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Saturday, January 31, 2009

वसंत पंचमी....और निराला

आज वसंत पंचमी है, आज दिन है हिन्दू मान्यता में विद्या और कला की देवी माँ सरस्वती की आराधना का। दरअसल जो धर्म में विशवास नहीं करते वे भी इसे विद्या और कला के प्रतीक पर्व के रूप में तो मना ही सकते हैं। आज के दिन से वसंत ऋतु का प्रारंभ माना जाता है। वसंत जो माह है उत्साह का उल्लास का....जब खेतों में सरसों सोना बिखेर देती है और हवाओं में ठंडी ताजगी और भीनी सुगंध होती है.....वसंत
जो पर्व है प्रेम का....(शायद इसीलिए इसी माह में विदेशी प्रेम दिवस 'वैलेंटाइन डे' और देसी वसंतोत्सव सभी पड़ते हैं। वसंत के लिए महादेवी वर्मा कहती हैं,

मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत
मैं अग जग का प्यारा वसंत
खैर बात होती है तो वसंत पंचमी की तो याद आते हैं निराला .......महाप्राण ! वाकई महाप्राण ........ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म भी माना जाता है कि इसी दिन हुआ था .....और हुआ हो या ना ये मस्त औघड़ अपना जन्मदिन इसी दिन मनाता था। साहित्य को निराला जैसा कुछ भी शायद ही किसी और ने दिया हो। मैं तो उस व्यक्तित्व से इतना प्रभावित था कि काफ़ी दिनों तक उसी शैली में कवितायें लिखता रहा.....प्रेम हो या समाज या फिर भक्ति, निराला की शैली ही निराली थी.....श्रृंगार देखें जब वे कहते हैं कि,
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!



वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबमें दाँव, बंधु!
समाज की बात की तो भिक्षुक की आंखों से ऐसा चित्र खींच दिया कि दर्द कागज़ पर छलक आया, दिखी समाज की विडम्बना.....
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!
खैर निराला पर पूरी बात किसी और दिन जब उनके लखनऊ प्रवास की भी चर्चा होगी पर अभी मुद्दे की बात.....आज वसंत पंचमी है और मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि सरस्वती वंदना जो निराला ने लिखी थी वह सर्वश्रेष्ठ वंदना है....सो उसे पढ़ें और गुनगुनाएं....


वीणा वादिनि


वर दे, वीणावादिनि वर दे।



प्रिय स्वतंत्र रव,
अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे।
काट अंध उर के बंधन स्तर

बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।

नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।
वर दे, वीणावादिनि वर दे।




वसंत पंचमी की शुभकामनाएं.......

मैंने गांधी को मारा है.....


यह कविता मैंने पिछले साल लिखी थी और उस दिन थोड़ा संतुष्ट था कि लगभग सभी मीडिया ने बापू को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था पर इस बार दूरदर्शन छोड़कर किसी ने भी राष्ट्रपिता को याद करने की भूल नहीं की (देखें .taazahavaa.blogspot.com), सो इस बार यह कविता प्रस्तुत है केव्स संचार के पाठकों के लिए,


मैंने गांधी को मारा है !!
मैंने गांधी को मारा है .....
हां मैंने गांधी को मार दिया !!


मैं कौन ?
अरे नही मैं कोई नाथूराम नहीं
मैं तो वही हूँ जो तुम सब हो
हम सब हैं

क्या हुआ अगर मैं उस वक़्त पैदा
नही हो पाया
क्या हुआ अगर गांधी को मैं
सशरीर नही मार सका
मैंने वह कर दिखाया
जो नाथू राम नही कर पाया

मैंने गांधी को मारा है
मैंने उसकी आत्मा को मार दिखाया है
और मेरी उपलब्धि
कि मैंने गांधी को एक बार नही
कई बार मारा है

अक्सर मारता रहता हूँ
आज सुबह ही मारा है
शाम तक न जाने कितनी बार मार चुका हूँगा
इसमे मेरे लिए कुछ नया नहीं
रोज़ ही का काम है

हर बार जब अन्याय करता हूँ
अन्याय सहता हूँ
सच छुपाता झूठ बोलता हूँ
घुटता अन्दर ही अन्दर मरता हूँ
अपने फायदे के लिए दूसरे का नुकसान
करता हूँ
और उसे प्रोफेश्नालिस्म का नाम देकर
बच निकलता हूँ

तब तब हर बार
हाँ मैंने गांधी को मारा है ........

जब जब यह चीखता हूँ कि
साला यह मुल्क है ही घटिया
तब तब ......
जब भी भौंकता हूँ कि
साला इस देश का कुछ होने वाला नही
और जब भीव्यंग्य करता हूँ कि
अमा यार' मजबूरी का नाम .........

'तब तब हर बार मैंने
उसे मार दिया
बूढा परेशान न करे हर कदम पर
आदर्शो के नखरों से
सो उसे मौत के घाट उतार दिया

तो आज गीता कुरान जिस पर कहो
हाथ रख कर क़सम खाता हूँ
सच बताता हूँ
कि मैंने गांधी को मारा है
पर इस साजिश में मैं अकेला नहीं हूँ
मेरे और भी साथी हैं
जो इसमे शामिल हैं
और
वो साथी हैं
आप सब !!बल्कि हम सब !!!!
यौर होनौर आप भी ......

अब चौंकिए मत
शर्मिन्दा हो कर चुप भी मत रहिये .......
फैसला सुनाइये
मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है !!!!!!!
हाँ दो मुझे सज़ा दो क्यूंकि मैंने गांधी को ....................

Friday, January 30, 2009

युगावतार गांधी....


महात्मा गाँधी पर यह कविता कई साल पहले प्रसिद्ध कवि सोहनलाल द्विवेदी ने लिखी थी। द्विवेदी बच्चो के लिए लिखने वाले कुछ प्रमुख कवियों में से एक थे। यह कविता मैंने अपनी स्कूल बुक में कक्षा ७ या ८ में पढी थी। प्रस्तुत है अंश ............ याद करें राष्ट्रपिता को उनकी पुण्यतिथि पर !



चल पड़े जिधर दो डग, मग में,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि,
पड़ गये कोटि दृग उसी ओर;
जिसके सिर पर निज धरा हाथ,
उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया,
झुक गये उसी पर कोटि माथ।

हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु!
हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि!
हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम!

युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख,
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख;
तुम अचल मेखला बन भू की,
खींचते काल पर अमिट रेख।

तुम बोल उठे, युग बोल उठा,
तुम मौन बने, युग मौन बना
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर,
युग कर्म जगा, युगधर्म तना।

युग-परिवर्त्तक, युग-संस्थापक,
युग संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें,
युग-युग तक युग का नमस्कार!

सोहन लाल द्विवेदी

Wednesday, January 28, 2009

दो दो हिंदुस्तान

केव्स संचार पर हम लगातार देश की हालातों पर चर्चा करते है तो आज सोचा की क्यों ना लम्बी चर्चा की जगह एक कविता जो गुलज़ार ने लिखी है और मुझे बहुत पसंद है वो पेश कर दी जाए.....तो इस स्वाद चखें

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं

एक है जिसका सर नवें बादल में है
दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है

एक है जो सतरंगी थाम के उठता है
दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है

फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा
एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है‘
अग्नि’ पर रख पर पांव
उड़ जाने को तय्यार खडा है
हिंदुस्तान उम्मीद से है!

आधी सदी तक उठ उठ कर
हमने आकाश को पोंछा है
सूरज से गिरती गर्द को छान के
धूप चुनी है
साठ साल आजादी के…
हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है
अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!
हिन्दोस्तान उम्मीद से है॥

Tuesday, January 27, 2009

२६ जनवरी

२६ जनवरी यानी कि गणतंत्र दिवस फिर आ कर गया है ....... गणतंत्र दिवस यानी कि इस दिन हम गणतंत्र बने थे मतलब अपना संविधान लागू हुआ था और सो मानते हैं कि यह असली आजादी थी । पर आज संविधान क्या है हम भूलते जा रहे हैं ..... सो समय है सोचने का कि आगे का क्या प्लान है इस मुल्क का, इसके नेताओ का, और अवाम का..... तब तक प्रस्तुत है काका हाथरसी की कविता २६ जनवरी जो कई साल पहले लिखी गयी और पिछले साल मैंने ताज़ा हवा पर भी प्रकाशित की थी पर आज भी प्रासंगिक है ..... गणतंत्र दिवस की बधाई !

२६ जनवरी

कड़की है भड़की है मंहगाई भुखमरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

कल वाली रेलगाडी सभी आज आई हैं
स्वागत में यात्रियों ने तालियाँ बजाई हैं
हटे नही गए नहीं डरे नही झिड़की से
दरवाज़ा बंद काका कूद गए खिड़की से

खुश हो रेलमंत्री जी सुन कर खुशखबरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

राशन के वासन लिए लाइन में खडे रहो
शान मान छोड़ कर आन पर अडे रहो
नल में नहीं जल है तो शोर क्यो मचाते हो
ड्राई क्लीन कर डालो व्यर्थ क्यो नहाते हो

मिस्टर मिनिस्टर की करते क्यो बराबरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

वेतन बढ़ाने को कान मत खाइए
गुज़र नहीं होती तो गाज़र चबाइए
रोने दो बाबू जी बीबी अगर रोती है
आंसू बह जाने से आँख साफ़ होती है

मिस्टर मिनिस्टर की करते क्यो बराबरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

छोड़ दो खिलौने सब त्याग दो सब खेल को
लाइन में लगो बच्चो मिटटी के तेल को
कागज़ खा जाएंगी कापिया सब आपकी
तो कैसे छपेंगी पर्चियां चुनाव की

पढ़ने में क्या रखा है चराओ भेड़ बकरी
चुप रहो आज है २६ जनवरी

- काका हाथरसी

Sunday, January 25, 2009

वर्ण और हित

अमेरिका में ओबामा का आना एक अच्छा संकेत है .लेकिन ख़ुद भारत के लिए अभी दिल्ली दूर है क्यूंकि अमेरिका में चेहरे बदलते है लेकिन राष्ट्र हित नही और यही हमें भी सीखना होगा .

Saturday, January 24, 2009

आखिर कयों न हो जै-जै ओबामा वरुण जी..

वरुण जी आपकी शुरुआती बातों से तो मैं इत्तेफाक रखता हूं.. लेकिन आपके निष्कर्ष से थोड़ा असहमत हूं.. आखिरकार ओबामा को हमारे देश में इतनी तवज्जो क्यों नहीं दी जानी चाहिए.. क्योंकि वे दुनिया के सबसे मजबूत और व्यवस्थित लोकतंत्र के पहले अश्वेत राष्ट्रपति हैं.. क्योंकि उनका चुना जाना श्वेत और अश्वेत के बीच विभेद के खत्म होने का सुखद और संभवतः निर्णायक अहसास कराता है.. क्योंकि वे एक ऐसे देश से सम्बन्ध रखते हैं.. जिस देश की तमाम परम्पराएं भारत की ही तरह ब्रिटिश हुकूमत के आंचल में ही पलकर जवान हुईं हैं.. वही ब्रिटिश हुकूमत जिसका हर फैसला फूट डालो और राज करो की कसौटी पर कसा जाता था..
वरुण जी ये तो रही ओबामा और उनके अमेरिका की बात.. अब हम कुछ अपनी बात भी कर लें.. आखिरकार हम क्यों न ओबामा की महिमा का गुणगान करें.. क्योंकि हमें भी अमेरिका की ही तरह चरण वंदना करने की आदत भी ब्रिटिश हुकूमत से विरासत में मिली थी.. कयोंकि आज भी हमारे नेता सार्वजनिक सभाओं में लोगों से चरण स्पर्श करवाने में गर्व की अनुभूति किया करते हैं..
वरुण जी अब मैं सीधे निष्कर्ष पर आ जाता हूं.. हमें कुछ बातें अमेरिका से सीखनी चाहिए.. वह देश काफी बदल गया है.. अब वह चरण वंदना करता नहीं बल्कि करवाता है.. लेकिन हम....... छोड़िए.. मैं यह नहीं कहता कि हमें अमेरिका जैसा बन जाना चाहिए.. मैं यह नहीं कहता कि हमें ओबामा के आवेग में पूरी तरह से बह जाना चाहिए.. लेकिन मैं यह जरुर कहता हूं कि हमें भी एक ऐसा ही ओबामा अपने देश में ही चाहिए.. जो देश में मौजूद तमाम सामाजिक दायरों को पाट दे.. और जरुरत पड़े तो सदियों के इतिहास को भी पलट दे..
बस आज इतना ही

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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