एक क्लिक यहां भी...

Tuesday, August 5, 2008

स्वागत ...

महीना है अगस्त का..... और वक़्त है नए पंछियों के आगमन का और उसी सिलसिले को जारी रखते हुए हमारे विभाग में भी नए पंछियों का आगमन हो गया है ..... अलग अलग प्रान्तों, शहरों और संस्कृतियों से आने वाले ये नए पंछी भले ही अलग अलग बोलियों में चहकते हो पर बोलियाँ बदलने से भावना नहीं बदलती ........ ये सब एक साथ रहेंगे एक घोंसले में जो है केव्स ..... दृश्य श्रव्य अध्ययन केंद्र और इस बड़े वृक्ष का नाम है माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय !
अलग अलग राज्यों से आए और विभिन्न बोलियाँ बोलने वाले ये हमारे केव्स परिवार के नए सदस्य उम्मीद है कि विभाग को एक मिनी इंडिया या छोटा भारत बना देंगे ....... जहाँ रंग रूप, भेष - भाषा अलग होते हुए भी हम सब एक हैं एक दूसरे के लिए हैं ! जब तक यहाँ रहेंगे एक परिवार की तरह रहेंगे ...... लड़ाई झगडा होगा तो मान मनुहार भी .... और जब आंखों में आंसू लिए विदा होंगे तो भी एक दूसरे के साथ रहेंगे नैतिक और मानसिक रूप से !
हानि लाभ ...... सुख दुःख हर क्षण में साथ रहेगा केव्स ये शपथ लें और अच्छे पत्रकार बनें ...... क्यूंकि आप सब शायद इसीलिए घर से दूर आयें हैं इस नए परिवार में और हम यकीन दिलाते हैं कि ये आपका हमेशा साथ देगा ...... क्यूंकि परिवार हमेशा साथ रहता है !
बाकी बस यही कि हमेशा गुरुजनों का सम्मान करें ........ सीनिअर्स को पराया ना समझे और आपस की एकता कभी खंडित ना होने दें ................ एक दिन आप सब अपने माता पिता, गुरुजनों, विभाग का, देश का, पत्रकारिता और सबसे बढ़कर मानवता का सर ऊंचा कर दें यही हम सबकी शुभ कामना है !
आप सबका केव्स में स्वागत है ........ आशा है ये घर से दूर एक और घर बन पायेगा !
तो आज हम केव्स के सभी पूर्व विद्यार्थी और चिर परिवार जन अपनी गौरवशाली परम्परा आपको सौंपते हैं और निश्चिंत होते हैं कि आप इसके योग्यतम उत्तराधिकारी हैं !
और कुछ कहने की जगह साहिर लुधियानवी का एक गीत जो नया दौर फ़िल्म में भी था ....... ये सब कुछ बयान करता है ,

साथी हाथ बढ़ाना
एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना।
साथी हाथ बढ़ाना।
हम मेहनत वालों ने जब भी, मिलकर कदम बढ़ाया
सागर ने रास्‍ता छोड़ा, परबत ने सीस झुकाया
फ़ौलादी हैं सीने अपने, फ़ौलादी हैं बाँहें
हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें
साथी हाथ बढ़ाना।
मेहनत अपने लेख की रेखा, मेहनत से क्‍या डरना
कल गैरों की खातिर की, आज अपनी खातिर करना
अपना दुख भी एक है साथी, अपना सुख भी एक
अपनी मंज़‍िल सच की मंज़‍िल, अपना रास्‍ता नेक
साथी हाथ्‍ा बढ़ाना।
एक से एक मिले तो कतरा, बन जाता है दरिया
एक से एक मिले तो ज़र्रा, बन जाता है सेहरा
एक से एक मिले तो राई, बन सकती है परबत
एक से एक मिले तो इंसाँ, बस में कर ले किस्‍मत
साथी हाथ बढ़ाना।


मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com
9311622028

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

    ReplyDelete
  2. आपका भी स्वागत है.शुभकामनाऐं.

    ReplyDelete

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

अर्थ...अनर्थ....मतलब की बात !

ब्लॉग एक खोज ....