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Sunday, January 11, 2009

हम रहें या न रहें लेकिन यह झंडा रहना चाहिए

(यह लेख कल लिखा गया था पर बैंडविथ की समस्या के कारण आज प्रकाशित किया जा रहा है)

'हम रहें या न रहें लेकिन यह झंडा रहना चाहिए और देश रहना चाहिए। मुझे विश्वास है कि यह झंडा रहेगा, हम और आप रहें न रहें, लेकिन भारत का सिर ऊँचा होगा।'

कौन सा भारतीय होगा जिसका मस्तक इन शब्दों को सुन कर गर्व से ऊंचा किस हिंन्दुस्तानी का सर इस गर्जन को सुनकर ऊंचा नहीं हो जाएगा ? यह सिंह नाद किया था लाल किले की प्राचीर से भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री ने। १५ अगस्त १९६५ की उस सुबह वह भाषण इसलिए ही नहीं महत्वपूर्ण था कि उसे प्रधानमंत्री ने दिया था बल्कि इसलिए भी कि उस समय भारत एक युद्ध की स्थिति से जूझ रहा था.....युद्ध जो थोपा गया था, युद्ध जो प्रतिष्ठा का प्रश्न था। ठीक आज की तरह....

आज मैं यह बात इसलिए कर रहा हूँ कि आज ११ जनवरी है और आज शास्त्री जी पुण्यतिथि है। दुर्भाग्य यह रहा कि मीडिया को ढूंढ ढूंढ कर कोसने वाला ब्लॉग जगत भी आज इससे अनजान रहा, क्या वाकई हमें याद नहीं था या हम याद करना नहीं चाहते। शास्त्री जी की पुण्यतिथि का भी महत्त्व इसलिए ज्यादा है कि उनका निधन तब हुआ जब वे रूस के ताशकंद में पाकिस्तान के साथ ऐतेहासिक समझौते के लिए गए थे।

२ अक्टूबर १९०४ को मोहन दास करमचंद गाँधी के जन्म के ठीक ३५ वर्ष बाद उत्तर प्रदेश के मुगलसराय कसबे में लाल बहादुर शास्त्री का जन्म हुआ पर जन्म के दो साल बाद ही पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव का देहावसान हो गया। माता के साथ लाल बहादुर मामा के पास चले गए। ये वे संकट और दुःख के दिन थे जब पिता के ना होने का एहसास और पराव्लाम्बित होने की पीड़ा की पहली वेदना को महसूस किया। बचपन से ही कद छोटा और काठी कमज़ोर थी और लाल बहादुर एक दोहा अक्सर गुनगुनाते थे
नानक नन्हे ही रहो, जैसे नन्ही दूब
और रूख सूख जायेंगे, दूब खूब की खूब
इस पीड़ा और परावलंबन की वेदना ने उन्हें वह ताक़त और हौसला दिया कि बचपन में स्कूल जाते पर जेब में नाव का किराया ना होने पर बाढ़ में उफनती हुई गंगा को तैर कर पार करते करते ज़िन्दगी के हर उफान को उसी हिम्मत और जज्बे से पार करते गए। असहयोग आन्दोलन में भाग लेने की वजह से जब सरकारी स्कूल से निकाल दिए गए तो १६ मील पैदल चल कर काशी विद्यापीठ रोज़ जाना वह जिजीविषा दिखाता है जिसने कभी हार नहीं मानी।
आज़ादी की लड़ाई के साथ ललिता शास्त्री से परिणय सूत्र में जुड़े, ससुराल से लिया एक खादी का थान और चरखा....यह थी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता। १५ साल के स्वाधीनता आन्दोलन के जीवन में ९ साल जेल में रहे, आज़ादी के शास्त्री जी रेल मंत्री थे जब एक गेट मैन की असावधानी से हुई दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी ख़ुद पर लेते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस कदम पर पंडित नेहरू ने कहा था,
'उनमें ऊँचे दर्जे की ईमानदारी, आदर्श के प्रति निष्ठा, अंतरात्मा की आवाज सुनने और कड़ी मेहनत करने की आदत है।'
क्या शिवराज पाटिल जैसे लोग भी उसी कौंग्रेस का हिस्सा हैं...१९६५ में देश में खाद्य संकट के समय जब अमरीका ने अनाज देने का प्रस्ताव रखा तो शास्त्री जी प्रधान मंत्री थे, राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उन्होंने कहा,
"साग सब्जी ज्यादा खाओ, सप्ताह में एक शाम उपवास रखो। जीना है तो इज्ज़त से जियेंगे, बेईज्ज़ती की रोटी से इज्ज़त की मौत भली।"
क्या है आज के किसी नेता में ऐसा आत्म सम्मान
पाकिस्तान के हमले पर शुरुआत में जब सरकार गांधीवादी नीति अपनाती रही तब लोकसभा में एक बार शास्त्री जी को Chiken Hearted (मुर्गी के दिल वाला) कह दिया गया। व्यथित शास्त्री जी अपने कार्यालय पहुंचे और तीनो सेनाध्यक्षों को बुला कर हमलावरों को कुचल देने का आदेश दे दिया। १३ दिन के अन्दर भारतीय सेनायें लाहोर पहुँच गई। पाकिस्तान के अमरीका से उधार लिए गए पैटन टैंक नेस्तनाबूद कर दिए गए।
बाद में रूसी राष्ट्रपति कोसिगिन के हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता हुआ....तारीख थी १० जनवरी १९६६ और उसी रात तथाकथित ह्रदय गति रुकने से ताशकंद में ही शास्त्री जी का निधन हो गया। रूस की जनता जो उनके स्वागत में सडको पर उतर आई थी, नम आंखों से उनको विदाई दे रही थी। भारत में जब उनका शव विमान से उतरा तो उसे श्री कोसिगिन और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान कन्धा दे रहे थे।
छोटे कद का विराट व्यक्तित्व चिर निद्रा में था। बचपन में गंगा के तट से शुरू हुई मझ्धारों की यात्रा अब परिणिति की ओर थी
माना अगम अगाध सिन्धु है, संघर्षों का पार नहीं है
किंतु डूबना मझधारों में, साहस को स्वीकार नहीं है
देश ने उनके १८ माह के प्रधानमंत्रित्व में आत्म सम्मान और हौसला पाया पर उनको खो दिया। एक ऐसा प्रधान मंत्री जो कद काठी में साधारण से भी कम और व्यक्तित्व में असाधारण से भी ज्यादा, जो बच्चो के द्बारा सरकारी कार के प्रयोग होने पर अपनी जेब से उसमे पेट्रोल डलवाता था....एक ऐसा प्रधानमन्त्री जिसके पास अपनी मृत्यु तक ख़ुद का मकान नहीं था......क्या आज ऐसे राजनेता हैं या कभी भविष्य में होंगे। अभी मैं उनको याद कर रहा हूँ और पीछे हरी ॐ शरण की आवाज़ में कबीर का भजन चल रहा है...जो शास्त्री जी का भी प्रिय भजन था .....
झीनी झीनी बीनी चदरिया
काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया
इडा पिङ्गला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया
आठ कँवल दल चरखा डोलै, पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया
साँ को सियत मास दस लागे, ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया
सो चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढि कै मैली कीनी चदरिया
दास कबीर जतन करि ओढी, ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया

1 comment:

  1. बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने. धन्यवाद.
    आज कल के नेता शास्त्री जी जैसा नहीं बनना चाहते. उनके लिए शास्त्री जी को भूल जाना ही बेहतर है. और जनता की बात करें तो, जो जनता मायावती को जिताती है उसे शास्त्री जी से क्या लेना?

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