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Thursday, August 25, 2011

सुनो देश पर काबिज लोगों...

मैं भारत की युवा बोला रहा हूं। मेरे जैसे इस देश में सबसे ज्यादा हैं। लेकिन मेरा नेता 74 साल का अन्ना है। मैं अब तक अपना नेता नकली नेता को मानता रहा। विधायक, सांसद को मानता रहा। मगर यह सब तो एक थोथली व्यवस्था के अंग निकले। अन्ना लड़े, लड़ते रहे। मर गए। मर गए। मर गए।
अब क्या करूं। मैं। मैंने तो देख लिया गांधी के अहिंसा मार्ग को भी। मैं तो चल भी पड़ा अन्ना के साथ भी। मगर क्या बदला। क्या हुआ बड़ा काम। उल्टा सरकारी सुर और घातक हुए। कुछ नहीं होता यार ताकत उनके ही पास रहती है। अब झुके भी तो क्या अब मान भी जाएं तो क्या। नाम की संसद विधायक हैं। भैया वे सब मूल रूप से भेडिय़े हैं। सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज मैं युवा सालों से अच्छा सोचता रहा। मगर अब तक मुझे अच्छा मिला नहीं। अब मैं आपक अहिंसा मार्ग त्याग दूं तो मुझे पथभ्रष्ट न कहना। अन्ना की एक-एक सांस मेरी रगों में तैर रही है। अहिंसा की इज्जत कर रहा हूं। मगर अब कुछ हो जाए तो मत कहना। बसों को जलाकर मैं कोई रैली. तूफान नहीं लाना चाहता। मैं जंगलों में घुसकर कोई लाल गाल नहीं करना चाहता। मैं इस व्यवस्था में रहकर इसके ही खिलाफ कुछ करना चाहता हूं। हां अगर कुछ यानी अच्छा करने में दिक्कत हुई, तो मुझे जंगलों में जाकर बम बरसाने में भी बुराई नहीं लगेगी। मैं कहता हूं बार-बार। अगर हो जिम्मेदार। सरकार।
तो अभी भी वक्त है, अपना तथाकथित इगो छोड़ दो नेताओं। वरना देश में आग लग जाएगी। आज नहीं सही कल लग जाएगी। कल नहीं सही परसो मैं खून खराबा कर दिखाऊंगा। किसी मंत्री को निकाल लाल बत्ती से बीच रास्ते पर गोलियों से भून दूंगा। किसी अरुंधति, अरुणा का पकडक़र चित्रशाला की सियासत तोड़ डालूंगा। मैं इस जंग में किसी अन्ना से भी फिर इत्तेफाक नहीं रखूंगा। क्या मुझ युवा की मनशक्ति को इस दिशा में जाने से रोकने वाला कोई है।
( यह मनोवेग अब युवाओं और अन्ना समर्थकों के मन में आए हैं अगर आप सच्चे हैं, तो जरूर कुछ इतना ही क्रोध महसूस कर रहे होंगे। और हां आप अगर गलत हैं जरूर ही इन पंक्तियों से आप डर कर खारिज करने कुछ सोच रहे होंगे। और अगर आप कुछ भी कर ना चाहें तो बंदूक ही एक रास्ता आपको लग रहा होगा। - भारत का युवा)

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