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Saturday, October 4, 2008

सड़क पार करने वालों का गीत

इब्बार रब्बी की यह कविता या नज़्म जो भी कहें मुझे बहुत पसंद है.....आप भी गुने ...

महामान्य महाराजाधिराजाओं के
निकल जाएं वाहन
आयातित राजहंस
कैडलक, शाफ़र,
टोयोटा बसें और
टैक्सियाँ और स्कूटर

महकते दुपट्टे
टाइयां और सूट
निकल जाएं ये प्रतियोगी
तब हम पार करें सड़क

मन्त्रियों, तस्करों
डाकुओं और अफ़सरों की
निकल जाएं सवारियां
इनके गरुड़
इनके नन्दी
इनके मयूर
इनके सिंह
गुज़र जाएं
तो सड़क पार करें

यह महानगर है
विकास का
झकाझक नर्क
यह पूरा हो जाए
तो हम
सड़क पार करें
ये बढ़ लें तो हम बढ़ें

ये रेला आदिम प्रवाह
ये दौड़ते शिकारी थमें
तो हम गुज़रें।

Friday, October 3, 2008

एक दिन का मौन व्रत .....

कल ईद थी और संयोग रहा की साथ ही गांधी जयंती भी......पर माहौल कुछ अजीब रहा। हालांकि पिछले करीब ३ साल से लखनऊ से दूर हूँ पर क्जिसी न किसी तरह ईद मना लेता था उअर गांधी जयंती पर भी कोई न कोई समारोह में शामिल हो ही जाता था पर इस बार कुछ सही नही था। अजीब सा माहौल था दिल के भीतर भी और बदन के बाहर भी और शायद इसीलिए कल इतना महत्वपूर्ण दिन होने पर भी कोई पोस्ट नहीं लिख पाया।

खैर उसके लिए माफ़ी पर जब मन न हो तो न लिखना ही बेहतर ....... आप बताएं किजब रोज़ के धमाकों में इतने लोग मर रहे हो ! मुल्क में अमां का माहौल न हो.......हिन्दू और मुस्लिम के बीच की खाई बढती जा रही हो और गांधी के तथाकथित उत्तराधिकारी सत्ता के मज़े लूटते नीरो बने हो तब ...........................किस दिल से ईद मनाई जाए और किस तरह से गांधी जयंती ?

खैर मैंने कुछ न लिखने की धृष्टता की इस के लिए मेरे पास कई मेल, एस एम् एस और फ़ोन आ चुके हैं सो मुझे माफ़ करें पर लिखा तो आपने भी कुछ नही केव्स संचार पर ? चलिए माना मैंने कल इन सब घटनाओं से व्यथित हो कर लेखन से और बधाई देने का बहिष्कार किया था पर आज मान लेते हैं कि हमने देश भर में हुई आतंकवादी घटनाओं के शहीदों और मृतकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक दिन का मौन रखा था ............

तो साथियों चलें थोड़ी ( थोड़ी ज्यादा ) देर से ही सही पर गांधी जयंती और ईद के बधाई और कुछ आशार ....

ईद पर एक कविता ( साभार : हिंद युग्म )

कुदरत का ये करिश्मा भी क्या बे-मिसाल है

चेहरे सफ़ेद काले लहू सबका लाल है

हिंदू यहाँ है कोई मुसलमान है कोई

कितना फरेबकार ये मज़हब का जाल है

हिंदू से हो सके न मुसलमां की एकता

दूरी बनी रहे ये सियासत की चाल है

धरती पे आदमी ने बसाई है बस्तियां

इंसानियत का आज भी जग में अकाल है

दिन ईद का है आ के गले से लगा मुझे

होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है

जगदीश रावतानी

बापू के प्रति

सोहनलाल द्विवेदी की यह कविता मैंने बरसों पहले अपनी हिन्दी की पाठ्य पुस्तक में पढ़ी थी ...... काफ़ी छोटा था पर आजतक यह दिल के काफ़ी करीब है इसीलिए याद रह गई.....

चल पङे जिधर दो डग, मग में

चल पङे कोटि पग उसी ओर;

पङ गई जिधर भी एक दृष्टि

पङ गये कोटि दृग उसी ओर,


उसके शिर पर निज धरा हाथ

उसके शिर रक्षक कोटि हाथ,

जिस पर निज मस्तक झुका दिया

झुक गये उसी पर कोटि माथ;


हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु!

हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!

तुम एकमूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि

हे कोटिमूर्ति, तुमको प्रणाम!


युग बढा तुम्हारी हंसी देख

युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,

तुम अचल मेखला बन भू की

खींचते काल पर अमिट रेख;


तुम बोल उठे, युग बोल उठा,

तुम मौन बने, युग मौन बना,

कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर

युगकर्म जगा, युगकर्म तना;


युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक,

युग-संचालक, हे युगाधार!

युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें

युग-युग तक युग का नमस्कार!

अंत में एक बार फिर कि अब ज़रा सोचना शुरू करें ............

Wednesday, October 1, 2008

जी न्यूज़ का जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ लांच हुआ


रायपुर में आज सुबह एक भव्य कार्यक्रम में जी ग्रुप ने अपने लंबे समय से प्रस्तावित जी २४ घंटे छत्तीसगढ़ का लोकार्पण कर दिया। चैनल मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ की खबरें प्रसारित करेगा पर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम पर भी इसकी सूक्ष्म नज़र रहेगी। जी न्यूज़ जिसने हाल में ही अपनी प्रसारण नीति को आमूलचूल ढंग से बदलते हुए केवल गंभीर खबरिया चैनल के रूप में काम करने का निर्णय लिया था, उम्मीद जतायी जा रही है किइस चैनल का भी कलेवर गंभीर रखा जाएगा।

चैनल के लोकार्पण के अवसर पर हुए भव्य कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री रमन सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री विद्याचरण शुक्ल, जी न्यूज़ लिमिटेड के अध्यक्ष लक्ष्मी गोयल, एस बी मीडिया के अध्यक्ष तथा स्वामी रामदेव उपस्थित थे। स्वामी रामदेव ने मंच से भावी पत्रकारों और लोगों को देश सेवा का प्राण दिला कर चैनल का शुभारम्भ किया और इसके साथ ही जी २४ घंटे छत्तीसगढ़ का प्रसारण प्रारंभ हो गया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा छत्तीसगढ़ की प्रसिद्द पंवानी शैली की लोक गायिका तीजन बाई का महाभारत प्रसंग गायन।

चैनल को प्रथम दृष्टया देखने पर ही समझ में आता है कि हालांकि चैनल के संचालन की ज़िम्मेदारी अनुभवी कन्धों पर है पर टीम का बहुसंख्य हिस्सा युवा पत्रकारों का है। खुशी की बात यह भी कि चैनल ने हमारे विश्वविद्यालय में एक कैम्पस इंटरव्यू किया था जिसमे हमारे विभाग के काफ़ी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों का भी चयन हुआ था तो हम में से कई उस टीम का हिस्सा हैं .....

आप सबको बधाई और नए चैनल को शुभकामनाएं !

Sunday, September 28, 2008

मैं नास्तिक क्यों हूँ: भगत सिंह


(यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था जो भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है. इस लेख में उन्होंने ईश्वर के प्रति अपनी धारणा और तर्कों को सामने रखा है. यहाँ इस लेख का कुछ हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है.)
प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी. प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा. यदि काफ़ी तर्क के बाद भी वह किसी सिद्धांत या दर्शन के प्रति प्रेरित होता है, तो उसके विश्वास का स्वागत है. उसका तर्क असत्य, भ्रमित या छलावा और कभी-कभी मिथ्या हो सकता है. लेकिन उसको सुधारा जा सकता है क्योंकि विवेक उसके जीवन का दिशा-सूचक है. लेकिन निरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी. यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे. तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा, तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी करके नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ करना. यह तो नकारात्मक पक्ष हुआ. इसके बाद सही कार्य शुरू होगा, जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है. जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं शुरू से ही मानता हूँ कि इस दिशा में मैं अभी कोई विशेष अध्ययन नहीं कर पाया हूँ.
एशियाई दर्शन को पढ़ने की मेरी बड़ी लालसा थी पर ऐसा करने का मुझे कोई संयोग या अवसर नहीं मिला. लेकिन जहाँ तक इस विवाद के नकारात्मक पक्ष की बात है, मैं प्राचीन विश्वासों के ठोसपन पर प्रश्न उठाने के संबंध में आश्वस्त हूँ. मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है.ॉहम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगति का ध्येय मनुष्य द्वारा, अपनी सेवा के लिए, प्रकृति पर विजय पाना है. इसको दिशा देने के लिए पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है. यही हमारा दर्शन है. जहाँ तक नकारात्मक पहलू की बात है, हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं-(i) यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं.कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है. कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका शग़ल है. नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए. और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं?
सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ-के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. एक चंगेज़ खाँ ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो? फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं? मैं पूछता हूँ कि उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी-ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है? सर्वशक्तिमान ने मनुष्य का सृजन क्यों किया जबकि उसके पास मनुष्य का सृजन न करने की ताक़त थी? इन सब बातों का तुम्हारे पास क्या जवाब है? तुम यह कहोगे कि यह सब अगले जन्म में, इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और ग़लती करने वालों को दंड देने के लिए हो रहा है. ठीक है, ठीक है. तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे जो हमारे शरीर को जख्मी करने का साहस इसलिए करता है कि बाद में इस पर बहुत कोमल तथा आरामदायक मलहम लगाएगा?
ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापकों तथा सहायकों का यह काम कहाँ तक उचित था कि एक भूखे-खूँख्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि यदि वह उस जंगली जानवर से बचकर अपनी जान बचा लेता है तो उसकी खूब देख-भाल की जाएगी? इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?’’मुसलमानों और ईसाइयों। हिंदू-दर्शन के पास अभी और भी तर्क हो सकते हैं. मैं पूछता हूँ कि तुम्हारे पास ऊपर पूछे गए प्रश्नों का क्या उत्तर है?तुम तो पूर्व जन्म में विश्वास नहीं करते. तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्व जन्मों के कुकर्मों का फल है. मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने विश्व की उत्पत्ति के लिए छः दिन मेहनत क्यों की और यह क्यों कहा था कि सब ठीक है. उसे आज ही बुलाओ, उसे पिछला इतिहास दिखाओ. उसे मौजूदा परिस्थितियों का अध्ययन करने दो. फिर हम देखेंगे कि क्या वह आज भी यह कहने का साहस करता है- सब ठीक है.कारावास की काल-कोठरियों से लेकर, झोपड़ियों और बस्तियों में भूख से तड़पते लाखों-लाख इंसानों के समुदाय से लेकर, उन शोषित मजदूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक या कहना चाहिए, निरुत्साहित होकर देख रहे हैं.और उस मानव-शक्ति की बर्बादी देख रहे हैं जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा; और अधिक उत्पादन को जरूरतमंद लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देने को बेहतर समझने से लेकर राजाओं के उन महलों तक-जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है...
उसको यह सब देखने दो और फिर कहे-‘‘सबकुछ ठीक है.’’ क्यों और किसलिए? यही मेरा प्रश्न है. तुम चुप हो? ठीक है, तो मैं अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ.और तुम हिंदुओ, तुम कहते हो कि आज जो लोग कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं. ठीक है. तुम कहते हो आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनंद लूट रहे हैं. मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे. उन्होंने ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है. लेकिन हमें यह विश्लेषण करना है कि ये बातें कहाँ तक टिकती हैं. न्यायशास्त्र के सर्वाधिक प्रसिद्ध विद्वानों के अनुसार, दंड को अपराधी पर पड़नेवाले असर के आधार पर, केवल तीन-चार कारणों से उचित ठहराया जा सकता है. वे हैं प्रतिकार, भय तथा सुधार. आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धांत की निंदा की जाती है. भयभीत करने के सिद्धांत का भी अंत वही है. केवल सुधार करने का सिद्धांत ही आवश्यक है और मानवता की प्रगति का अटूट अंग है. इसका उद्देश्य अपराधी को एक अत्यंत योग्य तथा शांतिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है. लेकिन यदि हम यह बात मान भी लें कि कुछ मनुष्यों ने (पूर्व जन्म में) पाप किए हैं तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिए गए दंड की प्रकृति क्या है? तुम कहते हो कि वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है. तुम ऐसे 84 लाख दंडों को गिनाते हो. मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर सुधारक के रूप में इनका क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गदहा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं?अपने पुराणों से उदाहरण मत दो. मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है. और फिर, क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है?
गरीबी एक अभिशाप है, वह एक दंड है. मैं पूछता हूँ कि अपराध-विज्ञान, न्यायशास्त्र या विधिशास्त्र के एक ऐसे विद्वान की आप कहाँ तक प्रशंसा करेंगे जो किसी ऐसी दंड-प्रक्रिया की व्यवस्था करे जो कि अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था? या उसको भी ये सारी बातें-मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर-अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो. किसी गरीब तथा अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का भाग्य क्या होगा? चूँकि वह गरीब हैं, इसलिए पढ़ाई नहीं कर सकता. वह अपने उन साथियों से तिरस्कृत और त्यक्त रहता है जो ऊँची जाति में पैदा होने की वजह से अपने को उससे ऊँचा समझते हैं. उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं. मान लो यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोगेगा? ईश्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दंड के बारे में तुम क्या कहोगे जिन्हें दंभी और घमंडी ब्राह्मणों ने जान-बूझकर अज्ञानी बनाए रखा तथा जिन्हें तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों-वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा को सहने की सज़ा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा और उसका प्रहार कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तो. ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं. जी हाँ, शायद वह अपटन सिंक्लेयर ही था, जिसने किसी जगह लिखा था कि मनुष्य को बस (आत्मा की) अमरता में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सारा धन-संपत्ति लूट लो. वह बगैर बड़बड़ाए इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा. धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबंधन से ही जेल, फाँसीघर, कोड़े और ये सिद्धांत उपजते हैं. मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया?
उसने अंग्रेज़ों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने हेतु भावना क्यों नहीं पैदा की? वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत संपत्ति का अपना अधिकार त्याग दें और इस प्रकार न केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव-समाज को पूँजीवाद की बेड़ियों से मुक्त करें. आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं. मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह इसे लागू करे. जहाँ तक जनसामान्य की भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं, पर वह इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं. चलो, आपका परमात्मा आए और वह हर चीज़ को सही तरीके से कर दें.अब घुमा-फिराकर तर्क करने का प्रयास न करें, वह बेकार की बातें हैं. मैं आपको यह बता दूँ कि अंग्रेज़ों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए कि उनके पास ताक़त है और हम में उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं. वे हमें अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हुए हैं बल्कि बंदूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे रखे हुए हैं. यह हमारी ही उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निंदनीय अपराध-एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचारपूर्ण शोषण-सफलतापूर्वक कर रहे हैं.कहाँ है ईश्वर? वह क्या कर रहा है? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? वह नीरो है, चंगेज़ है, तो उसका नाश हो.क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो. सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी. कब? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो. और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ.
यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अंधा या लँगड़ा पैदा होता है, यदि यह उसके पूर्वजन्म में किए कार्यों का फल नहीं है तो?जीवविज्ञान-वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाला है. उनके अनुसार इसका सारा दायित्व माता-पिता के कंधों पर है जो अपने उन कार्यों के प्रति लापरवाह अथवा अनभिज्ञ रहते हैं जो बच्चे के जन्म के पूर्व ही उसे विकलांग बना देते हैं.स्वभावतः तुम एक और प्रश्न पूछ सकते हो-यद्यपि यह निरा बचकाना है. वह सवाल यह कि यदि ईश्वर कहीं नहीं है तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर संक्षिप्त तथा स्पष्ट होगा-जिस प्रकार लोग भूत-प्रेतों तथा दुष्ट-आत्माओं में विश्वास करने लगे, उसी प्रकार ईश्वर को मानने लगे. अंतर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और उसका दर्शन अत्यंत विकसित. कुछ उग्र परिवर्तनकारियों (रेडिकल्स) के विपरीत मैं इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को नहीं देता जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे और उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे. यद्यपि मूल बिंदु पर मेरा उनसे विरोध नहीं है कि सभी धर्म, सम्प्रदाय, पंथ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं. राजा के विरुद्ध विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है. ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में मेरा अपना विचार यह है कि मनुष्य ने अपनी सीमाओं, दुर्बलताओं व कमियों को समझने के बाद, परीक्षा की घड़ियों का बहादुरी से सामना करने स्वयं को उत्साहित करने, सभी खतरों को मर्दानगी के साथ झेलने तथा संपन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिए-ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना की. अपने व्यक्तिगत नियमों और अविभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ाकर कल्पना एवं चित्रण किया गया. जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है तो उसका उपयोग एक डरानेवाले के रूप में किया जाता है, ताकि मनुष्य समाज के लिए एक खतरा न बन जाए. जब उसके अविभावकीय गुणों की व्याख्या होती है तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है.
इस प्रकार जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों के विश्वासघात और उनके द्वारा त्याग देने से अत्यंत दुखी हो तो उसे इस विचार से सांत्वना मिल सकती है कि एक सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसे सहारा देगा, जो कि सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिए उपयोगी था. विपदा में पड़े मनुष्य के लिए ईश्वर की कल्पना सहायक होती है.समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था. इसी प्रकार मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करने लगे और यथार्थवादी बन जाए तो उसे ईश्वरीय श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पौरुष के साथ सामना करना चाहिए जिसमें परिस्थितियाँ उसे पलट सकती हैं. मेरी स्थिति आज यही है. यह मेरा अहंकार नहीं है. मेरे दोस्तों, यह मेरे सोचने का ही तरीका है जिसने मुझे नास्तिक बनाया है. मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना-जिसे मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ-मेरे लिए सहायक सिद्घ होगी या मेरी स्थिति को और चौपट कर देगी. मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.देखना है कि मैं इस पर कितना खरा उतर पाता हूँ. मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा. जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी. स्वार्थ के लिए मैं प्रार्थना नहीं करूँगा.’ पाठकों और दोस्तो, क्या यह अहंकार है? अगर है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ.
(यह लेख 80 के दशक में राजकमल प्रकाशन ने भी हिंदी में छापा. यहाँ प्रकाशन के इस संस्करण के संपादकों की अनुमति से यह हिस्सा इस्तेमाल किया गया है.)
-बी.बी.सी. हिंदी वेबसाइट से साभार

हमारी भूलने की आदत ....


२८ सितम्बर ..... शहीद ऐ आज़म भगत सिंह की आज जन्मतिथि है......नहीं मालूम कितने लोगों को पता है पर कल यश चोपडा का जन्मदिन था और अखबार-टीवी और पोर्टल अटे पड़े थे। आज लता मंगेशकर का जन्मदिन है आज भी यही हाल है ......या तो हम सो रहे हैं या हम सब बेहोशी में हैं पर यह जो भी है इसे दूर करना होगा।

भगत सिंह की पैदाइश २८ सितम्बर, १९०७ को आज के पाकिस्तान के लायलपुर जिले के बंगा में चक नंबर १०५ में हुआ जबकि उनका पुश्तैनी घर आज भी भारतीय पंजाब के नवाशहर के खट्टरकलां गाँवमें है। भगत सिंह ने क्या कुछ किया वह शायद हम सब जानते हैं पर शायद उनको याद करने की ज़हमत उठाना हम गवारा नहीं कर सकते हैं। उनकी जयंती के अवसर पर केव्स संचार उनको याद करते हुए उनकी कुछ स्मृतियाँ आपसे बांटेगा और यही नही ताज़ा हवा (http://www.taazahavaa.blogspot.com/) इस पूरे हफ्ते भगत सिंह के दुर्लभ पात्र और किस्से आपसे बांटेगा ............




भगत सिंह के हस्ताक्षर




आख़िरी पैगाम
यह वो आखिरी ख़त है जो भगत सिंह ने २२ मार्च १९३१ को यानि की फांसी के एक दिन पहले अपने साथियों को लिखा था ..........


22 मार्च,1931

साथियो,

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.

आपका साथी,

भगत सिंह


फिर यही कहूँगा ........ अब सोचना शुरू कर दें !


Saturday, September 27, 2008

वक्त सड़क पर उतर आने का ....


देश के दिल दिल्ली अब दिल की मरीज़ हो चली है। आज दोपहर २:१५ से २:३० के बीच दिल्ली के पुराने और मशहूर इलाके महरौली में दो संदिग्ध विस्फोट हुए जिसमे अब तक प्राप्त सूचनाओं के अनुसार ४-५ लोगों की मौत हो चुकी है जबकि असली आंकडा अभी आना बाकी है। ज्ञात हो कि कुतुबमीनार के लिए मशहूर इलाके महरौली के फूल बाज़ार के इलाके में यह धमाका हुआ। यह धमाके इस मायने में खतरनाक संकेत देते हैं कि पुलिस और सरकार ने पिछली १३ सितम्बर को हुए धमाको के बाद बड़े बड़े दावे कर डाले थे। हाल ही में आतंकियों ने अनेक ई मेल भी की जिनमे तमाम तरह की धमकियां दी गई और पुलिस ने सतर्कता भी बढ़ा दी पर नतीजे सिफर ही रहे और आज फिर ये घटना हुई।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार स्कूटर सवार दो युवकों ने एक झोले में यह विस्फोटक फूल बाज़ार की सड़क पर फेंका और वहाँ से चले गए, उनको लोगों ने यह कह कर आवाज़ भी दी कि शायद उनका कोई सामान गिर गया हो पर जब तक लोग कुछ समझ पाते ...... चारों तरफ़ लाशें, घायल और खून बिखरा पड़ा था। बताया जाता है कि उस बैग को एक बच्चे ने उठाया और उसके साथ ही उस बैग में धमाका हो गया और उस बच्चे के चीथड़े उड़ गए। अभी तक ४ लोगों की मौत की ख़बर है जिसमे दो बच्चे हैं।

सवाल आतंकियों से है जो अपने आपको दहशतगर्द की जगह मुजाहिद्दीन कहते हैं ..... कि धर्म की लड़ाई में बेगुनाहों की जान लेने पर क्या कोई धर्म माफ़ करता है ?

सवाल सरकार से है जो शायद सुरक्षा से ज्यादा मुआवजा देने में तत्परता दिखाती है......कि आख़िर उसकी कोई जवाबदेही है या नहीं ?

सवाल हम सबसे है कि हम अपने समाज और अपने मुल्क को लेकर कितने संवेदनशील हैं ....... क्या अब हमें सड़कों पर नहीं उतर आना चाहिए ?


दुष्यंत कुमार ने जैसा कहा....

पक चुकी हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं

कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं


अब वक़्त आ गया है कि हम सोचना शुरू करें ...... नेताओं से उम्मीद ना करें, अपने अपने स्तर पर आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखें....सडकों पर तमाशबीन बनने की जगह सडको पर जुटना शुरू करें ...... ???

Sunday, September 21, 2008

मंच नहीं विचार हैं महत्वपूर्ण


आज की तारीख में अगर सबसे संवेदनशील कोई विषय है तो वह आतंकवाद है। ऐसे में जब उसके विरोध में सामने आने की बात हो तो मंच देखना कहीं से भी सही नहीं लगता। लेकिन दुःख की बात तो यह है की आज भी लोग यह विचार करते हैं कि हमारे विरोध करने का मंच क्या है?जिस तरह आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता वैसे ही उसका विरोध करने के लिए मंच नहीं हमारी भावनाएँ ज्यादा मायने रखती हैं।
हमलों के पीछे एक बार फ़िर से हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान का हाथ होने की बात पुष्ट हुई है। वहां की खुफिया एजेंसी आई एस आई लगातार ऐसी घटनाओं को अंजाम देने जुटी रहती है और अब उसने अपनी सफलता के प्रमाण इंडियन मुजाहिद्दीन और सिमी के विशाल नेटवर्क के रूप में खड़े कर लिए हैं। ऐसी दशा में आम इंसान को चेतने की और प्रखर विरोध करने की आवश्यकता है। इस सन्दर्भ में मैं हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म "अ वेडनेसडे " इसी जज्बे को दिखाती हुई लगी। लोगों ने इसे सराहा भी खूब लेकिन जब इसे ज़मीन पर लाने की बात होती है तब हममे से कितने लोग खड़े होते हैं? जो क्जदे भी हैं उन्हें है कि कहीं उन पर बायस्ड होने का आरोप न लग जाए। समझ में नहीं आता कि हम दिन रात चिल्लाते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है और फ़िर उसके विरुद्ध अभियान छेड़ते समय क्यूँ उसे धर्म विशेष से जोड़ देते हैं।

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

ब्लॉग एक खोज ....