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Thursday, September 30, 2010

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...भाग-2


भाग एक से आगे....

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति बनते ही प्रो. बीके कुठियाला ने अंधों की तर्ज पर अपनों में रेवड़ियां बांटनी शुरु की, कुठियाला ने सबसे पहले अपने अधीन पीएचडी करने वाले छात्र सौरभ मालवीय को विवि में 12000 रुपए मानदेय पर रख लिया। यह नियुक्ति विधिवत प्रक्रिया के तहत नहीं की गई। और अब सौरभ मालवीय विश्वविद्यालय में जूनियर कुलपति की तरह घूमते और आदेश देते दिखते हैं।

पर ये पहला वाकया नहीं था, इससे पहले प्रो. कुठियाला ने कुरुक्षेत्र विवि और गुरु जंबेश्वर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी हिसार में अपने कई मुंहलगों को पीएचडी भी करवा डाली थी। 4 अप्रैल 2010 को हुई एलुमनी मीट में भी विवि के एक पूर्व छात्र को पुस्तक के संपादन के लिए 20,000 रुपए दे दिए गए, इस पर भी सवाल उठते रहे। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र विवि में भी प्रो. कुठियाला ने रीडर और डायरेक्टर का पद गलत तरीके हासिल किया।

इसकी शिकायत सितम्बर 2009 में राष्ट्रपति से भी की गई। इसी शिकायत के आधार पर 10 मार्च 2010 को मानव संसाधन मन्त्रालय के अन्तर्गत उच्च शिक्षा विजिलेंस सचिव केएस महाजन ने अपने पत्र क्रमांक 36012/31/ पीएस/2010- पीजी में लिखा कि एक माह के अन्दर इस सिलसिले में जो भी कार्रवाई की जाए उससे शिकायतकर्ता को सूचित किया जाए। लेकिन समय अवधि गुजरने के बाद भी जांच का पता नहीं चला। और जब तक कुछ हो पाता कुठियाला साहब भोपाल चले आए....

कुठियाला साहब ने आते ही पुराने छात्रों को एक छत के नीचे मिलाने के लिए 4 अप्रैल को एलुमनी मीट करवाई। पूर्व छात्रों के अनुभव का संग्रहण एक पुस्तक के रूप में किया गया। इसे मीट में बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया। एक हजार पुस्तकें प्रकाशित की गई। इनमें से सौ पुस्तकें भी नहीं बिक पाई। पुस्तक का संपादन विवि के एक पूर्व छात्र ने किया। उन्हें इस काम के लिए बीस हजार रुपए का भुगतान किया गया। एक बात और बताते चलें कि पूर्व छात्रों के अनुभव के नाम पर इन महोदय ने ज़्यादातर केवल अपने जानने वाले पूर्व छात्रों के अनुभव संग्रहित किए जबकि कई पूर्व छात्र तमाम बड़े संस्थानों में शीर्षतम पदों पर हैं, उनका कहीं नाम भी नहीं है।

विवि में पीएचडी के लिए रजिस्टर्ड सौरभ मालवीय विवि में ही नौकरी करने लगे। सौरभ को यह नौकरी पाने के लिए किसी प्रतियोगी परीक्षा या साक्षात्कार का सामना नहीं करना पड़ा। सौरभ जिनके अधीन पीएचडी कर रहे हैं, वे विवि के कुलपति हैं और इसीलिए सौरभ पूरे विश्वविद्यालय में जूनियर कुलपति के तौर पर टहलते और नसीहतें देते नज़र आ सकते हैं। जिनको यकीन न हो वो एक बार परिसर में जाकर देख आएं।

एक और शिष्य है इनके, कुरुक्षेत्र में प्रो. कुठियाला ने डायरेक्टर पद पर रहते हुए राजवीर सिंह को रीडर पद शिक्षण के अनुभव को देखते हुए रखा। उन्होंने अपने शिक्षण अनुभव में कुरुक्षेत्र विवि व गुरू जंबेश्वर विवि हिसार का अनुभव दिखाया, जबकि राजवीर हरियाणा जनसंपर्क विभाग में डिस्ट्रिक पब्लिक रिलेशन ऑफिसर पद पर कार्यरत थे। रीडर पद के इस भर्ती की स्क्रूटनी और सलेक्शन कमेटी दोनों में प्रो. कुठियाला सदस्य थे। कुठियाला ने इस तथ्य को जानबूझकर नज़रअन्दाज किया, क्योंकि कुठियाला पिछले 1 वर्षों से इन दोनों विवि में विभागाध्यक्ष के तौर पर जुड़े रहे हैं। इन दोनों विवि में राजवीर नाम का कोई नियमित अध्यापक नहीं है। इसके खिलाफ कुरुक्षेत्र न्यायालय में मामला विचारधीन है। इसके अलावा कुरुक्षेत्र विवि में राजवीर सिंह के प्रोफेसर पद के नियुक्ति के खिलाफ न्यायालय में डॉ. प्रमोद कुमार जेना ने याचिका दायर कर रखी है।

प्रो. कुठियाला पर कुरुक्षेत्र विवि में अपने चहेतों को 2006 में पीएचडी कराने के भी आरोप लगे हैं। पीएचडी में अपनों को कम योग्यता पर रखने के लिए उमीदवार नीरज नैन और रविप्रकाश शर्मा ने कुरुक्षेत्र के अदालत में याचिका दायर की। विभागाध्यक्ष होने के नाते प्रवेश प्रक्रिया में गड़बड़ी के लिए प्रो. कुठियाला को कई बार पेशी में जाना पड़ा। अदालत में याचिका से चिढ़कर कुठियाला ने नीरज नैन को एमफिल में भी प्रवेश नहीं दिया। नीरज ने एमफिल में प्रवेश के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कोर्ट डायरेक्शन लेकर दाखिला लिया। प्रो. कुठियाला ने अपने डायरेक्टर पद के कार्यकाल में अपने ही पीएचडी छात्र देवव्रत सिंह को रीडर बनाया। इसके खिलाफ भी पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में केस नंबर 210/2008 के तहत पिछले दो वर्षों से केस चल रहा है। जिसकी अगली सुनवाई 20 अगस्त है।

प्रो. कुठियाला ने मैसूर यूनिवर्सिटी में पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया, लेकिन समय सीमा के अन्दर पूर्ण नहीं कर पाए और तो और प्रो. कुठियाला ने पंजाब यूनिवर्सिटी से एमएससी एन्थ्रोपोलॉजी और मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए सोशियोलॉजी की उपाधि हासिल की है, लेकिन पत्रकारिता एवं संचार की कोई उपाधि नहीं है। इसके बावजूद उन्हें कुरुक्षेत्र विवि में रीडर बना दिया गया। 1993 में रीडर बने कुठियाला 1996 में ही गुरु जंबेश्वर विवि में प्रोफेसर बन गए। बाद में कुठियाला कुरुक्षेत्र विवि में प्रोफेसर तौर पर आ गए।

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग को बन्द कर इन्हें मास कम्‍युनिकेशन इंस्टीट्यूट में डायरेक्टर बना दिया गया। आरोप है कि विभाग को इंस्टीट्यूट की शक्ल देने में इनके डायरेक्टर पद की महत्वाकांक्षा छुपी थी। कुरुक्षेत्र विवि के मास कम्युनिकेशन विभाग में रीडर बनने के लिए प्रो. कुठियाला ने 3 फरवरी, 1994 को आवेदन किया। फॉर्म में उनके हस्ताक्षर नहीं थे। दस्तावेज भी संलग्न नहीं थे।

रीडर पद के लिए कुरुक्षेत्र विवि में आवेदन के समय प्रो. कुठियाला ने खुद को अधिक अनुभवी बताया। प्रो. कुठियाला आईआईएमसी, दिल्ली में मार्च 1983 से दिसम्बर 1993 तक रहे, लेकिन उन्होंने बॉयोडाटा में खुद को 28 मार्च 1982 से कार्य करना बताया है अर्थात एक वर्ष का अधिक अनुभव बताकर लेक्चरर से रीडर बने। इस बात का खुलासा सूचना के अधिकार में प्राप्त उनके बायोडाटा से हुआ। प्रो. कुठियाला के कुरुक्षेत्र विवि इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन एण्ड मीडिया टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर पद के फार्म पर भी खुद के हस्ताक्षर नहीं है, फिर भी यूनिवर्सिटी और कमेटी ने उन्हें डायरेक्टर पद पर नियुक्ति दे दी।

भोपाल आते ही कुलपति जी को जैसे मुक्ताकाश मिल गया, क्योंकि एक बड़े नेता का वरदहस्त सर पर जो था। तो आते ही तुगलकी फरमानों की झड़ी लगा दी, सौरभ मालवीय के अलावा भी कई ऊल जुलूल नियुक्तियां की, एक प्रभावशाली खास व्यक्ति की पत्नी कि परिसर में असिस्टेंट प्लेसमेंट अधिकारी के तौर पर नियुक्ति करवा दी, हालांकि उसके लिए प्रवेश परीक्षा हुई पर वो महिला उस परीक्षा के पहले ही विश्वविद्यालय ज्वाइन कर चुकी थी। इसके अलावा एक और बेहूदा फैसला ले डाला कि विश्वविद्यालय में बिना प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के प्रवेश लिए जाएंगे। ज़रा सोचिए कि पत्रकार बनने की लालसा लिए छात्रों के लेखन और ज्ञान का स्तर भी नहीं देखा जाएगा.....बेटा बीएससी में फर्स्ट डिवीज़न हो, आओ बेटा पत्रकार बन जाओ......

इसके बाद तो एक एक कर के अनुशासन और न जाने किस किस चीज़ के नाम पर कुलपति हद से आगे बढ़ते चले गए। पुस्तकालय के अखबार तक सेंसर हो कर, ख़बरें काट कर छात्रों के पास पहुंचने लगे, किसी तरह के सामूहिक आयोजन के खिलाफ़ अघोषित फ़तवा जारी हो गया और तो और लड़कों से कुलपति महोदय परिसर में संघ की शाखा तक लगवाने की बात करने लगे....कम्प्यूटर लैब शाम पांच बजे बंद होने लगी....और पुराने कर्मचारियों के हितों के खिलाफ़ अजीबोगरीब निर्णय होने लगे। जो कुलपति अनुशासन और नीतियों कि बात करता है वो सरकारी खर्चे पर अमेरिका घूम आया और अपने लिए महंगा मकान किराए पर ले लिया....ज़ाहिर है कोई भी विद्रोही हो जाएगा फिर ये तो पत्रकारिता के छात्र ठहरे....शिक्षक भी विरोध में उतर आए तो रोज़ नए हथकंडे।

मैं नहीं जानता कि पी.पी. सर दोषी हैं या नहीं, पर उनको जिस वक्त पद से हटाया गया उसकी मंशा को लेकर संशय होना स्वाभाविक है। कुठियाला जी के अब तक के रिकॉर्ड को देखते हुए इसमें कोई शक़ नहीं रह जाता है। पर एक और ख़बर कि विश्वविद्यालय में जो नोटिस पत्रकारिता विभाग के मुखिया को भेजा गया है, वही नोटिस अब कुलपति और प्रशासन को भी भेज दिया गया है तो क्या इसी लीक पर चलते हुए कुलपति को भी इस्तीफा देकर जांच पूरी होने का इंतज़ार करना चाहिए? अपने सभी न्यायप्रिय मित्रों से इस सवाल का जवाब चाहूंगा....

तीसरी बात ये कि जिस तरह की अभद्रता पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने संजय द्विवेदी जी के साथ की उसकी जितनी निंदा हो कम है, हालांकि अब चूंकि छात्रों ने सार्वजनिक माफ़ी मांगी है तो उनको क्षमा कर देना चाहिए। पर एक बात हमें समझनी होगी कि ये सारा घटनाक्रम इसीलिए पैदा किया गया कि छात्रों और शिक्षकों में फूट पड़े और ये आंदोलन राह से भटक जाए। इसलिए सभी से एक अपील करना चाहूंगा कि कम से कम इस आंदोलन को अपने उद्देश्य से न भटकने दें और इसे इसके अंजाम तक पहुंचाएं। कुठियाला जैसे लोग किसी भी शिक्षण संस्था में नहीं होने चाहिए और इसके लिए जो कुछ भी किया जाना चाहिए किया जाए।

भोपाल से कुछ ही घंटे की दूरी पर वर्धा में एक और आतंकवादी कुलपति विश्वविद्यालय को अपनी बपौती माने बैठा है और उसी का एक और तालिबानी भाई भोपाल में आ गया है। कुलपति कुठियाला आप ज़ाहिर तौर पर बेहद शातिर हैं पर याद रखें कि हम भी बेवकूफ नहीं हैं। जब जनता जागती है तो सिंहासन हिलते ही हैं। भोपाल और विश्वविद्यालय हमारे लिए घर है, और यहां के शिक्षक हमारे अभिभावक, किसी भी कीमत पर हमारे बीच के झगड़ों का फ़ायदा कोई बाहरी नहीं उठा पाएगा.....फूट डाल कर राज करना पुरानी नीति हो गई है.....अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई नहीं रोक सकता.....हम चीखेंगे...चिल्लाएंगे....शोर मचाएंगे....विश्वविद्यालय किसी की निजी संपत्ति नहीं है....ये आपको समझाएंगे.....हंगामा अभी तो शुरू हुआ है....ताबूत की आखिरी कील जड़ी जानी अभी बाकी है.....

जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,

जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,

जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे

तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।


जनता?हां,लंबी -बड़ी जीभ की वही कसम,

"जनता,सचमुच ही, बड़ी वेदना सहती है।"

"सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है?"

'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"


मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,

जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;

अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के

जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।


लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,

जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

(रामधारी सिंह दिनकर)

-मयंक सक्सेना

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