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Saturday, November 21, 2009

खेती की सियासत


छत्तीसगढ़ राज्य देश के नक़्शे पर उस वक़्त उभरा जब समूचा राष्ट्र नेताओं से सवाल कर रहा था कि आखिर देश में कभी गठबंधन की सरकार स्थायित्व दे पाएगी या य़ूं ही कभी किसी वजह से तो कभी किसी वजह से लड़खड़ाती और गिरती रहेगी...इसी के साथ 2 राज्यों ने भी अपना जीवन शुरू किया लेकिन इनमें से सिर्फ़ छत्तीसगढ़ है जो स्वस्थ है झारखण्ड तो जैसे बुरी तरह से बीमार है...अस्थिरता तो अस्थिरता देश का तबसे बड़ा घोटाला भी यहां सामने आया...लेकिन राज्य छत्तीसगढ़ अपनी ज़िंदगी की नई इबारत लिख रहा है...राज्य में रमन की सरकार बड़ी लोकप्रिय और कर्मठ है इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन इस राज्य में भी वोट की राजनीति की जाती है..विधायकों की खरीद-फरोख्त तो अब पुरानी बात हो गई लेकिन बेमतलव का औबिलीगेशन जारी है...देश का सबसे बड़ा विद्युत उत्पादक होने के नाते राज्य को एक अल्हदा पहचान भी मिली हुई है...लेकिन क्या रमन सरकार को येन वक्त पर किसानों के आंदोलन के सामने हथियार डाल देने थे...धमतरी की हिंसा से घवराए सीएम ने ये फैसला इतने जल्द लिया कि कोई सोच भी नहीं सका...माना कि देश में किसानों से किसी को भी द्वेष नहीं होगा इन्हें कइयों रियायतें भी दी जानी चाहिए ताकि किसान अपनी तंग ज़िंदगी से परेशान ना हो औऱ खेती घाटे का सौदा क़तई ना रहे...लेकिन इन सबके बीच क्या सरकार को इन बातों पर ग़ौर नहीं करना चाहिए...
पहला राज्य़ के किसानों को मुफ्त बिजली देने से खज़ाने पर पड़ने वाले भार की पूर्ती कहां से की जाएगी।
दूसरा 200 करोड़ के अधिभार से राज्य के शेष विकास कार्यों पर क्या फर्क पड़ेगा
तीसरी क्या महज़ बिजली देने से किसान खुश हो जाएंगे या फिर उनकी वाकई यही समस्या है
चौथा इसकी क्या व्यवस्था की गई है कि खेतों में सिंचाई के नाम पर कनेक्शन लेकर इसका दुरूपयोग नहीं होगा जिसमें विभागीय कर्मी भी शामिल होते हैं
पांचवा क्या इस फैसले से राज्य के कर्मठ किसानों की कर्मठता पर असर नहीं होगा. या फिर वे हर मौकों पर सरकार के सामने हाथ फैलाए खड़े नहीं हो जाए जिससे किसानों की कर्मठता तो ख़त्म हो ही जाएगी साथ ही प्रदेश भविष्य में आंदोलनों और सरकारों पर पूरी तरह से निर्भर हो जाएगा, हालाकि ये देश की समस्या है लेकिन इसके पीछे नेता वोटिंग कॉज देकर बच निकलते हैं...
छठा क्या इस तरह मुफ्त बिजली बांट कर सरकार दोबारा पॉवर एक्सीलेंसी एवार्ड जीत सकेगी
सातवां क्या सरकार ये भूल गई कि इसी साल गर्मियों में बढ़ते पावर लोड के कारण राज्य सरकार को केंद्र के सामने अपने एनटीपीसी वाले कोटे के लिए ज़द्दोजहद करनी पड़ी थी
आठवां क्या सरकार भूल जाती है कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल का ख़ुदका कुल उत्पादन दोनों स्रोतों , पनबिजली और थर्मल बिजली से 2200 मेगावॉट तक ही पहुंचता है..जबकि सरप्लस का मतलव आईपीयू औऱ सीपीयू की बिजली होता है..
नौवां क्या सरकार इस बात को नहीं जानती कि यही बिजली बेंच कर राज्य को करोड़ों का लाभ होता है..
दसवां क्या यही किसान प्रेम है...जिसमें खजाना लुटाया जाए...अगर ऐंसा है तो फिर सभी किसानों को कह देना चाहिए कि वे खेतों पर ना जाए बल्कि किसी शेड के नीचे बैठ कर आंदोलन करें।
ये महज़ वोट की राजनीति होती है..जिसे राजनीति के चतुर सुजान रमन सिंह ने क्यों किया इस पर नज़र डालते हैं..
पहला इस मुद्दे पर कांग्रेस की सियासी बढ़त को ख़त्म करना जो वैशालीनगर परिणामों के बाद सामने आई है...
दूसरा अगर मुद्दा आगे बढ़ा जाता तो रियायतें देने के बाद भी श्रेय कांग्रेस को जाता और अगर रियायतें नहीं दी जातीं तो रमन की चांउर वाले बाबा की वोटिंग इमेज पर बुरा असर पड़ता
तीसरा कांग्रेस को बे-मुद्दा करके साबित करना कि सरकार चहुंओर विकास की लहर चला रही है इससे देश की सियासत में सीएम का रुतबा तो बढ़ता है साथ ही डॉ.रमन सिंह की पार्टी के भीतर बेहतर छवि भी बनती...यानें वे एक अच्छे प्रबंधक भी बन जाते...जो कि उन्हे शिवराज से आगे निकलने में मदद करता..गौरतलब है कि शिवराज के डंपर घोटाले ने उनकी पार्टी के भीतर छवि को कम किया है जो एक खराब प्रबंधन का नतीज़ा माना गया है, ऐंसी ही सूझ-बूझ धान घोटाले के वक्त दिखा कर साबित किया था..इन सबसे सीएम का क़द लगातार बढ़ा है..
लेकिन क़द के चक्कर में प्रदेश के साथ बड़ा अन्याय हो सकता है..
किसी भी नेता से पर्सनली पूछा जाए तो वो यही कहता है कि ये सब हमारी सियासी मज़बूरी है वरना हम भी ऐंसा नहीं चाहते...लेकिन इसका समाधान किसी के पास नहीं किसानों की राजनीति अब जोरों पर है हालाकि देश के बड़े नेता मुलायम हों या लालू सभी ने किसानों की नौका का इस्तमाल किया है यहां तक कि अजीत सिंह तो हरित प्रदेश को लेकर किसान पुत्र के नाम से ही जाने जाते हैं...ऐंसे बहुत से नेता हैं जो किसानों के हितैषी कहे जाते हैं..नवीनतम् घटनाक्रम में गन्ना किसानों की बात की जाए तो कांग्रेस के यू-टर्न और शरद पवार पर ठीकरे ने फिर साबित किया कि किसान बड़ा वोट बैंक है...लेकिन सालों से किसानों के हित की बात की जा रही है और ऐंसा नहीं है कि किसी किसान नेता को किसानों के लिए कुछ करने का मौका ना मिला हो कम या ज्यादा सभी को मौका मिल चुका है लेकिन इस सबके बाद ही से किसानी में इज़ाफ़ा किसी नेताई करिश्में से नहीं बल्कि उद्योगपतियों के नये प्रयोगों से हुआ है...जिसमें देश के इंडस्ट्रीयालिस्ट्स ने खेती के उपकरण आमलोगों तक सस्ते दामों पर पहुंचाए...जिससे खेती मौसम के चंगुल से किसी हद तक बाहर आ सकी...सरकारी स्तर पर भी कोशिशें क़ाबिले तारीफ़ हैं...लेकिन पर्टीकुलर नेता इसका श्रेय नहीं ले सकता भले वो इस नाम पर वोट लेले।
अब बात करते हैं सरकारी मदद और किसानों के उत्थान की तो ये कहना ग़लत ना होगा कि इसके बाद से ही किसानों की मेहनत पर उल्टा असर पड़ा है...गांवों में अपराध बढ़ा है, और हद तो तब हो जाती है कि देश के भंडारण में अनाज इतना कम पड़ जाता है कि बाहर से आयात करना पड़ जाता है...राज्य छत्तीसगढ़ की बात की जाए तो देश के कुल चावल उत्पादन का बड़ा हिस्सा राज्य का है लेकिन शायद मौसम की बैरूखी से ज़्यादा सरकारी योजनाओं के कारण 20 सालों बाद देश को चावल का आयात करने पर मज़बूर होना पड़ा....
वरुण के सखाजी
पत्रकार ज़ी24घंटे छत्तीसगढ़ रायपुर
Read me at sakhajee.blogspot.com
contact:-09009986179
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Sakhajee@gmail.com

Wednesday, November 18, 2009

हैडली नहीं हैदर अली...

आंतकी वारदातों के बढ़ते ग्राफ और तरह-तरह की बातों ने ज़ेहन में कई सवालात खड़े कर दिए है...दरअसल..मन बेहद विचलित है कि कोई भला कैसे ये कह सकता है कि फलां वर्ग या समाज धर्म के लोग ऐसे होते हैं..क्यों इस मामले में इतना पूर्वाग्रह होता है...इन दिनों हैडली प्रकरण बड़ा उछला हुआ है...सच तो जो भी हो लेकिन भारतीय तीव्रतम् मीडिया को मसाला ख़ूब मिला है...मुम्बई हमले में शामिल था देश के एक-एक शहर को घूमा आदि..आदि। खैर ये तो किसी भी सूचना माध्यम के साथ होता है..मेरे मन में सहसा ही हैडली के बारे में ख़्याल आया कि ये जो डेविड कॉलमेन हैडली है, कहीं इसका असल नाम दाउद क़ल उम्मैन हैदर अली तो नहीं....इस तरह का विचार ज़ेहन में यूं ही नहीं आया था..बल्कि ऐंसे विचारों की शुरूआत कंधार काण्ड के बाद हुई थी ,जब हाईजैकर्स में से एक का नाम शंकर था जो बाद में साकिर निकला...औऱ चल पड़ा सिलसिला आतंकी वारदातों का...जुड़ने लगा नाम इनके पीछे..अक्सर ऐंसी कौम का जो पहले से ही भारत जैसे सहिष्णु देश में रहने की ज़द्दोजहद कर रही है...हर चेकपोस्ट पर अपने देशभक्त होने का सबूत दे रही है...इसी दौरान मैंने एक निजी समाचार चैनल के खास कार्यक्रम में देवबंद के मदनी साहब के विचार जाने उनका दर्द उनकी टीस हर शब्द में थी...बात-बात पर कटघरे में खड़े होने वाले मुल्ला मौलवियों के सामने अब आखिर कितने और सवाल हैं...रजत शर्मा जैसे मंझे हुए पत्रकार अपना पूर्वाग्रह रोक ना सके..उनका भी एक सवाल सीमापार और देशी लोगों के बीच भेद ना कर सका...मुझे तकलीफ इस बात की है..कि आखिर मुस्लिम कौम ही क्यों कटघरे में है अमरिका में भारतीय क्यों नहीं जबकि वहां तो खुले तौर पर भारतीय आज़ादी का दिन औऱ बाकी सब वो राष्ट्रीय त्यौहार मनाये जाते हैं..जो उन्हें सीधा एक भारत परस्त साबित करतीं हैं..क्या कारण है कि भारत में ही ऐंसा होता है...इसके पीछे हम उस पुरानी सोच पर भी चल कर देखते हैं..जिसमें हिंदी वर्णमाला पढ़ाते वक़्त कई ऐंसी चीज़ें पढ़ाई जाती हैं..जिन्हें बच्चा अपने दिमाग में हमेशा के लिए बिठा लेता है..जैसे कि....क्ष क्षत्रिए का और फोटो रहता है एक योद्धा का...जो तलवार ढाल लिए खड़ा रहता है..तब से अब तक कोई अगर ख़ुद को क्षत्रिए बताता है..या ठाकुर जाति का बताता है तो ख़ुदवख़ुद ज़ेहन में बचपन की पढ़ाई गई तस्वीर उभरने लगती है..जबकि सच उस तस्वीर के इतर होता है...ऐंसे ही हर काली पगड़ी बढ़ी दाढी वाला व्यक्ति आतंकी नज़र आता है और ये हमें पढ़ाया गया उस आतंक की क्लास में जो शुरू हुई थी..सन् 2001 में जब अमरिका तिलमिलाया था..तभी एक चेहरा आतंक का पर्याय बन गया..उसकी शक़्ल हुबहू उसी शक़्ल से मिलती है जो आज मौलाना मुल्ला मौलवियों का लुक है...सीधी बात ये है कि धर्म की आड़ लेकर जितनी क्रूरता आतंकियों ने की है और कर रहे हैं उतना ही ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैया उनका भी है जो सच्चे इस्लाम के विचारक हैं..चाहे वो मस्ज़िद में हों या मज़ार में..सब जगह वो हैं..अब अच्छी बात है कि मदनी साहब जैसे लोग आतंक और इस्लाम में फर्क करने के लिए सामान्य सभाएं भी करने लगे हैं..देवबंद का सम्मेलन कई माइनों में देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के चाल,चरित्र,और चेहरा को निर्धारित करने वाला था...जिसमें समय के साथ इस आबादी का सही चेहरा औऱ मौहरा सामने आएगा वहीं बहुसंख्यकों का भी इनके प्रति नज़रिए साफ होता जाएगा..अब हमें क्ष क्षत्रिए का प पंडित का ल लाला का पढ़ाया जाएगा तो तस्वीरें ऐंसी तो बनेंगी ही ना...लेकिन फिर भी पूर्वाग्रह जैसी चीज़ें देश,समाज,दुनिया और धर्म सबके लिए घातक हैं..मीडिया ने इस सम्मलन से वंदेमातरम् उठाया बाकियों पर तो ध्यान ही नहीं गया......इस देश का विचार मीडिया,मुस्लिम,और महंत बनाते हैं तब इनकी भूमिकाएं खास के साथ ही ज़िम्मेदाराना भी हो जाती हैं....

Monday, October 19, 2009

ये ज़मीन मेरे बाप की है....

अमरिका इस दुनिया के समस्त संसाधन और मानवों पर जैसे जन्मजात कोई हक़ लेकर पैदा हुआ है...तभी इसके सैन्य अधिकारी पिकनिक पर भी जाते हैं तो उन्हें किसी देश की गरिमा प्रतिष्ठा की कोई चिंता नहीं होती क्योंकि उन्होनें दुनिया को किराए पर ज़मीन दे रखी है...ये बात मैं किसी व्यंग्य में नहीं कह रहा हूं बल्कि सच है यही इन दुष्ट अमरिकन्स की मानसिकता बलवती हो रही है..जो बारत जैसे देश ही तोड़ सकते हैं....लेकिन अभी भी ग़लत हो रहा है...वायुसेना को बिना कुछ सुने भारतीय कोर्ट में केस दायर कर देना चाहिए औऱ जो कुछ भी कार्रवाई हो सके वो भारतीय न्याय व्यवस्था के तहत हो..याने सज़ तो नहीं हो पाएगी लेकिन मामना इतना घिसट जाएगा कि दुनिया की सबसे तेज़ गति से चलने वाले अमेरिकी मामले के साथ घिसट कर ही मर जाएंगे...खैर..जो भी हो बहरहाल इस अमेरिकी दुस्साहस को क़तई हल्के से नहीं लिया जा सकता ज़रूरी अभी भी ये नहीं कि ये अधिकारी वाकई..गैरइरादतन भारतीय सीमा में घुसे थे....जो कुछ भी था इसका मतलव सिर्फ़ इतना है..कि वे अपनी सफलताओं के मद में बेहद चूर हैं....अमरिका जान ले ये ज़मीन तेरे बाप की नहीं ना तेरे पूर्वज़ों की यहा खुपड़िया गड़ी है....जय भारत के साथ बाउम्मीद मैं...

Saturday, October 17, 2009

हमरी दिवारी....

दिवारी है...घुंघटा काढ़े मुंह में सिर पर डला पल्लू दांतों में दबा के झिन्या ने कहा....हल्कू चुप था...मुंह लटकाए हंकनी (पशुओं को नियंत्रित करने वाला डंडा) पे ठोड़ी टिकाए.....एक बार फिर झिन्या ने अपने हाथ से हल्कू को हिलाते हुए कहा...मैं क्या हड़ूसूं (किसी को बुरी तरह से हिलाना) तईं समझै...सुनी है बजार में कछु अफरो आओ है..ते वे भैया कै रै थे..पटेल हुन कै टीबी लेत आएं हैं...मैंने देखी है वा दिवार पे लटक जाउथै...मैंने पटेलन से पूछी थीगी..कित्ते की है..ते वे कै रईं थीं कै जादा मैंगी नई है...अफरो आओ थो तेमे लैलई...मैं कऊं तू सोई तनक बजार देखआत कऊंकी अफरो में हमरे भाग में सुई होए..हल्कू चुप था अचानक से झिन्या के सीधेपन से झल्ला के बोला...अरी तू कछु नई जाने अफरो का होत है...जानत सुई है कै सुनयाई उतै ते कैन लगी इतै...जा चौका में देख कहूं कछू खाबै होय ते दै...झिन्या हल्की सी निराश और फिर कुछ खुश सी होती हुई बोली...तू..हां पटेल के हां से कछु मिठाई दई है पटेलन ने ते खालै...और पुड़ी सुई है...लाथौं रुकजा...तनक...सबर कर लै तोय तो कछु बताने ने चैये...तू रैहे अपढ़ा को अपढ़ा ...जाते हुए चौके की तरफ से झिन्या बड़ी उदास थी उसके मन में एक ही चीज़ चल रही थी जो थी अफरा याने ऑफर......भीतर से पटेल की मिठाइयां लाकर हल्कू के सामने रखते हुए फिर बोली...मोय कछु नई पता तू तो कल बजार जा भांको अफरा देख कै आ..पटेलन कै रई थी उन्हा (कपड़े) धोत की मसीन के संगे...कछु आरौ है..ते तू लेया..चलो जइए भिहान उठकै....फीरी (फ्री) को समान तू लेत आइऐ..चल अब खालै...हल्कू के मन में लगातार अफरा शब्द गूंजता रहा आखिर ये इसका अर्थ क्या है...बाज़ार अपना कितना ही रूप बदल ले लेकिन इस वर्ग के लिए आज भी ये सब अजूबा ही है....आज भी दीवाली सच में बनियों का ही त्योहार है...कहने को लोग कुछ भी कहें मगर सच तो ये ही है...

Friday, August 21, 2009

राहुल छत्तीसी

राहुल गांधी 20-21 दो दिनी छत्तीसगढ़ की यात्रा पर हैं....जगदलपुर में देरी से पहुंचे राहुल बाबा को एक बार फिर अंतिम पंक्ति का आदमी याद आया औऱ चुपके से राहुल निकल गये रायपुर के नज़दीक एक बीहड़ गांव में जानने उनके हाल.....ना मीडिया को ख़बर ना प्रशासन को बस बाबा को निकलना था तो चले गये आदिवासी का जानने सच्चे हाल वैसे तो एक और बाबा हैं...जिन्हे लोग चांउर वाले बाबा कहते हैं..लेकिन ये चांउर बाबा कभी ऐंसे स्टंट नहीं करते....शायद उन्हे इस बात का भी बखूबी अहसास है कि वे अब दो बार आ ही चुके हैं तीसरी बार वैसे भी आना नहीं तो ऐंसा कुछ क्या करना जो गांव ग़रीब से सीधा जुड़ा हो....राहुल में सचमुच बहुत संभावना हैं ये कोई आम आदमी का सोकॉल्ड सिपाही नहीं बल्कि सच्चा आखिरी आदमी का सिपाही है.....वॉह वॉह राहुल ...मैं राहुल के इस काम की खुले गले से तारीफ़ करता हूं।।।।

Sunday, August 2, 2009

अपनी ज़िम्मेदारी समझो

इमरान बड़ा नाम है.....
इमरान मामले पर कुछ लिखना चाहता हूं कहना चाहता हूं...दरअसल जब आदमी की आर्थिक हैसियत बढ़ती है तो उसकी ज़िम्मेदारी भी बढ़ जाती है, और अगर जनता के बीच की कोई बात हो तो फिर तो सामाजिक दायित्व कहीं ज़्यादा होता है,,,इमरान को फ्लैट नहीं दिया गया या फिर फ्लैट मिला नहीं ये दोनो ही तथ्य हैं...महेश भट्ट वैसे बेहद सधे हुए व्यक्तित्व हैं....लेकिन इस बार वे भी फिसल रहे हैं....शबाना,जावेद और अब इमरान....आखिर क्यों M फैक्टर लोगों का निशाना बन रहे हैं...इमरान जैसे लोगों को इस बात को ज़रूर सोचना चाहिए...नब्बानी ने मना किया या नहीं ये बात किसी भी मीडिया ने नहीं उठाई सिर्फ ज़ी न्यूज़ के नब्बानी को भी पूरा हक़ है...अपनी बात कहने का NDTV तो जैसे देश में भूचाल आगया हो लेकर बैठ गया था...बाक़ी सभी किसी ना किसी रूप में इमरान की ही हां में हां मिला रहे हैं....मामला इतना आसान नहीं या वैसा नहीं जैसा दिखाई दे रहा है...नब्बानी ने क्या कहा कोई नहीं जानता क्यों जाने भई यहां अल्पसंख्यक,दलित,द्रविड़ आदि इंसान के छद्म नामों पे क्या क्या होता है ये हम सभी जानते हैं...इमरान को सलमान से प्रेरणा लेनी चाहिए अपने पर्सनल ग्रिफ को किस तरह से लोकदर्द बनाया जाता है महेश नाम के मास्टर माइंड से कोई सीखे....इमरान को इस अपार्टमेंट में फ्लैट चाहिए....चूंकि फ्लैट वहां मिल नहीं पा रहा तो लेक भावना का मामला बना दो इस बहाने इमरान को अपनी औक़ात पता चलने के साथ ही फ्लैट भी मिल जाएगा...इस पर हंगामा ज़रूर खड़ा होना चाहिए कि भारत जैसे देश में धार्मिक भेदभाव कैसे हो सकता है,,,,लेकिन इस तथ्य पर भी ग़ौर करना चाहिए...अगर ऐंसा भेदभाव होता तो शायद इमरान,सलमान,शाहरुख़,कभी इस नाम से इतने बड़े स्टार नहीं हो सकते थे....सलमान ने ये सब एक प्रेस कॉन्फ्रेस में कहा जो ये सबित करने के लिए काफी है कि वे कितने ज़िम्मेदार भारतीय है ना कि मुस्लिम...इमरान अपने पर्सनल हित के लिए ऐंसा क़दम उठा रहें है...भारतीय गणराज्य में अनास्था जता रहे हैं....होना तो कुछ इमरान के साथ चाहिए.....बोलना बहुत कुछ है मगर वक्त नहीं....अस्तु

Tuesday, March 24, 2009

हाय-हाय बोर्ड...बाय-बाय देश


क्रिकेट बेहद लोकप्रिय खेल होने के साथ ही एक बड़ा व्यवसाय भी है...अच्छी बात है कि विश्व की क्रिकेट पर कमांड रखने वाली संस्था आईसीसी में सबसे ज़्यादा दबदवा भी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का है.........यह सुखद बात है, लेकिन कहीं ज़्यादा पेनफुल है कि ये भारतीय संस्था तथाकथित भारतीय है...आईपीएल को चुनाव से ज़्यादा खास और अपरिहार्य बनाने से लेकर इसे बाहर ले जाने तक सारे मामले में इस संस्था के भारतीय होने पर शक होता है...... करोड़ों के व्यवसाय के लिए ये किसी भी हद तक गिर सकती है....यही मैचेज चुनाव जो लोकतंत्र के सबसे खास पल होते हैं, उसके बाद भी हो सकते थे...मगर क्या खिलाड़ियों को मतदान नहीं करना चाहिए आम आदमी को वोटिंग के लिए सचिन से लेकर चवन्नी छाप खिलाड़ी भी कहने लगेगा लेकिन जब खुद की बात आएगी तो आईपीएल के रोमांचक मैच ही दिखेंगे.....यह इस देश की विडंबना ही कहिए कि यहां के परिश्रमी लोगों में इतनी नकारियत आ गई कि वे हर छोटी बड़ी चीज के लिए सरकारों पर ही निर्भर हो गये हैं खुद पर उन्हे बिल्कुल यक़ीन नहीं रहा.......क्या ये सरकार का ही मामला था ?..देश की छवि बचाना हम आप का नहीं......बाहर मैच होने का मतलव भारत पाकस्तन दोनों ही का ना केवल खेल के नज़रिए से बल्कि हर नज़रिए से असुरक्षित होना सिद्ध करता है............क्या ये संदेश दुनिया में सरकार की गलती से जा रहा है ?....क्या आईपीएल के मैच सफलता पूर्वक होना ही सरकार की सिक्युरिटी सक्सेस है?....... ये छवि दुनिया के बीच ना जाए इसके लिए बीसीसीआई को भी सोचना चाहिए था, और खास कर मीडिया को भी कभी-कभी सच बोलने का साहस जुटाना चाहिए ना कि कुत्ते की तरह आईपीएल की हड्डी याने एड के लिए जीव लपलपानी चाहिए......अगर देश की छवि को धक्का लगा तो इसके लिए सबसा बड़ा दोषी ये बोर्ड होगा...दूसरे नंबर पर मीडिया जो इसके लिए उल्टे सरकार को दोषी ठहराने में जुटा है....तीसरे नंबर पर हम जो सच को भी नहीं समझ पा रहें हैं...चौथे नंबर पर दोषी है सरकार वो भी इस लिए नहीं कि मैच भारत से बाहर चले जाने दिए बल्कि इसके लिए कि बोर्ड की धमकी और दुष्साहस के बाद भी सरकार चुप है........अरे बैन लगा दो ऐंसे बोर्ड पर....ताकि समझ सके देश सबसे ऊपर है, ललित मोदी या बोर्ड नहीं....

Saturday, January 24, 2009

जै-जै हे ओबामा.......

भगवान आ गये अब कोई चिंता नहीं है........
"सुनी है के भगवान को जनम भओ है"....गहरे अचरज से उसने पूछा "कहाँ ?"..."अरे बड़े दिनो से टीबी में कहूं चल रओ थो, तंयीं बाबू जी ने सुइ बताओ के किस्न भगवान को औतार हैं वो...ऐंसे कउंके देस में जनमे हैं बे जहां कभउं कोई करिया नइ होय"....फिर वह खुशी से मिश्रित अपने आप में उम्मीदों संग कहीं खोते हुए बोला "तो का भैया हमरी मजूरी होन लग्हे का ?"....दूसरा अपनी धुन में यशगाथा सुनाता रहा वो उम्मींद से भरता रहा अपना मन.....घर में खाट पे आकर धरा सा गया रोज़ चिंतित,व्यथित रहने वाला हल्कोरी आज वेफ़िक्र खाट पे पड़ा हुआ है....झिन्या से रहा नही गया खुशी मगर जिज्ञासा से सनी आश्चर्य की मारी तिरछी भौंह से पूछा "का बात है आज तुम बड़े निसफिकर लग रये हो। ....जान के अच्छो तो लगो मनो बात तो कछु है सही"........"अरी कछु नइहै बस बैसइ" फिर निंश्चिंतता से जबाव दिया.... "अच्छा मैं जैसे चूले चौंका में ही घुसी हों जानत हों कछु तो है.........."झल्ला कर सवाल में जान डालते हुए फिर पूछा...."हाँ अब सबकी चिंता दूर होजै है" कहते हुए हल्कोरी ने मुंह पर गमछा डालते हुए कहा....."कैसे ?"...... भौंह का तिकोना उसके खूबसूरत चेहरे पे उभर आया.....पल्लू दांतों से बाहर निकालते हुए बोली....हल्कोरी ने जबाव दिया "अरे कहूं बिदेस में भगवान को जनम भओ है....ते बे सब कै रै थे"......"कौन ?"......फिर झिन्या ने उतावली हो कर पूछा......."एरी तू बेसुरत रेत है....तोय कछु पता नइ रेय बो कलगी भगवान हैं...ओबामा".....झिन्या को जैसे साक्षात भगवान दिख गये हों श्रद्धा और विश्वास के साथ दोंनो हाथ जोड़ कर दूर से आंख बंद कर बोली जै हो भगवान।........."अब हमरी सुइ सुरत लइयो...ओबामा भगवान...जै जै ओबामा"।।।.....मीडिया किसी को भी इतना कवरेज़ देने से पहले ज़रा इनके बारे में भी सोचे कि आखिर ये लोग भी तो हैं जो अपके अर्थ को ज़रा में अनर्थ बना कर ले लेते हैं हालाकि समूचा देश इस वक्त सिर्फ काले से दिखने वाले ओबामा को निहार रहा है, मैंने इतना नकारापन कभी इस देश में नहीं देखा।।।।।। इन हालात की ज़िम्मेदार... ग़ैरज़िम्मेदार मीडिया और मज़बूर सरकार है....।।।।।

Sunday, January 18, 2009

कहां गई छग की ग्रेनबैंक योजना?

"छेरछेरा माय धान ल कोठी हेरहेरा" याने छेरचेरा पर्व जो मनाया गया। जान कर बड़ी खुशी हुई कि इसी की तर्ज़ पर केंद्र सरकार ने पिछले साल एक योजना छत्तीसगढ़ के लिए बनाई थी। जिसका नाम था "ग्रेनबैंक" याने अनाज का बैंक। सचमुच गांवों की फालतू सी जान पड़तीं कइयों ऐंसी रीतियों रिवाज़ों के भीतर की परिकल्पना कितनी दूरदर्शी होती थी, कि लोग कभी भूखे ना मरें। पहले का समाज इतना जुड़ा,बंधा,कसा,और वेलनिटेड होता था कि काहे की मंदी, काहे की लाचारी "हमर पेट ना कोऊ खतरा हे" छत्तीसगढ़ का खास ज़िक्र इसलिए क्योंकि, इस राज्य ने अपने गांवी संस्करों, अल्हड़ पहाड़, जबान खेतों, ज़िम्मेदार खलिहानों, रचनात्मक हलों, बख्खरों, जुआं, नारियों, और घर के सदस्य से गाय, बैल, भैसों कुत्तों को अभी तक छोड़ा नहीं है....हाँ कुछ हैं जो अपने इस इतिहास पर शर्म करते हैं लेकिन बाकी राज्यों की तुलना में यहां ऐंसे लोगों की कमी है।.....यही चीज़ अच्छी लगती है।........मैं बात कर रहा था "ग्रेनबैंक" की। जी हां ये योजना "छेरछेरा" से प्रेरित थी, मगर दुर्भाग्यवश इस पर अमली जामा नहीं पहनाया जा सका......इसके पीछे मंशा थी कि गांवों के पास बड़े वेयर हाउस बना कर अनाज रखा जाए जिस पर ब्याज़ की भी व्यवस्था थी लेकिन कौन करे इस पर काम ये थोड़े ही इंपोर्टेड है, जो हम हाथोंहाथ लेते.....या कल कोई अखवार छाप दे या कोई नेता घूम आये विदेश जहां ये योजना चल रही हो....तब देखिए वही वरिष्ठ पत्रकार नेता चीखने लगेगें हमारे यहां भी होना चाहिए......खैर ये तो हमारी जेनेटिक प्रोबलम है। छत्तीसगढ़ को मैं देख नही रहा हूँ, बल्की महसूस कर रहा हूँ। ये है वह वेधड़क स्टेट जो अपने आप से ज़्यादा ग़िला शिक़वा नहीं करती आज भी ग्रामीण अपनी भाषा, पहनावे से बिल्कुल भी शर्मिंदा नहीं होते। यही चीज़ जो इसे पहचान दिलाती है।...हां कुछ शहरी,अपडेट,जींस,लेदरशू के बाइकिया लोगों के मन में ज़रूर ही अपने आप का गांव से संबद्ध होने का मलाल है।।।।।।।।।।

Saturday, January 17, 2009

अबुझमाड़ः अबुझ पहेली

अविभाजित मध्यप्रदेश में पांचवी क्लास में पढ़ा करते थे छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है, जिज्ञासु, अबोध,मन सोचता था, कि आखिर धान का कटोरा क्या है.....क्या किसी बॉउल में धान रखा है या फिर कुछ और। किसी तरह से इस सवाल का तो जबाव मिल गया लेकिन एक प्रश्न जो मन में फंसा रहा, वो ये कि आखिर अबुझमाड़ के वनवासी क्या है.....ये बस्तर क्या है.....सालों बाद जब इस राज्य को देखने समझने और आत्मसात करने का मौका मिला तो सबसे पहले इसी सवाल ने घमासान मचाया.......मीडिया एक माध्यम है लेकिन ये बात इसके लिए अप्रासंगिक हो चुकी है...जबकि मेरे लिए बिल्कुल नई...तब समसामयिकता की तूती फूंकने वाले प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से उम्मींद ही करना बेकार है...कभी प्रिंट तो फिर भी दे सकता है, लेकिन अद्दतन होने का दाबा करने वाले टीव्ही माध्यम से तो कभी आशा ही नहीं रही........किसी तरह से लोकल के लोगों से जानने की कोशिश की, मगर फिर वही बात सामने आई...उनका खुद के प्रति असंतोष, डर, भय, सामने आया। संपदा पर सीना तानने वाले एक हमारे साथी ने ख़ूब बखान किया लेकिन फिर भी वे इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं दे पाये.....तब महाराज का करहों...हमारे साथी जो बस्तर से है उनसे जानना चाहा जो जानकारी मिली वो दे रहा हूँ.....बस्तर का अबुझमाड़ का इलाका जिसका आज तक भारतीय भू-अभिलाखागार में कोई रिकॉर्ड नहीं है....कोई आज तक यहाँ का सर्वे नहीं कर सका है ग़ुलाम भारत में अंग्रेज़ों ने ज़रूर ही इस दिशा में प्रयास किया था, लेकिन तत्कालीन हालात आदिवासियों की ख़िलाफत के बन गये तो ये काम फिर ठंडे बस्ते में गया तो फिर निकला नहीं आज़ाद भारत में किसी ने भी ऐंसा प्रयास तक नहीं किया किसी ने अगर कोशिश भी की तो भारत की राजनीति मासाअल्लाह है, जो कुछ भी करो तो सारे मानवाधिकार आयोगों के दढ़ियल लोग चील की तरह ताड़ने लगते है...तो फिर वहीं राग अलापा गया वे नहीं बदलना चाहते ख़ुद को तो क्यो ज़बरन ऐंसा किया जाए.....और फिर कभी कोई कोशिश नहीं हुई.....कलेक्टर (डीएम) की खास इजाज़त से ही घूमा जा सकता है इस जगह जाने की भी अनुमति नहीं है....कारण प्रशासन ग्यारंयटी नहीं ले सकता...आखिर मुझे समझ नहीं आया क्यों ऐंसा होता है.....बस्तर कभी भारत का सबसे बड़ा ज़िला हुआ करता था....आज इसके टुकड़े किये गये कि प्रशासन बेहतरी से काम कर सके.....इस जगह के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है बस जाने की इच्छा है ....नक्सल का गढ़ यह एरिया आम लोगों की लापरवाही, सरकारों की निकम्माशाही,प्रशासन की नज़रअंदाज़ी और प्रबुद्धों की महज़ कलम घसीटी के कारण बुरी तरह अपेक्षित है.....जो अपने आप में दुनिया की खूबसूरती लिए है बताना चाहता हूँ.....यहाँ दुनिया में सबसे ज़्यादा साल वनों का घना छायादार एरिया है......इतना ही नहीं यहाँ भारत का नियाग्रा फॉल याने चित्रकोट भी है......यह सब दखने की बड़ी तमन्ना है आप सभी की तरह....मुझे भी इंतज़ार है किसी मेकमोहन का या सर कलिंगम का। जो इस जगह पर शोध कर दबेकुचले लोगों में आत्मबल भरेगा औऱ नये इतिहास के साथ ही भारत के गौरवशाली कल में आज की ख़ुशबू भरेगा.........ऐंसे किसी अंग्रेज़ की राह तकता हूँ.......

Wednesday, January 14, 2009

छत्तीसगढ़ः एक खोज

मुझे अफसोस है कि छत्तीसगढ के छेरछेरा पर्व के बारे में तारीख 11से पहले मुझे कोई जानकारी नहीं थी। संभवतः आपको भी नहीं होगी, अगर होगी भी तो एक हल्की, सुनी-सुनी सी बात की तरह। जो लोग इस राज्य के नहीं हैं या किसी रूप से यहाँ से नहीं जुड़े हैं, उनके लिए तो ये शब्द भी अनजाना हो सकता है।.........क्यों ऐंसा हुआ ? आखिर कारण क्या था ? जो मैं राज्य की छाती रायपुर में रह कर भी इस विषयक जानकारी नहीं जुटा सका या फिर इस बारे में कोई पता न चल सका.....क्या ? मेरी रुची नहीं थी इसे जानने की या फिर मेरी लापरवाही। क्या कहा जाए ?........लेकिन दोस्तों ऐंसा कुछ भी नहीं है...इसका कारण सीधा सा ख़बरों के अकाल को तरसता मीडिया, इस ख़बर पर ठीक पर्व के दिन ही बन सका इससे हम जैसे वाहरी लोगों के लिए यह पर्व नया हो गया.......मैं यहां मीडिया को दोष नहीं दे रहा हूँ बल्की उन मेरे साथियों से भी असंतुष्ट हूँ, जो इस राज्य का गुणगान करने में कंजूसी करते हैं। बल्की कुछ लोग तो मुंह से आवाज़ तक नहीं निकालते....किसी नई जगह की बेहतर जानकारी कागज,पन्नों से ही नहीं जुटाई जा सकती बल्की ज़्यादा अच्छी और वास्तविक जानकारी लोकल के लोगों से ली जा सकती है.....मगर अफसोस, छत्तीसगढ़िया ऑफिस में हर अगला आदमी लोकल है, फिर भी छेरछेरा का पता तक नहीं चला। आखिर ये सब बात करने के पीछे मेरी मंशा किसी के ज्ञान पर सवाल खडे करने की नहीं है वरन लोगों के उत्साह को परखने की है...कोई बात अगर मध्यप्रदेश की होती तो सभी लोग उत्साह के साथ तीज त्यौहारों की बात कर रहे होते रोज़ एक बार तो ज़रूर ही ये बात आ जाती कि फलां दिन फलां तीज या त्यौहार है....और सिर्फ मध्यप्रदेश ही क्यों भारत के सभी राज्यों में कमोवेश ऐसं ही होता। क्या ये मीडिया की उदासीनता है ? या फिर स्थानीय लोगों की उत्साह हीनता। खैर जो भी हो मगर इस त्यौहार ने छत्तीसगढ़ के एक और रचनात्मक पहलू से रूबरू ज़रूर कराया है....इस दिन गांव के बच्चे घर-घर जाकर इस गीत के साथ धान मंगते हैं....अगरहिन ल नेवतेंव,बगरहिन ल नेवतेंव,नेवतेंव बन के चांटी,पीपर तरी के खुसरा ल नेवतेंव,ओखरों बड़े बड़े आंखी.....और साथ ही बच्चे गाते है...छेरछेरा,माई कोठी के धान ल हेरहेरा....मैं दुर्भाग्यवश इस पर्व का साक्षी नहीं बन सका क्योंकि नवयुग के जींस ठाठ के लोग इन सब परंपराओं को देखना या इनका ज़िक्र करना तक अपना पिछड़ापन मानते है। रायपुर या लाइक दिस सिटी में ये पर्व उतने उत्साह से नहीं मनाया गया जितना उत्साह गांवों में देखा गया.....गांव ही तो हैं जो परंपराओं को लेकर चल रहे हैं और निरंतर बिखराव सह रहे हैं।........मीडिया और माउथ पब्लीसिटी के लोगों से निवेदन है कि अपनी जड़ों में मठा ना डालें।.......फिर भी जो कुछ भी इस बारे में पता चला आखिर मीडिया से ही....तो फिर धन्यवाद में क्यों कंजूसी.........धन्यवाद मीडिया........

छत्तीसगढ़ एक उगता सूरज।

छत्तीसगढ़ की उम्र आठ साल हो चुकी है...यूं तो ये बड़ा वक्त नहीं, जो किसी से इतनी अपेक्षायें पाल ली जाएं कि आलोचनाओं के तीर पर तीर छोड़े जाने लगें। हाँ लेकिन ऐंसा भी नहीं कि ये कोई कम समय है...दरअसल इस राज्य की विडंबना कहिए या नेताओं का निकम्मापन....कुछ भी कहें आज इसने जो पाया है वह अपने अकेले दम पर मध्यप्रदेश के ज़माने में तो जैसे ये सिर्फ भारी भरकम टेक्स देने वाली ज़मीन भर था.....राज्य विखंडन के बाद नई स्फूर्ती के साथ स्टेट ने अपनी हाज़िरी दर्ज़ कराई...मीडिया भी इस राज्य को पिछड़ा समझता था मगर ये बात अब बीते वक्त की हो चुकी है....सदियों से मुंह चिढ़ाते भोपाल को आज इस राज्य ने पीछे छोड़ दिया है....भोपाल से जहाँ एक भी समाचार चैनल अपना प्रसारण नहीं करता वहाँ रायपुर से एक सेटेलाइट समेत क़रीब दो चैनल्स का प्रसारण होता है.........मीडिया ने इस राज्य पर नज़रे इनायत नहीं की है...ना ही कोई अहसान ही कर रहा है...अगर ऐंसा था तो पहले भी ये सब किया जा सकता था......कुल मिला कर मीडिया अपना स्वार्थ लेकर इस राज्य में घुसपैठ कर रहा है,राज्य प्रगति की नई कहानी लिख रहा है....इसी का एक उदाहरण है यहाँ से दो चैनल्स का प्रसारण और आने वाले वक्त में मध्यभारत का मीडिया हब बनने की ओर अग्रसर होना.....चाहे वह स्टार के रीजनल बकेट्स की बात हो या आजतक के क्षेत्रीय चैनल की सभी के प्रसारण केंद्र रायपुर में बनने की संभवनाएं हैं....कोई कहे ना कहे मगर यह सत्यता है कि इस रीजनल मीडिया क्रांती को रायपुर से शुरू करने और नये मीडिया युग के सूत्रपात के आग़ाज़ पीछे ज़ी24घंटे,छत्तीसगढ़ की बड़ी भारी भूमिका है। जिसके लिए ज़ी परिवार को साधूवाद.........

Sunday, January 11, 2009

मेरे नज़र में छग...

4 जून 2008 की सुबह राज्य की राजधानी में पहली बार मैं जब आया तो यहाँ की भीषण गर्मी ने मुझे पिछ्छे पांव लौटने का सा अनुभव कराया। तारीख़ 06 को हुए दूरदर्शन के इंटरव्यूह में चयन के बाद ज्वाइन ना करने की बजह यहाँ की जलती धूप सुलगती दोपहर और आंचभरी शाम हल्की गर्म रात ऊपर से जहां-तहां सढ़ांध मारती दुर्गंध उफ कैसे रहूंगा इस शहर में.....जबकि नौकरी मेरी ज़रूरत ही नहीं बल्की मज़बूरी भी थी॥फिर भी ना बाब ना यहां रहना....कभी नहीं सोचा था इत्तेफ़ाक से ज़ी24घंटे,छत्तीसगढ़ का इंटरव्यूह कॉल और समयांतर में चयन लगा सखाजी की यही इच्छा है....तब इस राज्य को कर्मभूमि बनाने का फैसला महज़ एक नौकरी नहीं बल्की इसे समझने की एक ज़िद और जानने की जिज्ञासा भी थी.....शुरूआत में जितनी दिक्कतें हो सकती थीं होती गईं...बाद में लगा प्रदेश ना सिर्फ नक्सली हिंसा का पर्याय है बल्की औऱ भी कुछ है..और भी कुछ हां जी और भी कुछ... राज्य में कितनी प्राकृतिक संपदा है यह मेरे लिए गौढ मुद्दा है जबकि प्रदेश में कितना प्राकृतिक सौंदर्य है यह बड़ा सवाल है...आज की आपाधापी भरी ज़िंदग़ी में वक्त कस कर भिंची मुठ्ठियों से भी खिसक रहा है...जीवन एक कठिन चुनौती बनता जा रहा है..रचनात्मकता और तकनीकि का शीतयुद्ध सा छिड़ा है...ऐंसे में दो पल घने पेड़ की छांव में बिता कर जो सुख मिलता है वह किसी उपभोग में नहीं है......मुझे यह प्रदेश सिर्फ इसीलिए अच्छा लगा कि यहाँ के लोग सीधे सरल भोलेनाथ हैं जो इनकी सबसे बड़ी कमी भी बना हुआ है,ज़्यादा पसंद आया। इतना ही नहीं यहां के लोगों के बोल-चाल रहन-सहन में गांव की खुशबू है जो अक्सर तथाकथित वैश्वीकरण में हीन भाव समझा जाता है...शेष सभी संपदाओं का भंडार व्यापारियों के लिए छोड़ता हूं कि वे ही गौर फरमाये और यहाँ के मूलनिवासियों का जो शोषण कर सकें वे करें....इस पर लकीर पीटना मुझे नहीं आता....मेरा राज्य के प्रति किसी अज़नवी को कोई भी राय बिना समझे बनाने से रुकने का आग्रह है... युवा अग्रणी पठनशील जिज्ञासु कर्मशील लोगों से इस राज्य को बड़ी उम्मीदें हैं। सिर्फ लोहे,लक्कड़,धातु धतूरों से कोई राज्य बनिया दृष्टि से संपन्न हो सकता है लेकिन लोगों की आत्मीयता,स्वागतातुरता,ईमानदारी,और फका दिली ही सच्चे मायने में रहने,बसने का सा महसूस कराती है...वरना छत की तलाश में लोग कहीं भी घर बनाने में नहीं चूकते.....और ये सब इस राज्य में मैने महसूस किया है...वस थोड़ा सा लोग कन्फ़्यूज़न छोड़ दें कुछ ज़्यादा ही किंकर्तव्यव्यूमूढ़ हैं.....अस्तु.....

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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