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Thursday, May 27, 2010

बुद्ध....बुद्ध मुस्कुराए हैं



आज बुद्ध जयंती है....हम में से ज़्यादातर इसे शायद केवल इसलिए याद करते हैं क्योंकि कई जगह इस दिन सरकारी कार्यालयों में अवकाश होता है.....चलिए आज एक बार बस एक बार बुद्ध को आंख बंद कर के याद करें और स्मरण करें वो रास्ता...अहिंसा और शांति का जो उन्होंने दिखाया था.....प्रस्तुत है बामियान में बुद्ध की मूर्तियों के ध्वंस पर सरोज परमार की एक कविता जो मुझे काफी पसंद आई.....

बुद्ध

अमन का कबूतरकंगूरे पर बैठ
घिघियाता रहा
गिड़गिड़ाता रहा
फिर जार-जार सोया था
उस दिन
बेबस हो गई थी भाषा
बेकस हो गये थे अर्थ
तुम्हारे खौफ़नाक इरादों के सामने।
ओर
बहभियान कला का नायाब तोहफा
तुम्हारे जनून के हत्थे चढ़ गया
कनिष्ठ ने 'क' से पढ़ाई थी
कन्धार कला
तुमने क से पढ़ा दिया कठमुल्लापन।
कठमुल्ले कला को कत्ल करते रहे
आसमान थर्राता रहा दरिन्दगी के नाच पर
शायद
तोड़ना तुम्हारा वजूद
तुम्हारे विश्वास
तुम्हारे मिथक
खुद को छलना है।
सत्य को तोड़ना
खुद को तोड़ना है
बारूद, तोपखाने रॉकेट लाँचर
नहीं मिटा सकते तुम बुद्ध को
बुद्ध तो चतेना है।
चेतना शाश्वत है
नसों में जब-जब भी दौड़ता है युद्ध
धड़कने लगता है दिल में बुद्ध
बुद्ध तो
युद्ध से शान्ति तक की यात्रा हैं।

सरोज परमार

और एक कविता जो हरिश्चंद्र पांडे की है.....

बुद्ध मुस्कुराए हैं....


लाल इमली कहते ही इमली नहीं कौंधी दिमाग़ में

जीभ में पानी नहीं आया

‘यंग इण्डिया’ कहने पर हिन्दुस्तान का बिम्ब नहीं बना


जैसे महासागर कहने पर सागर उभरता है आँखों में

जैसे स्नेहलता में जुड़ा है स्नेह और हिमाचल में हिम
कम से कमतर होता जा रहा है ऐसा

इतने निरपेक्ष विपर्यस्त और विद्रूप कभी नहीं थे हमारे बिम्ब

कि पृथिवी पर हो सबसे संहारक पल का रिहर्सल

और कहा जाए
बुद्ध मुस्कराये हैं


हरिश्चंद्र पांडे


2 comments:

  1. दोनों रचनाएँ बहुत अच्छी लगी. आभार आपका.

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