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Sunday, September 7, 2008

एनएसजी से मंजूरी के बाद आगे का रास्ता


साभार : बी बी सी हिन्दी

अनुपम श्रीवास्तव जोर्जिया विश्वविद्यालय में एशिया कार्यक्रम के निदेशक


एनएसजी की मोहर लगने के बाद यह लाभ हुआ है कि अब अमरीका भारत के असामरिक परमाणु कार्यक्रम में सहयोग कर सकता है.
अब अमरीका के राष्ट्रपति की ओर से भारत-अमरीका परमाणु क़रार की स्वीकृति बची हुई है. इसके लिए अमरीका सरकार की ओर से एक प्रतिनिधिमंडल भारत आकर इस बात की जाँच-पड़ताल करेगा कि भारत ने समझौते में जिन बातों का पालन करने का वादा किया है, उसे किस तरह से लागू किया जाएगा.
इस दिशा में कुछ काम हो भी रहा है और स्टेट डिपार्टमेंट जल्द ही इस बारे में अपनी रिपोर्ट तैयार करके अमरीकी राष्ट्रपति को सौंप देगा जिसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति की औपचारिकता का रास्ता खुल जाएगा.
राष्ट्रपति की ओर से इस रिपोर्ट के आधार पर प्रस्ताव अमरीकी संसद के समक्ष रखा जाएगा. इसपर विचार विमर्श के लिए 30 दिन का समय दिया जाएगा और फिर संसद में इसपर मतदान होगा.
ख़ास बात यह है कि संसद के दोनों सदनों में इस प्रस्ताव पर बहस हो सकती है, विवाद हो सकता है लेकिन इसमें संशोधन की कोई गुंजाइश नहीं होगी. सांसदों को या तो इसके पक्ष में मत देना होगा या विरोध में, पर संशोधन नहीं किए जाएंगे.
अमरीकी सरकार की कोशिश रहेगी कि यह प्रक्रिया 26 सितंबर तक पूरी कर ली जाए. अगर ऐसा नहीं किया जा सका तो राष्ट्रपति चुनाव के बाद संसद के लेम-डक सत्र में राष्ट्रपति इसे फिर से प्रस्तावित करके पारित करवा सकते हैं.

"इस बात की पूरी संभावना है कि अमरीकी संसद के इसी सत्र में इसे पारित कर दिया जाए क्योंकि रिपब्लिकन पूरी तरह से इसके साथ हैं और डेमोक्रेट भी भारत के साथ इस समझौते को तोड़ना नहीं चाहेंगे"


परमाणु बाज़ार खुला
एनएसजी की हरी झंडी के बाद सबसे बड़ी बात यह हुई है कि भारत अब किसी भी सदस्य देश से परमाणु ईधन ले सकता है.
यह कतई ज़रूरी नहीं है कि भारत अमरीका से ही इसकी शुरुआत करे या अमरीका ने अगर नहीं दिया तो भारत को परमाणु ईधन नहीं मिलेगा.
पर भारत को कोशिश यही है कि वो पहल अमरीका के साथ ही करे.
हालांकि रूस और फ्रांस के साथ भारत 123 एग्रीमेंट पर पहले ही पहल कर चुका है. फ्रांस के राष्ट्रपति ने इस बारे में ही भारतीय प्रधानमंत्री से 30 सितंबर का समय मांगा है.
यानी साफ़ तौर पर भारत एनएसजी के किसी भी सदस्य देश के साथ स्वतंत्र रूप से समझौता कर सकता है.
इस बात की पूरी संभावना है कि अमरीकी संसद के इसी सत्र में इसे पारित कर दिया जाए क्योंकि रिपब्लिकन पूरी तरह से इसके साथ हैं और डेमोक्रेट भी भारत के साथ इस समझौते को तोड़ना नहीं चाहेंगे.
अगर डेमोक्रेट रोकने की कोशिश भी करेंगे तो उन्हें अपने ही उद्योग जगत के दबाव का सामना करना पड़ेगा.
उद्योग जगत का तर्क होगा कि भारत के लिए परमाणु ईधन का रास्ता साफ़ तो करवाया अमरीका ने पर इसका लाभ रूस और फ्रांस जैसे देशों को मिल रहा है, अमरीका को नहीं.
ऐसे में अमरीका की सरकार पर अपने बाज़ार के हित को ध्यान में रखने का ख़ासा दबाव बनेगा.

Saturday, September 6, 2008

निज भाषा उन्नति अहे ....

आदरणीय पाठकों एवं CAVS के प्रिय साथियों आपको सूचित करने में हमें हर्ष हो रहा है की हमने ८ सितम्बर से १४ सितम्बर तक CAVS संचार पर हिन्दी सप्ताह मनाने का निर्णय लिया है। इस अवसर पर हम चाहते हैं कि आप पाठक हमें cavssanchar@gmail.com अथवा mailmayanksaxena@gmail.com पर अपने लेख एवं रचनाएँ मेल करें जबकि हमारे सदस्य सीधे ब्लॉग पर पोस्ट कर सकते हैं। सर्वश्रेष्ठ रचनायों को हिन्दी दिवस यानी कि १४ सितम्बर को प्रकाशित किया जाएगा बाकी की रचनायों को पूरे सप्ताह विभिन्न ब्लॉग पर प्रकाशित किया जाएगा।

हम आभारी हैं उन पाठको और सहयोगियों के जो लगातार हमें प्रशंसा और प्रोत्साहन देते रहे हैं ..... हम चाहते हैं कि मातृभाषा के इस आन्दोलन में आप हमारे साथ शामिल हो।

इस अभियान में हमारे साथी हैं,

शंभू चौधरी

हिंद युग्म (http://www.hinyugm.com/)

ई पत्रिका ' कथा व्यथा ' (http://www.kathavyatha.blogspot.com/)

मेरे कवि मित्र (http://www.merekavimitra.blogspot.com/)

कवि मंच ( http://www.kavimanch.blogspot.com/ )

हिमांशु बाजपेयी

अमां यार (http://www.kavihim.blogspot.com/)

मयंक सक्सेना

ताज़ा हवा (http://www.taazahavaa.blogspot.com/)

तन्जीर अंसार

अल फतह (http://www.tanzir-ansar.blogspot.com/)

स्वप्रेम तिवारी

खबरचीलाल (http://www.khabarchilal.blogspot.com/)

निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल

बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल

Friday, September 5, 2008

शिक्षक दिवस विशेष

राधाकृष्णन, कबीर, तुम्हारे या फिर अपने बहाने ...?

(कुछ व्यक्तिगत कारणों से इधर व्यस्त या कहूं की अस्त - व्यस्त रहा इस कारण शिक्षक दिवस पर ज़्यादा तैयारी से ब्लॉग पर नही आ पाया उसके लिए क्षमायाचना के साथ)

A teacher affects eternity; he can never tell where his influence stops ( एक शिक्षक आने वाले युगों तक प्रभाव डालता है.....कितना और कितने समय तक यह उसे ख़ुद को भी नहीं मालूम होता !)

हेनरी ब्रुक एडम्स की यह उक्ति वाकई कितनी सटीक है। कल जब मैं पहली बार इतनी परेशानी में था की मुझे याद ही न रहा कि आज शिक्षक दिवस है, तभी मुझे एक ई मेल मिली जिसमे यह उक्ति थी ..... कुछ समय के लिए अपनी सारी परेशानी भूल कर स्कूल के दिनों में चला गया।

राम-नाम कै पटंतरै, देबे कौं कछु नाहिं ।

क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं ॥

सुबह सुबह अपनी साइकिल उठा कर सबसे पहले फूलों की दूकान पर जाकर मास्टर जी/सर/गुरूजी के लिए फूल खरीदना......

"५ रुपये का है बेटा .... "

"चचा यार घर से ३ ही रुपये मिले हैं आज मास्टर साब को फूल देना ज़रूरी है....टीचर्स डे है ना आज !"

"ऊ तो मालोमै है हमको, अमा बरखुरदार ये बताओ ..... साल भर तो उनको तिगनी का नाच नचाये रहते हो, ससुर ऊ दिन उनकी गाड़ी की हवा भी तुम्ही निकाले थे ना ? आज कौन सा गज़ब हो गया कि अमां फूल पाती चढ़ा रहे हो ??"

" अमां चचा ऐसा है कहानी ना समझाओ हमको, आज देश के दूसरे राष्ट्रपति डाक्टर राधाकृष्णन की सालगिरह है .... वो भी टीचर थे ..... बस उन्ही की याद में शिक्षक दिवस मनाते हैं "

" अच्छा जैसे १५ अगस्त - २६ जनवरी मानते हैं ?"

" हाँ ऐसे ही समझ लीजिये .... ख़ुद तो चले गए ...हम को फंसा गए ये सब मनाने को !!"

We expect teachers to handle teenage pregnancy, substance abuse, and the failings of the family। Then we expect them to educate our children - John Sculley

मैं सोचता हूँ हम में से ज़्यादातर को ये याद होगा ...... उसके बाद स्कूल में मास्टर साहब से दरवाज़े का फीता कटवाना और फिर उनको पूरी कक्षा की ओर से एक तोहफा ...... और फिर होड़ लग जाती उनको अपना अपना गुलाब देने की, कभी कभी कुछ बड़े घरों के बच्चे जब अध्यापकों के लिए महंगे तोहफे ले आते तब थोड़ा बुरा भी लगता पर खैर ...... अगले दिन से फिर वही ....

" होम वर्क किया ?"

" नहीं सर !"

" जाओ पीछे जा कर दोनों हाथ ऊपर कर के खड़े हो जाओ !"

" सर, आइन्दा से ऐसा नहीं होगा !"

" जितना कहा उतना सुनो ... पीछे !!"

(और फिर तमाम तरह के बुरे चेहरे बनाते हुए पीछे जाकर खड़े हो जाते थे, दिमाग चलता रहता था कि अब इनको कैसे परेशान करना है ....)

गुरु कुम्हार सिख कुम्भ है, गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट
अन्तर हाथ सहार दे, बाहर बाहे चोट

ये सब याद आया और फिर याद आया स्कूल का आखिरी दिन और उस दिन की बाद से हर रोज़ स्कूल को, स्कूल के टीचरों को और स्कूल के दोस्तों को याद करना ..... वो सारे टीचर जिनको सताया उनकी भी याद आती है .....जिन सहपाठियों से एक एक साल बात नहीं की उनको रोज़ ऑरकुट पर ढूंढता हूँ ......
आज सोचता हूँ तो पाता हूँ कि आज जो कुछ हूँ उसमे उनका कितना बड़ा योगदान है ...... अंग्रेज़ी की क्लास में मार न खाता तो आज फर्राटे से बोल नहीं पाता, गणित की कक्षा में पीछे ना खडा होता तो आज जीवन के सवाल क्या हल कर पाता ? भूगोल की जिन कक्षाओं से गोल रहा वो आज तक गोल गोल घुमा रही हैं ......

गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागू पाय
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय

आज जो कुछ हूँ उसमें उनका योगदान अपरिमेय है......
उसका धन्यवाद नहीं कर सकता

तेरा तुझको सौंप दूँ, क्या लागत है मोर
मेरा मुझ में कुछ नाही, जो होवत सो तोर

पर आज ये बताना चाहता हूँ कि जो कुछ हूँ ...... आपकी वजह से, जहाँ तक पहुँच पाया आपकी वजह से ......जहाँ तक जाऊँगा, वह रास्ता आपका दिखाया हुआ है और चलने का हौसला भी आपने ही दिया है !
अगर कभी वो पा पाया जो सोच रखा है तो ...... वो मेरा नहीं आपका प्राप्य होगा, मेरी उपलब्धियां हमेशा आपकी मोहताज होंगी .....

गुरु ब्रह्म गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवै नमः

आप सब जो बचपन से अब तक चलना ही नहीं .... बदलना भी सिखाते रहे ......... कल अगर दुनिया बदली तो सबसे पहला श्रेय आपको मिलेगा ......
हम सब ये स्वीकार करते हैं कि आप हमारे बचपन की यादों से वर्तमान के वक्त में शामिल हैं ..... आप की वजह से हम हैं इसलिए हम आप से अलग नहीं हो सकते

आपकी शिक्षा से हमारा ज्ञान है
आपकी दीक्षा से हमारा व्यवहार है
आपके प्रेक्षण से हमारा चरित्र
आपकी प्रेरणा से हमारी प्रगति
आपके ध्यान से हमारी शुचिता है
अगर
आज भी हम इतना नहीं पथ भ्रष्ट हुए जितना दुनिया ने प्रयास किया तो उसकी वजह भी आप हैं ......
आपकी मति आज हमारी गति बन गई है

और अधिक लिखना अब मूर्खता है ..... कबीर का अब यह आख़िरी दोहा बचा है,

सब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुन लिखा ना जाए
( सारी धरती को कागज़ कर लूँ, सारे जंगलों के पेडो की कलम बना दूँ, सातों सागरों की स्याही कर लूँ पर गुरु के गुन लिखना सम्भव नहीं )

Thursday, September 4, 2008

क्रन्तिकारी कवि

देश में नक्सलवादी आन्दोलन ने कई तरह के प्रभाव पैदा किए ..... कुछ अच्छे - कुछ बुरे और कुछ समझ से परे !

इस दौरान इस हवा ने कई क्रांतिकारी कवि पैदा किए, उन्ही में से एक और सबसे अलग कवि हुए वेणुगोपाल ....जिस दौर में नक्सल आन्दोलन उपजा और तब से अब तक वेणुगोपाल ने कम लिखा पर जो लिखा उसे पढ़ना किसी भी विद्रोही कवि या व्यक्ति के लिए ज़रूरी है

कवि वेणुगोपाल का सोमवार देर रात निधन हो गया। वह 65 वर्ष के थे और कैंसर से पीडित थे। 22 अक्टूबर 1942 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर में जन्मे वेणुगोपाल का मूल नाम नंद किशोर शर्मा था और वह देश में नक्सलवादी आंदोलन से उभरे हिंदी के प्रमुख क्रांतिकारी कवियों में से थे।

उनके बारे में ज़्यादा कहने से बेहतर होगा की आपको उनकी रचना पढ़वा दूँ ..... पढे और सोचें ...

देखना भी चाहूँ

देखना भी चाहूं
तो क्या देखूं !
कि प्रसन्नता नहीं है प्रसन्न
उदासी नहीं है उदास
और दुख भी नहीं है दुखी
क्या यही देखूं ? -
कि हरे में नहीं है हरापन
न लाल में लालपन
न हो तो न सही
कोई तो 'पन' हो
जो भी जो है
वही 'वह' नहीं है
बस , देखने को यही है
और कुछ नहीं है
हां, यह सही है
कि जगह बदलूं
तो देख सकूंगा
भूख का भूखपन
प्यास का प्यासपन
चीख का चीखपन
और चुप्पी का चुप्पीपन
वहीं से
देख पाऊंगा
दुख को दुखी
सुख को सुखी
उदासी को उदास
और
प्रसन्नता को प्रसन्न
और
अगर जरा सा
परे झांक लूं
उनके
तो
हरे में लबालब हरापन
लालपन भरपूर लाल में
जो भी जो है ,
वह बिल्कुल वही है
देखे एक बार
तो देखते ही रह जाओ!
जो भी हो सकता है
कहीं भी
वह सब का सब
वही है
इस जगह से नहीं
उस जगह से दिखता है
देखना चाहता हूं
तो
पहले मुझे
जगह बदलनी होगी।

मयंक सक्सेना

Tuesday, September 2, 2008

रमजान मुबारक ....


कल न्यू मार्केट में भटक रहा था । छोले-भठूरे खाने के लिए । अचानक पास वाली मस्जिद में अजान सुनाई दी । और फ़िर पता नही कहाँ से कानों को एक रूहानी आवाज़ मिली "रमजान की इब्तेदा हो गई"





इस्लामिक केलेंडर के इस नौवें महीने का धार्मिक महत्त्व जितना है , उससे सांस्कृतिक महत्त्व भी उससे कम नही है। इसे महसूस करने के लिए आपका मुस्लिम होना भी ज़रूरी नही । फलक पर चाँद की दीद होने का इंतज़ार करते किसी मुसलमां की रूह को चाँद दिखाई देने पर जितना करार आता होगा , आप उससे गले लग कर "रमजान मुबारक" के अल्फाज़ कह कर देखें - उतना ही चैन न सिर्फ़ आपकी बल्कि हिंदुस्तान की रूह को भी मिलेगा ।



इस मुक़द्दस महीने को याद करूँ तो आंखों के सामने एक बच्चों की टोली भी आती है । कुछ प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पढने के कारन और कुछ लखनऊ की जाफरानी गलियों में रहने के कारन । रमजान शुरू होता है और शुरू होते हैं बच्चे भी । अम्मी की दिया सामान हाथ में लेकर निकल पड़ते हैं मस्जिद की ओर । जैसे नागपंचमी पर मैं गुडिया पीटने निकलता था ।



रिवायती शहरों की सड़कें भी इस महीने खूब रौशन रहती हैं । खजूर, लच्छे, टोपी वगैरह । लखनऊ में मौलवीगंज और नक्खास में तो ये रौनक मैंने खूब देखि है । इस पूरे महीने आपको खजूर की जितनी किस्म मिलेंगी उतनी पूरे साल नही मिलेंगी । मक्के वाला , ईरान वाला , । खजूर से रोजा तोड़ने पर सबाव मिलता है , ऐसा माना भी जाता है ।



तावारीह , सहरी , इफ्तारी , ईदी, इन्हे भले ही कुछ तंग नज़र वाले एक खास तबके तक सीमित कर दें , लेकिन हकीकी मायनों में ये सब उस श्रृद्धा या अकीदत के रंग हैं जो दुनिया के हर इन्सां में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में है। कहीं रमजान , तो कहीं नवरात्र , कहीं चौमासा, तो कहीं नौरोज़ ।



"अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बन्दे

एक नूर ते सब जग उपजा , कोण भले को मंदे"



आप सभी को केव्स संचार की ओर से रमजान उल मुबारक की बधाई ।।




Monday, September 1, 2008

दुष्यंत के जन्मदिन पर ...

आज १ सितम्बर है । दुष्यंत कुमार का जन्मदिन । भोपाल आने से पहले दुष्यंत के नाम से तो वाकिफ था पर दुष्यंत के मायने नही जानता था । भोपाल आया तो दुष्यंत को सही से जाना । फ़िर पता चला की दुष्यंत को न जानना कितनी बड़ी लापरवाही थी ।

दुष्यंत का मतलब लोगों के लिए हिन्दी ग़ज़ल हो सकता है ... कुछ सीमा तक मेरे लिए भी है लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं।

ग़ज़ल की विधा उर्दू में जितनी लोकप्रिय थी उतनी ही शिद्दत से हिन्दी में भी अपनाई गई । जब साहित्य में अलग अलग भाषाई विधाओं का इख्तेलात होता है , तब फायदा किसी उर्दू या हिन्दी को नही होता समूचे अदब को होता है । ग़ज़ल अगर आम जन तक पहुची विशेष कर हिन्दी प्रेमियों में, तो इसके पीछे दुष्यंत का आसमान में सुराख कर देने वाला जज्बा रहा । वरना साहित्य के कथित ठेकेदार हिन्दी और उर्दू दोनों में ही, न उस वक्त कम थे और न आज कम हैं ।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

फ़राज़ साहब के बारे में ....

अहमद फ़राज़ चले गए । उनके अदबी सफर और शायरी के बारे में बहुत जगह बहुत कुछ लिखा गया । तन्जीर सर और मयंक भाई ने अपने अपने तरीके से उन्हें श्रृद्धांजलि दी । बहुत अच्छा लगा । फ़िर मैं कैसे चुप रहता । मैं भी फ़राज़ साहब पर लिख रहा हूँ । पर न तो मैं आम जन को फ़राज़ साहब कौन थे ये बताते हुए उनका तारुफ़ दूंगा और न ही उनकी शायरी की तनकीद करूँगा ।

मैं फ़राज़ साहब की एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ और गुजारिश कर रहा हूँ की इसे पढ़े , अगर आपको ऐसा लगा की ये ग़ज़ल आपकी अपनी कहानी कह रही है , तो आपका सिर इस ग़ज़ल के शायर के सम्मान में अपने आप ही झुक जाएगा , फ़िर चाहें आपने अहमद फ़राज़ का नाम पहली बार सुना हो या आप भी मेरी तरह बरसों से उनके मुरीद हों।


बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा
अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा

खिंचे खिंचे से आँखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा

अल्फ़ाज़ थे के जुग्नू आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा

ख़्वाबों में ख़्वाब उस के यादों में याद उस की
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िन्दगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बतों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफ़ाक़तों से दिल था डरा डरा सा

कुछ ये के मुद्दतों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा

फिर यूँ हुआ के सावन आँखों में आ बसे थे
फिर यूँ हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा

अब सच कहें तो यारो हम को ख़बर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़िआ ज़रा सा

तेवर थे बेरुख़ी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आश्ना सा

हम दश्त थे के दरिया हम ज़हर थे के अमृत
नाहक़ था ज़ोंउम हम को जब वो नहीं था प्यासा

हम ने भी उस को देखा कल शाम इत्तेफ़ाक़न
अपना भी हाल है अब लोगो "फ़राज़" का सा

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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