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Saturday, September 1, 2012

नहीं बचाएगा तुम्हे कोई...

नित नई होती तकनीक अगर गुमान करे तो यह उसका हक है। कल तक ब्लैक एंड वाइट से आज की रंगरंगीली दुनिया के निर्माण में इसका रोल अहम है। तकनीक अपनी शक्ति को लेकर जितनी भी इतराना चाहे, वह इतरा सकती है। हमारे जीवन को आसान बनाने में इसकी भूमिका को शब्द दो शब्द में कहना तकनीक को मुहल्ला विचार मंच की ओर से दिए जाने वाली कोई उपाधिभर होगी। जबकि तकनीक की भूमिका इतनी वृहद है कि इसे नोवल प्राइज या संसार का और भी कोई बड़ा पुरस्कार दिया जाए तो भी कम ही लगेगा। मीलों दूर बैठे लोगों से बातें, समंदरों की दूरियां घंटों में पार करने या फिर अंतरिक्ष की बारीकियों को खंगालने की बात हो। तकनीक तुम कमाल हो। तकनीकी को दरअसल कई बार मोबाइल फोन से नापा जाता है। यानी नई तकनीकी तो स्मार्ट फोन, तो नई तकनीक यानी एंड्रायड। लेकिन तकनीकी इससे भी वृहद है। तकनीक हमारे जीवन की एक तरह से पयार्य सी है। इतनी करीबी, इतनी दासी, इतनी सेवक, इतनी जरूरी कि शायद मानव निर्मित वस्तुओं में सबसे ज्यादा उपयोगी। तकनीकी भले ही डिवाइस पर अवलंबित हो, किंतु मनुष्य के मस्तिष्क के भीतर छुपी कलाओं से कमतर नहीं है। यहां तक कि वह कला को भी एक दिन चैलेंज कर सकती है। कला बेचारी सालों से इंसान की संगिनी बनी हुई कभी सुरों से झरती, तो कभी कलम से टपकती रही है। न इसे डिवाइस चाहिए न कोई ऐसा जरिया, जिसके बगैर यह प्रस्फुटित न हो सके। कला का इतना तक कहना है कि तकनीकी को जन्म तक उसी के मौसेरे, चचेरे भाइयों ने दिया है। कला का एक यह दावा है, तो तकनीक का भी अपना दंभ है कि वह कला को भी पछाड़ देगी। हो भी सकता है वह अपने मंसूबे में कामयाब हो जाए। कला पीछे बैठ जाए। इससे कोई नफे नुकसान की बात भी नहीं होगी। मगर तकनीक का दंभ नहीं टूटेगा। तकनीक से क्या कुछ मुमकिन नहीं है। एक मोबाइल कंपनी के एड में तो यह तक बताया जाता है, कि एक व्यक्ति अपने ऑफिस से अचानक एक पार्टी में सिर्फ मोबाइल के बूते चला जाता है। वह जैकेट स्टोर खोजता है, फिर गिटार बजाने की प्रैक्टिस करता है और चंद मिनटों में पार्टी में हुंदड़ाकर वापस अपने ऑफिस में बेहद ही सज्जन किस्म के एक्जेक्यूटिव की तरह काम करने लगता है। यह मोबाइल से ही मुमकिन हुआ था। वह तो खैर गिटार था, अगर कोई और भी वाद्य यंत्र होता तो भी शायद इंसान चंद मिनटों की मंोबाइल प्रैक्टिस से सीख सकता है। तकनीक अपने साथ एक संसार लेकर चल रही है। तेजी से अपना साम्राज्य फैला रही है। देश दुनिया के हर तत्व की अगुवा और प्रतिनिधि बन रही है। इसमें बेशक नेतृत्व क्षमता है भी तो सही, किंतु फिर भी इसका बड़बोलापन ठीक नहीं है। तकनीक चीखती है चिल्लाती है, अपनी क्षमताओं पर नाज करती है, अपनी शक्तियों को बिखेरती है और प्रभावित करती है, अन्य तत्वों को हाईजेक करती है। अपने में समाहित करती है। कला के पास यह हुनर नहीं। तकनीक ने तबला वादन, गायन, लेखन, वाचन, मंचन, अभिनय समेत कमोबेश सभी कलाओं को कब्जा सा लिया है। कोई बात नहीं। इन सबने तकनीक की अधीनता स्वीकार भी कर ली। सहज और स्वभाविक जो हैं। तकनीक का दंभ आगे बढ़ा और आगे बढ़ा तो कला को चुनौति भी दे दी जाएगी। किंतु कला का एक ही जवाब तकनीक को मूक कर सकता है। वह जवाब है तकनीक तुम श्रेष्ठ हो, संसार को आसान बना रही हो, हम पर भी शासन कर रही हो, किंतु याद रखना। तुम अपने आपको ही खा जाती है। छत्तीसगढ़ की लोक कला को बचाने के लिए 108 संगठन बनेंगे, किंतु नोकिया 3310 बचाओ समिति कभी नहीं बनेगी। तुम नित नई हो, तुम चंचल हो, तुम निर्मल हो, तुम अच्छी हो, किंतु दंभी हो। तुम्हें बचाने के लिए कभी आईफोन-3 बचाओ समिति कभी नहीं बनेगी। कोई पेट वाली टीवी बचाओ आंदोलन नहीं होगा। कोई अन्ना तुम्हारे पुरान वर्जन को करप्शन की भेंट चढऩे से रोकने खानपीना नहीं छोड़ेगा। हां मगर कला को पूरा भरोसा है उसके लिए आदिकाल से भावीकाल तक यह सिलसिला जरूर चलता रहेगा। वरुण के सखाजी

Wednesday, August 15, 2012

आजादी के 66 साल और हम...



देश को स्वतंत्रता मिले आज हमें 66 साल हो चुके हैं। पर इस स्वतंत्रता की सही कीमत तो वहीं लोग जानते हैं। जिन्होंने परतंत्र भारत में रहकर स्वतंत्रता की सुनहरी किरण महसूस की थी। और इसे पाने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों को देश हित के लिए न्यौछावर कर दिया।

आज देश के सामने कई चुनौतियां है पर इन चुनौतियों के बीच ही हमने आजदी के साढ़े छह दशक बीत जाने के बाद भी अपने लोकतंत्रीय देश को बनाए रखा है। और आज हम इसी कारण एक युवा राष्ट्र के रूप में दुनिया भर में पहचाने जाते हैं, पर हमारी सभ्यता ने इस बीच कई दौर देखे, जिनमें हमें पहले भी कई लोगों ने गुलाम बनाया पर वो अपने इन मंसूबों में कभी कामयाब नहीं हो पाए और हमेशा से ही देश के वीर जवानों और साहसी महापुरषों के सामने अपने घुटने झुकाने पढ़े। इतिहास गवाह है कि हमने यह आजादी यूं ही नहीं मिली बल्कि इसके लिए हमारे देशभक्तों ने देश पर खुद को समर्पित कर इसे हमारे लिए मुक्त किया है और हमारा दायित्व है कि हम इसे हर क्षेत्र में और भी बेहतर बनाएं।

और इस तरह 15 अगस्त 1947 को हम स्वतंत्र हुए और जल्द ही एशिया की महाशक्ति बनकर उभरे, वहीं देश ने एक तरफ तो लोकतंत्र का पहला पड़ाव 1952 में तब पूरा किया जब हमारे देश में पहली बार आम चुनाव हुए। इस दौर में भारत अर्थव्यवस्था की और तेजी से बढ़ा, नवउदारवाद के रास्ते निजी क्षेत्र में चहुंओर गति देने की नीति अपनाई गई, देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. पं.जवाहरलाल नेहरू और स्व.राम मनोहर लोहिया ने उद्योग जगत की चकाचौंध में खो जाना ही ठीक समझा। इसके बाद तो भारत उभरती अर्थवयवस्था में तब्दील होता चला गया। और आज भी इसी गति से निरंतर अपनी साख विदेशी बाजारों में बनाए रखने में सक्षम हुआ है।

Tuesday, August 14, 2012

टीम अन्ना के बाद, बाबा का भी अनशन खत्म....!


एक राजनीतिक पार्टी को हराने की घोषणा करते हुए आखिर बाबा रामदेव ने अनशन तो खत्म कर दिया। पर, क्या वे वाकई में राजनीति के जरिए ही सही, देश का धन जो स्विस बैंक में जाकर काला हो गया है, उसे फिर से भारत लाकर देशवासियों को दें पाएंगे। यह एक ऐसा प्रश्न है जो हर देशवासीयों के मन में जरूर कौंधता होगा।

ऐसे में क्या बाबा रामदेव की मुहिम 'ब्लैक मनी' को भारत ला पाएगी... ये एक गंभीर प्रश्न है जो कि सरकार और उसके नुमाइंदे भी न दे पाएं। इस बार बाबा रामदेव ने कई दावे किए जिनमें से उन्होने एक दावा यह भी किया है कि उनके अगले ऐलान से सरकार हिल जायेगी। वहीं बाबा रामदेव की मानें तो इस आंदोलन में 400 सांसदों का साथ भी मिलेगा। खैर यह बात अलग है कि अभी दो दिन पूर्व ही बाबा ने खुद ही मंच से यह हुंकार की थी, कि उनके साथ 225 सांसद हैं।

इसके साथ ही योग गुरू ने कहा है कि 2014 तक तक कोई बड़ा आंदोलन नहीं करना चाहते। अब सीधी कार्रवाई होगी। बाबा ने अगली रणनीति का खुलासा करते जो कुछ भी कहा उसमें यहीं कॉमन है जो भी पार्टी काला धन वापस लाने में रोड़ा अटकाएगी उसको चुनाव में हराना है, और इस बार भी उनका यही रुख रहा। देश में मौजूदा सरकार पर निशाना साधते हुए योग गुरू का कहना है कि आज देश में जो गरीबी, अभाव और भूख बढ़ रही है वो सब इन्हीं की देन है।

बाबा का हर बार, इस बार मौजूदा केन्द्र सरकार पर है। बाबा ने संप्रग के खिलाफ विपक्षी पार्टियों का मोर्चा बनाने के संकेत देते हुए कहा है कि भ्रष्ट पार्टियों में सबसे ऊपर कांग्रेस है। बढ़ती महंगाई, भूख, अभाव और गरीबी के लिए यही कांग्रेस जिम्मेदार है। वहीं योग गुरू ने कहते हैं कि उनको 400 सांसदों का समर्थन हासिल है। पर इस बात की क्या पुष्ठि है कि ये सांसद दूध के धुले हुए ही हों, क्या इनके पास मौजूद धन ईमानदारी से कमाया हुआ ही हो और इनका धन स्विस बैंको में न हो क्या ये पुष्ठि बाबा अपने सांसदों के रवैये और व्यवहार  को रुप में लिखित दे सकते हैं।

हाल ही में टीम अन्ना का आंदोलन लोकपाल के मुद्दे पर चर्चा में रहा और आगे भी इनकी मुहिम जारी रहेगी पर बाबा की टीम अन्ना से दूरियां क्यों हुए जब देश एक है, मुद्दे एक हैं, हम सभी भारतवासी एक हैं तो बाबा का टीम अन्ना से मुंह मोढ़ना कहां तक जाय़ज है ?और केवल काले धन को लेकर ही आंदोलन करना, कहां तक जाय़ज है ? देश के और भी कई मुद्दे हैं। जिनके कारण आज हर वर्ग का तबका परेशान है। अगर मान लें कि देश में काला धन आ जाता है तो क्या ये धन वाकई में जरुरत मंदों को मिलेगा या फिर वहीं हश्र होगा। जिसका जिक्र कई साल पहले हमारे स्व.पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि कि- 'देश के जरुरत मंदो को सरकारी सुबिधा का महज एक प्रतिशत लाभ ही मिल पाता है। और 99 प्रतिशत हिस्सा सिस्टम की भेंट चढ़ जाता है'।

लोकपाल की जरुरत भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने की मुहिम है और काला धन लाना देश हित में जरूरी, पर बाबा का टीम अन्ना से इस तरह दूरियां बनाना क्या नज़रिया पेश करता है ? क्या बाबा लोकपाल को लेकर गंभीर नहीं...

ये एक गंभीर प्रश्न है जिसका उत्तर वक्त ही आगे बताएगा...!

Friday, August 10, 2012

मनोरंजन पर भारी शोक समाचार

मनोरंजन अपनी कमी या ज्यादाती को रोटी की तरह पेट या शरीर पर नहीं दिखाता। यह मनुष्य के मानस, आचरण, व्यवहार से नजर आता है। इसका मीटर डाउन हुआ तो खराब ऊपर हुआ तो खराब। संतुलित होना जरूरी है। और इंसान की पहचान रोटी तो है नहीं, उसकी सोचने समझने की शक्ति ही असली पहचान है। तब मनोरंजन एक तरह से रोटी से भी ज्यादा जरूरी हुआ। हास्य का बोध, रुदन का एहसास यह सभी मनोरंजन से ही तो आएगा न?
गांव छोटा था। सबलोग एक दूसरे को जानते थे। कोई अपना या पराया नहीं था। सबके दुख से सब दुखी और सबके सुख से दुखी। यकीनन यह गांव किसी सतयुग का काल्पनिक गांव कतई नहीं था। मनोरंजन के साधन सीमित। इतने सीमित कि तार बिजली तक से मनोरंजन करना पड़ता। जले हुए ट्रांसफार्मर से एल्युमिनियम के तार निकालना और उनसे कुछ बनाना। सबकुछ आनंद के लिए। टीवी के नाम पर महज एक पटवारी की टीवी। दोस्ती करो तो टी
वी वरना महरूम। देखें तो कहां देखें मृगनयनी, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, हम लोग, भीमभवानी और सबसे ज्यादा जरूरी महाभारत। संडे को तो खेतों में चरने वाले जानवर, खरपतवार, कीड़े मकोड़े, हिरण, हिन्ना सब जान गए थे कि आज संडे है। दूर तलक न खेतिहर मजदूर न मालिक। सब सुन्न सपाटा। वजह सुबह महाभारत शाम को हिंदी फीचर फिल्म। बीच में कुछ खाना पीना और जरूरी काम। फिल्म कौन सी या तो मारधाड़ वाली या फिर रोमांटिक। यह फर्क तो नहीं पता था, पर हां कुछ जादुई सी दुनिया का जरूर एहसास होता। कहीं कोई सितारों के बीच परि है, तो कहीं कोई बहन का बदला लेने मिथुन लाल सलाखें नंगे हाथों से पकड़ रहा है, तो कहीं प्रेम चौपड़ा मृदुभाषिता से अच्छे खासे सेठों की दौलत कब्जा रहा है। मनोरंजन के सीमित साधनों पर ही निर्भर रहना था। और तिसपर तरह-तरह के बंधन अलहदा से थे। टीवी नहीं देखना चाहिए, आंखे तो खराब होती ही हैं, साथ में पढ़ाई भी। यह तो ऐसी समस्या थी कि बुजुर्गों को बच्चों को टीवी देखने से हर हाल में रोकना था और बच्चों, महिलाओं और नौजवानों की जिद थी कि टीवी हर हाल में देखना है। तो मामला विरोध, सहमति, असहमति, वार्ता, संवाद और चोरी, मनमानी के जरिए सुलझ भी जाता। मगर समस्या तब विकराल हो जाती जब गांव या देश में कोई मर जाए। यह चूंकि संवेदनशील मामला होता था। इसपर नौजवानों ने अगर तर्क दिए तो यूपीए-2 जैसा मामला होगा, कि लोकपाल लाओ नहीं तो भ्रष्टाचार के पोषक कहलाओ। विरोध करें टीवी बंद का तो मरें, चुपचाप देखें तो मन की नैतिकता खा जाए। मगर मनोरंजन तो मनोरंजन है। क्या करें, यह भी खाने, पीने, या अन्य दैनिक कार्यों की तरह ही जरूरी है। लेकिन ऐसा जरूरी जिसपर लोकचर्चा नहीं होती। मनोरंजन अपनी कमी या ज्यादाती को रोटी की तरह पेट या शरीर पर नहीं दिखाता। यह मनुष्य के मानस, आचरण, व्यवहार से नजर आता है। इसका मीटर डाउन हुआ तो खराब ऊपर हुआ तो खराब। संतुलित होना जरूरी है। और इंसान की पहचान रोटी तो है नहीं, उसकी सोचने समझने की शक्ति ही असली पहचान है। तब मनोरंजन एक तरह से रोटी से भी ज्यादा जरूरी हुआ। हास्य का बोध, रुदन का एहसास यह सभी मनोरंजन से ही तो आएगा न? मगर क्या करें। टीवी बंद करने के आदेश और सक्रिय कार्यकर्ताओं ने बिना वक्त गंवाए टीव के निचले हिस्से में लगीं 3 बटनों में कोने वाली चट से बंद कर दी। यह काम करने में अक्सर वे बजरंगी टाइप के कार्यकर्ता आगे रहते थे, जो खुद भी टीवी देखना चाहते थे, किंतु बड़ों की नजर में सकारात्मक छवि के लिए ऐसा करते। एक पल के लिए तो ऐहसास होता आज के दौर के वेलेंटाइंस के अनुयायियों पर लगने वाली पाबंदी सा। मगर मसला ऐसा कि विरोध, प्रतिरोध और मनमानी किसी की गुंजाइश नहीं। लोग भी जैसे मरने के लिए तब तक बैठे रहते थे, जब तक कि कोई अच्छा सा कार्यक्रम न आने वाला हो। कस्तवारिन 90 साल की थी। घर के एक कोने में रह रही थी, बीसों साल से तो वह बूढ़ी होना तक बंद हो चुकी थी। जैसी की तैसी थी। न जाने क्या हुआ। मरने का क्या मुहूर्त सा खोज रही थी। बेटा धनसिंह खुद चाहता था मरे ये तो अब। पढ़ा लिखा नहीं था न? जो बुद्धि रखते थे, वे कहते अब तो माताराम को भगवान उठा ले, वे बड़े कष्ट में हैं। जैसे यह बड़े दयालु हैं। मगर चूंकि इंसानी बिरादरी की पहचान हैं संवेदनाएं, तो कस्तवारिन मरे, या नौजवान बेटा। अपने आप कोई मरे या दुर्घटना में। असर सीधा टीवी पर ही पड़ता। फिल्म चल रही थी राजकुमार, दृश्य था हाथी पर बैठा एक आदमी। बचपन था। पता नहीं क्या संवाद थे, क्या एक्टिंग थी। क्या प्लॉट था, होने वाला क्या था, फिल्म में। मगर एक बात थी गहरे से, हाथी को देखकर मन इतना खुश हो रहा था, कि अभी इसपर लद जाऊं। फिल्म पूरे शबाव पर थी। बाकी दर्शकों का तो नहीं पता पर मैं जरूर हाथी की मदमस्त चाल और वहां के परिवेश में फिल्माया गया उत्साह देखकर मुदित था। मनोरंजन अपार हो रहा था। इतना कि जैसे में किसी प्रभू की याद में रोकर भी प्राप्त न कर सकता। विशुद्ध आध्यात्मिक आनंद सा। मगर सुख कहां लंबे टिकते हैं। डर था बिजली न चली जाए, देश में कोई झंडा झुकाऊ आदमी न मर जाए। और सबसे बड़ा डर तो था कि कस्तवारिन का। चूंकि ऐसा पहले भी कई बार हुआ जब कस्वारिन मरते-मरते बच गई। चूंकि कोई कार्यक्रम नहीं आ रहा था न? और तभी टीवी वाले कमरे में दाखिल हुए दो कार्यकर्ता और टीवी को कोने वाले बटन को पकडक़र मरोड़ दिया। इससे पहले कि कोई कुछ कह पाता फरमान सुनाया गया। कस्तवारिन चल बसीं। लोगों का अंदेशा सच में तब्दील हो गया। पता नहीं क्यों कस्वारिन राजकुमार फिल्म का ही इंतजार कर रही थी। लेकिन उस बेचारी का क्या दोष, वो न मरती तो देश में कोई और मरता। चंद्रकांता के दौरान तो मरे भी थे न वो जो झंडा झुकाऊ। - वरुण के सखाजी

Saturday, August 4, 2012

करिए करिए शाहा ब्यारी..एक आध्यात्मिक आनंद

नर्मदा का रेतीला मैदान, तो कई बार ऊंची घाटी को छूते पल्लड़। यानी कभी गर्मी में तो कभी भारी बारिश तो कभी ठंड की सिहरन में भी मल मास पड़ा। पर महिलाओं में इतना जोश को सुबह 4 बजे से नर्मदा के एक महीने तक लगातार स्नान करतीं। फिर पूजन और एक बहुत ही खूबसूरत भजन गीत: करिए करिए शाहा ब्यारी, जी महाराजा अवध विहारी, इतनी सुन मैया जानकी जी बोली कहा बनी तरकारी। कहने को यह भजन था, लेकिन अध्यात्म के गहरे मंथन सा आनंद इसमें आता। नर्मदा में ठिठुरते हुए स्नान फिर बीच में भगवान की मूर्ति और फिर यह गीत। हम लोग ज्यादा नहीं समझते थे। गांवों में मनोरंजन के साधन भी कम होते हैं,
इसलिए ही सही। मगर सब दोस्त टोली बनाकर इस आनंद में शरीख होते जरूर थे। कालांतर प्रकारांतर में पता चला कि यह एक धार्मिक विधि है। सभी महिलाएं मल मास (विक्रम संवत में हर तीन साल में एक महीना अतिरिक्त होता है। इसे ही मल मास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है) या कार्तिक मास में ब्रह्म मुहूर्त की गोधुली बेला में स्नान कर शायद पाप धोना चाहती होंगी, मगर मेरे लिए तो सिर्फ इस गीत का सुमधुर गीतात्मक आनंद जरुरी था। बचपन बीता कुछ चीजों की समझ बढ़ी। तब सालों बाद गांव पहुंचे तो देखा पहले मल मास के स्नान के लिए सुबह से ही महिलाएं घरों घर बुलौआ सा देती हुई जाती थी। यह बुलौआ महज एक आह्वन नहीं हुआ करता था, बल्कि आत्मिक रूप से माईं, चाची, बड़ी अम्मा, दादी या किसी को उनके गांव के नाम वाली फलां के नाम से पुकारती हुईं चली जाती थीं। यह कोई वंृदावन की कृष्ण भक्ति सा नजारा था, लेकिन जब में इस बार गया तो सबकुछ बदल सा गया था। अगस्त में यह मल मास चल रहा है, महिलाएं अब भी उसी नर्मदा में नहाने जा रहीं हैं। किंतु तरीका बदल गया है। पहले जो पूरा गांव एक होकर धमनी के रास्ते, ऊपर के रास्ते से नर्मदा में इकट्ठा होता था, वह अब सब अपनी-अपनी राह से नर्मदा जा रहा था। कोई किसी को नहीं बुलाता, अब बस कुछ झुंड थे। कोई एक जाति के नाम पर तो कोई एक परिवार के नाम पर। इनमें कुछ ऐसे झुंड भी थे, जो मुहल्लों के नाम पर हैं। कुल संख्या में भी कमी आई थी। मेरे लिए यह सब रोमांचक था, चूंकि शहरी परिवेश ने जो दिया सो दिया लेकिन सुबह जल्दी उठने की अच्छी आदत वह हमेशा के लिए लेकर उड़ गया। लेकिन करिए करिए शाहा ब्यारी की एक सुरमयी धुन अभी भी कानों में तैर जाती है, तो एक आध्यात्मिक संगीत मन के भीतर कहीं बज उठता है। निश्चित तौर पर यह एक धार्मिक विधि और पापों से मुक्ति का एक जरिया थी। किंतु यह प्रक्रिया गांवी सहजता, अपने कर्मोंं के साथ ईश्वरीय चिंतन, सबके बीच के प्रेम, उत्सवी भारतीय मानस, को प्रतिबिंबित करती थी। पूरी जिंदगी भले ही सही और गलत के बीच फैसला न कर सके हों, किंतु एक डुबकी इस नाम पर लगाना कि जो कुछ गलत किया उसके लिए माफी अच्छी बात थी। यह उस युगबंधक मनुष्य के मानस पर एक तमाचा भी है, जो यह मानता है कि युग बदला है तो हम सतयुग या अच्छे युग के कैसे हो सकते हैं। एक अलग इंसानी फितरत भी यहां झलकती है कि इंसान चाहे कितना ही आगे पीछे, ऊपर नीचे चला जाए मगर वह अपने गलत कामों को सुधारने की कोशिश करता ही रहेगा। सालों बाद के गांवी गुटों को देखकर तकलीफ होती जरूर है, किंतु यह सोचकर कि इंसान हमेशा सुधरने की कोशिश करता है। इस मामले में भी वह आज नहीं, कल नहीं परसों जरूर अपने मुहल्ला गुटों को खत्म करके एकल गांवी गुट बन सकेंगे। चूंकि इन दिनों मल मास चल रहा है और यह महिलाएं स्नान भी कर ही रहीं है, तो मुमकिन है वे फिर चाची, दादी, बड़ीअम्मा, नन्हेघर की दादी, नैलापुर वाली, कैलकच्छ वाली, भौजी आ जाओ चिल्लाती हुईं नर्मदा जरूर जाएंगी। और मुझे वो गीत सुनने मिलेगा करिए करिए शाहा ब्यारी, जी महाराज अवध विहारी, इतनी सुन मैया जानकी जी बोलीं कहा बनी तराकारी। करिए करिए शाहा ब्यारी... वरुण के सखाजी चीफ रिपोर्टर, दैनिक भास्कर, रायपुर

Friday, July 27, 2012

हास्य के साथ हास्यास्पद बदलाव की आशा

एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान अरविंद केजरीवाल से बात हुई। यह बात करीब अभी से एक साल पुरानी है। यानी पिछले साल जब अन्ना हजारे करप्शन विरोधी मशीन ईजाद कर रहे थे। अरविंद से मैंने पूछा था कि आपके पास ह्युमन चैन क्या है? जिसके जरिए आप देशभर के जन सैलाब को बांधे रखेंगे। एकाध बार तो सही है कि लोग स्वस्फूर्त आ भी जाएंगे। और फिर मीडिया के पास कुछ और रहा तो फिर आप क्या करेंगे।? अरविंद इतने आत्मविश्वस्त थे कि वे कुछ भी विरोधी बात नहीं सुनना चाहते थे। उन्होंने इस प्रश्न को इतना हल्के से लिया और कहा, यह तो लोगों को सोचना है कि वे करप्शन से निपटने के लिए कोई बिल पास करवाने की विल रखते हैं या नहीं। अरविंद की इस बात से मैं सहमत नहीं हुआ। मैंने वीडियो कॉन्फ्रेंस की अपनी मर्यादाओं के बीच तीन बार उनसे इस पर बहस चाही। मगर अरविंद को लगा जैसे मेरे अखबार ने उन्हें यहां अपमानित करने के लिए बुलाया है। तो वह पैर पटककर बोले यह तो मीडिया के कुछ जिम्मेदार लोगों को सोचना होगा, वरुण जी आप इस बारे में नहीं समझ पाएंगे। मेरा प्रश्न पत्रकार के नाते जरूर था, किंतु आम आदमी की छटपटाहट भी था। मैं वास्तव में इस टीम से जुडऩा चाहता था। किंतु मुझे कोई रास्ता ही नहीं दिख रहा था। इससे जुडऩे के लिए टीवी देखना इकलौती शर्त थी, वो भी न्यूज चैनलों की बातें जो वे पूर्वाग्रस्त से भी कह सकते थे। उस दौर का मेरा मानस था कि देश, राष्ट्र अगर रिएक्ट कर रहा है, यह नहीं कि वह लोकपाल के लिए लड़ रहा है। बस रिएक्ट कर रहा है, तो अच्छा अवसर है हमें भी समाज में आगे आना चाहिए। मन मानस सब तैयार था कि कैसे भी इस महा आंदोलन में कूदेंगे। चाहे नौकरी जाए, चाहे घर, चाहे परिवार। देशप्रेम या यूं कहिए एक सोशल कंर्सन इतना बलवान हुआ। किंतु अरविंद की बेहूदा इस बात ने झल्ला दिया। मैं यह नहीं कहता कि मैं कूद ही जाता, किंतु कूद जरूर जाता। अगर अरविंद या अन्ना थोड़े भी प्रैक्टिकल होते। भीड़ के बूते आगे बढ़े लोगों को आखिरकार चाहिए तो भीड़ ही होती है। मैं नहीं गया उल्टा मुझे कोफ्त सी भी हुई कि यह क्या व्यवस्था बदलने की बात कर रहे हैं, वो भी इतने अव्यवस्थित तरीके से। इस विंडबना ने मुझे इस आंदोलन से दूर किया और यह भी मैं दावे से कहता हूं कि मेरे जैसे लाखों लोगों को आंदोलन ने ऐसी ही गैर जिम्मेदाराना बातों से दूर किया है। अब जब बाबा रामदेव उर्फ राजनीतिज्ञ योगासन गुरु यह कह रहे हैं, कि लोकतंत्र में अपनी बात मनवाने के लिए कम से कम 1 फीसदी लोग तो साथ हों। तो गलत नहीं कह रहे। सच है ऐसे तो यह पर्सनल आंदोलन हो गया। और रहा अनशन का तो यह लोकतंत्र में गरिमापूर्ण स्थान रखता है, लेकिन कल, परसो, शाक भाजी जैसा अनशन हो गया तो क्या होगा। यह अभी भी मौका है अन्ना को थिंक टैंकों की शरण में होना चाहिए। वे इसे फिर से बनाकर निश्चित ही प्रासंगिक, सांदर्भिक और कार्यरूपित आंदोलन की शक्ल में ढाल सकेंगे। अन्ना को मेरा खुला निमंत्रण है अगर चाहें तो मुझसे बात कर सकते हैं। इसी हास्य के साथ गंभीर बात पर हास्ययुक्त तरीके से बदलाव की अति हास्यास्पद आशा के साथ। वरुण।

Sunday, July 22, 2012

पंचायत मतलब सबकुछ गलत क्यों?

कभी फरमानों तो कभी बेजा शोषण के अरमानों के लिए खाप पंतायतें अपने पाप के साथ चर्चाओं में रहती हैं। इसे लोकतंत्र का चरम कहिए या फिर अतिश्योक्ति। या यूं भी कह सकते हैं कि यह मौजूदा यूनिफॉर्म सिस्टम के खिलाफ एक अजीब सी आवाज भी है। हम यह भी जानते हैं कि गांधी के ग्राम सुराज की परिकल्पना इन्हीं पंचायतों की सीढ़ी से साकार हो सकती है। मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में इन्हीं पंचायतों की गरिमा और गर्व की बात की जाती है। इन्हीं पंचायतों में मानव के स्वभावगत व्यवस्थापन की कल्पना भी की जाती रही है। लेकिन अफसोस कि अब खापें खंडहर होकर भी भूतिया सोच और फरमानों की एशगाह सी बन गईं हैं। हमारे गांव मेंं किसी दौर में एक ऐसी ही पंचायत हुआ करती थी। नजदीकी गांव तक से लोग इस पंचायत में जमीनी विवाद से लेकर हर उस बात के लिए आते थे, जो कि यहां सच्चे न्याय के लिए संभावित नजर आती। सालों इस पंचायत ने न्याय दिया। मुझे याद है 1993 में एक बड़े किसान के हलवाए (नौकर) को उसके ही रिश्तेदारों ने लठ से मार-मारकर अधमरा कर दिया था। यह घटना बिल्कुल गुपचुप तरीके से हुई। हलवाए को मरा मानकर मारने वाले घर आ गए। लेकिन दूसरे दिन जब हलवाए की खोज की गई तो वह खेत में मरणासन्न मिला। पुलिस को बुलाने जैसी बातें भी की गईं। साथ ही गांव की यही पंचायत भी सक्रिय हो गई। सक्रिय इसलिए नहीं कि कोई उलूल-जुलूल फरमान जारी करेगी। सक्रिय इसलिए भी नहीं कि पुलिस के दखल को कम करेगी। और सक्रिय इसलिए भी नहीं हुई कि पंचायत तय कर दे कि कौन हत्यारा है। पंचायत के लोगों ने एक राज्य की व्यवस्था की तरह आनन-फानन में पंचों को बुलाया। पूरे गांव के लोग जमा हुए। एक संसद सा माहौल। एक ऐसी संसद जहां पर प्रतिनिधि चुना नहीं, उसका राज्य में पैदा होना ही चुने जाने के बराबर है। हर कोई खुलकर इस पंचायत में बात कर सकता था। पंचायत का मुख्य विचार यही निकला कि यह महज एक हलवाए की हत्या के प्रयास का मामला नहीं, बल्कि गांव की शांति का भी मसला है। पंचों ने इस मौके पर बहुत ही संजीदा और जिम्मेदाराना रुख अपनाया। पंचायत ने पुलिस को पड़ताल में साथ देने के लिए युवाओं की टोली बनाई। बुजुर्गों ने अपने अनुभवों को सांझा किया। यहां पर न तो रॉ जैसी जासूस एजेंसी थी, न सीबीआई जैसी जांच एजेंसी। मगर इस पंचायत ने ऐसे किया जैसे एक राज्य में कोई सरकार करती। पुलिस के साथ मिलकर पूरे गांव ने एक सप्ताह के भीतर हत्यारों की गतिविधियों को पकड़ लिया। मरणासन्न हलवाया बयान देता इससे पहले ही अपराधी हिरासत में थे। यह कहानी कहने का मतलब महज इतना है कि गांवों की यह पंचायतें खाप नहीं हैं। न ही यह ऐसी हैं जिनके वजूद को खत्म कर दिया जाए। अच्छा होगा कि इनके बारे में नकारात्मक राय फैलाने की बजाए इन्हें नैतिकता और प्राकृतिक न्याय के प्रति उन्मुख किया जाए। और गांधी के ग्राम सुराज की परिकल्पना को साकार बनाया जाए। वरुण के सखाजी

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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