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Saturday, April 12, 2008

ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे ............

आइन्दा २० तारीख को मशहूर शायर और हिन्दी फिल्मों के लिए सबसे शीरीं नगमात लिखने वाले मरहूम शकील बंदायूनी साहब को दुनिया से रुखसत हुए ३८ साल मुक़म्मल हो जाएँगे !!! इस जज्बाती मौके पर cavs संचार उन्हें सलाम करता है,,,,,,,,,,,,,

शकील साहब की पैदाइश उत्तर प्रदेश के बन्दायूं शहर में ३ अगस्त १९१६ को हुई । अपने एक दूर के रिश्ते दार जिया उल कादरी जो की मज़हबी शायरी करते थे उनसे हौसला पाकर शकील साहब बचपन से ही काफिये - रदीफ़ के पेचो ख़म में उलझने लगे । १९३६ में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिले के बाद उनकी शायरी परवान चढी।

अगरचे वह दौर तरक्की पसंद शायरी का था और साहिर, फैज़, मजाज़ जैसे शायरों की धूम थी लेकिन शकील साहब की तासीर जुदा थी । शायरी के नए और ज़दीद दौर में भी उन पर रिवायती उर्दू शायरी का रूमानी रंग दिखता था । सो उनके लिए अदबी दुनिया से ज़्यादा मुनासिब थी फिल्मों की दुनिया ।

फिल्मी दुनिया में शकील को पहला मौका नौशाद ने १९४७ में फ़िल्म दर्द में दिया । इसी फ़िल्म का शकील का लिखा गीत " अफसाना लिख रही हूँ " जिसे टुनटुन ने गाया , बहुत हिट हुआ। रफी नौशाद के पसंदीदा गायक थे , शकील पसंदीदा गीतकार। नौशाद , रफी, शकील की तिकड़ी ने मेला(१९४८), अंदाज़(१९४९), दुलारी(१९४९), बैजू बावरा(१९५२), मदर इंडिया (१९५७), मुगल ऐ आज़म (१९६०), जैसी कई फिल्मों में अपना जलवा बिखेरा । खास कर अपने भजनों से ये तिकड़ी भारत की मज़हबी एकता की मिसाल बन गयी।

शकील की इश्किया शायरी फिल्मों को बहुत रास आई। रूमानी रंग में साहिर भी शकील को नही पकड़ सके । शकील ने १९६१ , १९६२,१९६३, का सबसे अच्छे गीतकार का फ़िल्म फेयर अवार्ड भी अपने नाम किया । १९६५ के आस - पास शकील को शुगर की बीमारी ने पकड़ा और इसी से २० अप्रैल १९७० को उनका इंतकाल हुआ ।

शकील साहब की वफात के ३८ साल बाद , आज फिल्मी गीतों की शक्ल-ओ-सबाहत भले ही बदल गयी हो , लेकिन उनसे जो कैफियत फिल्मी दुनिया को मिली वह हमेशा कायम रहेगी ................


ग़मे-आशिक़ी से कह दो रहे–आम तक न पहुँचे ।
मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत मेरे नाम तक न पहुँचे ।।

मैं नज़र से पी रहा था कि ये दिल ने बददुआ दी –
तेरा हाथ ज़िंदगी-भर कभी जाम तक न पहुँचे ।

नयी सुबह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है,
ये सहर भी रफ़्ता-रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे ।

ये अदा-ए-बेनियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारिक,
मगर ऐसी बेरुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे ।

जो निक़ाबे-रुख उठी दी तो ये क़ैद भी लगा दी,
उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे ।



हिमांशु बाजपेयी
mabj 2nd sem

2 comments:

  1. बहुत शानदार हिमांशु ..... बस ऐसे ही आप सब लोग लगे रहे तो इंशाल्लाह यह ब्लोग तरक्की पर रहेगा !

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  2. very good himanshu ,,
    your effort is very well. keep it up

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