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Friday, October 10, 2008

हमें माफ़ करें .... कि हम इंसान हैं

जैसा की हिमांशु ने कहा कि यह हफ्ता वाकई हमारे सबके लिए शर्मनाक रहा। हम सबने जिस तरह से आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई की जगह एक दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ाई की वह हमें दुनिया के सामने लज्जित करने के लिए काफ़ी था। कुछ लोग जैसे शायद यही चाहते थे, और हमने उनकी चाल समझे बिना उनका सहयोग किया यह हमारी भूल थी।

दरअसल जो कुछ भी अजीत ने शुरू किया था उसमे मेरी सहमती थी और उसका उद्देश्य था कि धार्मिक कट्टरपंथ और धर्मांतरण के पीछे के कारणों पर हम एक सार्थक चर्चा करें जिससे कुछ वाकई गंभीर समाधान निकल कर आयें पर मैं नही समझ पाया कि विचार करने की जगह सीधे अजीत पर आक्षेप क्यों हुआ और उसके बाद इस तरह से व्यक्तिगत टिप्पणियों का दौर क्यों शुरू हो गया। हम क्या एक अच्छे पत्रकार होने के नाते गंभीर और सार्थक चर्चा भी नही कर सकते हैं और क्या इतने सभ्य समझे जाने वाले ब्लॉग का उपयोग ऐसे करेंगे ?

मैं या अजीत या तन्जीर या फिर और कोई भी धर्मांतरण का समर्थक नहीं हैं पर क्या धर्मांतरण के विरोध के लिए किसी कट्टरपंथी संगठन के समर्थक होना जायज़ शर्त है ?

क्या हिंदू होने के लिए जे श्री राम का उद्घोष अनिवार्य है ?

क्या ज़रूरी है कि अगर कोई मुस्लिम है तो वह आई एस आई का एजेंट है ?

क्या १८५७ के संग्राम का नेतृत्व बहादुर शाह ज़फर ने नहीं किया था और उसमे मंगल पांडे और तांत्या टोपे शहीद नही हुए ?

क्या अगर पेशवा नाना साहेब को नज़र बंद किया गया तो बेगम हज़रात महल ने आज़ादी की जंग नहीं लड़ी ?

क्या क्रांति के रास्ते पर बलिदान होने के लिए चंद्रशेखर आज़ाद और अशफाक उलाह खान एक साथ नहीं बढे थे ?

क्या नेहरू और मौलाना आज़ाद अलग अलग गांधियों के सत्याग्रह के आंदोलनकारी थे ?

क्या आपको मालूम होता है कि जो गेंहू आप खाते हैं उसे हिंदू ने उगाया है या मुस्लिम ने ?

मैं भगत सिंह को याद करने वाले अपने एक मित्र से कहूँगा कि एक बार वो भगत सिंह को पढ़ें ज़रूर ....... वो धर्मनिरपेक्ष थे !

मुझे लगता है कि शायद यही हमारा दुर्भाग्य है कि जब भी हमारे बीच कोई व्यक्ति किसी गंभीर मसले पर सार्थक बहस करने की पहल करता है, हम मेरी और तेरी पर उतर आते हैं और वहीं उस मसले को भूल कर दूसरी राह पकड़ते हैं या फिर कुछ लोग चाहते हैं कि इन मसलो का कभी समाधान न हो जिससे उनकी राजनीति चमकती रहे।

मैं इतने दिन तक इस पसोपेश में रहा कि मैं इन लोगों के बीच आऊ या ना आऊ पर जिस तरह के विद्वेष भरे वक्तव्य दिखे उससे लगा कि क्या किया जाए ?

मन व्यथित था कि क्या लक्ष्य लेकर यह चर्चा शुरू की और क्या नतीजे निकले ?

हम सोचने पर मजबूर हैं कि क्या आगे से किसी विषय पर सार्थक पहल का प्रयास करें या न करें .......

क्या कहीं इसी रवैये की वजह से तो आज पूरा मुल्क मीडिया को ग़लत तो नही समझता ?

अगर आप किसी विचार से सहमत नहीं तो उस के विरोध में अपना तर्क रखें ना कि व्यक्तिगत आक्षेपों पर उतर आयें

एक पोस्ट में कहा गया कि यह मेरे तर्क हैं और इन पर मेरा कॉपीराइट है ...... एक बार उसे सब पढ़ें और देखें कि वस्तुतः उस पोस्ट में कोई तर्क था ही नहीं ......कुल मिला कर निजी प्रहार था , क्या यह तर्कसंगत है ?

हाँ आपके लिखे पर कॉपी राइट आपका ही था क्यूंकि जो आप लिखते हैं उसकी ज़िम्मेदारी भी आपकी ही होनी चाहिए !

व्यक्तिगत भड़ास निकालने के लिए और ब्लॉग हैं जो केवल यही काम देखते हैं , मैं भी अक्सर वहाँ जाता हूँ आप भी जा सकते हैं

इसके लिए कृपया केव्स संचार का दुरुपयोग ना करें

आख़िर क्यों यह धर्मान्धता कि आंधी बह रही है .....ऐसा क्यों कि अगर आप हमारे साथ नही तो शत्रु के साथ हैं ?

हम किसी भी तरह के कट्टरपंथ के विरोध में हैं.....वह चाहे किसी भी धर्म का क्यों न हो !
ना तो हम किसी जेहाद में शामिल हैं ना ही किसी धर्मयुद्ध के योद्धा हैं !

हमने सिर्फ़ यह कहा था कि धर्मांतरण के पीछे के कारणों पर विचार होना चाहिए .... क्या अपनी कमियों पर विचार करना ग़लत है ?

अगर धर्म और रोटी वाली बात ग़लत है तो रखिये सामने रोटी और भगवान् की प्रतिमा को एक साथ और भगवान् के नाम पर चार दिन तक भूखे रह कर दिखा दें और भजन करते रहे !

अगर यह हमारी गलती है तो हमारा सर कलम कर दीजिये

हमें माफ़ करें हम सिर्फ़ और सिर्फ़ इंसान है ....और इस मज़हब से हम किसी तरह का धर्मान्तरण नहीं चाहते हैं !

अंत में राही मासूम रज़ा की एक छोटी सी कविता

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं
और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके
कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ
मेरा भी एक संदेश है।


मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको
और उस योगी से कह दो-महादेव
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह जलील तुर्कों के बदन में गढा गया
लहू बनकर दौड़ रही है।

अंत में हमें वो सब एक बार फिर क्षमा करें जिन्हें हमारा सार्थक प्रयास ग़लत लगा !

अगली पोस्ट में उन सज्जन को उत्तर जिन्होंने इतिहास को ढंग से पढने की सलाह दी थी ....

जय हिंद .....

GARAMMUDDA.BLOGSPOT.COM

मित्रो आप सभी आमंत्रित है एक नए ब्लाग garammudda.blogspot.com पर......
यहां हर हफ्ते किसी मुद्दे पर बहस होगी.......खुलकर....
नो लिमिट तक......किसि भी विशय पर.....

इस बार का मुद्दा है ....शहीदो पर राजनीति....

जय भारत.....जय छत्तीसगढ....नवीन सिंह...

Thursday, October 9, 2008

मज़हब नही सिखाता आपस में बैर रखना

मुझे इस ब्लॉग की इस स्थिति पर अब शर्म आ रही है । मेरा आप सभी लोगों से आग्रह है की केव्स संचार नाम के इस ब्लॉग पर , जिस चैनल में आप काम करते हैं , अथवा जहाँ आप रहते हैं कहीं भी साम्प्रदायिकता का ज़हर न फैलायें । अगर आप दूरियां कम नही कर सकते तो कम से कम उन्हें बढाये मत । और सबसे बड़ी दुःख की बात ये है की आप सब मीडिया के व्यक्ति होकर सांप्रदायिक रंग में रंग रहे हैं । हम वो लोग हैं जो अगर हिंदू धर्म में कोई कमी है तो उसपर भी खुल कर प्रहार कर सकें और अगर मुसलमान या इस्लाम कही पर चूक रहा है तो उस पर भी खुल कर बोले । न तो हिंदू धर्म बुराइयों से पूरी तरह मुक्त है न इस्लाम ।

मेरी आप सबसे एक विनती और है बिना किसी धर्म को पढ़े उसके बारे में कोई राय मत व्यक्त किया करें । जो इस्लाम को आतंक का धर्म बता रहे हैं उन्हें पहले कुरान और हदीस को पढ़ लेना चाहिए । अगर आपको इन्हे खरीदने म्विन कोई दिक्कत हों तो मुझे बताएं मैं आपको वो बहुत सी सामग्री भेज दूंगा की इस्लाम में अमन और शान्ति को सैवोपरी मन गया है ,और जिस जिहाद को लेकर इतनी हाय तौबा है उसके भी कुछ नियम है । आतंक कहीं से जिहाद नही है । आप को चाहिए की आप कर्बला का पूरा वृत्तान्त पढ़ें की किस तरह से हुसैन वहां हिन्दुस्तान के प्रति श्रद्धा वान थे । कुरान कहती है " वालेकम दीन वालेय्दीन" यानी उन्हें उनका धर्म मुबारक हो और हमें हमारा "

इसी तरह से हिंदू धर्म को कमज़ोर कहने वाले इस बात को समझें की हिंदू धर्म के ६ देषणों में एक चार्वाक मुनि का दिया हुआ नास्तिक दर्शन भीहै । यानी हिंदू धर्म विश्व का अकेला धर्म है जहाँ नास्तिकता का भी स्वागत किया गेहै ।

रही बात मिसालों की तो उसके लिए आप में से कोई भी मुझसे बहस कर सकता है मैं आपको असंख्य उदहारण गिनवाऊंगा की इस देश में अभी भी मिलजुल कर रहने वाले लोगों की कमी नही है ,ये भारत की निजी उपलब्धि है , और यही मिली जुली रिवायत भारत को भारत बनती है , आप जब भारत की बात करेंगे तो आप अकेले हिंदू की बात नही कर सकते, अकेले मुस्लिम की बात नही कर सकते ।

आप ये बताएं की जब रफी साहब गाते हैं तो मिठास केवल मुस्लिमों के कान में जाती है क्या ? चन्नू लाल मिश्रा की ठुमरी केवल हिंदू सुनते हैं क्या ? कौन है जो अब्दुल हमीद और कलाम पर गर्व नही करता । क्या आपने कल्बे सादिक का बयां सुना है वो सुन्नी इमाम के पीछे नमाज़ पढने को तैयार है और अमरनाथ बोर्ड को ज़मीन दिए जाने का स्वागत किया है उन्होंने । क्या आपको मालुम है की लखनऊ में आज भी हिंदू लोग ताजिया उठाते हैं , अब आपको लग रहा होगा की हिंदू तो सहिष्णु होते हैं, लेकिन इसी लखनऊ में एक रामलीला होती है जिसके सारे कलाकार मुस्लिम हैं । क्या आपको पता है की मुहर्रम पर अनीस और दबीर के जो मर्सिये पढ़े जाते हैं वो उर्दू से ज्यादा अवधी के लगते हैं ।


उदहारण बहुत हैं मेरे पास ...........और वो भी दूरियां कम करने वाले। उदहारण आपभी देते हैं लेकिन नफरत फैलाने वाले । एक दूसरे को जानिए और एडजस्ट करके रहिये । और प्ल्ज़ आपस में ही स्तर हीन बहस से बचिए कुछ पढिये और उस अधर पर लिखिए ....... और एक बार सभी सीनियर्स से अनुरोध है की एक बार फेयरवेल को याद करिए ।

मुमकिन है आसां हो ये सफर कुछ दूर साथ भी चल कर देखें
थोड़ा तुम badal कर देखो , थोड़ा हम बदल कर देखें

आमीन

आपने सुना होगा ,बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो एक्साम देने जाते हैं ,कुएस्शन पेपर ठीक से नही पड़ते और प्रश्नों का ग़लत उत्तर दे आते हैं फिरफेल होने का रोना रोते हैं ,गलती जवाब मे नही बल्कि ग़लत जवाब की होती है। ऐसे लोगो की ये आदत आगे भी बरकरार रहती है और अपनी इस आदत की वजह से वो दूसरों को भी परेशान करते है। खैर दुआ यही है की राम सदबुधि दे इन्हे । आमीन

कहीं निगाहें कहीं निशाना

आतंकवाद हमें निगलने को बढ़ा चला आ रहा है। हमारी कोशिश सर्वप्रथम अपने मुस्लिम भाइयों को यह विश्वास दिलाने की होनी चाहिए की आप भी इसी मुल्क के नागरिक हैं। और आपका भी इस देश पर उतना ही हक है जितना की हमारा या फिर किसी अन्य व्यक्ति का; हम ये क्यों कहें की बात निकलेगी तो पाकिस्तान तक जायेगी। हमारे घर की बात है घर मैं रहेगी। हमारी समस्या आतंकवाद कभी थी ही नही हमारी समस्या तो अपने घर के अन्दर पनप रहा असंतोष था। अब मैं कहूँगा तन्जीर भइया का क्या लेना देना पाकिस्तान से ? या इस देश के किसी भी राष्ट्रवादी मुस्लिम का क्या लेना देना पाकिस्तान से । ध्यान दे कहीं हम दुसरे भिंदरा वाले को जनम नही दे रहे हैं । जब कोई भी जंगली जानवर चारों तरफ़ से घिर जाता है तो उसकी मुद्रा रक्षात्मक नही आक्रामक हो जाती है । हम क्यों किसी भी मुस्लिम को आतंक का जिम्मेवार मान लेते हैं। और किसी एक की गलती के लिए पुरे समाज को आड़े हाथों ले लेते हैं। चौरासी के जख्मअभी भरे नही हैं , हम सतवंत सिंह और केहरसिंह की तरह पुरे मुस्लिम समुदाय को सजा देने की तरफ़ बढ़ तो नही रहे हैं। हमारे लिए ज्यादा जरुरी ये बात है की हम अपने देश को लाखों कश्मीर ना बनने दे की हर मोहल्ले मैं एक कश्मीर जन्म ले लें और हम सिर्फ़ अपने राष्ट्र को तबाही की ओरजाते देखने के सिवाय और कुछ भी न कर सकें। आपके जवाब की प्रतीक्षा मैं आपका
-------------- आशु प्रज्ञ मिश्र

राम जी सदबुद्धी दे ईन्हे....

कुंद,कुठित और संकीर्ण मानसिकता किसकी है ये तो देश मे होने वाले हादसो से पता चल जाता है...
और रही बात कूऐ के मेढक की तो हम अगर मेढक है तो ऊस कूऐ मे कुछ पनियल सांप भी है...जो आए दिन अपना जहर ऊगलते रहते है...

ईतीहास गवाह है ठेकेदारी प्रथा तो मुल्ला मौलवीयों ने शूरु की है...
कडवाहट का बीज तो 47 मे जिन्ना ने बोया था और ऊस फसल को काटने की तैयारी हम जैसे धर्म प्रेमी बंधु कर रहे है...

मुहब्बत की रस्सी को अक्सर होने वाले हादसे और विस्फोट करने वाले स्वंय काट देते है...ऐसा दोहरा चरित्र रखने लोगो के लिए हमारे दिल मे कोई जगह नही है...

और पिछले लेख में ऐसा जवाब इसलिए दिया गया क्योंकी आपके लेख मे हिंदु धर्म को कमजोर धर्म कहा गया था और यह भी लिखा था कि मुठ्ठी भर लोगो से घबराए हुए हैं.....
ईसका जवाब देना आवश्यक था सो दिया....
मै एक व्यक्तिगत सलाह दुंगा की ऐसी टिप्पणीयां देने से थोडा बचे
मेरे पिछले सारे लेख पढे और बारम्बार पढे......ऊसमे चरित्र चित्रण देखने को मिलेगा....
इस ब्लाग पर मुझे ऐसी चीजे लिखने को विवश न करे
क्योंकि
हंगामा खडा करना मेरा मकसद नही...
मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिये.....

बहरहाल आप सभी व्यथित और कुंठित लोगो को भगवान राम सदबुद्धी दे......

जय भारत...जय छत्तीसगढ.....नवीन सिंह....




Wednesday, October 8, 2008

समझ का फेर

बात निकल कर पाकिस्तान तक ही जा सकती क्युकी इससे आगे आप सोच नही सकते .संकीर्ण मानसिकता इंसान को कुवे का मेंढक बना देती। मै किसी धर्म की बुराई कर ही नही सकता क्युकी दुसरे के धर्म का आदर न करने वाला अपने धर्म के प्रति कभी वफादार नही हो सकता । बुराइयां और कुरीतिया हर धर्म मे है मगर वो समाज की बनाई हुई है ,कोई धर्म इंसानियत के विरुद्ध नियम नही गढ़ता वो तो समाज के ठेकेदार अपनी सहूलियत के हिसाब से उसमे फेर बदल करते रहते है । जहाँ तक सवाल लेख का है तो मैंने आपकी तरहां ही अपने विचार रखे थे,लेकिन इसे आपने धार्मिक रंग दे दिया जो इस बात की पुष्टि करता है की आप कितना व्यथित हैं । कृपया करके ऐसे बीज न बोए की कड़वी फसल किसी के भी गले न उतरे और फ़ूड पोइसिनिंग से इंसानियत की तबियत ख़राब हो जाए .ये देश मुहब्बत की डोर से बंधा है इस रस्सी को रेतने का काम न करें .मेरा लेख आपकी समझ मे नही आया शायद इसी लिए आपने एक धर्म और सम्प्रदाए को निशाना बना दिया .अगर लेख एक बार मे समझ नही आता तो कई बार पढ़े और समझने की कोशिश करे रस्सी की लगातार रगड़ से सख्त पत्थर भी घिस जाया करते हैं ,फिर कुंद दिमाग की बिसात ही क्या.

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