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Tuesday, August 5, 2008

केव्स पताका फहराओ ......... शुभकामनाएं

हर्ष और गौरव दोनों के ही अनुरूप विषय है यह कि हमारे विभाग के १६ होनहारों का चयन जी न्यूज़ के आने वाले छत्तीसगढ़ न्यूज़ चैनल के लिए हुआ था और वे सभी रायपुर में ज्वाइन कर चुके हैं और आज से अपना काम शुरू कर देंगे या कर चुके होंगे। हर्ष की बात ये है कि सभी अत्यन्त प्रतिभाशाली हैं और योग्यता अनुरूप इन्हे बड़े नेटवर्क में काम मिला और गर्व का विषय यह कि विश्वविद्यालय में इतने बड़े नेटवर्क में कैम्पस चयन के द्वारा चयनित होने वाली यह रिकार्ड संख्या है ....... सो विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाने वाले इन केव्स वीरों को बधाई और इनके पत्रकारिता के उज्जवल भविष्य के लिए पूरे केव्स परिवार की ओर से शुभकामनाएं ........ ईश्वर करे कि ये सभी पत्रकारिता के दिन पर दिन स्वरुप में सुधार लायें और कीर्तिमान गढे....................
साथ ही सबसे ज़्यादा बधाई के पात्र हैं डॉ अविनाश बाजपई और डॉ श्रीकांत सिंह

Saturday, August 2, 2008

एक युग बीता ......




१८ मई, 2008 की रात, जगह थी नॉएडा के सेक्टर १२ के मेट्रो हॉस्पिटल का क्रिटिकल केयर सेंटर ......... मैं शांत और स्तब्ध खडा एक युग को अपने अवसान की ओर जाते देख रहा था........ देख रहा था एक भीष्म को शैया पर पड़े .... और सोच रहा था कि हाँ ये वाकई एक युग का अंत है। मैं तो मैं हूँ ही और यहीं हूँ पर वो युग आज बीत गया, भीष्म आज इच्छा मृत्यु को प्राप्त हो गया ........ और वो भीष्म थे हरकिशन सिंह सुरजीत...... भारतीय वामपंथ के पितामह ! मैं तब नोइडा में एक अदद मीडिया की नौकरी के लिए मन मार रहा था और तभी पता चला कि सुरजीत जी मेट्रो में भरती हैं...... पुराना सोशलिस्ट मन जोर मार गया और रात के ९ बजे मोटर साइकिल का हैंडिल अपने आप ही मुड गया मेट्रो हॉस्पिटल की ओर .... गेट पर गार्ड से पूछा कि सुरजीत जी यहीं भर्ती हैं ...... सर हाँ में हिला इशारा किया रिसेप्शन की ओर , रिसेप्शन पर कहा गया कि ऊपर दूसरी मंजिल पर क्रिटिकल केयर सेंटर में हैं ! ऊपर पहुंचा तो अजीब सी शान्ति मिली, बहुत भीड़ भाड़ नहीं, कोई उत्साही समर्थक नहीं; ना ही पार्टी नेताओं का जमावडा ....... सिर्फ़ दो घरवाले और लुधियाना से आए दो रिश्तेदार ! पहले बाहर बैठने को कहा गया तो मुलाक़ात हुई सुरजीत जी के बड़े बेटे से जो ब्रिटेन के ग्लासगो शहर से आए थे और आजकल वही रहते हैं ........ पता चला कि स्थिति ज्यादा नाज़ुक है ....... सुरजीत जी कोमा में हैं ही और फेफडे तथा गुर्दे दोनों ही काम नही कर रहे थे। उनके रिश्तेदारों से भी उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ चर्चा हुई और बेशक वे उनके राजनीतिक जीवन के बारे में बहुत नही जानते थे पर उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में ज़रूर जानकारी मिली।


तभी बाहर आए उनके पौत्र जो उनकी देखरेख कर रहे थे ....... मेरे ये बताते ही कि छात्र जीवन में स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया से जुडा रहा था तुंरत उन्होंने कहा कि आप साथ आयें और मुझे अन्दर ले गए, सामने की शैया पर मैंने वो देखा जो अब तक किताबो में पढा था ........ एक युग का अंत ! बिस्तर पर तमाम तरह की नलियों और उपकरणों के बीच में कुछ साँसे संघर्ष कर रही थी ....... पहली बार सुरजीत जी को बिना पगड़ी के देखा, देख रहा था एक युग को अचेतन अवस्था में और याद कर रहा था जब पहली बार उनको लखनऊ में और फिर सैकडो बार टीवी पर देखा था।


जितना जानता हूँ उनके बारे में वो सब आज याद आ रहा है क्यूंकि आज १ अगस्त २००८ को अब वे हमारे बीच नहीं हैं ........... एक आम नागरिक के तौर पर हम सब उनके बारे बस यही जानते हैं कि वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) के भूतपूर्व महासचिव और सबसे बुजुर्ग कम्युनिस्ट थे, कई लोग उन्हें वयोवृद्ध कामरेड के या कामरेड सुरजीत के नाम से भी जानते थे। उनको लेकर कई विवादित मुद्दे भी रहे और बिल्कुल ये दूसरो से और भीड़ से अलग होने की कीमत भी है कि आपको प्रसिद्द होने के साथ विवादित भी होना पड़ेगा। कामरेड सुरजीत का जन्म २३ मार्च १९१६ को जालंधर जिले के बुन्दाला में एक बस्सी जाट परिवार में हुआ, इसे संयोग कहें या विधि की भगत सिंह के इस कट्टर अनुयायी का जन्म १९२६ में उसी दिन हुआ जिस दिन १९३१ में भगत सिंह को फांसी दी गई। १९३० में सुरजीत ने किशोरावस्था में ही भगत सिंह की नौजवान भारत सभा की सदस्यता ले ली और आज़ादी की क्रांतिकारी आन्दोलन में कूद पड़े। २३ मार्च १९३२ को भगत सिंह के पहले शहादत दिवस पर सुरजीत ने होशियारपुर कचहरी परिसर में तिरंगा लहरा दिया जिसमे इन्हे दो गोलियाँ मारी गई, अदालत में पेश किए जाने पर जज को इन्होने अपना नाम लन्दन तोड़ सिंह बताया।


रिहाई के बाद सुरजीत पंजाब के साम्यवादियों के संपर्क में आए और १९३६ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली, १९३८ में सुरजीत किसान आन्दोलन से जुड़ गए जब पंजाब किसान संघ की नींव पड़ी और वे उसके महासचिव बनाए गए। उसी साल उन्हें ब्रिटिश सरकार ने पंजाब से बाहर जाने का फरमान सुना दिया, यहाँ से वे पहुंचे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और वहां से चिंगारी नाम की इंकेलाबी पत्रिका निकालने लगे। तभी द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और उनको भूमिगत होना पड़ा। फिर उन्हें गिरफ्तार करके लाहोर किले में क़ैद कर दिया गया। १९४४ में वे वहाँ से रिहा हुए और दोबारा किसान आन्दोलन में जुट गए। तभी देश आजाद हो गया ....... इस दौरान बंटवारे को लेकर हुए दंगो में हिंसा रोकने और सदभाव फैलाने की सुरजीत की कोशिशों को लोग आज भी याद करते हैं। १९५४ में भाकपा के तीसरे अधिवेशन में वे पार्टी की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में चुने गए। वो इन पदों पर १९६४ में पार्टी के टूटने तक रहे फिर १९६४ में विवादित घटनाक्रम में भाकपा मार्क्सवादी की स्थापना हुई और तब से अप्रैल २००८ तक वे पार्टी के वरिष्ठतम क्रम पर रहे। यही नही पिछले दस सालो में गठबंधन की राजनीती में भी सुरजीत हमेशा धुरी बने रहे। अप्रैल २००८ में गिरते स्वास्थ्य की वजह से सुरजीत ने पार्टी के तमाम पदों से इस्तीफा दे दिया।


१९६२ में (कथित साम्यवादी) चीन के हमले के दौरान चीन का समर्थन करने वाले नेताओं में सुरजीत भी शामिल थे और ये विवाद जीवन पर्यंत उनके साथ जुड़े रहे। सुरजीत का ये कदम उनके पूरे राजनैतिक जीवन का सबसे ग़लत कदम माना जा सकता है पर फिर भी इसे सबसे दुस्साहसिक कदम भी कहेंगे ....... ऐसा दुस्साहस सुरजीत हमेशा करते रहे !
सुरजीत उन साम्यवादियों में रहे जो विवादित तो रहे पर कई मामलो में उनके विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। वैसे भी कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नहीं पर उसके कुछ महान काम उसकी तमाम गलतियों पर भारी पड़ते हैं। उनका दुस्साहस यह भी था कि एक ज़बरदस्त विवाद की आधार भूमि पर एक नयी पार्टी बना दी और आज वो देश की सबसे बड़ी साम्यवादी राजनैतिक पार्टी है .......... ये श्रेय उनसे नहीं छीन सकते हम .......... हम में से कितने लोग एक झंडा फहराने के लिए सीने पर गोलियाँ खाने को तैयार हैं ? ...... हम में से कितने किसानो के हक के लिए अपनी जायदाद बेच देंगे ? हम में से कितने लोग खालिस्तान अलगाववादियों के ख़िलाफ़ खुल कर खड़े हो गए था ?



१८ मई की रात मेट्रो हॉस्पिटल में मेरे सामने सुरजीत जी कोमा में पड़े मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे ................ और मैं पहुँच गया था लखनऊ के उस वक़्त में जब मेरी उनसे पहली और चेतन अवस्था में आखिरी भेंट हुई थी ! ...... तब मैंने उनसे अभिवादन करते हुए कहा था
' कामरेड लन्दन तोड़ सिंह को मेरा सलाम '
और उधर से जवाब आया कि
" लन्दन क्या जो भी चीज़ तुम पर ज़बरदस्ती थोपी जाए उसे तोड़ डालो ! "


यादों से लौट कर मैं फिर हॉस्पिटल में था........और सोच रहा था कि क्या उनसे ऐसी ही दो मुलाकातें होनी थी .... एक जिसमे ऐसा जोश था और एक में जिंदगी के अंत का सन्नाटा ?
फिर अचानक देखा कि सुरजीत जी ने अवचेतन अवस्था में एक बार ज़ोर से साँस ली .... जैसे कहना चाहते हों कि लड़ाई तो हमेशा ही है, चाहे दुनिया से या ख़ुद से ! मैं फिर शांत था क्यूंकि देख लेना चाहता था पूरे ध्यान से और चाहता था कि हमेशा के लिए हिस्सा बन जाऊ उस युग का जो अब ख़त्म हो गया...........


मेरे सामने भीष्म की भांति एक युग और वाकई भारतीय राजनीति शर शैया ही है ..... एक महागाथा अपनी परिणिती की ओर थी .............. आज वो पूर्ण हुई ! विवाद तो होंगे ही ..... गलतियां भी होनी ही हैं पर युग तो युग है ........ यह एक युग की समाप्ति थी ....भारतीय साम्यवाद के !


मयंक सक्सेना
9311622028 mailmayanksaxena@gmail.com

Thursday, July 31, 2008

प्रेमचंद और रफी ......

आज ३१ जुलाई है। एक खास दिन । १८८० में आज ही के दिन कथा सम्राट प्रेमचंद का जन्म हुआ था तो ठीक १०० साल बाद १९८० में स्वर सम्राट मोहम्मद रफी साहब इस दुनिया से रुखसत हुए थे। मैं दोनों का बहुत बड़ा मुरीद हूँ इसलिए दोनों को श्रृद्धांजलि दे रहा हूँ।

प्रेमचंद - प्रेमचंद को केवल कथा सम्राट कह देने से उनका परिचय नही दिया जा सकता । प्रेमचंद को जानना है तो उन्हें पढ़ना तो पड़ेगा ही । लेकिन चूंकि आजकल चेतन भगत को पढने से आपको फुर्सत नही होगी और फ़िर आप में से ही कोई अपने चेतन का अचेतन पाठक , अपने आपको साहित्य पढने का शौकीन बताते हुए प्रेमचंद के लेखन की समीक्षा कुछ यूँ करेगा की "प्रेमचंद के साहित्य से अगर गाँव और किसान निकाल दो तो कुछ बचता ही नही है (जैसा की अभी कुछ दिन पहले मेरे एक स्वयम्भू साहित्य-शौकीन ने की ) तो मैंने जो उस दिन उससे कहा वही आपसे भी कह रहा हूँ "मानव शरीर से प्राण निकाल दो और पूछो की फ़िर बचता क्या है ?" गाँव और किसान प्रेमचंद साहित्य के ही नही भारत के भी प्राण हैं । प्रेमचंद के साहित्य में भारत साँस लेता है । आपको अगर नही मिलता , तो चेतन और चेतना दोनों जिम्मेदार हैं ।

मोहम्मद रफी -

तुझे नगमों की जान अहले नज़र यूँ ही नही कहते
तेरे गीतों को दिल का हमसफ़र यूँ ही नही कहते
महफिलों के दामन में , साहिलों के आस पास
ये सदा गूंजेगी सदियों तक दिलों के आस पास

ये कॉल हैं हमारे अपने शहर के नौशाद साहब के जो उन्होंने रफी साहब के इंतकाल पर ३१ जुलाई १९८० को कहे थे । ३५ साल और २६०००० गाने । इतने लंबे सफर को ब्लॉग में समेट पाना तो मुमकिन नही है लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा की रफी साहब संगीत के उस सुनहरे दौर की अगुआई करते हैं जिसके बारे में पंडित जसराज ने कहा था की , तब संगीत सुनो तो सर हिलता था , आज पैर हिलते हैं ,स्तर कहाँ पहुँचा है इसका अंदाज़ आप लगा सकते हैं ।

Tuesday, July 29, 2008

हादसे.... ख़बर .....और आंसू !






एक न्यूज़ चैनल में काम करता हूँ इस नाते मौका मिलता है खबरों को ज़्यादा नज़दीक से देखने का, ज्यादा जानकारी पाने का और उनको ज्यादा समझने का......... साथ ही साथ उनसे ज्यादा उदासीन होना और अधिक संवेदनाहीन होने का ! परसों बेंगुलुरु में धमाके हुए और कल हुए अहमदाबाद में और बेशक सारे मीडिया में यह सब छाया रहा। दोनों दिन ऑफिस में ही था और अभी फिलहाल ऐसे विभाग में हूँ जहाँ बहुत अधिक काम नहीं रहता सो न्यूज़ डेस्क पर बैठा रहा। फिलहाल पहले चर्चा धमाकों की क्यूकि पत्रकार हूँ उसके बाद बात जिरह अपने मन की क्यूंकि साहित्यकार मन है। सुरक्षा एजेंसियों को लगातार मिली सूचनाओं के बावजूद निश्चित रूप से ये गृह मंत्रालय और सुरक्षा तंत्र की ज़बर्स्दस्त विफलता ही कही जाएगी कि देश के दो बड़े शहरो में लगातार दो दिन के लिए बम धमाके होते रहे और एक दो नही बेंगुलुरु में २५ जुलाई को १० विस्फोट हुए और कल अहमदाबाद में एक के बाद एक १६ बम पते जिसमे कुल मिलाकर 46 लोग मारे गए और १०० से अधिक घायल हुए।


जिम्मेदार अधिकारी तो इस मामले पर अपना पल्ला झाड़ते नज़र आए ही नेताओं ने इस पर इतने गैरजिम्मेदाराना बयान दिए कि क्या कहें। खैर उनके बयान तो आप पढ़ ही लेंगे पर सोचने की बात है कि संसद में लोकतंत्र की नौटंकी बना देने वाले इस समय चुप हैं या एक दूसरे पर आरोप मढ़ने में जुटे हैं मतलब कुल जमा फिर नौटंकी और राजनीतिक दांव पेंच ! ये दुखद है पर आश्चर्यजनक नहीं ..... क्यूंकि किसी नेता का कोई परिजन इस घटना का शिकार नही हुआ और आजकल आदमी राजनीति में आता तभी है जब सारी संवेदना मार देता है। किसी शायर की चंद लाइन याद आ रही हैं ,
कभी मन्दिर, कभी मस्जिद कभी मैखाने जाते हैं
सियासी लोग तो बस आग को भड़काने जाते हैं


सियासी लोग तो खैर सियासी हैं पर अब बात मन की .............. तो फिलहाल एक समाचार चैनल में काम कर रहा हूँ और पिछले दो दिनों में काफ़ी कुछ देखना पडा। ख़बर आई कि धमाके हो गए हैं ....... पहले २ फिर ४, फिर ६ और अब १६ ........................मन डरा , उत्तेजित हुआ भागादौडी मच गई और लगी ख़बर पे ख़बर...........लाइव पर लाइव .......... शॉट्स...फीड्स........बाइट्स और खेल ख़बर का जितने धमाके बढ़ते गए उतनी ही टी आर पी ! आश्चर्य या कहूँ दुखद आश्चर्य ये हुआ कि अधिकतर लोग बहुत या बिल्कुल दुखी नही थे। कुछ तो शायद काफ़ी उत्साहित थे ....... ख़बर को लेकर ! असाइंमेंट डेस्क आतंकवादियों को गालियाँ बक रहा था ...... इसलिए कि आज भी जल्दी घर नहीं जाने दिया .............. रिपोर्टर इसलिए कि वीकएंड ख़राब कर दिया और डेस्क इसलिए कि अब सन्डे को भी आना पड़ेगा ........ सीनिअर लोग चहक रहे थे कि अबकी टी आर पी आने दो ......... कुल मिला के लोग दुखी और नाराज़ थे पर इसलिए कि उनको काम ज्यादा करना पड़ेगा। शायद गिने चुने लोग होंगे जो इस ख़बर को ज़िम्मेदारी समझ कर चला रहे होंगे !


खैर मेरा घर जाने का वक़्त हो चला था ........ डेस्क के बड़े लोग सनसनीखेज एंकर लिंक और धाँसू पैकज लिखने में जुट चुके थे .......... उन सबका मूड ऑफ़ हो रहा था पर मेरा मन भारी हो रहा था ................... मालूम था कि जब घर पहुंचूंगा तो टीवी पर सारेगामा या वौइस् ऑफ़ इंडिया चलता मिलेगा। शायद रियलिटी शो के आंसू रियलिटी से ज़्यादा रियल हैं और तभी घर वालों की आंखों को नम कर पाते हैं .......................धमाको में तो रोज़ ही लोग मरते हैं !


मयंक सक्सेना

Monday, July 28, 2008

आतंक के रखवाले ........

सबसे पहले बंगलोर और अहमदाबाद में आतंक की बलि चढ़े लोगों को केव्स संचार की तरफ़ से श्रद्धांजलि ! अब ज़रा आपको बताऊँ की मैंने पोस्ट को ये नाम क्यूँ दिया ? २००६ में उत्तर प्रदेश सरकार नें सफ़दर नागौरी के ख़िलाफ़ राष्ट्र द्रोह का मुक़दमा वापस ले लिया था । वही नागौरी जो सिमी सरगना है और कुछ ही दिनों पहले इंदौर से पकड़ा गया है .... संसद पर हमले के दोषी अफज़ल गुरु को आज तक फांसी नही दी गयी है , कांग्रेस , पीडीपी ,और हुर्रियत के कुछ नेता खुले आम उसकी माफ़ी की बात कर चुके हैं । पोटा कानून के पक्ष या विपक्ष में मैं अपनी राय नही रख रहा , पर अगर उस क़ानून में कुछ खाम्मियाँ थीं तो उन्हें दूर करना था , न की पोटा को ही ख़त्म कर देना, अब अपनी बात , हम में से कितने लोग सार्वजनिक स्थलों पर संदिग्ध वस्तुओं या आदमियों की सुचना पुलिस को देते हैं , और आम आदमी पुलिस से डरता क्यूँ है ? अब आप बताएं की जिस देश में आतंक के इतने रखवाले मौजूद हों वहां आतंक क्यूँ नही पनपेगा ?

गौर फरमाएं !

ख़बरों का जाने कौन सा मेयार हो गया
कितने अजीब ढंग का अखबार हो गया
उसूलों की अहमियत से इंकार नही है
ज़्यादा अहम लेकिन यहाँ बाज़ार हो गया ...............'हिम लखनवी'

मेयार = मापदंड

Sunday, July 27, 2008

पाँच साल पन्द्रह हमले !



परसों और कल हुए धमाको के बारे में ज्यादा कुछ क्या बताऊ पर इतना कहना चाहूँगा कि शायद अमेरिका केवल हौवा खडा करता है वस्तुतः आतंकवाद के सबसे बड़े शिकार दुनिया में हम हैं। इसका सबूत ये है कि पिछले पाँच साल में भारत में पन्द्रह बड़े आतंकवादी हमले हो चुके हैं .............................. एक नज़र


13 मार्च 2003: मुंबई में एक ट्रेन में हुए धमाके में 11 लोगों की मौत हो गई।



25 अगस्त 2003: मुंबई में एक के एक दो कार बम धमाकों में 60 लोगों की मौत हो गई।



15 अगस्त 2003: असम में हुए धमाके में 18 लोग मारे गए जिनमें ज़्यादातर स्कूली बच्चे थे।



29 अगस्त 2003: नई दिल्ली के तीन व्यस्त इलाक़ों में हुए धमाकों में 66 लोगों ने अपनी जान गँवाई।



7 मार्च 2006: वाराणसी में हुए तीन धमाकों में कम से कम 15 लोग मारे गए जबकि 60 से ज़्यादा घायल हुए।



11 जुलाई 2006: मुंबई में कई ट्रेन धमाकों में 180 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई।



8 सितंबर 2006: महाराष्ट्र के मालेगाँव में कुई सिलसिलेवार धमाकों में 32 लोग मारे गए।



19 फरवरी 2007: भारत से पाकिस्तान जा रही ट्रेन में हुआ धमाका। इस धमाके में 66 लोगों की मौत हो गई जिनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान के नागरिक थे.



18 मई 2007: हैदराबाद की मशहूर मक्का मस्जिद में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान धमाका हुआ। जिनमें 11 लोगों की मौत हो गई.



25 अगस्त 2007: हैदराबाद के एक पार्क में तीन धमाके हुए जिनमें कम से कम 40 लोग मारे गए।



11 अक्तूबर 2007: अजमेर में ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ की दरगाह पर हुआ धमाका। धमाके में दो लोगों की मौत हो गई.



23 नवंबर, 2007 : वाराणसी, फ़ैज़ाबाद और लखनऊ के अदालत परिसर में सिलसिलेवार धमाके हुए जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई और 50 से ज़्यादा घायल हो गए।



13 मई 2008: जयपुर में सात बम धमाके हुए। जिनमें कम से कम 63 लोगों की मौत हो गई.



25 जुलाई 2008: बंगलौर में हुए सात धमाके। जिनमें दो व्यक्ति की मौत हो गई और कम से कम 15 घायल हुए.



26 जुलाई 2008: अहमदबाद में लगातार 1६ धमाके हुए।


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