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Tuesday, July 10, 2012
फिल्म एक था टाइगर में आईएसआई और रॉ की तुलना गलत
सलमान खान की नई फिल्म एक था टाइगर पाकिस्तान में आईएसआई के नाम को इस्तेमाल करने पर बैन हो गई है। दूर से जरूर ऐसा लगता है कि यह पाकिस्तान का हठवादी फैसला है, किंतु जरा करीब जाइए तो लगेगा वास्तव में ऐसा ही फैसला तो भारत को भी लेना चाहिए। यह कैसी बात है कि पाकिस्तान की आईएसआई और भारत की रॉ को एक ही जैसा मान लिया गया और किसी को एतराज तक नहीं हुआ। फिल्म के ट्रेलर में एक वाइस ओवर में कहा गया है पिछल 65 सालों में भारत पाकिस्तान के बीच 4 जंगों हो चुकी हैं, और इनके नतीजे भी सभी को पता हैं। किंतु पाकिस्तान की आईएसआई और भारत की रॉ ऐसी एजेंसियां हैं तो हर घंटे जंगों लड़ा करती हैं।
इस बात पर भारत सरकार को कड़ा ऐतराज होना चाहिए। दरअसल फिल्म का यह डायलॉग साबित करता है कि भारत की रॉ एजेंसी भी आईएसआई की तरह ही आतंकवाद को बढ़ावा देने में मदद करती है। रॉ जैसी प्रतिष्ठित स्वरक्षा के लिए जासूसी करने वाली एजेंसी पर यह आरोप सरासर गलत कहने वाले भारत में ही ऐसी फिल्में चालाकी से ऐसा कर जाती हैं।
सलमान खान उत्साहित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं। भीड़ इकट्ठा करने के लिए माने जाते हैं, एक अच्छे कलाकार हैं। किंतु चुपके से इस तरह का इंजेक्शन भारतीय मानुष में लगा देना बिल्कुल ही गलत है। इस बात पर जंू तक नहीं रेंगा लोगों के सिर पर, कि फिल्म ने कितनी ही चालाकी से यह साबित कर दिया कि रॉ और आईएसआई में कोई फर्क नहीं। आईएसआई मुल्ला परस्ती के साये में आतंक और सिर्फ भारत के खिलाफ आतंक फैलाने में सहायक होती है। यह बात कई आतंकियों के पकड़े जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर भी साबित हो चुकी है। किंतु रॉ के बारे में पाकिस्तान ऐसे कई मिथ्या प्रयास कर चुका है, साबित नहीं कर पाया। एक अदद फिल्म ऐसा कहकर करने जा रही है और हम हैं कि चुप बैठे हैं।
- वरुण के सखाजी
Tuesday, July 3, 2012
बचपन: वक्त का खूबसूरत कोना
बालमन की सुलभ इच्छाएं बड़ी आनंद दायक होती हैं। कई बार सोचते-सोचते हम वक्त के उस कोने तक पहुंच जाते हैं, जहां हम कभी सालों पहले रचे, बसे और रहे होते हैं। जिंदगी जैसे अपनी रफ्तार पकड़ती जाती है, हम उतने ही व्यवहारिक और यथार्थवादी होते जाते हैं। किंतु यह यथार्थ हमसे कल्पनाई संसार की रंगत ले उड़ता है। वह कल्पनाई संसार जो अनुभवों की गठरी होता है, सुखद एहसासों के आंगन में मंजरी होता है, हल्की सहसा आई मुस्कान की वजह होता है। इस कल्पनाई संसार से दूर जाकर हम देश, दुनिया की कई बातें सीखते, समझते और जानते हैं। किंतु जब बचपन की यह खोई, बुझी, बिसरी और स्थायी सी सुखद यादें दिमाग में ढोल बजाती हैं, तो मन भंगड़ा करने लग जाता है।
यादों की धुन पर मन मस्ती में डूब गया, जब 20 साल पुरानी चिल्ड्रन फेवरेट लिस्ट पर चर्चा शुरू हुई। किस तरह से एक अदद स्वाद की गोली के लिए तरसते थे, किस तरह से हाजमोला कैंडी के विज्ञापन को देख मन मसोस कर बैठ जाते थे, कैसे स्कूल के रास्ते में पडऩे वाली दुकानों पर लटके पार्ले-जी के विज्ञापन को देख मन डोल उठता था। सोचने लगते कि वह बच्चा कितना लकी है जो इस बिस्किट के पैकेट पर छपा रहता था, जब चाहे बिस्किट खाता होगा। खूब खाता होगा, मम्मी तो उसे कभी मना करती नहीं होगी, फोटो तक उसका खिंचवाया है। बालमन यहां तक इच्छा कर बैठता कि काश मेरे घर बैल गाड़ी में ऊपर तक भरकर बिस्किट आएं। और ऐसा नहीं कि यह इच्छा मर गई हो, वह इमेज भी आज जेहन में जस की तस है, जब इस बात की कल्पना की गई थी। मेरा घर, उसमें खड़ी लकड़ी की बैल गाड़ी, उसमें लदे फसल के स्थान पर बिस्किट, हरेक बिस्किट में दिख रहा है वही गोरा-नारा हिप्पीकट बच्चा। इस बात की कल्पना कोयल जब भी मन के किसी कोने से कूकती है तो यादों का बियावां खग संगीत पर और जवां हो जाता है। वो मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम की बसों के पीछे बना एक सुंदर सा बच्चा और हाथ में लिए स्वाद की गोली। वाह मजा आ जाता। जब उसे देखता और उसके चेहरे की परिकल्पना करते कि वह कितना लकी है जिसके हाथ में स्वाद की गोली है, वो भी जब वह चाहे तब। स्वाद के प्रति क्रेज ऐसा रहा कि टीवी पर जब एड आता स्वाद-स्वाद और एक व्यक्ति आसमान से स्वाद की गोलियां फेंकता तो लगता था जैसे अब गिरी या कब गिरी मेरे आंगन में।
बालमन की कल्पनाएं यहीं नहीं थमतीं वह मीठे पान पर भी खूब मुज्ध होता है। मीठे पान में डलने वाले लाल-लाल पदार्थ को क्या कहते हैं आज भी नहीं मालूम, मगर हम लोग उसे हेमामालिनी कहते थे। लोग इसमें मीठे पेस्ट की ट्यूब डालकर उसे धर्मेंद्र कहते थे। तब तो नहीं, लेकिन आज लगता है धर्मेंद्र और हेमामालिनी का मीठे पान की दुनिया में अद्भुत योगदान रहा है। बालमन एक और कुलांचे भरता है। बातों ही बातों में शरारतें भी जवां होने लगती हैं। इनमें छुप-छुपकर कंचा खेलने, स्कूल में आधी छुट्टी के बाद न जाने, चौक चौराहों पर बैठकर बड़ों की बातें सुनने जैसी बातों पर लगे प्रतिबंध आज के अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों जैसे विषय हुआ करते थे।
बालमन की कल्पनाएं उस वक्त और अंगड़ाई लेने लगती हैं, जब बीसों साल पुराने किसी खाद्य उत्पाद के पैकेट्स कहीं मिल जाएं। कहीं बात छिड़े तो यूपी, बिहार, गुजरात, की सीमाओं से परे होकर कॉमन इच्छाएं, कठिनाइयां, कमजोरियां, चोरियां, शरारतें और मन को आह्लादित करने वाली खुशियां मिलने लग जाती हैं। इस अद्भुत बचपन के सफर को संभालकर रखने की जिम्मेदारी अपने दिमाग की किसी स्टोरेज ब्रांच को दे दीजिए, वरना सोने जैसी मंहगी होती मेमोरी में स्पेस नहीं बचेगा इन खूबसूरत एवर स्माइल स्वीट मेमोरीज को सहजेने के लिए। चूंकि संसार में घटनाएं बहुत बढ़ गईं हैं। रोजी के जरिए आपका दिमागी ध्यान ज्यादा चाह रहे हैं, ऐसे में दिमाग के पास हर घटना के डाटा रखने की जिम्मेदारी है, तब फिर कहां रखेंगे इन बाल चित्रों जैसे स्माइली इवेंट्स को।
वरुण के. सखाजी
Thursday, June 21, 2012
प्रोफेशन की आंधी में इंसानी भार न खो दें
प्रोफेशन की आंधी में इंसानी भार न खो दें
अपने जूनियर्स के प्रति आपका नजरिया कूटनीतिक से ज्यादा ईमानदारी भरा हो यह जरूरी है। कूटनीति भी कंपनी के कुछ हितों के लिए जरूरी है। किंतु ईमानदारी की कीमत पर कतई नहीं। चूंकि आपका जूनियर आपसे ही सीखता है। अगर हम अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के चलते जूनियर के लिए नकारात्मक रहेंगे तो संभव है कि हम अपना इंसानी वजन तो खो ही रहे हैं, साथ ही कंपनी को भी एक खुराफाती ब्रेन दे रहे हैं। कई फैसले, जिनमें जूनियर यह अपेक्षा करता है कि इसमें रिस्क फैक्टर है तो निर्णय आप लें और उसे अमल करने को कहें। तो हमें ही साफ कर देना चाहिए कि यह करना है या नहीं करना है। खासकर तब, जबकि वह फैसला हम भी स्वयं लेने में डर रहे हों। कहीं कोई ऐसी बात न हो जाए, जो कंपनी की पॉलिसी के विपरीत हो। ऐसी स्थिति में जिम्मदारी और साहस की बड़ी जरूरत होती है। और ऐसा तभी हो सकता है, जब हम सिर्फ और सिर्फ काम के प्रति सजग, समर्थ, बहादुर और जिम्मेदार होंगे। कंपनियों के मुख्य काम के अलावा भी कई जिम्मेदारियां सीनीयर्स के कंधों पर होती हैं, ऐसे में मुमकिन है कि हम लगातार कूटनीतिक होते चले जाएं। किंतु इन सब पेशेवराना तंग दर्रो से भी होकर हमें अपने आपको बेहद साफ सुथरा और खासकर ईमानदार बने रहना होगा।
दरअसल यह बात जेहन में उस वक्त आई, जब गांव के बहुत धनाड्य रहे परिवार के अंतिम सदस्य की बड़ी गुरवत में दम तोडऩे की खबर सुनी। दुनिया से जाने के बाद उनके बारे में जो ख्याल आया वह बड़ा नकारात्मक था। दिमाग के सिनेमा हॉल में उनके जीवन की डॉक्यूमेंट्री चलने लगी। वे बड़े सेठ हुआ करते थे। इस समय उन पर कई व्यावसायिक जिम्मेदारियां थीं। वे अपने कर्मचारियों के प्रति ऐसा रवैया रखते थे, कि अगर कल को बड़े सेठ नाराज हुए तो वे गोलमोल कुछ ऐसा कह सकें कि ठीकरा कर्मचारी पर फूट जाए। जब भी उनसे किसी बड़े फैसले के लिए पूछा जाता तो वे कोई ऐसी बात करते कि वह घूम फिरकर पूछने वाले की ही जिम्मेदारी रह जाए। ऐसे में कई कर्मचारी परेशान भी रहते थे। किंतु वह कुछ बोल नहीं सकते थे। यह बात इतनी शातिर तरीके से वे करते थे कि लोग समझ ही नहीं पाते। लेकिन जब उन सेठ के यहां से कर्मचारी दूसरी जगह काम पर गए तो उन्हें कहने के लिए एक भी काम से जुड़ा उदाहरण नहीं मिला। नई जगह पर भी उनके काम में यही डर रहा कि हमारा बॉस कोई भी बात हमपर ही ढालेगा। छोटे सेठ इस बात की लंबे समय तक ताल भी ठोकते रहे। आज जब नव पेशेवर युग शुरू हुआ तो न उन सेठ जी का पता चला और वैसे कर्मचारियों का।
असली में उदारवाद के बाद तेजी से देश में नव पेशेवर युग जो शुरू हुआ है, तो कोई भी ऐसी कंपनियां, लोग, संस्थाएं या विचार आगे नहीं बढ़ पा रहे, जो स्पष्ट और ईमानदार न हों। यह नकारात्मक विचार होता है कि झूठ जीत रहा है, बल्कि मुझे तो कई बार लगता है कि सतयुग आ रहा है। ऐसे लोग इतनी तेजी से रिप्लेस हो रहे हैं, कि अगले 6-8 सालों में पेंशनर्स हो जाएंगे। वक्त ने हमेशा अपने साथ बदलने वालों को ही साथ में लिया है, जो नहीं बदले वे दूर कहीं पीछे रह गए हैं। गोलमोल बात, अस्पष्ट विचार, सोले के सिक्के (दोनों तरफ एक से, सिर्फ भ्रम भर रहे कि दो पहलू होंगे) जैसे गैर इंसानी भार के लोग अगले दशक तक अल्प संख्यक हो जाएंगे।
वरुण के सखाजी
Monday, June 18, 2012
प्रणब ने टेंटुआ दबाया था पत्रकारों का
प्रणब ने टेंटुआ दबाया था पत्रकारों का
भारत की बदकिस्मती कहिए या फिर जनाब इसे अंधापन भयानक रोग। जिन प्रणब के हाथों देश के प्रथम पुरुष की कमान आने को है वह जरा देखें तो क्या कर रहे थे इनरजेंसी के दौरान। शाह कमिशन में प्रणब को अपात काल में सर्वाधिक मीडिया पर अत्याचार का दोषी पाया गया था। इस रिपोर्ट को देश की कई लाइब्रेरी में भी रखा गया था। किंतु जैसा कि होता है भारत के लोग लंबे अरसे बाद कांग्रेस से परेशान होकर हर किसी को चुन लेते हैं और वह अपने आपको साबित भी नहीं कर पाता। जैसा कि हुआ था जनता पार्टी की सरकार में। और अभी भी। वाह रे एनडीए चुप है। औकात इतनी भी नहीं कि एकाध कैंडीडेट उतार सके। यहां देखिए कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर में भी सबसे ज्यादा लड्डुओं को अपने मुंह में ठूंसे खड़ी है। मैं कह रहा था प्रणब के खिलाफ केस भी दर्ज हुआ और इस रिपोर्ट के आधार पर उन्हें दोषी माना गया। किंत इंदिरा ने अपनी सरकार आते ही सारे केस वापस ले लिए।
प्रणब ये वही शख्स हैं, जिन्होंने पत्रकारों का तो जैसे गला दवा रखा था। और न जाने कितनों को जेल में ठूंस दिया और बाद में कुछ छुट्टुओं को तो मरवाया भी था। और आज वह राष्ट्रपति की गरिमा को सुशोभित करेंगे। वहीं यह वही प्रणब हैं जिन्होंने सभी लाइब्रेरी से इस शाह कमिशन की रिपोर्ट को जला देने के लिए कहा था। अभी इसकी इकलौती रिपोर्ट एक ऑस्ट्रेलियन लाइब्रेरी में रखी हुई है।
Friday, March 30, 2012
नूर नासूर बन गया
लड़कियों का नूर नासूर बन गया
हर दफ्तरान का दस्तूर बन गया
काम आता नहीं, मेल चेक करना तक
कतार में हैं बॉस से अदने चाकर तक
सैलरी उठातीं इन बालाओं का सुरूर बन गया
हर दफ्तरान का दस्तूर बन गया
टाइम जो जी में आया आ गईं
लंच हुआ तो पेल-पेल के खा गईं
आंसुओं को कह ही रखा है
लगे तुम्हे जरा भी ठेस चले आना
चश्में से झांकती आंखों का गुरूर बन गया
हर दफ्तरान का दस्तूर बन गया
लिपस्टिक्स, लाली, गुलाली, फाउंडेशन
चूड़ी कंगन, बेंदी, वॉव, सरप्राइज में मुंह खुला
शैंपू, साड़ी, चप्पल, रंग, रोगन
परफ्यू सा बातों में घुला
काम कहां, किसे करना है
बॉस टैंपरेरी झूठा ही सही हुजूर बन गया
हर दफ्तरान का दस्तूर बन गया
खैर है सरकारी, जहां यह तो नहीं हैं
मगर स्वेटर न जाने कितनी बुनी हैं
ऊन के भाव बैठ वित्त विभाग में बताएं
डंडे के पीले कलर पर पुलिस में आपत्ति जताएं
लाल कर दो प्यार होगा,
काम होगा, मुजरिमों का दीदार होगा
वुमन हरासमेंट सेल में सुबकना जरूर बन गया
हर दफ्तरान का यह दस्तूर बन गया
- सखाजी
हर दफ्तरान का दस्तूर बन गया
काम आता नहीं, मेल चेक करना तक
कतार में हैं बॉस से अदने चाकर तक
सैलरी उठातीं इन बालाओं का सुरूर बन गया
हर दफ्तरान का दस्तूर बन गया
टाइम जो जी में आया आ गईं
लंच हुआ तो पेल-पेल के खा गईं
आंसुओं को कह ही रखा है
लगे तुम्हे जरा भी ठेस चले आना
चश्में से झांकती आंखों का गुरूर बन गया
हर दफ्तरान का दस्तूर बन गया
लिपस्टिक्स, लाली, गुलाली, फाउंडेशन
चूड़ी कंगन, बेंदी, वॉव, सरप्राइज में मुंह खुला
शैंपू, साड़ी, चप्पल, रंग, रोगन
परफ्यू सा बातों में घुला
काम कहां, किसे करना है
बॉस टैंपरेरी झूठा ही सही हुजूर बन गया
हर दफ्तरान का दस्तूर बन गया
खैर है सरकारी, जहां यह तो नहीं हैं
मगर स्वेटर न जाने कितनी बुनी हैं
ऊन के भाव बैठ वित्त विभाग में बताएं
डंडे के पीले कलर पर पुलिस में आपत्ति जताएं
लाल कर दो प्यार होगा,
काम होगा, मुजरिमों का दीदार होगा
वुमन हरासमेंट सेल में सुबकना जरूर बन गया
हर दफ्तरान का यह दस्तूर बन गया
- सखाजी
Wednesday, February 22, 2012
Not news
संस्कृति विभाग के राहुल सिंह जी ने पिछले दिनों एक घटना पर ध्यानाकर्षित करवाया। एक कोई दबी कुचली सी लेखिका हैं लक्ष्मी शरथ। इन्होंने छत्तीसगढ़ की महिलाओं के छत्तीस पति होने जैसी टिप्पणी अपने एक लेख में की है। और इसे एक कहानी के रूप में चटखारे लेकर बतलाया है, जिसमें एक कोई टोप्पो और दूसरा कोई मुमताज आपस में चर्चा कर रहे थे। इसके बाद से जब मैंने इस लेखिका से बात की तो यह बड़ी बदमिजाज निकली। इतना ही नहीं डरी हुई भी निकली। अब यह कह रही है कि मुझे तो पर्यटन वालों ने बुलाया था। इस इश्यू को मैं मीडिया में नहीं लाना चाहता। चूंकि इससे होगा सो होगा किंतु इस दबी कुचली लेखिका को जरूर एकाध पहचान मिल जाएगी।
क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो बिना मीडिया में आए इसके खिलाफ केस दर्ज करवाए? और शेष मीडिया से भी मेरी अपील है कि वह इस घटना को छापे भी तो इसमें अपनी एक लाइन साफ करते हुए छापे कि हम लेखिका कौन है यह नहीं बताएंगे। इससे विवादों के सहारे संवाद करने वाले गैर जिम्मेदार लोगों की फेहरिश्त बढ़ेगी। अगर कोई ऐसा करना चाहता है तो वह शीघ्र करे।
- सखाजी
क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो बिना मीडिया में आए इसके खिलाफ केस दर्ज करवाए? और शेष मीडिया से भी मेरी अपील है कि वह इस घटना को छापे भी तो इसमें अपनी एक लाइन साफ करते हुए छापे कि हम लेखिका कौन है यह नहीं बताएंगे। इससे विवादों के सहारे संवाद करने वाले गैर जिम्मेदार लोगों की फेहरिश्त बढ़ेगी। अगर कोई ऐसा करना चाहता है तो वह शीघ्र करे।
- सखाजी
Saturday, February 4, 2012
अस्मिता के 19 साल...
चाय की दुकान पर बैठा अखबार पर चर्चा कर रहा लोगों का वो झुंड अचानक उठ कर उस शोर की दिशा में चल देता है...शोर में आवाज़ सुनाई दे रही है, कुछ युवाओं की...अरे क्या कह रहे हैं ये...ये चिल्ला रहे हैं...आओ आओ...नाटक देखो...और फिर देखते ही देखते उस मंझोले शहर के नुक्कड़ पर लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है। काले कपड़ों में तैयार वो युवा एक सुर में आवाज़ देते हैं और एक गीत के साथ नाटक शुरु होता है...लोग खूब तालियां बजाते हैं...हंसते हैं...फिर अचानक गंभीर हो जाते हैं...फिर तालियां बजाते हैं...और फिर अचानक से उदास हो उठते हैं...नाटक के अंत में एक धवल केश और दाढ़ी वाला शख्स हाथ जोड़कर लोगों के बीच आ खड़ा होता है...उनसे उस नुक्कड़ नाटक के सरोकारों पर बात करता है, उस के मुद्दों पर बात करता है...उसके बाद शुरु होता है चाय का सिलसिला और लगभग हर शख्स चाहता है कि वो इन बच्चों को चाय नाश्ता कराकर ही जाने दे...ये कमाल पूरी तरह से एक आदमी के नाम लिखा है...अरविंद गौड़, और काले कपड़ों से रंगीन रोशनियों तक ये है उनका रंगमंडल...अस्मिता।
दरअसल ये दो तस्वीरें हैं जो अस्मिता के उन दो चेहरों को जोड़ती हैं, जो देश के उन दो हिस्सों को जोड़ती हैं, जिन्हें हम इंडिया और भारत कहते हैं। नुक्कड़ नाटक के दर्शक और प्रोसीनियम के दर्शक दोनो ही उद्वेलित हो रहे हैं, एक अपने अधिकारों के लिए जाग रहे हैं, तो दूसरे अपने रवैये के लिए शर्मिंदा हो रहे हैं। दरअसल ये ही कमाल है अरविंद गौड़ नाम के उस शख्स का जिसके लिए साधारण बने रहना सबसे असाधारण कमाल है, ये ही सादगी उनकी भी आभा पिछले तीन दशकों से बढ़ा रही है, और इसी आभा से अस्मिता को चमकते 19 साल हो गए हैं।
जी हां...अस्मिता अपने 19 साल पूरे कर रहा है, अस्मिता 20 वें साल में प्रवेश कर रहा है और साथ ही 2 दशक की यात्रा तय कर आज भी जारी है प्रतिरोध के थिएटर का ये सफ़र। एक अभिनव प्रयोग अस्मिता, जो कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के साथ रामलीला मैदान में हज़ारों लोग जुटा लाता है तो कभी इरोम शर्मिला के साथ जंतर मंतर पर एक काले कानून के खिलाफ आवाज़ उठाता खड़ा होता है। कभी ये गांधी और अम्बेडकर के बीच के रिश्ते को समझने की कोशिश करता करता, वर्ण व्यवस्था की जड़ पर कुदाल चला देता है तो कभी जिन्नाह की रूह को ज़िंदा कर अपने सिर पर इनाम रखवाता है पर झुकना स्वीकार नहीं करता। अस्मिता के ये 20 साल उतार-चढ़ाव से भरे रहे तकनीक से लेकर अभिनेताओं तक सब कुछ बदला लेकिन कुछ नहीं बदला है तो वो है अरविंद गौड़ की जिजीविषा, प्रतिरोध की शैली और अस्मिता की मुखरता।
अस्मिता की बात करते वक्त तमाम और लोगों की तरह मैं गिनवा सकता हूं कि यहां से कौन कौन से अभिनेता निकल कर बॉलीवुड में नाम बन गए हैं लेकिन थिएटर से इतर भी दरअसल अस्मिता की अपनी एक अलग दुनिया है। ये एक अद्भुत परिवार है, जिसमें न जाने कितने सदस्य हैं। 60 से ज़्यादा वर्तमान अभिनेताओं के साथ (जिनमें से ज़्यादातर युवा हैं और 25 साल से कम उम्र के हैं) ये अलग ही घर है। एक घर जहां लगभग हर चौथे दिन किसी का जन्मदिन होता है और हर जन्मदिन पर एक उत्सव। एक ऐसा परिवार जो एक दूसरे के लिए तो दिन रात खड़ा ही है, दूसरों की मदद के लिए भी सबसे आगे है। रामलीला मैदान में आपको याद होगा अस्मिता के काले कपड़े वाले बच्चों का जज़्बा। न जाने कितनी बार मैंने देखा कि अस्मिता के सदस्य कभी किसी की मदद के लिए रक्तदान करने तो कभी किसी मोहल्ले-बस्ती की सफाई में श्रमदान करने निकल पड़ते हैं। एक एसएमएस एक-एक मोबाइल से न जाने कहां कहां पहुंच जाता है। दिल्ली की ये सड़के उन रातों को जूतों के निशानों को अपने ज़ेहन से मिटा नहीं पाई हैं, जब अरविंद गौड़ को इसी दिल्ली ने नाटक करने से प्रतिबंधित कर दिया था। अरविंद गौड़ उस दौर में हर रात मंडी हाउस से शाहदरा अपने घर तक पैदल जाया करते थे और शायद वो ही न झुकने की ज़िद उनके अंदर आज भी कूट कूट कर भरी है...
अरविंद गौड़...और अस्मिता को न जाने कितने साल से सिर्फ चाय और पारले जी के सहारे दिन रात मेहनत करते देख रहा हूं। हो सकता है कि हम में से कई अस्मिता के कलाकारों के अभिनय पर सवाल उठा दें। उनके कम उम्र और कम अनुभव पर सवाल उठा दें...लेकिन अरविंद गौड़ का थिएटर जो सवाल उठा रहा, क्या उनके जवाब हम देने को तैयार हैं? क्या हम इस योगदान को नकार सकते हैं कि देश और समाज के बारे में शून्य समझ रखने वाली एक पूरी पीढ़ी के न जाने कितने युवाओं के दिमाग अरविंद गौड़ बदल चुके हैं। थिएटर के ज़रिए किस कदर सोशल चेंज हो सकता है, ये अरविंद गौड़ और अस्मिता से हम लम्बे समय तक सीख सकते हैं।
हर बार जब अस्मिता जाता हूं, इन जोशीले नौजवान साथियों से मिलता हूं तो कई बार डर लगता है कि कहीं पूंजीवाद की आंधी और इंडिया की शाइनिंग किसी रोज़ अरविंद गौड़ और अस्मिता को न बदल दे। लेकिन तभी रिहर्सल्स के बाद अरविंद जी को साहित्यकार लक्ष्मण राव जी (लक्ष्मण राव के बिना अस्मिता की कहानी अधूरी है...)की चाय की दुकान पर ज़मीन पर ही बैठा देखता हूं, और हाथ से इशारा कर मुझे बुलाते हैं...तो लगता है कि नहीं उम्मीदें अभी बाकी हैं और उम्मीदों को बाकी रहना ही होगा...दिल्ली के आईटीओ पर हिंदी भवन के बाहर बैठा मैं सोच रहा हूं कि काश देश में ऐसे 10 अस्मिता होते, तो क्या हो सकता था...काश अरविंद जी हमेशा ऐसे ही रहें...और अस्मिता भी...बचा रहे बुर्जुआ से और बाज़ार से...अरविंद जी आप सुन रहे हैं न...
(अस्मिता के 20वें साल में प्रवेश के मौके पर कुछ सशक्त प्रस्तुतियां दिल्ली में हो रही हैं...जिस कड़ी में 4 फरवरी को शाम 7 बजे दिल्ली के श्रीराम सेंटर में कोर्ट मार्शल, 12 फरवरी को मयूर विहार में बुज़ुर्गों के लिए अम्बेडकर और गांधी की विशेष प्रस्तुति दोपहर 3 बजे, श्रीराम सेंटर में ही 18 फरवरी को शाम 7 बजे एक मामूली आदमी, 19 फरवरी को दोपहर 3 बजे श्रीराम सेंटर में मोटेराम का सत्याग्रह और 19 फरवरी को ही शाम 7 बजे अम्बेडकर और गांधी का श्रीम सेंटर में मंचन होगा...देखिए कि आप इनमें से किसमें आकर इस दो दशक के जश्न में शामिल हो सकते हैं...)

(नोट - यह किसी तरह का पी आर का लेख नहीं है...लेखक का अपना मत है...आपके मत भिन्न हो सकते हैं...)
मयंक सक्सेना
मयंक सक्सेना
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