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Wednesday, March 31, 2010

गुजरात दंगे और विभिन्न नजरिया

गुजरात दंगे के बाद देश के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और बेशक मीडिया के लोगो ने गुजरात की जनता और वहां की छवि को बिना किसी अवसर गंवाये बदनाम करने की कोई कसर नही छोड़ी. और कुछ लोगो ने तो यहां तक कह दिया कि तरक्की और प्रगति अपनी जगह है लेकिन मोदी के खून से रंगे हाथ को कौन धो सकता है. इन लोगो को सिर्फ गुजरात दंगे के जख्म दिखते है लेकिन इन लोगो ना तो कभी दस लाख कश्मीरी पंडितो की पीड़ा नही दिखती है. कुछ लोगो ने एनजीओ बनाकर गुजरात की छवि को आघात पहुंचाने के लिए हरेक मंच का उपयोग किया. तीस्ता सितलवाड़ जिन्हे सुप्रीम कोर्ट ने भी खरी खरी सुनाई है का कहना है कि मैने गुजरात मे रह रहे अल्पसंख्यको के जख्म को देखा है .ये कहती है कि पुनर्वास सिविर मे रह रहे लोगो के लिए कभी भी वहां के सीएम ने समुचित व्यवस्था नही की . हालांकि इसमे सच्चाई कम है और मिलावट ज्यादा. तीस्ता सितलवाड़ को गुजरात दंगे के जख्म तो दिखते है तथाकथित सेक्युलर और दो मुंही बात करने वाले लोगो को गुजरात के राहत शिविर की तकलीफे तो दिखती है लेकिन उन 59 हिंदू परिवार की पीड़ा नही दिखाई देती है जिसे 500 से ज्यादा की भीड़ ने आग के हवाले कर दिया. जरा सोचिए इन 59 परिवार के बारे मे जिनके परिजन ना तो आतंकवादी थे और ना ही नक्सली थे ये तो केवल कार सेवक थे जो अयोध्या से वापस आ रहे थे क्या इन परिवार के उपर बीत रही होगी .आज तक इन परिवारो का ना तो कोई सरकार से कोई सुविधा मिली है और ना सियारी प्रवृति वाले नेताओ ने इनसे मिलने की कोशिश की हैंवैसे आतंकवादी अफजल जिसकी मौत की सजा सुप्रीम कोर्ट ने 20अक्टूबर 2006 तय की थी लेकि न इसके बाद भी यह देशद्रोही भारत की जेल मे मुफ्त की रोटिया तोड़ता है . खैर मै यहां गुजरात की बात कर रहा हूं ....
न्याय का तकाजा यह है कि आप किसी भी घटना को निरपेक्ष तरीके से देखे तब ही उस पर कोई टिप्पणी करे. लेकिन भारत मे ऐसा नही होता है और इसलिए कभी 2008 के असम दंगे या फिर पूर्वोत्तर क्षेत्र से होने वाले घुसपैठ पर चर्चा नही होती है. गुजरात दंगे से ही जुड़े हालिया मामला है नरेंद्र मोदी की पेशी का . इलेकट्रानिक मीडिया और प्रिट मीडिया मे यह खबर आई की नरेंद्र मोदी को एसआईटी के सामने पेशी के लिए 21 मार्च की तारीख तय की गई थी. जबकि ऐसा कुछ भी नही था .नरेंद्र मोदी 27 मार्च 2010 दिन शनिवार को सुबह 11.56 मिनट मे पहली बार एसआईटी के सामने पेश हुए. अब यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर यह बात मीडिया मे किसने फैलाई कि मोदी को बेजे गये समन मे यह कहा गया है उन्हे 21 मार्च को एसआटी के दफ्तर मे पेश होना है. क्या यह न्याय प्रक्रिया मे हस्तक्षेप नही है.दूसरी बात कही ना कही न्याय प्रक्रिया पर दवाब डालने की कोशिश की है कि एसआटी नरेंद्र मोदी को पेश होने के लिए बाध्य करे. यानि कुछ सियारी जबान के कहने इशारे पर मीडिया मे नरेंद्र मोदी की पेशी की झूठी खबर प्रसारित की गई. खैर मोदी से दो दौर मे 9 घंटे तक पूछताछ की गई और यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट मे पेश होनी हैं..
क्रमश:

नरेंद्र मोदी और गुजरात विभिन्न नजरिया

मित्रो, पिछले 8 साल मे भारत की राजनीति जिस घटना ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया वो 27 फरवरी 2002 को गोधरा मे घटी ट्रेन हादसे और उसके बाद भड़के दंगे भी है. जिसकी आड़ मे राजनीति होती रही है और उन तमाम लोगो ने अपनी रोटियां सेकी है और सिर्फ इसी वजह से सच्चाई से अब तक परदा नही उठा हैं. बहुत लोगो ने केवल गुजरात दंगो की बात की लेकिन दंगे क्यो भड़के इसकी चर्चा करना कभी मुनासिब नही समझा. क्या हुआ और क्यो भड़का दंगा
दिनांक 27 फरवरी 2002 साबरमती एक्सप्रेस जिस पर सवार होकर कार सेवक अयोध्या से लौट रहे थे. जब साबरमती एक्सप्रेस गोधरा पहुंची तो 500 से ज्यादा लोगो ने बलपूर्वक ट्रेन रोककर उस विशेष कोच को आग के हवाले कर दिया जिसमे कार 59 कार सेवक सवार थे. जिसमे अधिकतर बच्चे और महिलाये थी. बात यही खत्म नही होती है 59 जिंदा लोगो को आग के हवाले करने के पहले कास सेवक जिस बोगी पर सवार थे उस बोगी पर पहले पेट्रोल फेका गया और उसके बाद 500 से ज्यादा लोगो की भीड़ ने ट्रेन को आग के हवाले कर दिया गया जिसके बाद गुजरात मे दंगा भड़का और 1000 से ज्यादा लोगो दोनो तरफ के लोग यानि हिंदू और मुस्लिम मारे गये. विश्व इतिहास मे ऐसी पहली घटना थी जब किसी देश के बहुसंख्यक समुदाय से संबंधित लोगो को इस तरह यातनाए देकर मारा गया .इससे पहले ना तो ऐसी घटना कभी घटी . मारे गये कार सेवक किसी भी नजरिये से गुनहगार नही थे और वो केवल अयोध्या से कार सेवा कर रहे थे. हालांकि मै किसी भी तरह के दंगे की निंदा करता हूं और मानता हूं कि ऐसी घटनाये भारत के साख पर बदनुमा दाग है. दंगे के 10 महीने बाद गुजरात मे विधानसभा के चुनाव हुए और भाजपा भारी बहुमत से चुनाव जीतकर सत्तासीन हुई..
क्रमश:

Tuesday, March 30, 2010

ये दूरियां

अमिताभ बच्चन और गांधी परिवार के बारे मे मैने पहले भी लिखा है लेकिन हमे लगता है कि जिस तरह से अमिताभ बच्चन को अपमानित होना पड़ा है उससे तो यह लगता है कि अभी और बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है क्योकि सवाल देश के उस महान कलाकार का है जिसे करोड़ो लोग अपना भगवान या रोल माडल बनते है जिसकी कलाकारी और हुनर को पूरी दुनिया सलाम करती है. कहा जाता है कि अमिताभ कभी लाइन मे खड़े नही होते है बल्कि जहां वे खड़े होते है वही नयी लाइन खीच जाती है. सबसे पहले अगर कोई व्यक्ति गुजरात का ब्रांड एम्बेस्डर बनता है तो कांग्रेस को कोई तनाव नही होना चाहिए क्योकि ना तो गुजरात कांग्रेस के इशारे पर चल सकता है ना तो अमिताभ कांग्रेस की छड़ी पर चल सकते है . वजह मै नही बताउंगा. अगर मोदी ने यह प्रतिक्रिया दी थी कि गुजरात की घटना न्यूटन के सिद्धांत के आधार पर घटी थी तो 1984 मै तात्कालीन प्रधानमंत्री ने इंदिरा जी के शहादत के बाद राजीव गांधी ने कहा था कि जब बड़ा पेंड़ गिरता है तो धरती कांपती है हालांकि मै इस बारे मे कभी आगे लिखूंगा.. चलिए कांग्रेस को अमिताभ से ही नाराजगी थी तो अब इस नाराजगी का निशाना बेचारा अभिषेक बच्चन को क्यो बनाया जा रहा है . कांग्रेस की यह हरकत पाकिस्तान की तरह लगती है जिस तरह पाकिस्तान के हरेक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भारत के साथ शत्रुता निभाना अपना फर्ज समझते है और इनके इस नादानी का शिकार भारत देश की जनता को भुगतना पड़ता है ठीक उसी तरह कांग्रेस अमिताभ से अपनी नाराजगी का बदला अभिषेक बच्चन से लेगी. हालिया विवाद दिल्ली मे आयोजित अर्थ आवर अभियान को लेकर है. राजधानी दिल्ली मे अर्थ आवर अभियान शुरू होने से पहले अभिषेक बच्चन का आडियो विजुअल हटा लिया गया. अभिषेक बच्चन वलर्ड वाइल्डलाइफ फाउंडेसन के ब्रांड एम्बेस्डर है इसलिए उनकी वीडियो क्लिपिंग को किसी भी पूर्वाग्रह को दिखाया जाना चाहिए था. लेकिन अब दिल्ली की सरकार ने ऐसा क्यो किया शायद इसका जवाब शीला दीक्षित ही दे सकती है ... मै मानता हूं कि कलाकार केवल कलाकार होता है और अमिताभ जैसे कलाकार का अपमान बंद होना चाहिए. जहां तक ब्रांड अमित जी के गुजरात का ब्रांड एम्बेस्डर बनने का सवाल है तो मेरी गुजारिश को अमिताभ जी ने कदम उठाया है अब इससे उन्हे वापस नही लेना चाहिए .देश की जनता अमित जी के साथ हैं

Saturday, March 27, 2010

ये दूरियां

अमिताभ ये भी कहा कि वो गुजरात क्या वो किसी भी राज्य का प्रचार करने को तैयार है तो हमे यह समझ मे नही आता कि क्यो बच्चन से कांग्रेसियों को नाराजगी है. खैर उनके नाराजगी की परवाह भारत की जनता नही करती है उन्हे नाराज होने दीजिए जनता इन्हे ज्यादा भाव नही देने वाली है. अब महाराष्ट्र के सीएम को दश जनपथ मार्ग से ज्यादा महाराष्ट्र की जनता की परवाह करनी चाहिए . सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं महाराष्ट्र मे ही की है. 16 घंटे की बिजली कटौती महाराष्ट्र मे हो रही है.बेरोजगारी काफी बढ़ी है और वो डाउट बिहार और यूपी के बाद सबसे ज्यादा गरीबी भी महाराष्ट्र मे ही है इसलिए चौहान जी कुछ ऐसा करके दिखाये कि महाराष्ट्र की जनता आपके कार्यो से राहत की शांस ले सके ताकि भविष्य मे कभी भी आपको कापने या माथे पर से पशीना पोछने की नौबत ना आये. अमिताभ बच्चन अमिताभ बच्चन ही रहेंगे और इनकी तुलना किसी से भी नही की जा सकती हैं.....

ये दूरियां ये दूरियां

दरअसल कांग्रेस के लिए अमिताभ बच्चन को अपमानित करने का यह मामला पहली बार नही है.जब दिसम्बर 2003 मे गोआ मे फिल्म समारोह की शुरूआत होनी थी तो अमिताभ बच्चन को मुख्य अतिथि बनाया गया था लेकिन कांग्रेस को यह कभी भी पसंद नही था कि उसके शासित राज्य में अमिताभ बच्चन किसी भी समारोह का मुख्य अतिथि बने और इस वजह से आनन फानन में कांग्रेस ने अमिताभ बच्चन को इस समारोह के लिए गुड बाय कह दिया. सवास अमिताभ बच्चन से डरकर भागने का नही है सवाल यह है कि कांग्रेस पार्टी आखिर कब तक गांधी परिवार के भरोसे चलते रहेग. भारत की सबसे बड़ी पार्टी के सामने यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि क्यो नही कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर गांधी खानदान से बाहर क्यो बड़ा लीडर पैदा नही किया.. यह सवाल मै इसलिए खड़ा कर रहा हूं ताकि फिर कभी अमिताभ जैसे महानायक का अपमान कांग्रेस के आला नेतृत्व के इशारे पर नही हो सके. अमिताभ करोड़ो के दिल पर राज करते है और देश के प्रति उन्होने जो वफादारी और पारदर्शिता दिखाई है वो किसी से छुपी नही है.अमिताभ जो ने लोकप्रियता हासिल की हैं वो उनकी मेहनत से उन्हे मिली है ना कि विरासत से. फिर कांग्रेस को यह अधिकार किसने दिया कि वो इस तरह बच्चन को जलील करे.कांग्रेस के कुछ नेता यह कह रहे कि चुकि गुजरात के ब्रांड एम्बेस्डर मोदी बन गये है इसलिए अशोक च्वहाण को उनके साथ नही होना चाहिए था. अब प्रश्न यह उठता है कि बच्चन हाल फिलहाल मे ही गुजरात का ब्रांड एम्बेस्डर बने है लेकिन दिसम्बर 2003 में गोवा में जो फिल्म समारोह हुआ था उस वक्त तो वे गुजरात के ब्रांड एम्बेस्डर नही थे तो फिर कांग्रेस ने उस वक्त उनका अपमान क्यो किया . प्रियंका गांधी की शादी मे अमिताभ बच्चन या उनके परिवार को आमंत्रित नही किया गया था लेकिन अमिताभ ने खुद्दारी का परिचय देते हुए गांधी परिवार को निमंत्रण कार्ड देने के लिए खुद अमिताभ के भाई अजिताभ गये थे लेकिन गांधी परिवार से कोई भी शादी में शामिल होने के लिए नही आया क्या यह अमिताभ बच्चन का अपमान नही था और अमिताभ बच्चन तो हाल फिलहाल मे गुजरात के ब्रांड एम्बेस्डर बने है .मै इन सारी बात का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं ताकि कांग्रेस के आला नेता के दो मुंही बात का पता आपको और हमे चल सके. जब इरादे गलत हो तो किसी को कोई भी किसी भी बहाने से बेइज्जत कर सकता है... अब अगर अमिताभ गुजरात के ब्रांड एम्बेस्डर बन गये तो क्या कांग्रेस को इस पर सवाल उठाने का कोई अधिकार है कदापी नही क्योकि गुजरात मोदी की अपनी संपत्ति नही है वे तो केवल वहां के सीएम है जिसे गुजरात की जनता ने जिताकर भेजा है .....ठीक इसी तरह जिस तरह सी लिंक अशोक चव्हाण की बपौती नही है.. क्रमश:

Friday, March 26, 2010

अमिताभ और कांग्रेस

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और उस पर महाराष्ट्र के सीएम के चेहरे पर चिंता की लकीरे
जिस तरीके से कांग्रेस अमिताभ बच्चन को अपमानित कर रही है वो किसी भी दृष्टिकोण से जायज कहा जा सकता है . कांग्रेस को एतराज इस बात से है कि चुंकि वे गुजरात के ब्रांड एम्बेस्डर है इसिलए किसी भी कांग्रेसियों को उनसे परहेज करना चाहिए. क्या गुजरात भारत से बाहर है या फिर गुजरात के सीएम अलोकतांत्रिक तरीके से चुने गये है यह बात बताना नही होगा कि मोदी 2002 से गुजरात के सीएम है और वहां की जनता ने 2 बार उन्हे भारी मतो से चुनकर वहां का सीएम बनाया है तो फिर गुजरात का ब्रांड एम्बेस्डर अगर अमिताभ बनते है तो क्या आपत्ती होनी चाहिए. अशोक चव्हान अमिताभ बच्चन के साथ बैठे थे अजमल कशाब या अफजल गुरू के साथ नही तो फिर क्या विपत्ती आ पड़ी की चव्हान को कांग्रेस अलाकमान के सामने अपनी सफाई देनी पड़ी. जिस सोनिया गांधी के सामने कृपा शंकर सिंह और अशोक च्वहान को सफाई देनी पड़ी है उस सोनिया गांधी को यह नही भूलना चाहिए कि जब वह 13 जनवरी 1968 को दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर पहुंची थी तो उन्हे कोई और नही बल्कि अमिताभ बच्चन ही लेने पहुंचे थे. दिवंगत राजीव गांधी और सोनिया की शादी सोनिया के भारत आने के 43 दिनो के बाद हुई थी और इतनेदिनो तक सोनिया गांधी बच्चन परिवार मे ही ठहरी थी क्या सोनिया उस वक्त को भुल गयी .इतना ही नही जब राहुल और प्रियंका काफी छोटे थे तो राजीव गांधी के पास लेम्ब्रेटा स्कुटर हुआ करती थी जो जल्द स्टार्ट नही होती थी .अधिकतर सोनिया व राजीव गांधी के स्कूटर पर बैठ जाने के बाद अमिताभ स्कूटर को को धक्का दिया करते थे . क्या ये बात सोनिया गांधी और कांग्रेस के लोग भूल गये. ये बात सौ प्रतिशत सही है कि अशोक चव्हान को दुनिया नही जानती है लेकिन अमिताभ का कृत्तित्व और व्यक्तितव को दुनिया जानती है और अमिताभ को कांग्रेसियो ने जो अपमान किया है वो किसी भी नजरिये से उचित नही हैं. इस मामले का दूसरा पहलू भारत सभी का है और मुंबई सभी की है फिर अमिताभ के सीलिंक के उदघाटन के मौके पर पहुंचकर कांग्रेस को क्यो आपत्ति है .सी लिंक कांग्रेस की बपौती नही है रही बात मोदी की तो नरेंद्र मोदी की तारीफ तो स्वयं रतन टाटा, सुनील मित्तल, अनिल और मुकेश अंबानी ने भी की है तो क्या कांग्रेस अब इन उधोगपतियों का भी विरोध शुरू करेगी.....क्रमश:

पागल

पत्नी कहती है पति से
तुम पागल तो नहीं हो?
इसके जवाब में पति मुस्कुराता है
यहाँ तक कि पत्नी को बाहों में लेकर
चूमने लगता है

बाकी उनके बीच क्या होता है या क्या
नहीं होता हमें नहीं मालूम
पति कहता है फ़िर से प्लीज़ मुझे पागल कहो न
इस बार पत्नी सिर्फ़ मुस्कुराती है

ऐसे पति इतने पागल होते हैं
कि पत्नी बहुत दिनों तक उन्हें
पागल न कहे तो घबरा जाते हैं
और ऐसे हालत पैदा करते हैं कि
पत्नी को उन्हें पागल कहना ही पड़ता है

मेरे ख्याल से आप दोनों उन्हीं में से हैं।



विष्णु नागर

जिंदगी कैसे जियें!


“ज़िन्दगी लम्बी नहीं, गहरी होनी चाहिए” – रौल्फ वाल्डो इमर्सन

क्योंकि ज़िन्दगी जीने में और जीवित रहने में बहुत बड़ा अंतर है

* जब तक जियें तब तक सीखते रहें - हमेशा नया कुछ सीखने और पढने में हम जितना समय और ऊर्जा लगाते हैं वह हमारे जीवन को रूपांतरित करता रहता है. हम सभी हमारे ज्ञान का ही प्रतिबिम्ब हैं. जितना अधिक हम ज़िन्दगी से सीखते हैं उतना अधिक हम इसपर नियंत्रण रख पाते हैं.

* अपने शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा करें - हमारा शरीर हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण यन्त्र या औजार है. हम जो कुछ भी सही-गलत करते हैं उसका हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है. हमें अपने शरीर को पोषण, व्यायाम, और आराम देना चाहिए और स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए.

* प्रियजनों के साथ अधिकाधिक समय व्यतीत करना - हम सभी भावुक प्राणी हैं. हमें सदैव अपने परिजनों और मित्रों के सहारे की ज़रुरत होती है. जितना अधिक हम उनका ध्यान रखते हैं उतना ही अधिक वे हमारी परवाह करते हैं.

* अपने विश्वासों के प्रति समर्पण रखें - कुछ लोग अपने सामजिक परिवेश में सक्रीय होते हैं, कुछ लोग धार्मिक आस्था से सम्बद्ध हो जाते हैं, कोई व्यक्ति लोगों का जीवन सुधरने की दिशा में प्रयास करता है, अधिकांश लोग अपने काम और नौकरी के प्रति समर्पण भाव रखते हैं. प्रत्येक स्थिति में उन्हें एक समान मनोवैज्ञानिक परिणाम मिलता है. वे स्वयं को ऐसी गतिविधि में लिप्त रखते हैं जिससे उन्हें मानसिक शांति और संतुष्टि मिलती है. इससे उनके जीवन को मनोवांछित अर्थ मिलता है.

* जो भी करें सर्वश्रेष्ठ करें - यदि आप कोई काम बेहतर तरीके से नहीं कर सकते तो उसे करने में कोई तुक नहीं है. अपने काम और अपनी अन्य गतिविधियों जैसे रूचियों आदि में सबसे बेहतर साबित होकर निखरें. लोगों में अपनी धाक जमायें कि आप जो कुछ भी करते हैं वह सदैव सर्वश्रेष्ठ ही होता है.

* अपने पैर चादर के भीतर ही रखें - अच्छी ज़िन्दगी जियें लेकिन किसी तरह का अपव्यय न करें. दूसरों को दिखाने के लिए पैसा न उडाएं. याद रखें कि वास्तविक संपत्ति दुनियावी चीज़ों में निहित नहीं होती. अपने धन का नियोजन करें, धन को अपना नियोजन न करने दें. अपने से कम आर्थिक हैसियत रखनेवाले को देखकर जियें.

* संतोषी जीवन जियें - स्वतंत्रता सबसे बड़ा वरदान है. संतोष सबसे बड़ी स्वतंत्रता है.

* अपना प्रेमाश्रय बनायें - घर वहीँ है, ह्रदय है जहाँ. आपका घर कैसा भी हो, उसे प्यार के पलस्तर से बांधे रखें. याद रखें, घर और परिवार एक दुसरे के पूरक हैं.

* स्वयं और दूसरों के प्रति ईमानदार रहें - ईमानदारी भरा जीवन मानसिक शांति की गारंटी है और मानसिक शांति अनमोल होती है.

* दूसरों का आदर करें - बड़ों का आदर करें, छोटों का भी सम्मान करें. ऐसी कोई श्रेणी नहीं होती जो किसी मानव को दूसरे मानव से पृथक कर सकती हो. सभी को एक समान इज्ज़त बख्शें. जितना धैर्य आप अपने नवजात शिशु के प्रति दिखाते हैं उतने ही धैर्य से अपने वृद्ध पिता से भी व्यवहार करें.

* नया करते रहें - अपने प्रियजनों के साथ आप भांति-भांति प्रकार के अनुभव साझा करें. आपकी जीवन गाथा विस्तृत अनुभवों की लड़ी ही तो है! जितने अच्छे अनुभव आप उठाएंगे, आपका जीवन उतना ही अधिक रोचक बनेगा.

* अपने कर्मों की जिम्मेदारी से न बचें - आप कुछ भी करें, भले ही वह सही हो या गलत, उसकी जिम्मेदारी उठाने से न कतराएँ. यदि आप स्वयं जिम्मेदारी ले लेंगे तो आपको जिम्मेदार नहीं ठहराया जायेगा.

* अपने वायदों को हद से भी ज्यादा पूरा करें - बहुत सारे लोग दूसरों से बिना सोचविचार किये ही वायदे कर बैठते हैं और उन्हें निभा नहीं पाते. वे वादा करते हैं काम पूरा करने का लेकिन काम शुरू भी नहीं करते. यदि आप लोगों की दृष्टि में ऊंचा उठना चाहते हैं तो इसका ठीक उल्टा करें. अपनी योग्यताओं कों यदि आप कम प्रदर्शित करेंगे तो आप सदैव लोगों की दृष्टि में वांछित से अधिक उपयोगी साबित होंगे. लोगों में आपकी कर्तव्यनिष्ठ और कार्यकुशल व्यक्ति की छवि बनेगी.

* सुनें ज्यादा, बोलें कम - ज्यादा सुनने और कम बोलने से आप ज्यादा सीखते हैं और आपका ध्यान विषय से कम भटकता है.

* अपना ध्यान कम विषयों पर केन्द्रित करें - कराटे के बारे में सोचें, ब्लैक बैल्ट कम सुन्दर दिखती है बनिस्पत ब्राउन बैल्ट के. लेकिन क्या एक ब्राउन बैल्ट किसी रेड बैल्ट से अधिक सुन्दर दिखती है? बहुत से लोग ऐसा नहीं सोचेंगे. हमारा समाज प्रबुद्ध और महत्वपूर्ण लोगों कों बहुत ऊंची पदवी पर बिठाता है. परिश्रम बहुत मायने रखता है लेकिन इसे केन्द्रित होना चाहिए. अपना ध्यान अनेक विषयों में लगाकर आप किसी एक में पारंगत नहीं हो पायेंगे. एक को साधने का विचार ही सर्वोत्तम है.

* उपलब्ध साधनों का भरपूर दोहन करें - साधारण व्यक्ति जब किसी बहुत प्रसन्नचित्त अपाहिज व्यक्ति कों देखते हैं तो उन्हें इसपर आर्श्चय होता है. ऐसी शारीरिक असमर्थता की दशा में भी कोई इतना खुश कैसे रह सकता है!? इसका उत्तर इसमें निहित है कि वे ऐसे व्यक्ति अपने पास उपलब्ध सीमित शक्ति और क्षमता का परिपूर्ण दोहन करने में सक्षम हो जाते हैं. अश्वेत गायक स्टीवी वंडर देख नहीं पाते लेकिन अपनी सुनने और गाने की प्रतिभा को विकसित करने के परिणामस्वरूप उन्होंने 25 ग्रैमी पुरस्कार जीत लिए हैं.

* छोटी-छोटी खुशियों से ज़िन्दगी बनती है - मैं यह हमेशा ही कहता हूँ कि जीवन में जो कुछ भी सबसे अच्छा है वह हमें मुफ्त में ही मिल जाता है. वह सब हमारे सामने नन्हे-नन्हे पलों में मामूली खुशियों के रूप में जाने-अनजाने आता रहता है. प्रकृति स्वयं उन क्षणों कों हमारी गोदी में डालती रहती है. अपने प्रियजन के साथ हाथों में हाथ डालकर बैठना और सरोवर में डूब रहे सूर्य के अप्रतिम सौन्दर्य कों देखने में मिलनेवाले आनंद का मुकाबला और कोई बात कर सकती है क्या? ऐसे ही अनेक क्षण देखते-देखते रोज़ आँखों से ओझल हो जाते हैं और हम व्यर्थ की बातों में खुशियों की तलाश करते रहते हैं.

* लक्ष्य पर निगाह लगायें रखें - लक्ष्य की दिशा में न चलने से और भटकाव में पड़ जाने से कब किसका भला हुआ है! आप आज जहाँ हैं और कल आपको जहाँ पहुंचना है इसपर सतत मनन करते रहने से लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है और नई दिशाएं सूझने लगती हैं. इससे आपमें स्वयं कों सम्भालकर पुनः शक्ति जुटाकर नए हौसले के साथ चल देने की प्रेरणा मिलती है.

* अवसरों कों न चूकें - कभी-कभी अवसर अत्प्रश्याशित समय पर हमारा द्वार खटखटाता है. ऐसे में उसे पहचानकर स्वयं कों उसके लिए परिवर्तित कर लेना ही श्रेयस्कर होता है. सभी बदलाव बुरे या भले के लिए ही नहीं होते.

* इसी क्षण में जीना सीखें - जो पल इस समय आपके हाथों में है वही पल आपके पास है। इसी पल में ज़िन्दगी है. इस पल कों जी लें. यह दोबारा लौटकर नहीं आएगा.

(हिंदी जेन से साभार गृहीत...)

Tuesday, March 23, 2010

आख़िरी पैगाम (भगत सिंह का आखिरी खत...)


यह वो आखिरी ख़त है जो भगत सिंह ने २२ मार्च १९३१ को यानि की फांसी के एक दिन पहले अपने साथियों को लिखा था ..........

22 मार्च,1931
साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
आपका साथी,
भगत सिंह

योग्यता

विवेक  मिश्र 
अपनी जिन्दगी का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा,




तुमने योग्यता अर्जित करने में लगा दिया,



इस दौरान तुममे कई कुंठाओ ने घर किया ,



जिसे तुम समझ न सके



अब तुन्हारी योग्यता दो पन्नों में फनफनाने लगी,



कुछ और लोग



जो अब तुम्हारे योग्यता के दो पन्नो पर सवाल पूंछेगे



ये सवाल पूछने वाले जिन्दगी के उस पड़ाव पर हैं



जन्हा इन्हें अपनी योग्यता के आधार पर



यह सवाल पूछना है की तुम्हारी योग्यता क्या है ?



प्रश्नों का दौर चलता है



तुम अपनी योग्यता साबित करते जाते हो




और अंत में एक व्यक्ती तुमसे कहता है



एक अंतिम प्रश्न पूंछू ?



आप पूरे आत्मविश्वास से लबरेज़ हो प्रश्न पूछने की अनुमती दे देते है



वह आपसे पूछता है



तुम्हारी जाति क्या है ?



और फिर भीषण सन्नाटा जो तुम्हारे मन से उपज कर



एक बंद कमरे में फ़ैल जाता है



तुम उस बंद कमरे से बाहर चुपचाप उठ कर चले आते हो



और अंत में आपके मन में एक सवाल खड़ा होता है



जो अंतविहीन बहस की तरह हो जाता है



आखिर योग्य कौन ?

Thursday, March 18, 2010

मायावती...मालावती...ताकत और निर्लज्जता.....


मायावती ने इतिहास बना दिया है। एक इतिहास दलितों को राजनैतिक शक्ति दिलवाने का है और दूसरा सार्वजनिक बेशर्मी का। मायावती ने जाहिर कर दिया है कि उन्हें न भारत के संविधान की परवाह है और न किसी नियम कानून की। एक माला के नोट गिने नहीं जा सके थे कि नोटों की दूसरी माला पहन ली। आप अगर गौर से देखे तो इन दिनों मायावती के चेहरे की मुस्कुराहट सत्ता की शराब के नशे से विकृत हो गए चेहरे की मुस्कुराहट नजर आती हैं और उसका अर्थ यह होता है कि मेरा जो बिगाड़ सके, बिगाड़ ले।

मायावती को याद नहीं हैं कि इस देश के संविधान, विधान और उससे भी ज्यादा जनता ने बड़े बड़े तानाशाहों के होश उड़ा दिए हैं। मायावती तो राजनीति के चिड़ियाघर में बैठी एक मादा चिंपाजी हैं जिन्हें देखने के लिए भीड़ उमड़ती है। कांशीराम की मेहनत और आशीर्वाद के बाद अपनी भी मेहनत और कुटिल चालाकी से जो सम्मान मायावती ने देश की सबसे बड़ी ताकतवर दलित महिला के तौर पर अर्जित किया था वह मायावाद उनके मालावाद में विसर्जित हो गया। कानून कहता है कि मायावती की जगह तत्काल जेल होनी चाहिए। बहुजन समाज पार्टी के एक मित्र कह रहे थे कि दिल्ली में बैठ कर यह लिखना आसान है, उत्तर प्रदेश में कोई मायावती पर उंगली नहीं उठा सकता। इन मित्र को बताया और आपको भी बता रहा हूं कि मैं जिस टीवी चैनल में काम कर रहा हूं वह मायावती के उत्तर प्रदेश के नोएडा में हैं और आसानी से मेरा पता ठिकाना खोजा जा सकता है। तिहाड़ जेल देख ली है, जरूरी पड़ा तो डासना जेल भी देख लेंगे।

पहले की माला में हजार हजार के करारे नोट थे। सो रंग लाल था। लेकिन इस माला में तरह-तरह के नोट थे लिहाजा ये रंग-बिरंगी थी। मायावती की ये जवाबी माला अपनी अकड़ में, अपनी धौंस में विरोधियों को करारा जवाब है। बीएसपी का सिध्दांत है कि नोट में कोई खोट नहीं, ये नोट गरीब को अमीर बनाता है। लिहाजा अगर मायावती नोटों की माला पहनती हैं तो उनका समर्थक हर दलित वोटर भी नोटों की ताकत को फक्र से देखता है। पार्टी मानती है कि अपने नेताओं को दौलत से तौलना, उन्हें नोटों की माला पहनाना बीएसपी का पुराना तरीका है। 25 साल में पार्टी इसी तरीके से लंबा सफर तय कर पाई।

दो दिन से मायावती की माला पर बवाल चल रहा है। संसद से सड़क तक तूफान उठ रहा है। मायावती ने अपनी पार्टी के सांसदों और विधायकों की बैठक बुलाई। लगा कि शायद पहली माला पर सफाई दें। शायद माया की असली कीमत का खुलासा कर दें, या शायद मुलायम सिंह यादव को खरी खरी सुना दें जिन्होंने माला की कीमत 51 करोड़ आंकी थी। लेकिन बैठक के बाद एक दूसरी नोटों की माला मायावती का इंतजार कर रही थी।

दरअसल बीएसपी ने विपक्ष की कमजोर नस पकड़ ली है। उसे पता है कि विरोध जितना बड़ा होगा समर्थकों पर पकड़ उतनी ही मजबूत होगी। माला पर बवाल जितना बढ़ेगा असल मुद्दों से ध्यान उतना ही बंटेगा। लिहाजा वो अपने विरोधियों को चिढ़ा रही है, ललकार रही है। ऐसे में नियम, कायदे, कानून और नैतिकता की परवाह भला किसको है। माया की माला में कितने नोट। कितने की है माया की ये माला। 21 लाख, 5 करोड़, 21 करोड़ या 51 करोड़ ये सवाल सब को मथ रहा है। लेकिन सवाल ये भी उठ रहे हैं कि आखिर ये माला कैसे बनी। किसने बनवाई, किससे बनवाई। इसे बनाने में कितने नोट लगे। माया की माला पर बवाल होने के बाद इस माला का क्या हुआ। बीएसपी सूत्रों के मुताबिक माया को महारैली में करीब 1 मिनट के लिए पहनाई गई इस माला को बनाने में एक हफ्ते लगे। माया को पहनाई गई नोटों की माला को बैंगलोर की माला फैक्ट्री के कारीगरों ने बनाया। बैंगलोर से खास इन कारीगरों को लखनऊ बुलाया गया। इन्हें नोटों की माला बनाने में महारत हासिल है।

सूत्रों के मुताबिक मायावती की इस माला का डिजाइन थाइलैंड में बनने वाले माला के डिजाइन की तरह है। बीएसपी सूत्रों के मुताबिक पहले माला का पेपर मॉडल बनाया गया और उसे पार्टी के सीनियर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा को दिखाया गया। जब उन्हें माला पसंद आई तब जाकर नोटों की माला बनी। सवाल उठता है कि आखिर दूर से देखने में ये माला फूलों की माला कैसे लगी। इसके लिए नोट के सफेद किनारों को रंगा गया ताकि दूर से माला का रंग एक सा दिखे। फूलों की तरह लगे। माया को भी माला पसंद आई। लिहाजा महारैली में उन्हें पहनाए जाने के बाद फौरन नोटों की इस माला को पजेरो कार में रखकर सीधा मुख्यमंत्री आवास भेज दिया गया।

महारैली में माया की माला का राज जब खुला तो विपक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया। फौरन माला को पार्टी हेडक्वॉर्टर भेज दिया गया। जहां ये माला माया की फाइनेंस कमेटी के खास लोगों की देखरेख में है। उन 4 लोगों को माला तोड़ने में लगाया गया जिन्होंने इसे बनाया था। सूत्रों के मुताबिक माला को तोड़ने और वापस नोटों की शक्ल देने में करीब 12 घंटे लगे। इस काम में 4 कारीगरों के अलावा और 12 लोग लगे। यानी कुल 16 लोगों ने मिलकर मंगलवार शाम से रात भर में माला से नोटों को अलग किया। इस बात का खास ख्याल रखा गया कि नोट ठीक से निकाले जाएं, वो फटें नहीं। फिर मुड़े हुए नोटों को सीधा किया गया और बंडल बनाया गया। भारी चीज से नोटों को दबाया गया। वापस करारा करने के लिए प्रेस किया गया। फिर नोट गिनने की मशीन के जरिए उन्हें गिना गया और गड्डियां बना दी गईं। इन्हें किस बैंक अकाउंट में जमा किया जाएगा। फिलहाल ये पता नहीं है। लेकिन बीएसपी के सूत्र ये जरूर कह रहे हैं कि माला सिर्फ 21 लाख की ही थी।

माया के नोटों के मामले में एक अहम सुराग हासिल हुआ है। माला में लगे नोटों के सीरीज के नंबर पता चले हैं। ये सभी नोट हजार हजार नए और एकदम कड़क हैं। सोमवार को बीएसपी की मेगा रैली में मायावती को पहनाई गई माला के में गुथें इन नोटों का सीरियल नंबर। नोटों के सीरियल नंबर हैं 9- वी 410249, 9- वी 416623 9-v 416663, 9 -वी 416115, 9-वी 416611, 9-वी 416755।

करीब 16 फुट लंबी इस माला में हजार-हजार के जिन नोटों का इस्तेमाल हुआ है वो सभी 9-वी सीरिज के हैं। जिसकी शुरूआत 4 के अंक से होती है। सभी नोट एक साथ एक ही सीरीज से लिए गए। फिर इन्हें माया की माला में पिरोया गया है।ऐसे में कई कई सवाल उठते हैं। जिसका पहला छोर रिजर्व बैंक आफ इंडिया है। आखिर रिजर्व बैंक ऑॅफ़ इंडिया ने 9-वी सीरिज के हजार-हजार के नोट किस राज्य में भेजे। रिजर्व बैंक ऑॅफ इंडिया ने उस प्रदेश के किस शहर में ये नोट भेजे। उस शहर के किस बैंक की करेंसी चेस्ट को 9-वी की सीरीज भेजी गई।
जैसे ही इन सवालों के जवाब मिल जाएंगे खुद-ब-खुद साफ हो जाएगा कि करेंसी चेस्ट ने अपने बैंक कि किस शाखा को ये नोट जारी किए। उस बैंक के रिकॉर्ड खंगालने से साफ हो जाएगा कि आखिर किस ग्राहक को ये नोट दिए गए। क्योंकि इतनी भारी संख्या में नए और करारे नोट एक साथ एक ग्राहक को देने का रिकॉर्ड बैंक के पास सौ फीसदी होता है। साथ ही पांच लाख से ज्यादा की नकद निकासी पर आयकर विभाग की नजर होती है। नियमों के मुताबिक ये लेखा-जोखा बैंक के पास हर हाल में होगा। माया ने फिर पहनी नोटों की माला। लेकिन 17 मार्च और 15 मार्च की मालाओं में अंतर है। 15 मार्च को लखनऊ में बीएसपी की 25वीं वर्षगांठ पर महारैली में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मायावती को नोटों की माला पहनाई। दूर से देखने में फूलों की माला लग रही थी। जब विपक्ष की नजर नोटों की माला पर पड़ी तो उसने हंगामा मचा दिया।
17 मार्च को मायावती ने विरोधियों के विरोध को नीचा दिखाने के लिए फिर नोटों की माला पहनी। लेकिन इन दोनों मालाओं में फर्क है। हालांकि दोनों मालाएं नोटों से बनी हैं लेकिन 15 मार्च को पहनाई गई माला 1000-1000 के करारे नोटों से बनी थी। जबकि 17 मार्च को पहनाई गई माला 100, 500, 1000 के मिले जुले नोटों से बनी थी। हालांकि दोनों मालाओं में कई समानताएं भी हैं। मसलन दोनों नोटों की माला है। दोनों मालाओं में नोट गूंथे गए हैं। दोनों की लंबाई 16 फीट है। दोनों मालाओं का वजन करीबन एक है। लेकिन कई फर्क भी हैं। 15 मार्च वाली माला में सभी नोट नए थे, एक सीरीज के थे। लेकिन 17 मार्च वाली माला में अलग अलग नोट थे। सारे नोट बिल्कुल करारे नहीं थे।
विवादों की माला मायावती के गले से होते हुए विपक्ष के नेताओं की जुबान पर चढ़ गई। इस तरह चढ़ी कि न तो माया के गले से उतरने का नाम ले रही है। विपक्षी नेताओं की जुबान से 15 करोड़ी माला का अध्याय खत्म भी नहीं हुआ कि 18 लाख की माला ने उसकी जगह ले ली। सो विपक्ष का पसंदीदा वाक्य फिर गूंजा। दलित की बेटी नहीं दौलत की बेटी। कांग्रेस ने मायावती के खिलाफ मनी लॉन्डरिंग एक्ट लगाने की मांग की। साफ है, कांग्रेस बीएसपी की ये दलील मानने को तैयार नहीं कि माला के नोट कार्यकर्ताओं के हैं। इसलिए वो जानना चाहती है कि ये नोट कहां से आए। किसके जरिए आए, और कहां गए।

पार्टी का तो ये भी आरोप है कि ये मायावती का काला पैसा है जिसे माला में गूंथकर सफेद कर दिया गया है। ये माला अब केवल नोटों की नहीं रही ये माला अब दंभ, घमंड और ताकत-तिकड़म की माल भी बन गई है। भले ही इस माला से रिजर्व बैंक की क्लीन नोट पॉलिसी की धज्जियां उड़े। भले ही ये माला देश के मेहनतकशों का मजाक उड़ाए लेकिन सियासी मकसद से ये माला नोटों से गुंथती रहेगी। सियासी मकसद से इस पर विवाद भी चलता रहेगा।

आलोक तोमर

(लेखक जनसत्ता के वरिष्ठ फायरब्रांड पत्रकार रहे हैं....सम्प्रति डेटलाइन इंडिया के सम्पादक और सीएनईबी चैनल में सलाहकार सम्पादक हैं।)

Sunday, March 14, 2010

एक देश-एक जूनून : आई पी एल 3


आई पी एल -३ ने दस्तक दे दी है। पिछले वर्ष इसकी मार्केटिंग कुछ इस तरह हुई थी-"उपरवाले ने एक धरती बनाई हमने उस पर सरहदें बनाकर उसे कई देशों में बाँट दिया, लेकिन अब ये सरहदें मिटेंगी और सारे विश्व का एक देश एक जूनून होगा। " जी हाँ आई पी एल के ज़रिये दुनिया को एक करने का राग आलापा जा रहा है। इसे मनोरंजन का बाप कहा जाता है और इसका ग्लैमर कुछ ऐसा है की दिग्गज उद्योगपति और फ़िल्मी सितारे भी खुद को इसकी नाजायज़ औलादें बनाने पर आमदा है।


बड़े-बड़े संत महात्मा जो काम न कर पाए वो काम अब ललित मोदी की क्रिकेट लीग करने चली है। BCCI ने अपनी रईसी से दिग्गज क्रिकेट सितारों को तमाशा दिखाने इकठ्ठा कर लिया है। परिस्थितियों की बिसात पर रिश्तों का ताना-बना बुना जा रहा है। लक्ष्मी के आगे दोस्त, दुश्मन और दुश्मन, दोस्त बन रहे हैं। मनीपावर का ही खेल है जो एक भाई राजस्थान और दूसरा पंजाब से एक दुसरे के खिलाफ जंग लड़ रहे है। इतना सब होने पर भी सरहदें मिटने का राग आलापा जा रहा है।


दरअसल सरहदें ज़मीन पर नहीं इन्सान के दिमाग में होती है। दिमागी सरहदें ही इस दुनिया को आज तक बांटते चली आ रही हैं। एक घर में रहने वाले भाई, देवरानी-जेठानी, सास-बहु को यही सरहदें अलग करती है और इनके न होने पर कई बार दो दुनिया के लोग भी एक होते हैं। प्रसिद्द व्यंग्यकार सुरेन्द्र शर्मा कहते हैं-"लोग गलत कहते हैं दीवार में दरार पड़ती है दरअसल जब दिल में दरार पड़ती है तब दीवार बनती है।" आई पी एल के ज़रिये विश्व को एक करने की बात रास नहीं आती है। इसे देख लगता है की मोहल्ले की एकता के लिए घर में सरहदें बनायीं जा रही है।


"वसुधैव कुटुम्बकम" का सपना क्रिकेट से नहीं बल्कि "परस्परोपग्रह जीवानाम " अर्थात एक दुसरे के प्रति प्रेम और उपकार की भावना से पूरा होगा। इंसानियत के आलावा दूजा कोई विकल्प नहीं जो हमें एक कर सके। आई पी एल खिलाडियों और उद्योगपतियों को तो ख़ुशी दे सकता है पर आम आदमी इससे ठगाया ही जा रहा है। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हमारी जेबों से निकला हुआ पैसा ही इन तमाश्गारों की तिजोरी हरी कर रहा है। सारा ताम-झाम विज्ञापन और टी आर पी का है।

ये क्रिकेट नातो राष्ट्र भावना का संचार करता है न ही ये विशुद्ध क्रिकेट है। मनोरंजन का बाप जब सुप्त अवस्था में जायेगा तो गंभीर-दिल्ली का, सचिन-मुंबई का और युवराज-पंजाब का नहीं ये सब अखंड भारत के सपूत होंगे। जब असली क्रिकेट कि बात होगी तो लोग पांच दिनी टेस्ट मैचों को ही ललचायेंगे। चीयरलीडर्स के कपड़ों की तरह छोटा किया गया ये क्रिकेट असली क्रिकेट के पिपासुओं कि प्यास नहीं बुझा सकता। इसकी बढती लोकप्रियता इसकी महानता का पैमाना नहीं है। दरअसल हम उस देश के वासी है जहाँ हर विचार हिट होता है। देश की दशमलव पांच प्रतिशत जनता किसी भी विचार को सुपर-डुपर हिट करने को काफी है। इस छोटे से आंकड़े को जुटाना बहुत मशक्कत का काम नहीं है।

इस क्रिकेट के होने से सरहदों के मिटने का भ्रम न पाले। सरहदों का निर्माण हमारी कुछ ज्यादा ही समझ का परिणाम है। विभाजन हमारे स्वार्थ से पैदा हुआ है। दीवारें हमारी कभी न मिटने वाली इच्छाओं का परिणाम है। गनीमत है हवा-पानी और ये ज़मीन खुद नहीं बटती नहीं तो इंसानी अस्तित्व ही खतरे में हो जाये। रिफ्यूजी फिल्म का एक गीत है "पंछी नदिया पवन के झोंके कोई सरहद न इन्हें रोके, सरहद इंसानों के लिए है सोचो मैंने और तुमने क्या पाया इन्सान होके" खुद से यही हमारा प्रश्न है कि इन्सान होके हमने कर क्या लिया? शिक्षित होकर हम वेवकूफ क्यों हो रहे हैं, हम पैदा तो ऐसे नहीं हुए थे।

खैर दुनिया कि गतिविधियों के बारे में सोचना तो संभव है पर उन्हें बादल पाना मुश्किल। हर चीज का तार्किक होकर खुद को विचार करना है। सही-गलत का उत्तर हमें अपने-आप से ही मिलेगा। बहरहाल देखते हैं इस बार आईपीएल क्या रंग दिखाता है।

Monday, March 8, 2010

तुम्हारी लड़ाई...

सैकड़ों साल से
जकड़ी गई
बेड़ियां
अब टूटती जा रही हैं
उच्श्रंखल...
उत्साहित...उत्तेजित
आधी आबादी
पूरी आज़ादी के
गीत गा रही है


ओंठ
जिनके बोलने पर
बंदिश थी
वो नई बंदिशें
गुनगुना रहे हैं....
युग के लोग
तुम्हारे जीतने की
युगगाथा
सुना रहे हैं....


तुमको देखना
कई बार
थोड़ा तो
हीन महसूस कराता है
पर इस हीनता बोध का
तुमको बढ़ते देखने के
सुख से
गहरा नाता है


तुम्हारा संवरना
संवरना है
परिवार का...
तुम्हारा जीतना
जीतना है संसार का...


तुम्हारी ताकत
हम सबकी ताकत है
तुम्हारी प्रतिष्ठा
कौम की इज़्ज़त है


पर हां इतनी
हम सबकी लाचारी है
तुम्हारी लड़ाई
केवल तुम्हारी है....


(ये पोस्ट महिला दिवस पर उन सब पुरुषों की तरफ से दुनिया जीत रही आधी आबादी को शुभकामना है....जो उनके बढ़ते देख खुश तो हैं....पर उनकी लड़ाई में भागीदारी करने में अक्षम हैं....या विवश हैं....या फिर भागीदारी के जोखिमों से डरते हैं.....)

रात भर

रात भर चलती हैं रेले

ट्रक ढोते हैं माल रात भर

कारखाने चलते हैं

कामगर रहते हैं बेहोश

होशमंद करवटे बदलते हैं रातभर

अपराधी सोते हैं

अपराधों का सम्बन्ध अब

अँधेरे से नहीं रहा

सुबह सभी दफ्तर खुलते हैं अपराध के ।

नरेश सक्सेना की कविता

Saturday, March 6, 2010

हिन्दू

पीपल की
डाल काटना बहुत ज़रूरी था
सो उसने एक मुसलमान भाई को बुला लिया

इस तरह उसने
संकट भी टाल दिया
पाप मढ़ दिया दुसरे के मत्थे
और अपना धर्म भी बचा लिया
खलु खल हिन्दू !

ऐसा ही कुछ करते होंगे और धर्म के लोग
कटती होगी डाली कोई मरता होगा दीन....... !


अष्टभुजा शुक्ला की कविता ..

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

अर्थ...अनर्थ....मतलब की बात !

ब्लॉग एक खोज ....