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Saturday, October 11, 2008

जयप्रकाश नारायण (11 अक्टोबर, 1902 - 8 अक्टोबर, 1979) भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। वे जेपी के नाम से भी जाने जाते है। उन्हें 1970 में इंदिरा गांधी के खिलाफ विपक्ष का नेतृत्व के लिए जाना जाता है। वे समाज-सेवक थे और लोकनायक भी कहलाए जाते थे।

शिक्षा
पटना मे अपने विद्यार्थी जीवन में जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्रता संग्राम मे हिस्सा लिया। 1922 मे वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने 1922-1929 के बीच कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय-बरकली, विसकांसन विश्वविद्यालय में समाज-शास्त्र का अध्यन किया। पढ़ाई के महंगे खर्चे को वहन करने के लिए उन्होंने खेतों, कंपनियों, रेस्टोरेन्टों मे काम किया। वे मार्क्स के समाजवाद से प्रभावित हुए। उन्होने एम.ए. की डिग्री हासिल की। उनकी माताजी की तबियत ठीक न होने की वजह से वे भारत वापस आ गए और पी.एच.डी पूरी न कर सके।

जीवन
उनका विवाह बिहार के मशहूर गांधीवादी बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती के साथ अक्टोबर 1920 मे हुआ। प्रभावती विवाह के उपरांत कस्तुरबा गांधी के साथ गांधी आश्रम मे रहीं।
१९२९ में जब वे अमेरिका से लौटे, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तेज़ी पर था। उनका संपर्क गाधी जी के साथ काम कर रहे जवाहर लाल नेहरु से हुआ। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने। 1932 मे गांधी, नेहरु और अन्य महत्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओ के जेल जाने के बाद, उन्होने भारत मे अलग-अलग हिस्सों मे संग्राम का नेतृत्व किया। अन्ततः उन्हें भी मद्रास में सितंबर 1932 मे गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक के जेल में भेज दिया गया। यहाँ उनकी मुलाकात एम. आर. मासानी, अच्युत पटवर्धन, एन. सी. गोरे, अशोक मेहता, एम. एच. दांतवाला, चार्ल्स मास्कारेन्हास और सी. के. नारायणस्वामी जैसे उत्साही कांग्रेसी नेताओं से हुई। जेल मे इनके द्वारा की गई चर्चाओं ने कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी (सी.एस.पी) को जन्म दिया। सी.एस.पी समाजवाद में विश्वास रखती थी। जब कांग्रेस ने 1934 मे चुनाव मे हिस्सा लेने का फैसला किया तो जेपी और सी.एस.पी ने इसका विरोध किया।
1939 मे उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के अभियान चलाए। टाटा स्टील कंपनी में हड़ताल करा के यह प्रयास किया कि अंग्रेज़ों को इस्पात न पहुंचे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महिने की कैद की सज़ा सुनाई गई। जेल से छूटने के बाद उन्होने गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच सुलह का प्रयास किया। उन्हे बंदी बना कर मुंबई की आर्थर जेल और दिल्ली की कैंप जेल मे रखा गया। 1942 भारत छोडो आंदोलन के दौरान वे आर्थर जेल से फरार हो गए।
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हथियारों के उपयोग को सही समझा। उन्होंने नेपाल जा कर आज़ाद दस्ते का गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया। उन्हें एक बार फिर पंजाब में चलती ट्रेन में सितंबर 1943 मे गिरफ्तार कर लिया गया। 16 महिने बाद जनवरी 1945 में उन्हें आगरा जेल मे स्थांतरित कर दिया गया। इसके उपरांत गांधी जी ने यह साफ कर दिया था कि डा. लोहिया और जेपी की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता नामुमकिन है। दोनो को अप्रेल 1946 को आजाद कर दिया गया।
1948 मे उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया, और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिल कर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 19 अप्रेल, 1954 में गया, बिहार मे उन्होंने विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन के लिए जीवन समर्पित करने की घोषणा की। 1957 में उन्होंने लोकनिति के पक्ष मे राजनिति छोड़ने का निर्णय लिया।
1960 के दशक के अंतिम भाग में वे राजनिति में पुनः सक्रिय रहे। 1974 में किसानों के बिहार आंदोलन में उन्होंने तत्कालीन राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की।
वे इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध थे। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया। उनके नेतृत्व में पीपुल्स फ्रंट ने गुजरात राज्य का चुनाव जीता। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपात्काल की घोषणा की जिसके अंतर्गत जेपी सहित ६०० से भी अधिक विरोधी नेताओं को बंदी बनाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। जेल मे जेपी की तबीयत और भी खराब हुई। ७ महिने बाद उनको मुक्त कर दिया गया। 1977 जेपी के प्रयासों से एकजुट विरोध पक्ष ने इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।
जयप्रकाश नारायण का निधन उनके निवास स्थान पटना मे 8 अक्टूबर 1979 को हृदय की बीमारी और मधुमेह के कारण हुआ। उनके सम्मान मे तत्कालीन प्रधानमंत्री चरण सिंह ने ७ दिन के राष्ट्रीय शोक का ऐलान किया, उनके सम्मान मे कई हजार लोग उनकी शोक यात्रा मे शामिल हुए।
1998 में उन्हें भारत रत्न से सम्मनित किया गया।

तुशटीकरण की राजनीती....


पिछले कई सालो से देश की कुछ पार्टीया तुश्टीकरण की राजनिती कर रही है...

.... आए दिन अल्पसंख्यकों को कोई न कोई गिफ्ट देती रहती है...और घोशणाओ का तो कोई ठिकाना ही नही है... अब ये गिफ्ट देने के मामले मे एक दूसरे से काम्टीशन करती रहती है...और कभी कभी तो इस हद तक गिर जाती है...कि विपक्षीयो को शर्म आ जाती है....

इनमे सबसे पहला नाम कांग्रेस का आता है...
जब जम्मु के लाल चौक मे कट्टरपंथीयो ने भारत के झंडे को अपमानित करते हुए पाकिस्तान के झंडे को जिस गर्मजोशी के साथ फहराया.....
ऊस समय कांग्रेस अलगाववादियों को आई लव यू कह रही थी....

अब जब दिल्ली इनकाऊंटर मे शर्मा जी शहीद हो जाते है तो कांग्रेस के अर्जुन सिंह...ऊनकी शहादत पर शक करते है... और जामिया मीलीया के संदिग्ध आतंकीयो को कानूनी संरक्षण देने के बयान पर सहमती व्यक्त कर देते हैं....

असली मास्टरमाइंड तो ये हैं जो आतंक की भाषा बोलते हैं........जो लोग पकड़े गए हैं उन्हें कानूनी सहायता मिलनी ही चाहिए।
हमारा संविधान-कानून उन्हें इसका अधिकार देता है लेकिन ये सहायता देना किसी संस्थान का काम नहीं है। ये जामिया मिलिया का काम नहीं है।’

ईसके बाद सपा के मुलायम और अमर सिंह है... अमर सिंह ने शर्मा जी के शहीद होने पर 10 लाख देने की घोशणा की... अल्पसंख्यक नेताओ के साथ कुछ दिन बाद एक कार्यक्रम में उन्होंने श्री शर्मा की शहादत पर सवाल उठाकर अल्पसंख्यक समुदाय का भी राजनैतिक लाभ उठाने की चाल दी....

इसके बाद है लोजपा के पासवान.... जिन्होंने देश के सबसे बडे नेटर्वक वाले आतंकवादी संगठन के बैन हो जाने पर विरोध किया....वैसे ये कोई नई बात नही है,ऐसा ये अक्सर करते रहते है......

वोट की राजनीती आदमी को किस हद तक गिरा देती है....सोचने की बात है... एसी राजनीती करके ये अपने घर कैसे जाते होंगे....अपने बच्चो को मुंह कैसे दिखोते होंगे...ईनके रिशतेदारो को इनकी बातो पर यकीन कैसे होता होगा....

ये आज तक यक्ष प्रश्न बना हुआ है....

औरजब इस दलदल मे अटल जी जैसा कमल का फूल खिला हो तो..... सोचने की बात है....

अन्त मे मै कुछ लोगो को कहना चाहुंगा की तुशटीकरण की राजनीती बन्द करे....

जय भारत....जय छत्तीसगढ....नवीन सिंह....

Friday, October 10, 2008

मेरी सोच

मन्दिर हिंदू का है और इस्लाम की आयतें मुस्लमान की ऐसी दो राही सोच उन्ही लोगों की होती है जो सिर्फ़ धर्म के नाम पे अपनी आपसी खीज निकलना चाहते है , बहाने से लड़ना जानते हैं पर आगे बढ़के उन कुरीतियों को दूर करने की पहल से हमेशा बचते हैं। मैं हिंदू हं पर मैं मन्दिर भी जाती हं और दरगाह भी पर ध्र्म्नान्तरण की आड़ में एक दुसरे पर छीटा कशी कहाँ तक सही है। किसी मुस्लमान पे ऊँगली उठाने से पहले ये सोचना साथ ही समझना भी ज़रूरी है की अक्सर दूसरो पे वही ऊँगली उठाते है जिनके घर शीशे के होते हैं। एक धर्म तब महान होता है जब वो धर्मों की इज्ज़त करना सिखाये। पिछले हफ्ते से चल रही बहस को जहाँ एक तरफ़ सही मोड़ देना ज़रूरी था वहीँ लोगों को ये समझना भी ज़रूरी हो गया था की ये बहस कॉलेज के दो गुटों की नही जो एक गाली दे तो दूसरा हथियार उठा ले। हिंदू हो या मुस्लमान, जनती और पालती तो दोनों को एक एक माँ ही है ना। कौन हिंदू कौन मुस्लमान कौन इसाई-- क्या धर्म होने से संस्कार बदल जाते हैं, जैसे संस्कार नही बदलते वैसे ही इंसान हो इंसान पे क्यों नही मरते। धर्म की दुहाई तो सब देते हैं। किसी धर्म या जात से इंसान बड़ा नही होता , कर्मों से होता है। क्या हमारे माँ-बाप हमे धर्म के नाम पे लड़ना सिखाते है। जब वो हमे सही राह दिखाते है तो हम अपने अहम् में क्यों एक दुसरे के दुश्मन हो जाते हैं।

रही बात एक वक्त के मेरे बहुत करीबी मित्र नवीन सिंह की
तो क्षमा चाहूंगी नवीन मैं आपसे छोटी हूँ पर ये ज़रूर कहना चाहूंगी कि आज आप ग़लत हैं और मुझे लगता है की आप को इस बात पर विचार और ध्यान देने की ज़रूरत है की किस तरह आप उन गरीब लोगों की व्यथा को एक पत्रकार के नाते दुनिए तक पहुँचा सकें न की कौन पाकिस्तान की राह पर चल रहा है या मिशनरियों का सहायक है इस बात पे ध्यान दे। अक्सर ऐसी बातों से ही ध्यान भटकता है इससे आप उन लोगों की तो मदद करेंगे ही साथ ही अपनी नजाने कैसे संकीर्ण हो चुकी मानसिकता से भी छुटकारा पा पाएंगे। उम्मीद करती हूँ की आप मेरी बातों पे गौर फरमाएंगे।

पहल

खैर जो भी हुआ वोही भला है कम से कम हमारे ब्लॉग का सन्नाटा तो टूटा नवीन भइया ने ब्लॉग मैं गर्मी पैदा कर दी जो जाड़े से पहले जरूरी थी। ब्लॉग की भी एक मर्यादा होनी ही चाहिए। हम अपने ब्लॉग मैं तथ्यों को रखें कीचड़ को नहीं दिल के मेल को रखें मैल को नहीं। हमारे पास तथ्य न हो तो इसका मतलब यह तो नहीं की हम कीचड़ उछालने की राजनीती करें। याद रखें किसी के ऊपर कीचड़ उछालने से पहले हमेशा हाथ अपना ही गन्दा होता है और हमेशा पोस्ट पढ़ तो लेते हैं कभी प्रतिउत्तर भी दिया करें
आपके उत्तर की प्रतीक्षा मैं
आशु प्रज्ञ मिश्र

कलम और चिट्ठी ......

विवेक /अभी हालिया में श्याम बेनेगल की फ़िल्म वेलकम टू सज्जनपुर ने एक बार फिर आज के आधुनिक युग में जब संचार के कई आयाम मौजूद है ,तभी e-मेल ,ब्लॉग के जंजाल ,टेलीफोन से बाहर निकलकर हमारी पुरानी संचार व्यवस्था जिसे हम चिट्ठी या फिर पत्र कहते हैं को हमारे मानस पटल पर केंद्रित करते हुए (चिठ्ठी आई है) की याद दिलाई है खैर कलम की ताकत सीमित नही हो सकती की वह कभी पत्रकार या लेखक के हाथो का साधन मात्र बन जाए बल्कि कलम ने स्वय अपनी ताकत से लेखक या पत्रकार को मजबूर किया है की मुझे पकड़ और लिख लेकिन इससे आगे बढ़कर सोचे तो शायद हमारी रक्षा कर रहे जवान हो या घर में आश लगाए माँ बाप जो एक गरीब विकसित देश के अंग है के लिए चिट्ठी, उस कलम स्याही या एक सफ़ेद कागज़ के जोड़ से कही ज्यादा है दोस्तों कलम की ताकत वंहा भी दीखाई देती थी जब डाकिया चाचा कोई चिठ्ठी लेकर महीनो पर किसी दरवाजे पर पहूंचते थे सायद तब यह फक्र की बात होती थी और आज भी ,मुख्य बात यह की चिठ्ठी में जो मार्मिकता ,खुशी,संवेदनशीलता ,अहसाश ,मिलता है शायद वो खुशी अहसाश मेसेज या मेल नही दे पाते हो.......जारी रहेगा.....

use the forum for positive thoughts

Articulation of your ideas is a must and this is possible only for those who have perfected the art of communication .often we tend to say "i do not know how to express myself"This means you ar moving over a goldmine and you dont know how to explore it.by exchanging your thoughts with othersyou can learn this.the art of communication can be developed only when we remove our mental blocksand cultivate the faculty of speaking.it is a process for those aspiring to go high in the media field can ill afford. hope it will soothe some ruffled feathers and hurt egos. so dwell deep in scriptures before writing.

मस्ती की पाठशाला....

कुछ दिन और,
कुछ लम्हे और,
वो कॉलेज की मस्ती,
वो कैंटीन की चाय सस्ती,
वो चाय पीते-पीते विश्व की राजनीती को समेट कर रख देना,
और अपनी बात सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर देना,
वो घूमना-फिरना भोपाल की सडको में दोस्तों के साथ,
वो लड़कियों का पीछा करना मस्ती के साथ,
वो "प्रपोस" करने को लेकर रात भर जागना
और दुसरे दिन सोते ही रह जाना,
वो लडाई-झगडे और बकैती,
लंच को लेकर रोज छिनैती,
वो मीठे सपने और कसमे वादे खाना,
वो कॉलेज लेट जाना और,
सर से रोज डांट खाना,
और रूम पर आकर बिंदास सो जाना,
वो क्लास बंक करना और कैंटीन में बैठना,
चार चाय पीना और दो के पैसे देकर बिंदास निकल लेना,
वो दोस्तों को "पप्पू" बनाना और खाली टाइम में लाइब्रेरी जाना,
वो किताबो का ख्याल जिनसे न हुआ हमे कभी प्यार,
वो करियर की टेंशन,
वो डैड की पेंशन,
वो सिग्रेटस मोर
जिनसे न हुए हम कभी बोर..
वो लैब में जाना और बिंदास ओर्कुटिंग करना,
वो सीढियों पर बैठना और फ्री की सलाह फ्री में देना...
ये है कॉलेज लाइफ के वो दिन
जिन्हें याद करेगा हर कोई हर दिन,
लेकिन ये फ़िर कभी नही आयेंगे..कभी नही..

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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