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Thursday, December 22, 2011
पहिए सी चलती ये जिंदगी
अब कोलगेट, वेस्टर्न टॉयलेट, यूरोपियन बाथरूम, म्यूजिक, गीजर, वाशिंग मशीन, बड़ा सा आइना और झम-झम करके बरसता शॉवर। कपड़े, टाई, बेल्ट, कोट, जूते न जाने कितने बंधन। नाश्ता, डायनिंग। न जाने क्या-क्या। अटैची, कागज, मोबाइल, आईपैड, लैपटॉप, चश्मा और फिर कार। सीट बेल्ट, लाइसेंस, कार के कागज और सरपट तारकोल को रौंदते टायर। ऑफिस, नमस्ते, सलाम साब, लेट, अरे इतने जल्दी, तुम्हारा कल का काम, आज यह नहीं वह, कल फिर से वही। साहिब चाय। फोन, ट्रिन. ट्रिन। मेल का क्या हुआ, जवाब दो। मुझे आज के आज सब कुछ चाहिए। जमीन। महत्वाकांक्षाएं, स्पर्धा, सर्वश्रेष्ठ, पिछड़ापन आदि। चंदना, वंदना, शीला, मुन्नी, मोहन, रोहन, सोहन न जाने कितने कौन, क्या उनका काम, कैसा अच्छा बुरा, खराब, नया पुराना और बस लैपटॉप बंद फिर वही शाम के 8 बजे। घर से फोन कब, कहां डिनर में क्या लोगे। घर, बेटा, बीवी, टीवी, ऑफिस की फाइलें, सुबह की प्लानिंग, एडमिशन, स्कूल, परेशान बेटा, चिंतित पत्नी। वीडियो गेम और न्यूज चैनल, सास बहु साजिश, दिल्ली में दो हत्या मुंबई में बलात्कार, विधायक एक करोड़ का, बाबू के पास 10 कारें, सोने के हार, अंधेरे को चीरती कुछ सनसनी सी, हीरा, हार, मोती, ज्योतिष मंगाए, खुश हो जाएं। मंगल को व्रत रखें, अंगूठी पहनें दांयी उंगली में ऑफर के साथ और न जाने कब आंख लग सी गई। बस यही जिंदगी। एक दम नकली सी।
- वरुण के सखाजी, चीफ रिपोर्टर, रायपुर दैनिक भास्कर
Sunday, December 11, 2011
अन्ना की आंधी............!
अन्ना की आंधी का एक और नजारा दिल्ली के जंतर मंतर में देखने को मिल रहा है। मीडिया के लिए अन्ना एक ऐसा हथियार बने चुके हैं,जिसे वो महज टीआरपी के लिए ही अपनाना चाहती है।इस संदर्भ में अगर बात अन्ना के जन लोकपाल बिल की करें तो साफ है,इस बिल को सरकार भी लाना चाहती है,पर अपने बनाए नियमों के अनुसार वही अन्ना का कहना है कि स्थाई समिति ने कमज़ोर लोकपाल बिल संसद में भेजा है और ये देश के साथ धोखा है,स्टैडिंग कमेटी की रिपोर्ट में लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की सिफ़ारिश की गई है,स्थाई समिति के अध्यक्ष अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक लोकपाल को अभियोजन प्रक्रिया शुरू करने के लिए किसी भी तरह की पूर्व-अनुमति नही होनी चाहिए पर लोकपाल के चुनाव के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायधीश, लोकसभा के अध्यक्ष और लोकसभा में नेता विपक्ष के अलावा एक चौथा व्यक्ति भी होगा, लेकिन सीबीआई की तहक़ीक़ात और लोकपाल की अभियोजन प्रक्रिया अलग-अलग होंगी, प्रधानमंत्री को लोकपाल में शामिल किए जाने पर ये सुझाव रखे गए हैं, लोकपाल के दायरे में लेकिन सुरक्षा के प्रावधानों के साथ, लोकपाल के दायरे में लेकिन अभियोजन प्रक्रिया पद छोड़ने के बाद ही या लोकपाल के दायरे से बाहर, लेकिन अन्ना का कहना है कि ये मसौदा बेहद कमज़ोर है और इससे भ्रष्टाचार घटने के बजाए बढ़ जाएगा.अन्ना के जन आंदोलन की गूंज भारत के साथ ही विदेशों में भी रही। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को टाइम मैगज़ीन ने साल 2011 की दस सबसे बड़ी खबरों में शामिल किया है।इसके साथ ही मैगज़ीन ने लिखा है, "हज़ारे की भूख हड़ताल, और उनको मिले जन समर्थन ने लोगों को एक देशभक्ति का जज्बा दिया है जो कि भारत की आजादी के बाद ऐसा लगता था कि आज के युवाओं में वो जोश शायद ही रहा हो जिसके चलते भारत के कई बड़े शहरों में लोगों ने प्रदर्शन किए। इससे सरकार पर स्वतंत्र लोकपाल संस्था बनाने का दबाव बढ़ा जो प्रधानमंत्री तक की जांच कर सकता है और भ्रष्ट लोगों को सज़ा दिलवा सकता है."
साभार-बी.बी.सी.हिन्दी
Saturday, August 27, 2011
संसद एक बाजार
अरे सबसे अच्छी बात तो यह रही कि कर्ता धर्ता जान गए, समझ गए, जनता का गुस्सा संसद पर मोड़ो, वरना कांग्रेस पर फूट रहा है। मोडक़र चुपके से निकल पड़े वार्ता सैर पर। करेंगे। बाबा अन्ना मर गया तो हल्ला बच गया तो अपनी बला से। लेकिन कहीं संसद में कुछ ऐसी बात न होने लगे कि सचमुच का लोकपाल बिल लाना ही पड़ेगा, तो स्थिति संभालने पहुंच गए। सबको पीछे किया कौन श्री-श्री, भय्यू आदि।
अभी जारी है, किस्सा ए अन्ना और लोकपाल की लोक गाथा। देखते हैं, क्या होना है।
संसद के बाजार में किसका माल किसके मुकाबले कितना बिका यह ट्रेंड्स आने बाकी हैं। हाल में मिले झुकावों के मुताबिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों (कांग्रेस-भाजपा) के उत्पादों को अच्छी टक्कर दे रहे हैं, नकली, लोकल, मिलावट खोर कंपनियों के उत्पाद (जदयू, बसपा)-
देख तमाशा दुनिया का।
- सखाजी
Thursday, August 25, 2011
सुनो देश पर काबिज लोगों...
अब क्या करूं। मैं। मैंने तो देख लिया गांधी के अहिंसा मार्ग को भी। मैं तो चल भी पड़ा अन्ना के साथ भी। मगर क्या बदला। क्या हुआ बड़ा काम। उल्टा सरकारी सुर और घातक हुए। कुछ नहीं होता यार ताकत उनके ही पास रहती है। अब झुके भी तो क्या अब मान भी जाएं तो क्या। नाम की संसद विधायक हैं। भैया वे सब मूल रूप से भेडिय़े हैं। सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज मैं युवा सालों से अच्छा सोचता रहा। मगर अब तक मुझे अच्छा मिला नहीं। अब मैं आपक अहिंसा मार्ग त्याग दूं तो मुझे पथभ्रष्ट न कहना। अन्ना की एक-एक सांस मेरी रगों में तैर रही है। अहिंसा की इज्जत कर रहा हूं। मगर अब कुछ हो जाए तो मत कहना। बसों को जलाकर मैं कोई रैली. तूफान नहीं लाना चाहता। मैं जंगलों में घुसकर कोई लाल गाल नहीं करना चाहता। मैं इस व्यवस्था में रहकर इसके ही खिलाफ कुछ करना चाहता हूं। हां अगर कुछ यानी अच्छा करने में दिक्कत हुई, तो मुझे जंगलों में जाकर बम बरसाने में भी बुराई नहीं लगेगी। मैं कहता हूं बार-बार। अगर हो जिम्मेदार। सरकार।
तो अभी भी वक्त है, अपना तथाकथित इगो छोड़ दो नेताओं। वरना देश में आग लग जाएगी। आज नहीं सही कल लग जाएगी। कल नहीं सही परसो मैं खून खराबा कर दिखाऊंगा। किसी मंत्री को निकाल लाल बत्ती से बीच रास्ते पर गोलियों से भून दूंगा। किसी अरुंधति, अरुणा का पकडक़र चित्रशाला की सियासत तोड़ डालूंगा। मैं इस जंग में किसी अन्ना से भी फिर इत्तेफाक नहीं रखूंगा। क्या मुझ युवा की मनशक्ति को इस दिशा में जाने से रोकने वाला कोई है।
( यह मनोवेग अब युवाओं और अन्ना समर्थकों के मन में आए हैं अगर आप सच्चे हैं, तो जरूर कुछ इतना ही क्रोध महसूस कर रहे होंगे। और हां आप अगर गलत हैं जरूर ही इन पंक्तियों से आप डर कर खारिज करने कुछ सोच रहे होंगे। और अगर आप कुछ भी कर ना चाहें तो बंदूक ही एक रास्ता आपको लग रहा होगा। - भारत का युवा)
Saturday, August 13, 2011
जनक्रांति या भ्रांति?????
कुल मिलाकर सरकार बन गई विलैन और अन्ना बन गए हीरो। वाकई अन्ना हीरो हैं, वे अच्छे काम के लिए अच्छे प्रयास कर रहे हैं, बाबा की तरह ओवर रिएक्टिव सेना नहीं बना रहे। उनकी इन भावनाओं की कद्र की जानी चाहिए। मगर अफसो है, कि इस जनक्रांति में एक भ्रांति सतत चल रही है। अन्ना के इस आंदोलन को उन लोगों का सपोर्ट है, जो थिंक वोट हैं, न कि ईवीएम बटन दबाने जैसे छोटे काम करने वाले लोग। इस क्रांति में ड्रॉइंग रूप के प्लानर्स हैं। जमीन पर जमीन के लिए जमीन से काम करने वाले लोग इस पर अपना साफ सुथरा मत जाहिर नहीं कर पा रहे हैं, या फिर नहीं कर रहे हैं। सीधी सी बात है, अन्ना के इस आंदोलन को कुचलने के लिए कांग्रेस जो भी कर सकती है, करेगी और कर रही है। अभी क्या है, हो सकता है कोई ऐसा मुद्दा सामने आए जो इस पूरे आंदोलन से मीडिया का ध्यान हटाए और सूरत पूरी बदल जाए। कुछ भी हो सकता है। बहरहाल अन्ना के इस आंदोलन को नीचे बिंदुओं से होकर देखना चाहिए।-
क्यों सही है आंदोलन: अन्ना का आंदोलन मुख्य रूप से भ्रष्टाचार की बात करते हुए, वास्तव में व्यवस्थी की पोल सी खोलता है। लोकतंत्र की आड़ में पल रहे दुनिया के इकलौते 10 जनपथ के राजतंत्र की बात कहता है। आम आदमी की तमाम मिनी रिश्वतों से सजी जिंदगी की कहानी है, अन्ना की भाषा और केजरीवाल का विज्ञान और प्रशांत, शांति का कानून भूषण। आम आदमी महंगाई, भ्रष्टाचार, बेईमानी और लाल बत्तियों के भीतर के भेडियों से कम सिविल सर्वेंट्स की सिंगापोर, यूएस, टूर से ज्यादा त्रस्त है। वहीं बाबुओं की टेबल टेनिस से भी परेशान है, जहां बिना पैसे के कोई फाइल एक टेबल से दूसरे टेबल का सफर ही तय नहीं कर पाती। इसलिए इस आंदोलन को जन समर्थन मिल रहा है।
क्या होगा नतीजा: यह अहम प्रश्न है, कि नतीजा क्या होगा। केजरीवाल गीताई भाषा में कहते हैं, जन समर्थन मिला तो मानेंगे लोग साथ में हैं, नहीं तो हम जो कर रहे थे, वही करने लगेंगे। इस बात में एटीट्यूड है, घमंड और जनता पर अहसान है। लेकिन सब स्वीकार्य है, क्योंकि जनता परेशान है। नतीजे अच्छे होंगे। आंदोलन तेजी से ऊंचाई पर जाएगा। पूरे देश में जनाक्रोश बढ़ेगा। सियासी उल्लुओं काठों पर बैठ रजनी दर्शन करेंगे। जागते हुए, स्वप्न में जीने वाले मृग सी मारीच बढ़ेंगे। सब कुछ अन्ना के फेवर में ही होगा। सरकार हिल जाएगी, लेकिन कहां???
फेसबुक पर सरकारें औंधे मुंह गिर पड़ेंगी। अखबारों में नेताओं के बयान और नजरिए रंगे होंगे, टीवी पर अन्ना शादी का बन्ना होंगे। मगर...
क्या करेगी कांगे्रस: यूपीए की खाल में बैठी असली दागदार पार्टी कांग्रेस क्या करेगी। निश्चित रूप से सिब्बलिया सब्बल नहीं चलाएगी। शीलाई शिलाएं नहीं फेंकेगी, चिदंबरमिया भ्रम नहीं फैलाएगी। न अन्ना को मनाएगी, न अन्ना की मानेगी। बस चुप रहेगी। 2 दिनों बाद दबाव बढ़ेगा, तो कसाब को आर्थर से तिहाड़ शिफ्ट करेगी और वह बीच में भाग निकलेगा, या फिर अफजल पर सोनिया कुछ ऐसा बोलेंगी, जो कभी नहीं बोलीं, मनमोनह को इस इल्जाम के साथ हटा दिया जाएगा और राहुल जैसा का तैसा लोकपाल लाकर अन्ना के लोकपाल को लोकप्रियता का लोकपाल बनाकर पीएम बन जाएंगे, कोई विमान हाई जैक हो जाएगा, कहीं बॉम ब्लास्ट हो जाएगा, गस्से से तमातमाते हुए, सोनिया दो या तीन मंत्रियों की बली ले लेंगी, विदर्भ के किसानों, पुणे के किसान भट्टा परसौल के किसान एक होकर चिल्लाते हुए पीएमओ की सुरक्षा में सेंध लगाएंगे या फिर कोई दिज्विजय कहेगा हिंदुओं में है दम मुस्लिमों ने किया नाक में दम... और विपरीत होगी मीडिया की हवा, खत्म हो जाएगा अन्ना का धरना। रह जाएगा महज कुछ मुद्दों में बेदिशा उलझा मीडिया।
अगर सफल नहीं हुआ यूपीए तो क्या: कहीं किसी हाल में कोई चाल नहीं ठीक बैठी तो, राहुल भैया का पीएम बनना कांग्रेसियों का रुदनालाप, और बेचारे 8 सालों के सीधे, कठपुतली, विचारात्मक पुरुष की बली चढ़ जाएगी। संकल्प लेंगे राहुल, मैं बनवाऊंगा लोकपाल। सख्त लोकपाल ही देश की सच्ची आवाज है। और बात हो जाएगी आई-गई। मीडिया में जी न्यूज दिखाएगा बतौर पीएम राहुल के संकल्प, तो एनडीटीवी दिखाएगा गो ग्रीन कंट्री थू्र यंगर पीएम, वहीं इंडिया टीवी पर होगा राहुल बाबा का झाड़ फूंक मंत्र, स्टार न्यूज कराएगा पहली बार न्यूज रूम में पीएम। और इन सबके बाद भी नहीं बनेगा लोकपाल फिर क्या???
खेल खतम पैस हजम: थिंकवोटर टीवी देख-देख सरकारों को गालियां देगें, तो कहेंगे फेसबुक में हमने उखाडऩे की कोशिश तो की सरकार को लेकिन देश की जनता ही मूर्ख है। हां यह सब अपने पीसी, लैपटॉप या कैफे में बैठकर करेंगे। लेकिन ईवीएम वाले बूथ, कैफै में नहीं जाएंगे। वे सभी चित्रशाला में बैठकर मनाएंगे शोक।
फिर जीत जाएगा यूपीए: अन्ना के सच्चे शागिर्द थिंक वोटर्स हल्ला मचाएंगे, सडक़ों पर नहीं, सोशल साइटों पर। चिल्लाएंगे, मंचों पर नहीं अपने ड्रॉइंग रूम से। चीखेंगे चेंज। मगर मजाल कि वे वोट डालने जाएं। जिन थिंक वोटर्स के दम पर अन्ना बन्ना बने हैं, वह उनके साथ जिस्मानी तौर पर नहीं जेहनी तौर पर है। और ईवीएम में जिस्म की ही एक उंगली लगती है, दबाने के लिए।
-सखाजी
Thursday, August 4, 2011
सच कड़वा क्यों होता है...?
तो अटपटा मोहनजोदड़ो की खुदाई का कोई नगीना या फिर बर्तन है, क्या? या फिर समुद्रगुप्त की जीत का जरिया। या फिर शक, हूड़ों की संतान है, या फिर पृथ्वी और गजनवी की जंग। या फिर यह अकबर है, या तुलसीदास। अंग्रेजों का कोलकाता है, या फिर औरंगजेब का अंत। अटपटा कोई बहादुर शाह की सल्तनत है, या झांसी की रानी का बिगुल। यह लॉर्ड कर्जन का बंग भंग है, या फिर विलियम वेटिंज्स के सुधार, यहा नेहरू की चपड़ चुपड़ी अंग्रेजी है, या फिर गांधी का सीधापन, यह सुभाष की टोपी है, या फिर हिटलर की मख्खमूंछें, यह है राजेंद्र प्रसाद की प्रेसीडेंसी है, या लाल बहादुर की ईमान लाली। इंदिरा का मर्दाना है, या फिर चौधरी का अवसरवाद, बीपी की शरारत है, या राजीव की बोफोर्स। नरसिम्ह का इनसाइडर है, या सीताराम की बेआबरू विदाई, देवगोड़ा की किस्मत है, या गुजराल की विदेश यात्राएं, अटल का 13 दिनी 13 महीनी है, या प्रमोद का शाइनिंग इंडिया। अटपटा यह सबकुछ है। तब आप समझ तो गए ही हैं, कि अटपटा क्या है। मैं भी समझ गया। क्या है अटपटा। चलो कम से कम अब नए प्रश्न नहीं हो पाएंगे, क्यंोंकि प्रश्न पिता को मैंने खत्म कर दिया।
अब प्रश्न माता के रूप में सच अटपटा क्यों है मुंह बाए खड़ा हो गया। अगर वो सबकुछ जो कभी कभी हो वह अटपटा है, तो सच अटपटा क्यों है, यह ब्रह्मांड का सत्य है। सीता का सतित्व है, राम की प्रतिज्ञा, कृष्ण का संकल्प है, तो पांडवों की साफगोई। मनु का तप है, सतरूपा का समर्पण। सिंधु घाटी का विकसित आर्य नगर है, तो गीता का पर्व है, कुरान की आयत है, तो बाइबिल की लाइने है। सच चाणक्य सा गुरु है, तो अशोक सा विरक्त अनुराग है, राजा भोज का न्याय है तो, बास्कोडिगामा की इकलौती अव्यापारिक यात्रा है, सूरदास की कृष्ण भक्ति, है तो मीरा का पागलपन, एओ ह्यूम है, तो रविंद्र सा संगीत सच है। असहयोग आंदोलन है, तो भारत छोड़ो है। कश्मीर की अधूरी ख्वाहिश है, तो लडख़ड़ाता भारत का पहला प्रधानमंत्री है, गुलजारी सी घरेलू नौकरियत है, तो जेपी सी दूब है, सच जनता पार्टी है, तो मनमोहन का उदारवाद है, देश का टीवी मीडिया है, तो स्टिंग ऑपरेशन है। सच औंधे मुंह गिरी शाइनिंग इंडिया की चमक है, तो सच आखिर संसद का नोट कांड है। तो समझ में आया किस तरह से कम ही तो है, सच। तो अटपटा तो होगा ही।
लेकिन यह सच भी तो नहीं है, न इसे सच कहा जाए।
दरअसल इंसानी दिमाग में सच को लेकर बड़े भ्रम है, अध्यात्म कहता है, दुनिया झूठी है। तो फिर सच्ची बातें खुद ब खुद अटपटी सी हो गईं। भौतिक कहता है, जिंदगी को सुखद बनाओ खुशियां यही हैं, तो फिर सच अटपटा हो गया, चूंकि जिंदगी भौतिक में कहा सुखद होती है। व्यवहारिक बात कहती है, जिंदगी में सच का अनुसरण करो, तो यह होता कहां है, अब बताओ एक बार फिर सच अटपटा हुआ कि नहीं।
आध्यात्मिक नजरिए में वास्तव में सच वो है, जो नहीं है। और झूठ वो है, जो है। यानी संसार निरा झूठा है, तो सच अपने आप अटपटा तो होगा ही। और जब अटपटा कोई जबरन कानों में डलेगा, तो यह आप से आप ही कड़वा भी हो जाएगा। लेकिन यह भी सच है कि हम झूठ के इतने आदी हो चुके हैं, कि सच अटपटा लगता है।
अत: सच वास्तव में अटपटा और कड़वा होता है।
लेकिन प्रश्न पिता की अवैध संतान के रूप में फिर कई प्रश्न दिमाग की भ्रम संपत्ति पर अपना दावा ठोकने आत्मा के सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने पहुंच गए हैं। आखिरी समाचार मिलने तक सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई की तारीख मुकर्रर कर दी थी।
- सखाजी
Tuesday, August 2, 2011
www.dainikbhaskar.com
- अटल बिहारी बाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री, 1989 में विदीशा से सांसद (पहले यह क्षेत्र विदीशा लोकसभा में आता था)
- स्व. डॉ. शंकर दयाल शर्मा, पूर्व राष्ट्रपति, इसी क्षेत्र की पैदाइश हैं, बाद में बेगम बिया के कहने पर भोपाल शिफ्ट हो गए।
- रामपाल सिंह, पूर्व सांसद, विधायक, मंत्री भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष (शिवराज सिंह के दांए हाथ)
- शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री एवं पूर्व सांसद विदीशा
- जसवंत सिंह, पूर्व मंत्री, दिज्विजय सिंह के पहले कार्यकाल में मुख्यमंत्री के बेहद करीबी।
- डॉ. गौरीशंकर शेजवार, मंत्री, उमाभारती के बेहद करीबी, आडवाणी के नजदीकी।
- आशुतोष राणा, फिल्म कलाकार, (इसी जिले में इनकी पुस्तैनी जमीन है, हालांकि 7 साल की उम्र में गांव छोड़ा।
- आचार्य रजनीश, ओशो के नाम से मशहूर शख्शियत की जन्मस्थान इसी जिल में आता है।
- देश दुनिया में ऐसे कई और लोग हैं, जो यहां से ताल्लुक रखते हैं।
लेकिन मुझे अफसोस है, कि इस छोटी सी पुलिया को बनवाने की किसी में भी पुरुषता नहीं है। इन लोगों को लानत है।
-सखाजी