकरात्मक क्या है...हम या ये व्यवस्था? मैं बेहद साफगोई से कहता हूं कि अगर नई पीढ़ी के कुछ लोग बरखा दत्त को अपना आदर्श मानते हैं और वीर सांघवी सरीखा पत्रकार बनना चाहते हैं तो कृपया ये सब भूल जाइए। इन दोनो और बल्कि इनके अलावा भी तमाम चमकते चेहरों में केवल ग्लैमर के अलावा कुछ भी नहीं है जो आपको आकर्षित करे....ये सारे चमकते चेहरों की चमक उधार की...घूस की...या दलाली की है। लिप्सा, दोहरे चेहरे और भ्रष्टाचार के अलावा इन्हें किसी भी मामले में आदर्श नहीं माना जा सकता है।

अब बरखा दत्त की बात, अगर मैं सही हूं तो कुछ ही समय पहले एक अंग्रेज़ी ब्लॉगर चैतन्य कुंते को मानहानि का नोटिस भेज कर बरखा ने सार्वजनिक माफी मांगने पर मजबूर किया था। उस ब्लॉगर की गलती केवल इतनी थी कि उसने बरखा की पत्रकारिता की शैली पर सवाल उठाया था...खैर बात पुरानी है बरखा आज उससे बुरी स्थिति में हैं और देखना मज़ेदार होगा कि क्या इस बार वो कानूनी कार्रवाई करना चाहेंगी। ज़ाहिर है इस बार विधिक सहायता लेना उनके सर पर उल्टा भी पड़ सकता है। खैर वो कहती हैं कि उनकी जो बातचीत नीरा राडिया नाम की सदाचरण की पुतली से सामने आई है वो किसी और परिप्रेक्ष्य में की गई थी। हो सकता है बरखा दत्त अदालत में ये साबित भी कर दें कि वो बातचीत Out of Context थी पर ज़रा एक बार बातचीत के कुछ हिस्से देखिए....

RADIA: Yeah. Listen, the thing is that they need to talk to him directly. That is what the problem is.

BARKHA: Haan so, apparently PM’s really pissed off that they went public.

RADIA: But that’s Baalu’s doing, naa… he was not instructed by Karunanidhi to do that.

BARKHA: Oh, he wasn’t?

RADIA: This is not. He was told to come away and tell Congress that.

BARKHA: And he went public

RADIA: Well, the media… media, the media was standing outside.

BARKHA: Oh God. So now what? What should I tell them? Tell me what should I tell them?

RADIA: I’ll tell you what it is---the problem and I have had a long chat with both his wife and with the daughter right

क्या इस बातचीत से निकलने वाले मतलब एक किशोरवय भी नहीं समझ सकता है...और फिर क्या नीरा राडिया नाम की जिन महिला से बरखा ये और तमाम और गोपनीय जानकारिया साझा कर रही थी वो उनके चैनल की एडीटर इन चीफ या सीईओ थी....या कोई और बड़ी पत्रकार...या केवल गपशप के लिए इस तरह की बातें हो रही थी...आप सबको याद दिलाना चाहूंगा कि ये वो वक्त था जब पूरे देश की मीडिया की निगाहें देश के राजनीतिक नाटक पर लगी थी जो डीएमके और कांग्रेस के बीच चल रहा था....ऐसे में बरखा दत्त अंदरूनी सूचनाएं नीरा राडिया से अगर बांट रही थी तो इसके निहितार्थ क्या बिल्कुल पाक साफ हो सकते हैं...फिर क्यों ये ख़बरे एक संवाददाता के तौर पर उन्होंने अपने चैनल को नहीं दी...क्यों और फिर बरखा दत्त नीरा राडिया से एक आज्ञाकारी कर्मचारी की तरह पूछती हैं कि “Oh God. So now what? What should I tell them? Tell me what should I tell them?” बरखा जी क्या हम सब आपको वाकई ऐसे बेवकूफ लगते हैं?

ये केवल एक संवाद है, ज़रा नीरा राडिया और महाराजाधिराज ए. राजा के बीच के वार्तालाप पर ग़ौर करिए,

RADIA: Hi! I got a message from Barkha Dutt just now.

RAJA: Huh?

RADIA: Barkha Dutt

RAJA: What does she say?

RADIA: She says… that she has been following up the story with Prime Minister’s Office tonight. In fact, she was the one who told me that Sonia Gandhi went there. She says that he [the PM, presumably] has no problem with you, but he has a problem with Baalu.

ये वही नीरा राडिया हैं जो बरखा दत्त से भी बात कर रही थी और फिर वो सारा ज्ञान जो बरखा दत्त इनको प्रदान कर रही थी, उसे ये ए. राजा से साझा कर रही थीं। ऐसे में बरखा दत्त या तो ये ही नकार दें कि ये आवाज़ उनकी है (जो फॉरेंसिक जांच में साफ हो जाएगा) या फिर कोई तर्क न दें....और वो दे भी नहीं रही हैं...बल्कि हर मौके पर चीखने वाली, वीरांगना आज इतनी असहाय हो गई हैं कि खुद कुछ बोलने की जगह अपने संस्थान को आगे कर दिया....ये वही संस्थान हैं जो मंदी के नाम पर छंटनी करने में ज़रा देर नहीं लगाते, और आज किसी बड़े की पोल खुली है तो कर्मचारी हित के नाम पर मानहानि की धमकी दे रहे हैं। ज़ाहिर है इनको पता है कि इस लोकतंत्र में केवल बड़ों को लूट की छूट है, छोटों को सांस लेने की भी आवाज़ करने की आज़ादी नहीं है। वी द पीपल कहने वाली बरखा और उनके जैसे तमाम केवल एक धंधे में लगे हैं....वो जनता को सपने बेचते हैं और स्टूडियो से बाहर आ कर जनता के सपनों को बेच देते हैं। और बरखा क्योंकि कहानी इतनी साफ है कि और सफाई की गुंजाइश नहीं है इसलिए या तो ये टेप ही फ़र्ज़ी साबित हो जाए....नहीं तो हमें आपकी सफाई नहीं चाहिए।

अब बात वीर सांघवी की, वीर सांघवी का टेप सुनते हुए मैं कई बार बहुत जो़र से हंसा और कई बार बिल्कुल तरस आया कि इतना हट्टा कट्टा दिखने वाला शख्स और इतना दबंग माने जाने वाला पत्रकार क्या वाकई इतना दयनीय है। उस टेप में वाकई नीरा राडिया वीर सांघवी को डिक्टेट कर रही हैं कि उन्हें अपने एक तथाकथित लाबीइंग करने वाले लेख में क्या लिखना है और क्या नहीं। देखिए टेप में एक जगह किस तरह दोनो बात करते हैं,

RADIA: But basically, the point is what has happened as far as the High Court is concerned is a very painful thing for the country because what is done is against national interest.

VIR: Okay.

RADIA: I think that’s the underlying message.

VIR: Okay. That message we will do. That allocation of resources which are scarce national resources of a poor country cannot be done in this arbitrary fashion to benefit a few rich people.

RADIA: That’s right.

VIR: Yeah. That message we will get across, but what other points do we need to make?

ये बातचीत साफ दिखाती है कि वीर सांघवी तो जैसे नीरा राडिया के बिल्कुल इशारों पर एक लेख या साक्षात्कार कर रहे हों, और यकीन न हो तो आगे देखिए कि किस तरह वीर सांघवी ये तक कह देते हैं कि मुकेश अंबानी को पूरा साक्षात्कार रिहर्सल कर के देना होगा,

VIR: Mukesh can talk straight, can say things. You can rehearse. You can work out a script in advance. You can go exactly according to the script. Anil can’t do any of those things, no?

RADIA: Right. But we can do that, no?

VIR: Yeah.

RADIA:Yeah?

VIR: But Mukesh has to be on board. He has to sort of realise. It has to be fully scripted.

RADIA: No, that’s what I mean. I think that’s what he’s asking me.

VIR: Yes, it has to be fully scripted.

RADIA: He is saying is that, ‘Look Niira’, that ‘I don’t want anything extempore.’

VIR: No, it has to be fully scripted. I have to come in and do a run through with him before.

RADIA: Yeah, yeah.

VIR: We have to rehearse it before the cameras come in.

और ये सब सामने आने के बाद वीर सांघवी अपने ब्लॉग पर क्या लिखते हैं, क्या सफाई देते हैं इससे कतई कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। अगर वो पाक साफ़ हैं और सारे आरोप झूठे हैं तो आएं कानूनी अखाड़े में और लड़ें मुकदमा पर ज़ाहिर है वहां भी इन सबको सज़ा मिलना मुश्किल ही है। इनकी सज़ा केवल यही है कि ये हमारे सामने आकर सफाई देने का साहस ही न कर पाएं....ये जनता का सामना करने की हिम्मत ही न कर पाएं....ये जानें और समझें कि जनता और इनके प्रशंसक सब इनका सच जानते हैं....और इसीलिए उनको किसी तरह की सफाई देने का कोई मतलब नहीं है।

बरखा और वीर कोई अपवाद नहीं हैं न अपनी तरह के अकेले हैं, ये अलग बात है कि वो इस प्रकरण के बाद अलग थलग पड़ जाएं। एक और बड़ा और कड़वा सच ये है कि तमाम समाचार पत्रों और चैनलों के पास ये सारा सच और इसके सबूत पहले से मौजूद थे पर किसी ने भी इतना नैतिक साहस नहीं दिखाया कि इस ख़बर को उठाता। कुछ महीने पहले जब पहली बार ये मामला उठातो तो इन लोगों का नाम सामने आते ही एनडीटीवी समेत ज़्यादातर चैनलों ने ये ख़बर ही गिरा दी....किसी की इतनी तक हिम्मत नहीं हुई कि कोई बिना नाम लिए ही ये कह देता कि दो बड़े पत्रकारों की भी भूमिका संदिग्ध है।

जो लोग बरखा और वीर की चुप्पी पर सवाल उटा रहे हैं उनसे केवल एक निवेदन है कि उनसे किसी सच की उम्मीद न करें, उनसे सफाई न मांगे....क्या आपको अपने बुद्धि और विवेक पर भरोसा नहीं है....क्या आपने टेप नहीं सुने हैं या आप बदलते समय के कड़वे सचों से वाकिफ़ नहीं हैं। कैसे कोई आम आदमी की, किसान की और गरीब की आवाज़ उठाने की बात करने वाला इंसान करोड़ों कमा सकता है....कैसे कोई देश के आम आदमी को अपनी बपौती मान सकता है....और कब तक हम ठगे जाते रहेंगे...नेताओं....पत्रकारों और ढोंगी समाजसेवियों के ढोंग से....दरअसल ये समय हमें रोज़ शर्मसार ज़रूर करता है, कई ऐसे सचों से रूबरू कराता है जो सुनना हम में से कोई नहीं चाहता है...पर सच कहें तो इस समय की सबसे बड़ी खासियत यही है कि कोई भी शख्स कितना भी बड़ा क्यों न हो, वो महान और पवित्र होने का दावा नहीं कर सकता, उसके सच सामने ज़रूर आएंगे....और इसी लिए बरखा और वीर हमें आपसे कोई सफाई नहीं चाहिए.....

शब्द..
भाव.....
मात्रा......
छंद..........
कविता.........
जहां से नहीं थी
आशा
वहीं से देखो
फूट रहे हैं
क्रोध...
शोभ...
द्रोह......
विद्रोह....
ध्वंस हुई हैं
सदियों से पूजित
मूर्तियां
देखो युग के
प्रतिमान
टूट रहे हैं

(मई में पहली बार बरखा दत्त और वीर सांघवी के किस्से चर्चा में आने के बाद, और हाथ में इनके नाम वाले दस्तावेज़ आने के बाद ये कविता लिखी गई थी।)


Wednesday, November 3, 2010

सुनहरे २१

भारतीय संस्कृत में २१ को काफी शुभ  माना गया है, भगवान के किसी कार्य में २१  का  चढ़ावा  उसके महत्व को बढ़ा देता है.क्रिकेट के भगवान का भी ये क्रिकेट में २१वा  साल है . २१ की संख्या की तरह सचिन के २१ साल भारतीय क्रिकेट के लिए काफी शुभ  रहे. सचिन  बधाई के पात्र सिर्फ इसलिए नहीं है की उन्होंने इन २१ सालो में कई विश्व रिकॉर्ड बनाये .उन्होंने भारतीय  टीम को विश्व क्रिकेट में सम्मानजनक स्थान पहुचाया बल्कि इसलिए भी की पल भर  में स्टार  को गीटार बनाकर मनचाहे तरीके  से बजाने वाली क्रिकेट चयन समित  के साथ भी आदर्श २१ साल बिताये वर्ना भारतीय क्रिकेट के अनेक हीरे तो यू ही चयनसमित  का कोप भाजन  बनकर आज दूसरे रोजगार  में नजर आते है. जब भी सचिन के खेल पर किसी को शक हुआ तो सचिन ने अपने प्रदर्शन से सबके मुह बंद कर दिए.प्रदर्शन से लगाम तो गांगुली ने भी लगाई थी पर फिर भी वो अपना करियर नहीं बढ़ा सके .इसके आलावा इन्ही २१ सालो में कई ऐसे खिलाडी आये जिनकी तुलना महान खिलाडियों से की जाती रही लेकिन वो लम्बे समय तक न तो अच्छा खेल सके और न हमारी व्यवस्था ने उन्हें खेलने दिया. सचिन की योग्यता लोहा पूरे विश्व ने माना है लेकिन कई मौको पर हमारे ही पुराने खिलाडियों  ने सचिन के लोहे पर जंग  लगने जैसा आरोप  लगाते रहे लेकिन यही तो सचिन की महानता है की जब भी संकट में भगवान की जरुरत हुई उन्होंने अपने लाजबाब खेल से अपने विरोधियो को ही अपना कायल बना दिया. हम आम दर्शक तो यही चाहेंगे की सचिन २१ साल और खेले पर २०११ के विश्व कप के बाद सन्यास की खबरों ने अभी से एक बड़ी रिक्तता  का बोध करा दिया है उम्मीद करते है आगामी सालो में अगले २१ सालो  तक चमकने वाला हीरा मिल जाये.

Feelings

Today I am sad because I have not that shade



A shade which was with me when I was embryo


A shade that protect me from all evil & evildoer


When I have no sense.


A shade that care me when I started crawling .


And remember my hunger whenever I forget .






.


Today I am sad because I have not that feel .


When I heard a single loud clap in ground .


Although I got last position in the race.


A Feel that feel myself


When everyone go against me in the world.


A feel for that I am most great.






Today I am sad because I have not that power


That force and encourage me


When I first time fell down


A power that stop me to go wrong way.


And make me capable to find out


What is good and bad for me.






Today I am sad because I am fool


Who think her way to taught


Her rude nature .


While she making myself strong


To face all thunder of world.






Today I am sad and I think I will always sad.


Because she has started to think


That I am mature now.


And I have no need to her .


Because I have started to give suggestion her.










( SHAILENDRA RISHI )



Monday, October 25, 2010

बिहार विधानसभा चुनाव और राजनीतिक जमीन तलाशते दल

बिहार विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है.चुनावी जमीन तैयार है और भाजपा,जदयू,लोजपा,राजद सहित अन्य पार्टियां जीत के लिए दिन रात एक कर रही है.यह चुनाव नीतीश और लालू दोनो के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है.अगर नीतीश चुनाव जीतते हैं तो उनके सुशासन पर जनता की मुहर लगेगी और लालु चुनाव जीतते हैं तो राज्य के साथ साथ कांग्रेस नीत केंद्र सरकार में ही उनकी पार्टी की भूमिका बढ़ेगी.हालांकि कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों को अपने साथ नफा नुकसान देखकर ही रखती है.2005 के विधानसभा के दो चुनावी नतीजे इस प्रकार है
विधानसभा चुनाव(2005) विधानसभा चुनाव (2010)
पार्टियां सीट पार्टियां सीट
बीजेपी 37 बीजेपी 55
जनता दल यू 55 जनता दल यू 88
राजद 75 राजद 54
एलजीपी 29 एलजीपी 10
कांग्रेस 10 कांग्रेस 9
अन्य 37 अन्य 27

इस बात से सभी इतेफाक रखते है कि बिहार में पिछले 5 साल की स्थिति में काफी परिवर्तन आया हैं
और सड़क,स्वास्थय,शिक्षा और बिजली के क्षेत्र में काफी काम किया गया है.बीजेपी जदयू के नेतृत्व में चलने वाली इस सरकार में 15 साल के बाद पहली बार लोगों ने राहत की सांस ली.लेकिन सवाल ये है कि क्या इसके आधार पर नीतीश की वापसी संभव हैं.बिहार में जातिवाद एक बड़ा कारक हैं और वोटिगं इसी आधार पर होता हैं.चुनावी मुकाबला भाजपा-जदयू और लोजपा राजद में है.कांग्रेस की स्थिति में कुछ खास अंतर नही आया क्योंकि लालू राबड़ी के 15 साल की सरकार के पाप की भागीदार कांग्रेस भी बराबर रूप से हैं.राहुल या कांग्रेस चाहे जितनी भी सफाई दे लेकिन जनता जानती हैं कि लालू और राजद को कांग्रेस ने खूब पाला और सीचा हैं.कहलगांव से विधायक और विधानसभा अध्यक्ष सदानंद
सिंह पांच साल तक बने रहे और वे कांग्रेस के ही नेता है.सवाल ये भी पैदा होता हैं कि अगर दुर्भाग्य से बिहार में त्रिशंकु सदन की स्थिति बनती हैं तो क्या कांग्रेस लालू का साथ नही देगी..क्योंकि तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की जो बात है.कांग्रेस ने बिहार में 40 साल और लालू राबड़ी की स रकार को 15 साल तक समर्थन किया....अब राहुल की कांग्रेस और राहुल से सवाल...
1 आजादी के 60 साल बाद भी बिहार में क्यों नही खुल पायी आईआईएम की ब्रांच
2 9 करोड़ की आबादी वाले बिहार में क्यों नही खुल पाया केंद्रीय विश्वविधालय
3 इतनी आबादी होने के बाद भी बिहार में एम्स की कोई ब्रांच क्यो नही
4 बिहार में नही तो लॉ युनिवर्सिटी और ना ही निफ्ट की कोई ब्रांच..
जब दिसंबर 2008 में बिहारी छात्रों को पीटा जा रहा तो तब कांग्रेस क्या कर रही थी.क्यों नही राज ठाकरे को जेल में बंद किया गया.सीधी सी बात हैं कांग्रेस इस बात को जानती थी कि जितना राज ठाकरे मजबूत होंगे शिवसेना उतना ही कमजोर होगी..मुंबई में 6 लोकसभा सीटों पर राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस को 7 लाख से ज्यादा मत मिले जो कि शिवसेना का वोट बैंक था..उसी तरह मुंबई की 39 विधानसभा सीट में एमएनएस को 8 सीटे मिली ..जाहिर हैं अपनी सत्ता और सल्तनत को बचाने के लिए वो राज ठाकरे की नीतियों को पालती पोषती रही है और मेरी तरह हरेक आदमी कांग्रेस की इन नीतियों से वाकिफ है.अब राहुल को बिहार की याद आ रही हैं और इसी विचार को लेकर वो मुंबई भी गये.जब राज्य का सीएम ही किसी व्यक्ति की सुरक्षा के लिए रात दिन एक करे उसका कौन क्या बिगाड़ सकता हैं..बिहार राजनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण स्टेट हैं राहुल गांधी को पीएम बनने का रास्ता साफ करने के लिए राज्य की 40 सीटों का काफी योगदान होगा..इस लिहाज से राहुल के साथ साथ कांग्रेस भी पूरा जोर लगा रही हैं खैर इसमें कोई बुराई भी नही..अब देखना होगा कि बिहार की जनता नीतिश के साथ रहती है या फिर कोई और विकल्प तलासती है..

Saturday, October 16, 2010

गर्दन नापने की नई चाहत

भारत एक लोकतांत्रिक देश हैं और पत्रकारिता इसका चौथा स्कंभ हैं.मीडिया सदैव हमेशा से भारत का प्रहरी रहा हैं और इसकी निष्पक्षता के आगे बड़े बड़े हुक्मरान ,नौकरशाह अपनी नाजायज काम करने से डरते हैं.लेकिन शायद इमाम बुखारी को इस बात की जानकारी नही हैं या फिर ये देश के कानून को अपनी पैर की जूती समझते हैं. और इसलिए इन्हें पत्रकारिता की गर्मी को इन्हें समझाना पड़ेगा.14 अक्टूबर को लखनऊ के गोमती होटल में स्थानीय पत्रकार मोहम्मद वाहिद चिश्ती के साथ जो सलूक किया इसके लिए बुखारी को चिश्ती से माफी और मीडिया के सामने स्पष्टीकरण देना चाहिए.आप किसी भी चीज से सहमत या असहमत हो सकते हैं और विरोध करना संवैधानिक दायित्व लेकिन बुखारी की गर्दन नापने की चाहत ये समझ से बाहर की चीज हैं.सच्चाई बेहद ही कड़वी होती हैं और जिस सच्चाई को चिश्ती ने बुखारी और दुनिया के सामने रखा हैं उसके लिए बुखारी के साहस और जज्बे को सलाम.चिश्ती ने 1528 के उस खसरे का जिक्र किया जिसमें अयोध्या की जमीन राजा दशरथ के नाम पर दर्ज होने की बात कही गई इसलिए उसके स्वामी राजा राम चंद्र होते हैं.यह बात 30 सितंबर 2010 के फैसले में भी हैं और जफरयाब जिलानी को भी मालूम हैं.जब ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं तो आप ये जमीन सहिष्णुता का प्रर्दशन करते हुए हिंदुओं को क्यों नही सौप देते हैं.इतनी सुनते ही बुखारी की सोच और खाल दुनिया के सामने आ गई.बुखारी पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और मीडिया को इस शख्स पर इतना दबाव बनाना चाहिए कि वे चिश्ती से माफी मांग लें.वैसे बुखारी की यह सोच नई हैं इससे पहले 2006 में भी उन्होनें पत्रकार को औकात बताने की बात कही थी.माननीय बुखारी जी जनता एक पंडित की तरह हैं जो किसी की शादी करती हैं तो श्राद्ध भी.जिस पत्रकार को सबक सिखाने की बात करते हैं वह कभी हो नही सकता.30 सितंबर का फैसला एतिहासिक और प्रामाणिक भी हैं और यह तय हैं कि अब मंदिर का निर्माण उसी जगह पर होगा जिसे हिंदू सदियों से अपना बता रहे हैं.आम मुसलमान भी चाहता हैं कि अब मंदिर का निर्माण हो ही जाए.बुखारी जी अगर मुसलमान पिछड़ा हैं और अमेरिका और यूरोंप में इन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जाता हैं तो इसके लिए जिम्मेदार आप जैसे लोग ही हैं .चिश्ती ने एक आम भारतीय के सोच को सामने रखा हैं और आप उदारता दिखाए यह आपसे अपेक्षा हैं.ए आर रहमान और अब्दुल कलाम जैसे लोग आपकी बिरादरी से ही संबंध रखते हैं फिर आप ऐसे हरकत कर अपनी थु थु कराने पर क्यों लगे हैं...गर्दन नापने का शौक वैसे बड़े बड़े तानाशाहों का रहा हैं और उसका हश्र आपके सामने हैं..मारने वाला से बड़ा बचाने वाला होता हैं आपने चिश्ती के साथ साथ पत्रकारिता पर भी हमला किया हैं बेहतर होगा कि सीमा में रहकर अपनी बात रखे...नही तो दांव उल्टा भी पड़ सकता हैं.गर्दन नापने की इस चाहत को दफ्न कर दे..
चिश्ती जी आपके जज्बें को पत्रकारिता जगत का हजारों सलाम....

Thursday, September 30, 2010

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...भाग-2


भाग एक से आगे....

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति बनते ही प्रो. बीके कुठियाला ने अंधों की तर्ज पर अपनों में रेवड़ियां बांटनी शुरु की, कुठियाला ने सबसे पहले अपने अधीन पीएचडी करने वाले छात्र सौरभ मालवीय को विवि में 12000 रुपए मानदेय पर रख लिया। यह नियुक्ति विधिवत प्रक्रिया के तहत नहीं की गई। और अब सौरभ मालवीय विश्वविद्यालय में जूनियर कुलपति की तरह घूमते और आदेश देते दिखते हैं।

पर ये पहला वाकया नहीं था, इससे पहले प्रो. कुठियाला ने कुरुक्षेत्र विवि और गुरु जंबेश्वर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी हिसार में अपने कई मुंहलगों को पीएचडी भी करवा डाली थी। 4 अप्रैल 2010 को हुई एलुमनी मीट में भी विवि के एक पूर्व छात्र को पुस्तक के संपादन के लिए 20,000 रुपए दे दिए गए, इस पर भी सवाल उठते रहे। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र विवि में भी प्रो. कुठियाला ने रीडर और डायरेक्टर का पद गलत तरीके हासिल किया।

इसकी शिकायत सितम्बर 2009 में राष्ट्रपति से भी की गई। इसी शिकायत के आधार पर 10 मार्च 2010 को मानव संसाधन मन्त्रालय के अन्तर्गत उच्च शिक्षा विजिलेंस सचिव केएस महाजन ने अपने पत्र क्रमांक 36012/31/ पीएस/2010- पीजी में लिखा कि एक माह के अन्दर इस सिलसिले में जो भी कार्रवाई की जाए उससे शिकायतकर्ता को सूचित किया जाए। लेकिन समय अवधि गुजरने के बाद भी जांच का पता नहीं चला। और जब तक कुछ हो पाता कुठियाला साहब भोपाल चले आए....

कुठियाला साहब ने आते ही पुराने छात्रों को एक छत के नीचे मिलाने के लिए 4 अप्रैल को एलुमनी मीट करवाई। पूर्व छात्रों के अनुभव का संग्रहण एक पुस्तक के रूप में किया गया। इसे मीट में बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया। एक हजार पुस्तकें प्रकाशित की गई। इनमें से सौ पुस्तकें भी नहीं बिक पाई। पुस्तक का संपादन विवि के एक पूर्व छात्र ने किया। उन्हें इस काम के लिए बीस हजार रुपए का भुगतान किया गया। एक बात और बताते चलें कि पूर्व छात्रों के अनुभव के नाम पर इन महोदय ने ज़्यादातर केवल अपने जानने वाले पूर्व छात्रों के अनुभव संग्रहित किए जबकि कई पूर्व छात्र तमाम बड़े संस्थानों में शीर्षतम पदों पर हैं, उनका कहीं नाम भी नहीं है।

विवि में पीएचडी के लिए रजिस्टर्ड सौरभ मालवीय विवि में ही नौकरी करने लगे। सौरभ को यह नौकरी पाने के लिए किसी प्रतियोगी परीक्षा या साक्षात्कार का सामना नहीं करना पड़ा। सौरभ जिनके अधीन पीएचडी कर रहे हैं, वे विवि के कुलपति हैं और इसीलिए सौरभ पूरे विश्वविद्यालय में जूनियर कुलपति के तौर पर टहलते और नसीहतें देते नज़र आ सकते हैं। जिनको यकीन न हो वो एक बार परिसर में जाकर देख आएं।

एक और शिष्य है इनके, कुरुक्षेत्र में प्रो. कुठियाला ने डायरेक्टर पद पर रहते हुए राजवीर सिंह को रीडर पद शिक्षण के अनुभव को देखते हुए रखा। उन्होंने अपने शिक्षण अनुभव में कुरुक्षेत्र विवि व गुरू जंबेश्वर विवि हिसार का अनुभव दिखाया, जबकि राजवीर हरियाणा जनसंपर्क विभाग में डिस्ट्रिक पब्लिक रिलेशन ऑफिसर पद पर कार्यरत थे। रीडर पद के इस भर्ती की स्क्रूटनी और सलेक्शन कमेटी दोनों में प्रो. कुठियाला सदस्य थे। कुठियाला ने इस तथ्य को जानबूझकर नज़रअन्दाज किया, क्योंकि कुठियाला पिछले 1 वर्षों से इन दोनों विवि में विभागाध्यक्ष के तौर पर जुड़े रहे हैं। इन दोनों विवि में राजवीर नाम का कोई नियमित अध्यापक नहीं है। इसके खिलाफ कुरुक्षेत्र न्यायालय में मामला विचारधीन है। इसके अलावा कुरुक्षेत्र विवि में राजवीर सिंह के प्रोफेसर पद के नियुक्ति के खिलाफ न्यायालय में डॉ. प्रमोद कुमार जेना ने याचिका दायर कर रखी है।

प्रो. कुठियाला पर कुरुक्षेत्र विवि में अपने चहेतों को 2006 में पीएचडी कराने के भी आरोप लगे हैं। पीएचडी में अपनों को कम योग्यता पर रखने के लिए उमीदवार नीरज नैन और रविप्रकाश शर्मा ने कुरुक्षेत्र के अदालत में याचिका दायर की। विभागाध्यक्ष होने के नाते प्रवेश प्रक्रिया में गड़बड़ी के लिए प्रो. कुठियाला को कई बार पेशी में जाना पड़ा। अदालत में याचिका से चिढ़कर कुठियाला ने नीरज नैन को एमफिल में भी प्रवेश नहीं दिया। नीरज ने एमफिल में प्रवेश के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कोर्ट डायरेक्शन लेकर दाखिला लिया। प्रो. कुठियाला ने अपने डायरेक्टर पद के कार्यकाल में अपने ही पीएचडी छात्र देवव्रत सिंह को रीडर बनाया। इसके खिलाफ भी पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में केस नंबर 210/2008 के तहत पिछले दो वर्षों से केस चल रहा है। जिसकी अगली सुनवाई 20 अगस्त है।

प्रो. कुठियाला ने मैसूर यूनिवर्सिटी में पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया, लेकिन समय सीमा के अन्दर पूर्ण नहीं कर पाए और तो और प्रो. कुठियाला ने पंजाब यूनिवर्सिटी से एमएससी एन्थ्रोपोलॉजी और मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए सोशियोलॉजी की उपाधि हासिल की है, लेकिन पत्रकारिता एवं संचार की कोई उपाधि नहीं है। इसके बावजूद उन्हें कुरुक्षेत्र विवि में रीडर बना दिया गया। 1993 में रीडर बने कुठियाला 1996 में ही गुरु जंबेश्वर विवि में प्रोफेसर बन गए। बाद में कुठियाला कुरुक्षेत्र विवि में प्रोफेसर तौर पर आ गए।

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग को बन्द कर इन्हें मास कम्‍युनिकेशन इंस्टीट्यूट में डायरेक्टर बना दिया गया। आरोप है कि विभाग को इंस्टीट्यूट की शक्ल देने में इनके डायरेक्टर पद की महत्वाकांक्षा छुपी थी। कुरुक्षेत्र विवि के मास कम्युनिकेशन विभाग में रीडर बनने के लिए प्रो. कुठियाला ने 3 फरवरी, 1994 को आवेदन किया। फॉर्म में उनके हस्ताक्षर नहीं थे। दस्तावेज भी संलग्न नहीं थे।

रीडर पद के लिए कुरुक्षेत्र विवि में आवेदन के समय प्रो. कुठियाला ने खुद को अधिक अनुभवी बताया। प्रो. कुठियाला आईआईएमसी, दिल्ली में मार्च 1983 से दिसम्बर 1993 तक रहे, लेकिन उन्होंने बॉयोडाटा में खुद को 28 मार्च 1982 से कार्य करना बताया है अर्थात एक वर्ष का अधिक अनुभव बताकर लेक्चरर से रीडर बने। इस बात का खुलासा सूचना के अधिकार में प्राप्त उनके बायोडाटा से हुआ। प्रो. कुठियाला के कुरुक्षेत्र विवि इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन एण्ड मीडिया टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर पद के फार्म पर भी खुद के हस्ताक्षर नहीं है, फिर भी यूनिवर्सिटी और कमेटी ने उन्हें डायरेक्टर पद पर नियुक्ति दे दी।

भोपाल आते ही कुलपति जी को जैसे मुक्ताकाश मिल गया, क्योंकि एक बड़े नेता का वरदहस्त सर पर जो था। तो आते ही तुगलकी फरमानों की झड़ी लगा दी, सौरभ मालवीय के अलावा भी कई ऊल जुलूल नियुक्तियां की, एक प्रभावशाली खास व्यक्ति की पत्नी कि परिसर में असिस्टेंट प्लेसमेंट अधिकारी के तौर पर नियुक्ति करवा दी, हालांकि उसके लिए प्रवेश परीक्षा हुई पर वो महिला उस परीक्षा के पहले ही विश्वविद्यालय ज्वाइन कर चुकी थी। इसके अलावा एक और बेहूदा फैसला ले डाला कि विश्वविद्यालय में बिना प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के प्रवेश लिए जाएंगे। ज़रा सोचिए कि पत्रकार बनने की लालसा लिए छात्रों के लेखन और ज्ञान का स्तर भी नहीं देखा जाएगा.....बेटा बीएससी में फर्स्ट डिवीज़न हो, आओ बेटा पत्रकार बन जाओ......

इसके बाद तो एक एक कर के अनुशासन और न जाने किस किस चीज़ के नाम पर कुलपति हद से आगे बढ़ते चले गए। पुस्तकालय के अखबार तक सेंसर हो कर, ख़बरें काट कर छात्रों के पास पहुंचने लगे, किसी तरह के सामूहिक आयोजन के खिलाफ़ अघोषित फ़तवा जारी हो गया और तो और लड़कों से कुलपति महोदय परिसर में संघ की शाखा तक लगवाने की बात करने लगे....कम्प्यूटर लैब शाम पांच बजे बंद होने लगी....और पुराने कर्मचारियों के हितों के खिलाफ़ अजीबोगरीब निर्णय होने लगे। जो कुलपति अनुशासन और नीतियों कि बात करता है वो सरकारी खर्चे पर अमेरिका घूम आया और अपने लिए महंगा मकान किराए पर ले लिया....ज़ाहिर है कोई भी विद्रोही हो जाएगा फिर ये तो पत्रकारिता के छात्र ठहरे....शिक्षक भी विरोध में उतर आए तो रोज़ नए हथकंडे।

मैं नहीं जानता कि पी.पी. सर दोषी हैं या नहीं, पर उनको जिस वक्त पद से हटाया गया उसकी मंशा को लेकर संशय होना स्वाभाविक है। कुठियाला जी के अब तक के रिकॉर्ड को देखते हुए इसमें कोई शक़ नहीं रह जाता है। पर एक और ख़बर कि विश्वविद्यालय में जो नोटिस पत्रकारिता विभाग के मुखिया को भेजा गया है, वही नोटिस अब कुलपति और प्रशासन को भी भेज दिया गया है तो क्या इसी लीक पर चलते हुए कुलपति को भी इस्तीफा देकर जांच पूरी होने का इंतज़ार करना चाहिए? अपने सभी न्यायप्रिय मित्रों से इस सवाल का जवाब चाहूंगा....

तीसरी बात ये कि जिस तरह की अभद्रता पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने संजय द्विवेदी जी के साथ की उसकी जितनी निंदा हो कम है, हालांकि अब चूंकि छात्रों ने सार्वजनिक माफ़ी मांगी है तो उनको क्षमा कर देना चाहिए। पर एक बात हमें समझनी होगी कि ये सारा घटनाक्रम इसीलिए पैदा किया गया कि छात्रों और शिक्षकों में फूट पड़े और ये आंदोलन राह से भटक जाए। इसलिए सभी से एक अपील करना चाहूंगा कि कम से कम इस आंदोलन को अपने उद्देश्य से न भटकने दें और इसे इसके अंजाम तक पहुंचाएं। कुठियाला जैसे लोग किसी भी शिक्षण संस्था में नहीं होने चाहिए और इसके लिए जो कुछ भी किया जाना चाहिए किया जाए।

भोपाल से कुछ ही घंटे की दूरी पर वर्धा में एक और आतंकवादी कुलपति विश्वविद्यालय को अपनी बपौती माने बैठा है और उसी का एक और तालिबानी भाई भोपाल में आ गया है। कुलपति कुठियाला आप ज़ाहिर तौर पर बेहद शातिर हैं पर याद रखें कि हम भी बेवकूफ नहीं हैं। जब जनता जागती है तो सिंहासन हिलते ही हैं। भोपाल और विश्वविद्यालय हमारे लिए घर है, और यहां के शिक्षक हमारे अभिभावक, किसी भी कीमत पर हमारे बीच के झगड़ों का फ़ायदा कोई बाहरी नहीं उठा पाएगा.....फूट डाल कर राज करना पुरानी नीति हो गई है.....अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई नहीं रोक सकता.....हम चीखेंगे...चिल्लाएंगे....शोर मचाएंगे....विश्वविद्यालय किसी की निजी संपत्ति नहीं है....ये आपको समझाएंगे.....हंगामा अभी तो शुरू हुआ है....ताबूत की आखिरी कील जड़ी जानी अभी बाकी है.....

जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,

जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,

जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे

तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।


जनता?हां,लंबी -बड़ी जीभ की वही कसम,

"जनता,सचमुच ही, बड़ी वेदना सहती है।"

"सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है?"

'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"


मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,

जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;

अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के

जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।


लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,

जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

(रामधारी सिंह दिनकर)

-मयंक सक्सेना

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