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Friday, July 27, 2012

हास्य के साथ हास्यास्पद बदलाव की आशा

एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान अरविंद केजरीवाल से बात हुई। यह बात करीब अभी से एक साल पुरानी है। यानी पिछले साल जब अन्ना हजारे करप्शन विरोधी मशीन ईजाद कर रहे थे। अरविंद से मैंने पूछा था कि आपके पास ह्युमन चैन क्या है? जिसके जरिए आप देशभर के जन सैलाब को बांधे रखेंगे। एकाध बार तो सही है कि लोग स्वस्फूर्त आ भी जाएंगे। और फिर मीडिया के पास कुछ और रहा तो फिर आप क्या करेंगे।? अरविंद इतने आत्मविश्वस्त थे कि वे कुछ भी विरोधी बात नहीं सुनना चाहते थे। उन्होंने इस प्रश्न को इतना हल्के से लिया और कहा, यह तो लोगों को सोचना है कि वे करप्शन से निपटने के लिए कोई बिल पास करवाने की विल रखते हैं या नहीं। अरविंद की इस बात से मैं सहमत नहीं हुआ। मैंने वीडियो कॉन्फ्रेंस की अपनी मर्यादाओं के बीच तीन बार उनसे इस पर बहस चाही। मगर अरविंद को लगा जैसे मेरे अखबार ने उन्हें यहां अपमानित करने के लिए बुलाया है। तो वह पैर पटककर बोले यह तो मीडिया के कुछ जिम्मेदार लोगों को सोचना होगा, वरुण जी आप इस बारे में नहीं समझ पाएंगे। मेरा प्रश्न पत्रकार के नाते जरूर था, किंतु आम आदमी की छटपटाहट भी था। मैं वास्तव में इस टीम से जुडऩा चाहता था। किंतु मुझे कोई रास्ता ही नहीं दिख रहा था। इससे जुडऩे के लिए टीवी देखना इकलौती शर्त थी, वो भी न्यूज चैनलों की बातें जो वे पूर्वाग्रस्त से भी कह सकते थे। उस दौर का मेरा मानस था कि देश, राष्ट्र अगर रिएक्ट कर रहा है, यह नहीं कि वह लोकपाल के लिए लड़ रहा है। बस रिएक्ट कर रहा है, तो अच्छा अवसर है हमें भी समाज में आगे आना चाहिए। मन मानस सब तैयार था कि कैसे भी इस महा आंदोलन में कूदेंगे। चाहे नौकरी जाए, चाहे घर, चाहे परिवार। देशप्रेम या यूं कहिए एक सोशल कंर्सन इतना बलवान हुआ। किंतु अरविंद की बेहूदा इस बात ने झल्ला दिया। मैं यह नहीं कहता कि मैं कूद ही जाता, किंतु कूद जरूर जाता। अगर अरविंद या अन्ना थोड़े भी प्रैक्टिकल होते। भीड़ के बूते आगे बढ़े लोगों को आखिरकार चाहिए तो भीड़ ही होती है। मैं नहीं गया उल्टा मुझे कोफ्त सी भी हुई कि यह क्या व्यवस्था बदलने की बात कर रहे हैं, वो भी इतने अव्यवस्थित तरीके से। इस विंडबना ने मुझे इस आंदोलन से दूर किया और यह भी मैं दावे से कहता हूं कि मेरे जैसे लाखों लोगों को आंदोलन ने ऐसी ही गैर जिम्मेदाराना बातों से दूर किया है। अब जब बाबा रामदेव उर्फ राजनीतिज्ञ योगासन गुरु यह कह रहे हैं, कि लोकतंत्र में अपनी बात मनवाने के लिए कम से कम 1 फीसदी लोग तो साथ हों। तो गलत नहीं कह रहे। सच है ऐसे तो यह पर्सनल आंदोलन हो गया। और रहा अनशन का तो यह लोकतंत्र में गरिमापूर्ण स्थान रखता है, लेकिन कल, परसो, शाक भाजी जैसा अनशन हो गया तो क्या होगा। यह अभी भी मौका है अन्ना को थिंक टैंकों की शरण में होना चाहिए। वे इसे फिर से बनाकर निश्चित ही प्रासंगिक, सांदर्भिक और कार्यरूपित आंदोलन की शक्ल में ढाल सकेंगे। अन्ना को मेरा खुला निमंत्रण है अगर चाहें तो मुझसे बात कर सकते हैं। इसी हास्य के साथ गंभीर बात पर हास्ययुक्त तरीके से बदलाव की अति हास्यास्पद आशा के साथ। वरुण।

Sunday, July 22, 2012

पंचायत मतलब सबकुछ गलत क्यों?

कभी फरमानों तो कभी बेजा शोषण के अरमानों के लिए खाप पंतायतें अपने पाप के साथ चर्चाओं में रहती हैं। इसे लोकतंत्र का चरम कहिए या फिर अतिश्योक्ति। या यूं भी कह सकते हैं कि यह मौजूदा यूनिफॉर्म सिस्टम के खिलाफ एक अजीब सी आवाज भी है। हम यह भी जानते हैं कि गांधी के ग्राम सुराज की परिकल्पना इन्हीं पंचायतों की सीढ़ी से साकार हो सकती है। मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में इन्हीं पंचायतों की गरिमा और गर्व की बात की जाती है। इन्हीं पंचायतों में मानव के स्वभावगत व्यवस्थापन की कल्पना भी की जाती रही है। लेकिन अफसोस कि अब खापें खंडहर होकर भी भूतिया सोच और फरमानों की एशगाह सी बन गईं हैं। हमारे गांव मेंं किसी दौर में एक ऐसी ही पंचायत हुआ करती थी। नजदीकी गांव तक से लोग इस पंचायत में जमीनी विवाद से लेकर हर उस बात के लिए आते थे, जो कि यहां सच्चे न्याय के लिए संभावित नजर आती। सालों इस पंचायत ने न्याय दिया। मुझे याद है 1993 में एक बड़े किसान के हलवाए (नौकर) को उसके ही रिश्तेदारों ने लठ से मार-मारकर अधमरा कर दिया था। यह घटना बिल्कुल गुपचुप तरीके से हुई। हलवाए को मरा मानकर मारने वाले घर आ गए। लेकिन दूसरे दिन जब हलवाए की खोज की गई तो वह खेत में मरणासन्न मिला। पुलिस को बुलाने जैसी बातें भी की गईं। साथ ही गांव की यही पंचायत भी सक्रिय हो गई। सक्रिय इसलिए नहीं कि कोई उलूल-जुलूल फरमान जारी करेगी। सक्रिय इसलिए भी नहीं कि पुलिस के दखल को कम करेगी। और सक्रिय इसलिए भी नहीं हुई कि पंचायत तय कर दे कि कौन हत्यारा है। पंचायत के लोगों ने एक राज्य की व्यवस्था की तरह आनन-फानन में पंचों को बुलाया। पूरे गांव के लोग जमा हुए। एक संसद सा माहौल। एक ऐसी संसद जहां पर प्रतिनिधि चुना नहीं, उसका राज्य में पैदा होना ही चुने जाने के बराबर है। हर कोई खुलकर इस पंचायत में बात कर सकता था। पंचायत का मुख्य विचार यही निकला कि यह महज एक हलवाए की हत्या के प्रयास का मामला नहीं, बल्कि गांव की शांति का भी मसला है। पंचों ने इस मौके पर बहुत ही संजीदा और जिम्मेदाराना रुख अपनाया। पंचायत ने पुलिस को पड़ताल में साथ देने के लिए युवाओं की टोली बनाई। बुजुर्गों ने अपने अनुभवों को सांझा किया। यहां पर न तो रॉ जैसी जासूस एजेंसी थी, न सीबीआई जैसी जांच एजेंसी। मगर इस पंचायत ने ऐसे किया जैसे एक राज्य में कोई सरकार करती। पुलिस के साथ मिलकर पूरे गांव ने एक सप्ताह के भीतर हत्यारों की गतिविधियों को पकड़ लिया। मरणासन्न हलवाया बयान देता इससे पहले ही अपराधी हिरासत में थे। यह कहानी कहने का मतलब महज इतना है कि गांवों की यह पंचायतें खाप नहीं हैं। न ही यह ऐसी हैं जिनके वजूद को खत्म कर दिया जाए। अच्छा होगा कि इनके बारे में नकारात्मक राय फैलाने की बजाए इन्हें नैतिकता और प्राकृतिक न्याय के प्रति उन्मुख किया जाए। और गांधी के ग्राम सुराज की परिकल्पना को साकार बनाया जाए। वरुण के सखाजी

Tuesday, July 10, 2012

फिल्म एक था टाइगर में आईएसआई और रॉ की तुलना गलत

सलमान खान की नई फिल्म एक था टाइगर पाकिस्तान में आईएसआई के नाम को इस्तेमाल करने पर बैन हो गई है। दूर से जरूर ऐसा लगता है कि यह पाकिस्तान का हठवादी फैसला है, किंतु जरा करीब जाइए तो लगेगा वास्तव में ऐसा ही फैसला तो भारत को भी लेना चाहिए। यह कैसी बात है कि पाकिस्तान की आईएसआई और भारत की रॉ को एक ही जैसा मान लिया गया और किसी को एतराज तक नहीं हुआ। फिल्म के ट्रेलर में एक वाइस ओवर में कहा गया है पिछल 65 सालों में भारत पाकिस्तान के बीच 4 जंगों हो चुकी हैं, और इनके नतीजे भी सभी को पता हैं। किंतु पाकिस्तान की आईएसआई और भारत की रॉ ऐसी एजेंसियां हैं तो हर घंटे जंगों लड़ा करती हैं। इस बात पर भारत सरकार को कड़ा ऐतराज होना चाहिए। दरअसल फिल्म का यह डायलॉग साबित करता है कि भारत की रॉ एजेंसी भी आईएसआई की तरह ही आतंकवाद को बढ़ावा देने में मदद करती है। रॉ जैसी प्रतिष्ठित स्वरक्षा के लिए जासूसी करने वाली एजेंसी पर यह आरोप सरासर गलत कहने वाले भारत में ही ऐसी फिल्में चालाकी से ऐसा कर जाती हैं। सलमान खान उत्साहित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं। भीड़ इकट्ठा करने के लिए माने जाते हैं, एक अच्छे कलाकार हैं। किंतु चुपके से इस तरह का इंजेक्शन भारतीय मानुष में लगा देना बिल्कुल ही गलत है। इस बात पर जंू तक नहीं रेंगा लोगों के सिर पर, कि फिल्म ने कितनी ही चालाकी से यह साबित कर दिया कि रॉ और आईएसआई में कोई फर्क नहीं। आईएसआई मुल्ला परस्ती के साये में आतंक और सिर्फ भारत के खिलाफ आतंक फैलाने में सहायक होती है। यह बात कई आतंकियों के पकड़े जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर भी साबित हो चुकी है। किंतु रॉ के बारे में पाकिस्तान ऐसे कई मिथ्या प्रयास कर चुका है, साबित नहीं कर पाया। एक अदद फिल्म ऐसा कहकर करने जा रही है और हम हैं कि चुप बैठे हैं। - वरुण के सखाजी

Tuesday, July 3, 2012

बचपन: वक्त का खूबसूरत कोना

बालमन की सुलभ इच्छाएं बड़ी आनंद दायक होती हैं। कई बार सोचते-सोचते हम वक्त के उस कोने तक पहुंच जाते हैं, जहां हम कभी सालों पहले रचे, बसे और रहे होते हैं। जिंदगी जैसे अपनी रफ्तार पकड़ती जाती है, हम उतने ही व्यवहारिक और यथार्थवादी होते जाते हैं। किंतु यह यथार्थ हमसे कल्पनाई संसार की रंगत ले उड़ता है। वह कल्पनाई संसार जो अनुभवों की गठरी होता है, सुखद एहसासों के आंगन में मंजरी होता है, हल्की सहसा आई मुस्कान की वजह होता है। इस कल्पनाई संसार से दूर जाकर हम देश, दुनिया की कई बातें सीखते, समझते और जानते हैं। किंतु जब बचपन की यह खोई, बुझी, बिसरी और स्थायी सी सुखद यादें दिमाग में ढोल बजाती हैं, तो मन भंगड़ा करने लग जाता है। यादों की धुन पर मन मस्ती में डूब गया, जब 20 साल पुरानी चिल्ड्रन फेवरेट लिस्ट पर चर्चा शुरू हुई। किस तरह से एक अदद स्वाद की गोली के लिए तरसते थे, किस तरह से हाजमोला कैंडी के विज्ञापन को देख मन मसोस कर बैठ जाते थे, कैसे स्कूल के रास्ते में पडऩे वाली दुकानों पर लटके पार्ले-जी के विज्ञापन को देख मन डोल उठता था। सोचने लगते कि वह बच्चा कितना लकी है जो इस बिस्किट के पैकेट पर छपा रहता था, जब चाहे बिस्किट खाता होगा। खूब खाता होगा, मम्मी तो उसे कभी मना करती नहीं होगी, फोटो तक उसका खिंचवाया है। बालमन यहां तक इच्छा कर बैठता कि काश मेरे घर बैल गाड़ी में ऊपर तक भरकर बिस्किट आएं। और ऐसा नहीं कि यह इच्छा मर गई हो, वह इमेज भी आज जेहन में जस की तस है, जब इस बात की कल्पना की गई थी। मेरा घर, उसमें खड़ी लकड़ी की बैल गाड़ी, उसमें लदे फसल के स्थान पर बिस्किट, हरेक बिस्किट में दिख रहा है वही गोरा-नारा हिप्पीकट बच्चा। इस बात की कल्पना कोयल जब भी मन के किसी कोने से कूकती है तो यादों का बियावां खग संगीत पर और जवां हो जाता है। वो मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम की बसों के पीछे बना एक सुंदर सा बच्चा और हाथ में लिए स्वाद की गोली। वाह मजा आ जाता। जब उसे देखता और उसके चेहरे की परिकल्पना करते कि वह कितना लकी है जिसके हाथ में स्वाद की गोली है, वो भी जब वह चाहे तब। स्वाद के प्रति क्रेज ऐसा रहा कि टीवी पर जब एड आता स्वाद-स्वाद और एक व्यक्ति आसमान से स्वाद की गोलियां फेंकता तो लगता था जैसे अब गिरी या कब गिरी मेरे आंगन में। बालमन की कल्पनाएं यहीं नहीं थमतीं वह मीठे पान पर भी खूब मुज्ध होता है। मीठे पान में डलने वाले लाल-लाल पदार्थ को क्या कहते हैं आज भी नहीं मालूम, मगर हम लोग उसे हेमामालिनी कहते थे। लोग इसमें मीठे पेस्ट की ट्यूब डालकर उसे धर्मेंद्र कहते थे। तब तो नहीं, लेकिन आज लगता है धर्मेंद्र और हेमामालिनी का मीठे पान की दुनिया में अद्भुत योगदान रहा है। बालमन एक और कुलांचे भरता है। बातों ही बातों में शरारतें भी जवां होने लगती हैं। इनमें छुप-छुपकर कंचा खेलने, स्कूल में आधी छुट्टी के बाद न जाने, चौक चौराहों पर बैठकर बड़ों की बातें सुनने जैसी बातों पर लगे प्रतिबंध आज के अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों जैसे विषय हुआ करते थे। बालमन की कल्पनाएं उस वक्त और अंगड़ाई लेने लगती हैं, जब बीसों साल पुराने किसी खाद्य उत्पाद के पैकेट्स कहीं मिल जाएं। कहीं बात छिड़े तो यूपी, बिहार, गुजरात, की सीमाओं से परे होकर कॉमन इच्छाएं, कठिनाइयां, कमजोरियां, चोरियां, शरारतें और मन को आह्लादित करने वाली खुशियां मिलने लग जाती हैं। इस अद्भुत बचपन के सफर को संभालकर रखने की जिम्मेदारी अपने दिमाग की किसी स्टोरेज ब्रांच को दे दीजिए, वरना सोने जैसी मंहगी होती मेमोरी में स्पेस नहीं बचेगा इन खूबसूरत एवर स्माइल स्वीट मेमोरीज को सहजेने के लिए। चूंकि संसार में घटनाएं बहुत बढ़ गईं हैं। रोजी के जरिए आपका दिमागी ध्यान ज्यादा चाह रहे हैं, ऐसे में दिमाग के पास हर घटना के डाटा रखने की जिम्मेदारी है, तब फिर कहां रखेंगे इन बाल चित्रों जैसे स्माइली इवेंट्स को। वरुण के. सखाजी

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