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Sunday, May 30, 2010

हम कौन थे...क्या हैं...क्या होंगे....(हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष)





आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है। 184 साल हो गए। मुझे लगता है कि हिन्दी पत्रकार में अपने कर्म के प्रति जोश कम है। तमाम बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। उदंत मार्तंड इसलिए बंद हुआ कि उसे चलाने लायक पैसे पं जुगल किशोर शुक्ल के पास नहीं थे। आज बहुत से लोग पैसा लगा रहे हैं। यह बड़ा कारोबार बन गया है। जो हिन्दी का क ख ग नहीं जानते वे हिन्दी में आ रहे हैं, पर मुझे लगता है कि कुछ खो गया है। क्या मैं गलत सोचता हूँ?
पिछले 184 साल में काफी चीजें बदलीं हैं। हिन्दी अखबारों के कारोबार में काफी तेज़ी आई है। साक्षरता बढ़ी है। पंचायत स्तर पर राजनैतिक चेतना बढ़ी है। साक्षरता बढ़ी है। इसके साथ-साथ विज्ञापन बढ़े हैं। हिन्दी के पाठक अपने अखबारों को पूरा समर्थन देते हैं। महंगा, कम पन्ने वाला और खराब कागज़ वाला अखबार भी वे खरीदते हैं। अंग्रेज़ी अखबार बेहतर कागज़ पर ज़्यादा पन्ने वाला और कम दाम का होता है। यह उसके कारोबारी मॉडल के कारण है। आज कोई हिन्दी में 48 पेज का अखबार एक रुपए में निकाले तो दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया का बाज़ा भी बज जाए, पर ऐसा नहीं होगा। इसकी वज़ह है मीडिया प्लानर।
कौन हैं ये मीडिया प्लानर? ये लोग माडिया में विज्ञापन का काम करते हैं, पर विज्ञापन देने के अलावा ये लोग मीडिया के कंटेंट को बदलने की सलाह भी देते हैं। चूंकि पैसे का इंतज़ाम ये लोग करते हैं, इसलिए इनकी सुनी भी जाती है। इसमें ग़लत कुछ नहीं। कोई भी कारोबार पैसे के बगैर नहीं चलता। पर सूचना के माध्यमों की अपनी कुछ ज़रूरतें भी होतीं हैं। उनकी सबसे बड़ी पूँजी उनकी साख है। यह साख ही पाठक पर प्रभाव डालती है। जब कोई पाठक या दर्शक अपने अखबार या चैनल पर भरोसा करने लगता है, तब वह उस वस्तु को खरीदने के बारे में सोचना शुरू करता है, जिसका विज्ञापन अखबार में होता है। विज्ञापन छापते वक्त भी अखबार ध्यान रखते हैं कि वह विज्ञापन जैसा लगे। सम्पादकीय विभाग विज्ञापन से अपनी दूरी रखते हैं। यह एक मान्य परम्परा है।

मार्केटिंग के महारथी अंग्रेज़ीदां भी हैं। वे अंग्रेज़ी अखबारों को बेहतर कारोबार देते हैं। इस वजह से अंग्रेज़ी के अखबार सामग्री संकलन पर ज्यादा पैसा खर्च कर सकते हैं। यह भी एक वात्याचक्र है। चूंकि अंग्रेजी का कारोबार भारतीय भाषाओं के कारोबार के दुगने से भी ज्यादा है, इसलिए उसे बैठने से रोकना भी है। हिन्दी के अखबार दुबले इसलिए नहीं हैं कि बाज़ार नहीं चाहता। ये महारथी एक मौके पर बाज़ार का बाजा बजाते हैं और दूसरे मौके पर मोनोपली यानी इज़ारेदारी बनाए रखने वाली हरकतें भी करते हैं। खुले बाज़ार का गाना गाते हैं और जब पत्रकार एक अखबार छोड़कर दूसरी जगह जाने लगे तो एंटी पोचिंग समझौते करने लगते हैं।
पिछले कुछ समय से अखबार इस मर्यादा रेखा की अनदेखी कर रहे हैं। टीवी के पास तो अपने मर्यादा मूल्य हैं ही नहीं। वे उन्हें बना भी नहीं रहे हैं। मीडिया को निष्पक्षता, निर्भीकता, वस्तुनिष्ठता और सत्यनिष्ठा जैसे कुछ मूल्यों से खुद को बाँधना चाहिए। ऐसा करने पर वह सनसनीखेज नहीं होता, दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में नहीं झाँकेगा और तथ्यों को तोड़े-मरोड़ेगा नहीं। यह एक लम्बी सूची है। एकबार इस मर्यादा रेखा की अनदेखी होते ही हम दूसरी और गलतियाँ करने लगते हैं। हम उन विषयों को भूल जाते हैं जो हमारे दायरे में हैं।
मार्केटिंग का सिद्धांत है कि छा जाओ और किसी चीज़ को इस तरह पेश करो कि व्यक्ति ललचा जाए। ललचाना, लुभाना, सपने दिखाना मार्केटिंग का मंत्र है। जो नही है उसका सपना दिखाना। पत्रकारिता का मंत्र है, कोई कुछ छिपा रहा है तो उसे सामने लाना। यह मंत्र विज्ञापन के मंत्र के विपरीत है। विज्ञापन का मंत्र है, झूठ बात को सच बनाना। पत्रकारिता का लक्ष्य है सच को सामने लाना। इस दौर में सच पर झूठ हावी है। इसीलिए विज्ञापन लिखने वाले को खबर लिखने वाले से बेहतर पैसा मिलता है। उसकी बात ज्यादा सुनी जाती है। और बेहतर प्रतिभावान उसी दिशा में जाते हैं। आखिर उन्हे जीविका चलानी है।
अखबार अपने मूल्यों पर टिकें तो उतने मज़ेदार नहीं होंगे, जितने होना चाहते हैं। जैसे ही वे समस्याओं की तह पर जाएंगे उनमें संज़ीदगी आएगी। दुर्भाग्य है कि हिन्दी पत्रकार की ट्रेनिंग में कमी थी, बेहतर छात्र इंजीनियरी और मैनेजमेंट वगैरह पढ़ने चले जाते हैं। ऊपर से अखबारों के संचालकों के मन में अपनी पूँजी के रिटर्न की फिक्र है। वे भी संज़ीदा मसलों को नहीं समझते। यों जैसे भी थे, अखबारों के परम्परागत मैनेजर कुछ बातों को समझते थे। उन्हें हटाने की होड़ लगी। अब के मैनेजर अलग-अलग उद्योगों से आ रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता के मूल्यों-मर्यादाओं का ऐहसास नहीं है।
अखबार शायद न रहें, पर पत्रकारिता रहेगी। सूचना की ज़रूरत हमेशा होगी। सूचना चटपटी चाट नहीं है। यह बात पूरे समाज को समझनी चाहिए। इस सूचना के सहारे हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी होती है। अक्सर वह स्वाद में बेमज़ा भी होती है। हमारे सामने चुनौती यह थी कि हम उसे सामान्य पाठक को समझाने लायक रोचक भी बनाते, पर वह हो नहीं सका। उसकी जगह कचरे का बॉम्बार्डमेंट शुरू हो गया। इसके अलावा एक तरह का पाखंड भी सामने आया है। हिन्दी के अखबार अपना प्रसार बढ़ाते वक्त दुनियाभर की बातें कहते हैं, पर अंदर अखबार बनाते वक्त कहते हैं, जो बिकेगा वहीं देंगे। चूंकि बिकने लायक सार्थक और दमदार चीज़ बनाने में मेहनत लगती है, समय लगता है। उसके लिए पर्याप्त अध्ययन की ज़रूरत भी होती है। वह हम करना नहीं चाहते। या कर नहीं पाते। चटनी बनाना आसान है। कम खर्च में स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन बनाना मुश्किल है।

चटपटी चीज़ें पेट खराब करतीं हैं। इसे हम समझते हैं, पर खाते वक्त भूल जाते हैं। हमारे मीडिया मे विस्फोट हो रहा है। उसपर ज़िम्मेदारी भारी है, पर वह इसपर ध्यान नहीं दे रहा। मैं वर्तमान के प्रति नकारात्मक नहीं सोचता और न वर्तमान पीढ़ी से मुझे शिकायत है, पर कुछ ज़रूरी बातों की अनदेखी से निराशा है।

प्रमोद जोशी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और सम्प्रति प्रतिष्ठित हिंदी राष्ट्रीय दैनिक हिंदुस्तान के दिल्ली में वरिष्ठ स्थानीय सम्पादक हैं।)

Thursday, May 27, 2010

बुद्ध....बुद्ध मुस्कुराए हैं



आज बुद्ध जयंती है....हम में से ज़्यादातर इसे शायद केवल इसलिए याद करते हैं क्योंकि कई जगह इस दिन सरकारी कार्यालयों में अवकाश होता है.....चलिए आज एक बार बस एक बार बुद्ध को आंख बंद कर के याद करें और स्मरण करें वो रास्ता...अहिंसा और शांति का जो उन्होंने दिखाया था.....प्रस्तुत है बामियान में बुद्ध की मूर्तियों के ध्वंस पर सरोज परमार की एक कविता जो मुझे काफी पसंद आई.....

बुद्ध

अमन का कबूतरकंगूरे पर बैठ
घिघियाता रहा
गिड़गिड़ाता रहा
फिर जार-जार सोया था
उस दिन
बेबस हो गई थी भाषा
बेकस हो गये थे अर्थ
तुम्हारे खौफ़नाक इरादों के सामने।
ओर
बहभियान कला का नायाब तोहफा
तुम्हारे जनून के हत्थे चढ़ गया
कनिष्ठ ने 'क' से पढ़ाई थी
कन्धार कला
तुमने क से पढ़ा दिया कठमुल्लापन।
कठमुल्ले कला को कत्ल करते रहे
आसमान थर्राता रहा दरिन्दगी के नाच पर
शायद
तोड़ना तुम्हारा वजूद
तुम्हारे विश्वास
तुम्हारे मिथक
खुद को छलना है।
सत्य को तोड़ना
खुद को तोड़ना है
बारूद, तोपखाने रॉकेट लाँचर
नहीं मिटा सकते तुम बुद्ध को
बुद्ध तो चतेना है।
चेतना शाश्वत है
नसों में जब-जब भी दौड़ता है युद्ध
धड़कने लगता है दिल में बुद्ध
बुद्ध तो
युद्ध से शान्ति तक की यात्रा हैं।

सरोज परमार

और एक कविता जो हरिश्चंद्र पांडे की है.....

बुद्ध मुस्कुराए हैं....


लाल इमली कहते ही इमली नहीं कौंधी दिमाग़ में

जीभ में पानी नहीं आया

‘यंग इण्डिया’ कहने पर हिन्दुस्तान का बिम्ब नहीं बना


जैसे महासागर कहने पर सागर उभरता है आँखों में

जैसे स्नेहलता में जुड़ा है स्नेह और हिमाचल में हिम
कम से कमतर होता जा रहा है ऐसा

इतने निरपेक्ष विपर्यस्त और विद्रूप कभी नहीं थे हमारे बिम्ब

कि पृथिवी पर हो सबसे संहारक पल का रिहर्सल

और कहा जाए
बुद्ध मुस्कराये हैं


हरिश्चंद्र पांडे


Friday, May 21, 2010

हो सके तो...एक दिवंगत साथी की जीवंत कविताएं....


आज एक ऐसे साथी की दो कविताएं पढ़वाना चाहते हैं जो कल हम सबको अलविदा कह गया....कविताएं छोटी हैं पर बेहद संवेदनशील हैं, पहले कविता पढ़ें फिर कवि का परिचय भी.....  


हो सके तो...

मेरी रंगीन कब्र पर 

दीप मत जलाना 

हो सके तो 

जीते जी 

मेरे अंधेरे घर में 

उजाला कर दो...


मेरे चारों तरफ है 

आईने 

कहां छिपने जाऊं 

हो सके तो 

अपने सीने में 

छिपा लो मेरे आंसू ....


सपने

किसी भी उम्र में 

देखे जा सकते हैं

सपने

अंतिम सांस भी

कम नहीं होती

जिस जीवन में

सपने नहीं हैं...

वह सहेज कर

रखा गया  
पार्थिव शरीर है 

और कुछ नहीं....


प्रदीप श्रीवास्तव

(राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर में कार्यरत डिप्टी न्यूज एडिटर प्रदीप श्रीवास्तव की आज सड़क दुर्घटना में मौत हो गई है. प्रदीप कार चला रहे थे और एक ट्रक की कार से टक्कर हो गई. प्रदीप के साथ कार में बैठे उनके बहनोई की भी मौत हो गई. बताया जा रहा है कि टक्कर इतनी भीषण थी कि शव कार को काटने के बाद बाहर निकाला जा सका. प्रदीप की उम्र 47 वर्ष थी और वे करीब 18 वर्ष से राष्ट्रीय सहारा के साथ थे. वे राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर के जनरल डेस्क इंचार्ज थे।)  

Monday, May 17, 2010

और यूं चला गया ‘राजस्थान का सिंह’ भैरोंसिंह शेखावत

27 मई 1964 को दोपहर दो बजकर बीस मिनट पर आल इंडिया रेडियो की विविध भारती पर पर चल रहा गाना अचानक रुका और एक एनाउन्समेंट हुआ कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु नहीं रहे .तब लाखों कि भीड़ उमड़ी थी उनकी शव यात्रा में.


तब लोगों का कहना था कि जब उनकी मृत्यु हुई तब रेडियो पर गाना चल रहा था " मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे " ...

दरअसल उन दिनों नेताओं के लिए लोगों के दिलों में इज्ज़त होती थी...तब के नेता भी स्वतंत्रता की आग से तप कर निकले थे.. आज मुलायम सिंह और अमर सिंह के झगडे को देख कर लोग अपना न्यूज़ चैनल बदल देते हैं ..

कल भैरोंसिंह शेखावत की शव यात्रा सुबह 10.35 बजे फूलों से सुसज्जित ट्रक में सिविल लाइंस स्थित सरकारी आवास से रवाना हुई। रास्ते में सभी वर्गो के लोग पुष्प अर्पित करते जा रहे थे। अंतिम यात्रा में लोगों और वाहनों का एक किमी. लंबा काफिला था और लोग राजस्थान का एक ही सिंह, भैरोंसिंह, भैरोंसिंह जैसे नारे लगाते हुए चल रहे थे। सिविल लाइंस से शवयात्रा करीब 14 किमी की दूरी तय कर विद्याधर नगर पहुंची।

कल भैरोंसिंह शेखावत की शव यात्रा में शामिल लोगो की भीड़ देखने के बाद एक चीज समझ में आयी कि भैरोंसिंह शेखावत हमारे बीच कितने बड़े नेता थे. लाखों समर्थकों द्वारा ‘राजस्थान का एक ही सिंह’ कहलाने वाले पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत आखिरकार फेफड़े और सीने में संक्रमण से हारकर दुनिया को अलविदा कह गए।

भैरोंसिंह शेखावत बड़ी कद काठी में बड़े नेता भी थे...

सालों साल बाद किसी नेता कि अंतिम यात्रा में इतनी भीड़ नज़र आयी. हाल के वर्षो में कई बड़े नेताओं का इंतकाल हुआ . पी वी नरसिंह राव , देश के पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर , वी पी सिंह और प्रमोद महाजन . लेकिन ज्योति बासु के अलावाँ इतनी ज्यादा भीड़ अंतिम दर्शन के लिए या अंतिम यात्रा में नज़र नहीं आयी.................





अभिषेक कुमार ......

राजा-दयानिधि मौसेरे भाई...



रतन टाटा नीरा राडिया का इस्तेमाल कर के द्रमुक कोटे में किसी भी कीमत पर दयानिधि मारन को संचार मंत्री बनने से क्यों रोकना चाहते थे? धीरे धीरे गुप्तचर एजेंसियों के पास इसके सबूत आते जा रहे हैं। दयानिधि मारन करुणानिधि के चचेरे पोते हैं लेकिन उनका यही परिचय नहीं है। मारन परिवार एशिया के सबसे रईस परिवारों में से एक हैं और सन टीवी के अलावा उसके कई दक्षिण भारतीय भाषाओं में सात चैनल, कई एफएम स्टेशन और दिनाकरन नाम का एक अखबार भी है जो दस लाख कॉपी रोज बेचता है। जब इस मीडिया साम्राज्य के शेयर बेचे गए तो साढ़े आठ सौ रुपए में दस रुपए का एक शेयर बिका और जितनी उम्मीद थी उससे पैतालीस गुना ज्यादा बिका। पंद्रह दिन में मारन परिवार के पास 9 हजार 9 सौ 20 करोड़ रुपए आ गए।

दयानिधि मारन पहले खुद नीरा राडिया के काफी करीब थे। जब वे चेन्नई में हैल फ्रीजेज ओवर यानी एचएफओ के नाम से डिस्को और बार चलाया करते थे तो नीरा राडिया कई बार वहां देखी गई। अप्रैल 2006 में नीरा राडिया रतन टाटा को भी यहां ले के आई थी। सन मीडिया साम्राज्य दयानिधि के भाई और अमरीका में पढ़े लिखे कलानिधि चलाते हैं और जब दक्षिण भारत में उनके मीडिया साम्राज्य की तूती बोलने लगी तो उन्हाेंने इरादे और बड़े कर लिए। कलानिधि मारन ने रतन टाटा को संदेश भिजवाया कि उनके डिश कारोबार यानी टाटा स्काई डीटीएच सर्विस में एक तिहाई हिस्सा दस रुपए प्रति शेयर के हिसाब से सन समूह के नाम किया जाए। तब तक टाटा स्काई के अस्सी प्रतिशत मालिक टाटा थे और बीस प्रतिशत पैसा स्टार टीवी ने लगाया हुआ था। नीरा राडिया ने टाटा को समझाया मगर रतन टाटा ने साफ इंकार कर दिया। नीरा के जरिए ही रतन टाटा तक संदेश पहुंचाया गया कि दयानिधि मारन देश के संचार मंत्री है और मंत्रालय कभी भी टाटा स्काई बंद करवाने के लिए आदेश दे सकता हैं। लाइसेंस रद्द करना संचार और सूचना प्रसारण मंत्रालय का काम है और लाइसेंस की शर्तों में ऐसी एक दर्जन शर्ते हैं जिनके न मानने पर सरकार एकतरफा लाइसेंस रद्द कर सकती है।

उस समय लाल कृष्ण आडवाणी ने भी कहा था कि दयानिधि मारन अपने भाई और अपनी सन टीवी कंपनी को डीटीएच और एफएम के लिए सारे नियम तोड़ कर स्पेक्ट्रम अलॉट कर रहे हैं। रतन टाटा को खतरों का अंदाजा था इसलिए उन्हाेंने इस सरकार में दयानिधि मारन को संचार मंत्रालय किसी भी कीमत पर नहीं मिलने देने के लिए दलाली से ले कर दादागीरी तक और रोकड़े के इस्तेमाल तक सब कुछ किया।
नीरा राडिया और रतन टाटा के बीच 2009 और की बातचीत के जो और टेप निकल कर आए हैं उनमें से एक हिस्सा यह है।
रतन टाटा- यह दयानिधि बहुत गड़बड़ कर रहा है। ए राजा को तो मैनेज किया जा सकता हैं।

नीरा - पता है और दयानिधि का फोन मेरे पास भी आया था। वो गुलाम नबी और अहमद पटेल से लगातार मिल रहा है। करुणानिधि से भी मनमोहन सिंह को फोन करवाया है।

रतन टाटा- इसका क्या करना है? मुझे तो यह आदमी खतरनाक लगता है और ये हमे दूसरों के बराबर खड़ा नहीं होने देगा। राजा ने बीएसएनएल वाले मामले में हैल्प की थी और एक ज्वाइंट सेक्रेटरी को तो मेरे साथ कंाटेक्ट रखने के लिए कहा था।
नीरा- पैसा हर जगह चलता है। मगर दयानिधि और कलानिधि को पैसा कमाना आता है। बहुत चालाक है ये लोग। दयानिधि ने तो अपने टीवी चैनल और सारे मीडिया के काम का कॉरपोरेट ऑफिस डीएमके के ऑफिस में ही बनाया है। पार्टी को पैसा भी लगातार पहुंचता है। करुणानिधि को हैंडल करना पड़ेगा। मैं कनिमोझी- करुणानिधि की बेटी से संपर्क में हूं। लालची तो राजा भी है लेकिन उसे सिर्फ काम के पैसे चाहिए।

सुन लिया आपने? दयानिधि मारन के बहाने रतन टाटा की भी पोल कैसे खुल रही है? ए राजा पर सीधे सीधे स्पैक्ट्रम घोटाले में हजारों करोड़ के घपले का इल्जाम लगा। नीरा राडिया के साथ उनकी बातचीत के टेप उजागर हो गए मगर उनका मिस्टर क्लीन मनमोहन सिंह भी कुछ नहीं बिगाड़ पाए। कनिमोझी तो साफ साफ कहती है कि मारन बंधुओं का टीवी और अखबारों का साम्राज्य मदद करता है मगर अगर पार्टी नहीं होती तो यह साम्राज्य भी नहीं होता।

दयानिधि मारन का पूरा ध्यान सरकार में रखा जाता हैं। नीरा राडिया ने उन्हें संचार मंत्री भले ही न बनने दिया हो मगर सन टीवी ने जब दो आधुनिकतम जहाज आयात करने के लिए अर्जी दी और देश और विदेश में विमान सेवा शुरू करने का लाइसेंस मांगा तो उन्हें 237 करोड़ रुपए में ये जहाज आयात करने की मंजूरी मिल गई और 12 दिसंबर 2006 को दी गई अर्जी पर सिर्फ 23 दिन में यानी 5 जनवरी 2007 को विदेश व्यापार के महानिदेशक ने लाइसेंस के लिए नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दे दिया।

इसी बातचीत में एक जगह यह भी आया है कि दयानिधि मंत्री बनने के ठीक पहले तक सुमंगली केबल नेटवर्क चलाते थे और पूरे तमिलनाडु में केबिल कारोबार पर उनका ही सिक्का चलता था। मंत्री बनने के बाद उन्होंने सुमंगली केबल नेटवर्क भाई कालानिधि को पावर ऑफ अटार्नी पर दे दिया। इतना ही नहीं, दयानिधि मारन ने संसद में झूठ बोला कि सन चैनल से उनका लेना देना नहीं हैं मगर स्टॉक एक्सचेंज ने जो दस्तावेज दिए गए हैं उनके अनुसार दयानिधि मारन को इस पूरे कारोबार का प्रमोटर बताया गया हैं। करुणानिधि और दयानिधि के नामों का अर्थ एक ही होता है और शायद इसीलिए करुणानिधि अझागिरी और स्टालिन की नाराजी के बावजूद दयानिधि को बचाते रहते है।

आलोक तोमर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, फिल्म-टीवी के पटकथा लेखक हैं।)

Friday, May 14, 2010

डर....(पूर्णेंदु शुक्ल की छोटी कविता)


केव्स के वरिष्ठ साथी पूर्णेंदु शुक्ल जी ने एक बेहद छोटी सी पर उतनी ही गहरी कविता लिखी है...नई कविता आप भी पढ़ें......

डर...

वह बच्चा था
और तब
उसे हमेशा
मरने से डर लगता था....

अब...
वो
बड़ा हो चुका है
और...
ज़िंदगी से डरता है...

पूर्णेंदु शुक्ल
(लेखक पत्रकार हैं और सम्प्रति टीम सी-वोटर में चुनाव विश्लेषक हैं।)

Tuesday, May 11, 2010

राडिया के बहाने रिश्ता-रिसर्च...


कहानी उलझ रही है या सुलझ रही है यह तो आप तय करे। अपना काम आपको तथ्य बताने का है। दूरदर्शन के भूतपूर्व महानिदेशक भास्कर घोष ने एक टीवी चैनल शुरू किया था। नाम है ’’नाइन एक्स’’। चैनल बहुत धूम धड़ाके से शुरू हुआ और इसके पहले संपादक थे- वीर सांघवी। उन्हें चैनल में शेयर्स भी दिए गए थे मगर कुछ ही दिनों बाद वहां से चलते बने।
चैनल चला नहीं और फिर दृश्य में आई हमारी आपकी परिचित सुपर फिक्सर नीरा राडिया। उनके फोन की टैप की हुई बातचीत से पता चला है कि इंदौर के एक सेठ विनय छजलानी को उन्होंने सिर्फ मुखौटा बन कर यह चैनल खरीद लेने के लिए पटा लिया। पैसा अंबानी परिवार का लगा था और दो विदेशी कंपनियों के जरिए लगाया गया था। विनय, अभय छजलानी के बेटे हैं। अभय छजलानी हाल ही में पद्म श्री प्राप्त कर चुके हैं और इस उपलब्धि के चक्कर में पूरे देश के पत्रकारों को बुला कर शाही दावत दे चुके हैं।
छजलानियों के समूह के एक बड़े पत्रकार का नाम भी राडिया के दोस्तों में हैं मगर अभी दस्तावेज सामने नहीं आए इसलिए वे अपना आलोक बिखेर रहे हैं। मगर कहानी यह नहीं है। आज हम आपको यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि राजनीति, कारोबार और पत्रकारिता आपस में इतने घुल मिल गए हैं कि समझ में नहीं आता कि कौन कहां है और क्यों है? एनडीटीवी की बरखा दत्त पर ए. राजा को मंत्री बनाने के लिए भागदौड़ करने का इल्जाम लग चुका है मगर उनकी तरफ से कोई सफाई नहीं आई और किसी भी चैनल या पत्रिका ने उनसे सवाल भी नहीं पूछा। अब प्रणय रॉय एनडीटीवी के मालिक हैं। उनकी पत्नी राधिका बृंदा करात की बहन हैं। बृंदा करात मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो में हैं और इसके महासचिव प्रकाश करात की पत्नी भी है। प्रकाश करात चेन्नई में एन. राम, पी. चिदंबरम और मिथिली शिवरामन के साथ एक डिबेटिंग क्लब में थे और एक पत्रिका भी निकालते थे।
मार्क्सवादी पार्टी के सीताराम येचुरी की पत्नी का नाम सीमा चिश्ती है। सीमा चिश्ती इंडियन एक्सप्रेस की स्थानीय संपादक हैं। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता एनडीटीवी पर एक बहुत शानदार कार्यक्रम करते हैं। राजदीप सरदेसाई पहले एनडीटीवी के प्रबंध संपादक थे। उनकी शादी सागरिका घोष से हुई है। सागरिका घोष नाइन एक्स वाले भास्कर घोष की बेटी हैं। भास्कर घोष दूरदर्शन के महानिदेशक थे और उन्होंने एनडीटीवी को एक प्रोडक्शन हाउस के तौर पर करोड़ों रुपए के कार्यक्रम दिए। सागरिका की बुआ रुमा पाल सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश रही हैं और दूसरी चाची अरुंधती घोष संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी प्रतिनिधि है।
करन थापर आईटीवी कंपनी चलाते हैं जो बीबीसी के लिए कार्यक्रम बनाती है। करन थापर के पिता जी जनरल प्राण नाथ थापर के नेतृत्व में 1962 में चीन से हारा था भारत। करन थापर बेनजीर भुट्टो और वर्तमान पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खास दोस्त हैं। करन थापर के मामा की शादी जवाहर लाल नेहरू की भांजी और विजय लक्ष्मी पंडित की बेटी नयन तारा सहगल से हुई थी। राहुल बोस खालिद अंसारी के साढ़ू हैं। खालिद अंसारी मिड डे समूह के मालिक रहे हैं और हाल ही में दैनिक जागरण समूह को उन्होंने प्रकाशन बेच दिया है। खालिद अंसारी के पिता जी अब्दुल हमीद अंसारी कांग्रेस के नेता थे और स्वाधीनता संग्राम सेनानी भी थे। भारत में क्रिश्चियन आंदोलन के प्रवक्ता जॉन दयाल मिड डे के संपादक थे।
एन राम की पहली पत्नी का नाम सूजन हैं और वे आयरलैंड से हैं। इन दोनों की बेटी विद्या राम पत्रकार है। एन राम की शादी अब मरियम से हुई है और एन राम, जेनिफर अरुल और के एम रॉय कैथोलिक विषक कांफ्रेंस चलाने वाली संस्था के संस्थापक हैं। जेनिफर अरुल दक्षिण भारत में एनडीटीवी की स्थानीय संपादक हैं। वे इंडोनेशिया के चैनल एस्ट्रो स्वामी के लिए भी काम करती हैं। के एम राय हिंदू अखबार में काम करते हैं और समूह के मंगलम प्रकाशनों के संपाकद भी है। उन्हें ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन लाइफ टाइम पुरस्कार मिल चुका है जिसके उपाध्यक्ष डॉक्टर जॉन दयाल है। जोसेफ डिसोजा महासचिव हैं और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की अनुसूचित जाति, जनजाति समिति के सलाहकार भी है।
सुहासिनी हैदर सुब्रमण्यम स्वामी की बेटी है जिनकी शादी सलमान हैदर के बेटे से हुई है। सलमान हैदर 1996 तक भारत के विदेश सचिव के और बाद में ब्रिटेन और चीन में राजदूत भी रहे हैं। वे खुद स्टेटस मैन में कॉलम लिखते हैं और फोर्ड फाउंडेशन से पैसा ले कर साउथ एशियन पॉलिटिकल इनिशिएटेड नाम की एक दुकान चलाते हैं। तोसीह नाम का एक फारसी अखबार है जिसके हैदराबाद से निकलने वाले वार्ता से व्यवसायिक संबंध हैं। वार्ता एजीएफ पब्लिकेशंस चलाता है जिसके मालिक गिरीश सांघी हैं। गिरीश सांघी अखिल भारतीय वैश्य फैडरेशन के अध्यक्ष हैं जिसके सलाहकार समूह में दैनिक जागरण के चेयरमैन महेंद्र मोहन गुप्ता है।
डेक्कन क्रॉनिकल आईपीएल में टीम के मालिक होने के अलावा आंध्र भूमि नाम का एक तेलगू अखबार भी निकालता हैं। एमजे अकबर द्वारा शुरू किए गए एशियन एज को अब उसने हड़प लिया है। न्यूयार्क टाइम्स का प्रकाशन साझीदार बन गया है और इंटरनेशन हैराल्ड ट्रिब्यून का प्रकाशन भी करता हैं। डेक्कन क्रॉनिकल के मालिक टी वेंकट राम रेड्डी कांग्रेस की ओर से राज्य सभा के सदस्य भी रह चुके हैं। इसी समूह के संपाकद रहे एम जे अकबर भी एक बार कांग्रेस की ओर से लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं।
आंध्र प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वाई एस राजशेखर रेड्डी वाई एस जगन अखबार और टीवी चैनल चलाते हैं। उनके दोस्त करुणाकर रेड्डी तिरुपति न्यास के अध्यक्ष है और साक्षी नाम का अखबार चलाते हैं। ये अखबार लैंको ग्रुप के निवेश से चलता है और इसके उपाध्यक्ष श्रीधर के भाई एल राजगोपाल कांग्रेस के सासंद रह चुके हैं और वे भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री पी उपेंद्र के दामाद हैं। कहानी अभी और भी हैं और बगैर राजनैतिक या व्यापारिक संपर्कों के अगर आप पत्रकारिता में शिखर पर पहुंचना चाहते हैं तो आपकी उम्मीदें काफी हद तक बेकार साबित होंगी। यह रिश्तों, सौदों, दलालियों और भारी निवेश का खेल बन गया हैं।
आलोक तोमर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, फिल्म-टीवी के पटकथा लेखक हैं।)

Thursday, May 6, 2010

Quasab: again wounds to state

What is to be to verdict hang the terrorist Quasab. Indian judiciary did verdict once against a terrorist. He was a bigger and more dangerous than Quasab. Afzal laughed after judgment against. When he was laughing, every indian smiled on him. Indian were thinking, let see how Afzal hang till death. But indian was total wrong, Afzal did know our country more than us. He laughed that your judiciary can deliver only the judgment, it can not execute it. After a long drama, Afzal did file his clemency to the president of Indian. See the surprises series, first Afzal was caught, and prosecute legal case, and trial but the lastly, The hang was judged. He was a big accused and terrorist yet could not be hanged. So Quasab also now waiting to hang, and make us a big amount for his life and security. Actually nothing to be happened to hang verdict for any terrorist. But really they must be hanged publicly. Do not cheer, Quasab is still alive. We have no to fear from Quasab, Afazal or any terrorist from the glob, but we have to be very conscious and aware and beware of mental, and with in society terrorists and indian politics.

Wednesday, May 5, 2010

Judiciary: Restructure or amend it

Why the judiciary is playing with the all public emotions. Who has authorize it to do so. Who can make it arise the question on the functioning of the judiciary system. Although as for its concern, the sentence is to make sure justice for all. Judiciary go with punch, let it be released many of accused, against the justice to innocents. As per the sentence, we should think about Quasab as well. The question is that judiciary of india functioning for whom. Is it set-up for us (Indian) or non indian also. If it is true that the justice is to cure rights and freedom of life of whole human kind. So we should be expected same as from other republics also. As for common concerns with Indians about mumbai attack, we could have get Qusab throat block till his death. This can be my only opinion, but it is not true. This is the voice of nation of its freedom fighters and the own blood irrigaters of green india, enriched india, happy india, golden india. Each of classes are irritated by judiciary on the matter of Quasab. When this suffocation mounting up as its faster speed, each one began to go far from the set-up system. Judiciary has to be accountable for the people of state. The time is going fast towards the neo-age of fresh breath for all. Every one is saying, sharing, understanding, and interacting with surrounding. Early in tomorrow, people will be participating as well. if judiciary does'nt reply and aware so the time is coming when public come to the judges and begin to ask, leave the hold over judiciary and go away from this honor bench and chair. Although judiciary must aware all about cases but it has to be very aware regarding this types of cases, simultaneously amending public nature to distrust on natural justice.

Sunday, May 2, 2010

अगर ये हत्या है...तो दोहरा हत्याकांड है....नीरू हमें माफ़ करना...


फर्ज़ी सुसाइड नोट?
आत्महत्या का नाटक....?
हत्या की पूरी तैयारी....???
अपनी ही बेटी की हत्या....?
उसका कुसूर क्या था....?
प्रेम करना....
या प्रेम को विवाह में बदलने की इच्छा....
और अगर ये हत्या है....
तो फिर ये दोहरा हत्याकांड है....

निरुपमा की तस्वीर को कम से कम दो-तीन बार ध्यान से ज़रूर देखिएगा....आपको नीरू की इस तस्वीर में कहीं न कहीं अपनी बेटी...बहन...ज़रूर नज़र आएगी....और अगर नहीं आती है तो फिर अपने आप को आइने में दो-चार बार ज़रूर देखिएगा....कि क्या आपमें इंसान होने के कितने लक्षण बचे हैं.....पर सवाल आपके इंसान होने या न होने का भी नहीं है, सवाल तो केवल और केवल ये है कि आखिर कैसे और कब हम इंसान होने की मूलभूत अहर्ताएं भी हासिल कर पाएंगे....
नीरू के लिए उसके दोस्त कहते हैं कि वो एक बेहद हंसमुख लड़की थी...उसके सहपाठी कहते हैं कि वो एक अव्वल छात्रा थी.....उसके सहकर्मी कहते हैं कि वो होनहार पत्रकार भी थी...फिर आखिर कैसे उसके गरवाले ये शिकायत कर सकते थे कि वो एक अच्छी बेटी नहीं थी....उसका कुसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपनी पसंद के एक लड़के से प्रेम करने की हिम्मत कर दी थी....और उस प्रेम को वो केवल जवानी के दिनों की यादों में संजो कर नहीं रखना चाहती थी, वो ुसे विवाह के मुकाम पर पहुंचाना चाहती थी....नीरू नौकरी कर रही थी...आत्मनिर्भर थी...वो चाहती तो घर वालों से छुप कर भी शादी रचा सकती थी और फिर क्या कर लेते उसके वो घरवाले जिन्होंने अपनी ही....कहते भी हलक सूखता है....
नीरू की गलती थी कि वो सही रास्ते से अपनी मंज़िल पाना चाहती थी...अगर नीरू बिना घरवालों की मर्ज़ी के ये शादी कर लेती तो ज़्यादा से ज़्यादा एक दो साल बाद यही लोग उसे वापस अपना लेते...पर हमारे तथाकथित सभ्य समाज को सीधे और सरल तरीके पसंद ही कहां हैं....हमारी गौरवशाली संस्कृति का दम भरने वाले ठेकेदार अब कहां हैं...और क्या नाम देंगे इसे...
अफसोस ये भी है कि नीरू एक पत्रकार थी....उसे कई और ज़िंदगियों को रोशन करना था पर वो खुद ही बुझ गई...उसे उन्होंने ही बुझा डाला जिन्होंने उसे रोशनी दी थी....
मैं जानता हूं कि अभी भी कई लोग सवाल करेंगे कि क्या गारंटी है कि नीरू ने आत्महत्या नहीं की उसका क़त्ल हुआ है....तो एक बार उसकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट (पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का लिंक...ज़रूर देखें) पूरा ज़रूर पढ़ें....चलिए आपको बता ही देते हैं सरल भाषा में ये क्या कहती है....
  • उसकी श्वसन नली में कंजेशन था....
  • उसके दोनो फेफड़ों में भी कंजेशन था...
  • ह्रदय के दोनो कोष्ठों में रक्त था...
  • उसके लिवर में कंजेशन था....
  • उसकी किडनी में कंजेशन था...
  • स्प्लीन में कंजेशन था...
मतलब कुल जमा ये कि उसकी मौत दम घुटने से हुई...और ये सामान्य बुद्धि है कि कोई भी अपना गला खुद घोंट कर आत्महत्या नहीं कर सकता है....
लेकिन सबसे दर्दनाक सच सामने लाती है पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की आखिरी लाइन.....

"उसके गर्भाशय में 10-12 हफ्ते का शिशु भ्रूण था"

बहुत से लोग अब इस पर भी उंगलियां उठाएंगे...नाक भौं सिकोड़ेंगे...क्योंकि समाज की सभ्यता का यही तकाज़ा है....किसी को नहीं बख्शेंगे ये लोग....पर मैं केवल ये जानता हूं कि अगर ये हत्या है तो ये दोहरा हत्याकांड है....
क्या कहूं....जिस धर्म...जाति और ईश्वर की ये समाज दुहाई देता है क्या वाकई उसका कोई अस्तित्व भी है....

क्या ये वही लोग हैं जो साल में दो बार 8 दिनों तक नारी शक्ति की पूजा पाठ कर्मकांड कर के नवें दिन कन्याओं के पैर छूते हैं....
नीरू के शरीर में पल रहा भ्रूण जिस किसी का भी अंश था..मैं उसे नहीं जानता....पर क्या पुरुषों के लिए भी ऐसी ही सज़ा होगी....क्या उस बच्चे में उस पुरुष का अंश नहीं है....या सारी गलती नीरू की ही थी...
ज़ाहिर है अब मैं भावुक हो रहा हूं...और हमारे सभ्य समाज में भावुक केवल सामाजिक प्रतिष्ठा और दकियानूसी नियमों को लेकर हुआ जाता है...मानवीय नीतियों और मूल्यों को लेकर नहीं....ये भी एक नियम ही है.....
माफ करना नीरू हम तुम्हें बचा नहीं पाए...पर क्या अफसोस करें तुम्हारे जैसी हज़ारों नीरू हम खो चुके हैं...शायद खोते भी रहेंगे....
मेरा पुनर्जन्म में कतई यकीन नहीं है...पर मैं जानता हूं एक और नीरू कहीं और जन्म ले चुकी है...उसकी होनी में क्या लिखा है....हक...या मौत......
(पूरे प्रकरण का सबसे दुखदायी पहलू ये है कि मीडिया जिसका नीरू हिस्सा थी...टीवी या प्रिंट....लगभग मुंह सिले हुए है...क्यों वे ही बेहतर जानेंगे...)

अगर आपको लगता है कि नीरू को न्याय मिलना चाहिए तो आप भी चार शब्द तो लिख ही सकते हैं....

नीरू से जुड़ी और पोस्ट्स के लिंक...
मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com
9310797184

Saturday, May 1, 2010

कब तक रोकोगे.... (कविता) (मई दिवस विशेष)



इतिहास की किताबों को
जो मन में आये बक लेने दो
अलां फलां चीज़ों के लिए
अमुक चमुक को श्रेय देने दो
पर...
मेरा भी यकीन करो
एक बात बतलाता हूँ
दिल्ली का लाल किला
मैंने ही बनाया है
ये और बात है कि
मैं इसकी गद्दी पर कभी बैठा
ना इस पर झंडा फहराया है
मेरे नाम पर कोई मार्ग नहीं
पर
सारी सड़कें मैंने ही बनाई हैं
दो जून की रोटी की खातिर
उम्र भर हड्डियाँ गलाई हैं
मैं गैस रिसने से मरता हूँ
मैं पानी भरने से मरता हूँ
कभी खदान में मरता हूँ
कभी खलिहान में मरता हूँ
मैं दो हाथ हूँ , फौलाद हूँ
पहाड़ समतल ज़मीं पाताल करता हूँ
समझ में ये नहीं आता
के जीता हूँ या फिर रोज़ मरता हूँ
मैंने ही
छोटे बड़े हर शहर को बसाया है
तमाम बिखरी चीज़ों को
करीने से सजाया है
कोई बतलाये मुझको
मेरी मेहनत की कीमत....
कौन लगाता है
मेरी पैदा की चीज़ों को
मेरे ही सामने बेच आता है
मुझे ना रोको कोई अब
नई दुनिया बसाने दो
मुनाफे का महल तोड़ो
ज़रूरत को , ज़रूरत से मिलाने दो !!!!!

पूर्णेंदु शुक्ल
(लेखक पत्रकार हैं और सम्प्रति टीम सी-वोटर में चुनाव विश्लेषक हैं।)
1 मई...या मई दिवस...या मजदूर दिवस....हमारी नई पीढ़ी में शायद ज़्यादातर लोगों को आज के दिन की महत्ता तो दूर...शायद इसके बारे में पता भी नहीं होगा....पर मई की इस गर्मी में भी वो सुबह ही अपने कंधे पर बोरी टांग निकल चुका है...और अभी धूप में कहीं अपने कर्म में रत होगा....हमारेविभाग के... विश्वविद्यालय के ही एक वरिष्ठ पूर्व छात्र पूर्णेंदु शुक्ल ने आज ये कविता CAVS संचार के सभी पाठकों के लिए लिख भेजी है....कविता छोटी है पर शायद सबकुछ कहने में सक्षम है....ज़ाहिर है हर कहानी एक कविता है...और हर कविता में कई कहानियां......पूर्णेंदु जी ने लम्बे वक्त बाद कोई कविता लिखी है...सो बधाई और आज के दिन की बात कहने के लिए साधुवाद भी....

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