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Wednesday, August 27, 2008

भिवानी में हार-जीत के वो पल

(हिन्दी पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर हैं एन डी टीवी के रवीश कुमार। रवीश जी नियमित तौर पर वेब के लिए अपने अनुभव और अपने विचार लिखते रहते हैं,प्रस्तुत लेख रवीश जी ने NDTV Khabar के लिए लिखा था।)

भिवानी का देवसर गांव। ठीक चार बज रहे थे। बॉक्सर जितेंद्र कुमार के घर वालों ने मीडिया के लिए शामियाने का इंतज़ाम किया था। टीवी लगाया गया था। लाइव कवरेज के लिए 20 ओबी वैन से घर का हर रास्ता घिर चुका था। जितेंद्र कुमार के पिता जी ने कहा कि ढाई मणि की मन्नत मांगी है, मां भवानी से। कर्म और भाग्य की सीमा रेखा का लांघते, मिटाते अब सब कुछ उस मालिक पर निर्भर था जो सबका मालिक है। ढाई मणि यानी सौ किलो लड्डू की मन्नत। बीजिंग से एक फोन आता है। जितेंद्र कुमार अपने भाई सुरेंद्र कुमार को कहता है, मस्त हो कर मैच देखना। मीडियावालों का ख्याल रखना। कोई नाटक नहीं। सब कुछ सहज। देश का नेशनल मीडिया एक बार फिर से गांवों की खोज करने पहुंचा था। लोगों को लग रहा था कि यह एक उभरता भारत है। विकासशील देश में उभरने की तमाम संभावनाएं और कहानियां बची रहती हैं। जितेंद्र, अखिल और विजेंद्र उन बची हुईं लाखों कहानियों का हिस्सा हैं जो अभी कही जानी हैं।ख़ैर, जितेंद्र की हार होते ही उभरते भारत की कहानी कहने वाले अपने साज़ोसामान समेटने लगे। विजेंद्र कुमार के घर की तरफ रवाना हो गए। वहां उभरते भारत को देखने। टिके रहे तो सिर्फ गांव के बुज़ुर्ग। सबने कहा 20 साल की उम्र है जितेंद्र की। अभी तो सारी उम्र पड़ी है। हम हार से नहीं घबराते। ऐसे बुजुर्ग बड़े शहर वालों के पास नहीं होते। इसीलिए, वो नाकामी के क्षणों में अवसाद के शिकार हो जाते हैं। गांव के बुज़ुर्ग नाकामी के समय में भी साथ रहते हैं। लेकिन, मीडिया के लिए उभरता हुआ भारत तभी है जब वहां से कोई कामयाब होता है। देश के लिए। जिस देश के लोगों ने कमीशन और रिश्वत खाकर इन छोटे शहरों की कई पंचवर्षीय योजनाओं को गटक लिया है। सिर्फ 20 मिनट के फासले में जितेंद्र कुमार उभरते हुए भारत की कहानी बनते बनते रह गया। हार के साथ ही उसे भुला दिया गया। जिस तरह बड़े शहर वाले छोटे शहर को नाकाम समझ कर भुला देते हैं। ओबी वैन अब विजेंद्र कुमार के घर की तरफ दौड़ने लगी।कालुवास गांव। गांव के चौधरी, ताऊ और चाचा सब जमा हो गए थे। भोले शंकर और जय मां भवानी। इन्हीं के भरोसे छोटे शहर और गांव के लोग अपनी मन्नतों को छोड़ देते हैं। मां भवानी की कृपा होगी तो पूरी हो जाएगी। वरना कोई बात नहीं। मां भवानी के भक्त तब भी रहेंगे। उसी तरह से जैसे भिवानी की टूटी सड़कें, ध्वस्त ट्रैफिक व्यवस्था और लुटेरे प्राइवेट क्लिनिकों के बाद भी लोग इस छोटे शहर में रहते हैं। रहना पड़ता है।हवा में नारे गूंज रहे थे। वहां मौजूद एक-दो पत्रकार को छोड़ किसी को मालूम नहीं था कि बॉक्सिंग में स्कोर कैसे मालूम करते हैं। लोगों को मालूम था। वो हर पंच पर स्कोर का एलान कर देते और मां भवानी बोलने लगते। क्रिकेट के शब्दों की तरह बाउट यहां की भाषा का आम शब्द है। बाउट हो रही है। सब देख रहे थे और इंतज़ार कर रहे थे उस जीत का जिसे इतिहास के तमाम पन्नों में दर्ज होना था। विजेंद्र कुमार के घर की औरतों के लिए नज़ारा देखने के लिए किसी खिड़की और बालकनी में जगह नहीं बची थी। हर तरफ कैमरे लगे थे। बड़े शहर वाले अपने घरों में बैठे छोटे शहर को देख रहे थे। गांव का आदमी कैसे कर गया? क्या यह नया भारत नहीं है? ये असली इंडिया है। विजेंद्र कुमार ने साबित कर दिया है।तभी बिजली चली गई। विजेंद्र की जीत के साथ ही बिजली चली गई। शायद पूरी रात के लिए। घर अब इनवर्टर के भरोसे था या फिर टीवी कैमरों की लाइट से रोशन हो रहा था। घर की तमाम औरतें अब रसोई में थी। मीडिया और मेहमानों के लिए चाय बना रही थीं। तमाम होटल वाले, धर्मशाला वाले और सर्राफा बाज़ार वाले आकर मिठाई बांट चुके थे। कैमरों के सामने विजेंद्र के बचपन की कहानी गाकर जा चुके थे। गांव के एक व्यक्ति ने कहा जब आप आ ही गए हो तो इस गांव की समस्या भी उठा दो। भिवानी में नाले के पानी से बाढ़ आ गया। इसके बारे में उठा दो। यहां बिजली नहीं रहती, ये तो दिखा दो। मैंने कहा, अभी तो मुख्यमंत्री का फोन आया था बधाई के लिए। उनसे कहते कि समस्याओं को ठीक कीजिए। जवाब मिला जब मीडिया दिखाएगा तभी मिलेगा। आप हो तभी 25-50 लाख का एलान भी हो रहा है। वरना क्या पता इतना भी मिलता या नहीं। खिलाड़ी तो इस इलाके के बहुत से इंटरनेशनल खेले हैं। आप ही कुछ कर सकते हैं।मैंने उन्हें धोखे में नहीं रखा। कह दिया कि मीडिया कल चला जाएगा। आप लोगों को बिना बिजली और सड़क के ही रहना होगा। विजेंद्र एक कामयाब कहानी है। लेकिन वो भिवानी की कहानी नहीं है। वो कुछ लोगों की मेहनत और इरादे की कहानी है। शुक्र है भिवानी का समाज खिलाड़ियों को हताश नहीं करता। सब प्रोत्साहित करते हैं। शायद यही वजह रही होगी कि ओलिंपिक से पहले भी यहां खिलाड़ी सम्मान के साथ जीता होगा।फर्क सिर्फ इतना था कि विजेंद्र की कामयाबी को आज वो समाज अपनी कामयाबी भी मान रहा था। सरकार के नुमाइंदे हमेशा की तरह रेवड़ियों का एलान कर रहे थे। मैंने भिवानी के डीसी का इंटरव्यू करने से मना कर दिया। उनके नुमाइंदे को कह दिया कि उनके पास अगर घोषणाओं के अलावा कुछ है बताने के लिए तो फिर बात करता हूं। वरना उन सबसे कहिए कि बिजली का इंतज़ाम कर दें। बिजली नहीं आई और डीसी साहब जा चुके थे।विजेंद्र कुमार जैसों का छोटा शहर। उसके पिता महिपाल सिंह ने कहा बुरा लगता है जब कोई हमें छोटे शहर का कहता है। मैंने कहा मुझे भी बहुत बुरा लगता है। लोग भूल जाते हैं कि हर दिन छोटे शहरों के लाखों लोग सायकिलों, बसों, और ट्रेन की छतों पर लद-भर कर बड़े शहरों में जाते हैं और आबाद कर चले जाते हैं। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता ये सब महानगर छोटे शहरों, गांवों से आए लाखों करोड़ों लोगों की मेहनत से बसे हुए हैं।

रवीश कुमार
साभार:www.ndtvkhabar.com

2 comments:

  1. बंधु विजय पहली बार आप के ब्लॉग पर आया हूं शायद। लगा कि एक भारतीय के ब्लॉग पर आया हूं। अच्छा लगा सही लिखा है इस अंशुमन में आना है बार बार....।आता रहुंगा।

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  2. "गांव के बुज़ुर्ग नाकामी के समय में भी साथ रहते हैं। " यह आज का सबसे सुंदर विचार है - आप बहुत अच्छा लिखते हैं, धन्यवाद.

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