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Sunday, March 13, 2011

नौ साल बाद मिला इंसाफ

27 फरवरी 2002 एक ऐसा दिन जिसे गुजरात और भारत के लोग याद नहीं रखना चाहेंगे।यह वह दिन जब अयोध्या से गोधरा आ रही है साबरमती एक्सप्रेस को आग के हवाले कर दिया गया और एस 6 में मौजूद कारसेवकों को जिंदा जलाया गया.जो ना तो नक्सली थे ना आतंकवादी।और उसके बाद गुजरात में भड़का दंगा जिसे 1200 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।राजनीति अपनी जगह है लेकिन नेताओं से गुजारिश की जाती है कि वे गोधरा जैसे मामले में संवेदना बरते लेकिन ऐसा नहीं हुआ.यह एक निर्विवाद तथ्य था कि साबरमती एक्सप्रेस की एस 6 में आग बाहरी लोगों ने लगाई थी यह एक गहरी साजिश थी लेकिन कुछ लोगों ने ऐसा मानना से इंकार कर दिया ..मैं आपके सामने वो कुछ तथ्य रखूंगा जो बताने के लिए काफी हैं कि किस तरह सच्चाई पर झूठ और गलत दलीलों पर पर्दा ढका गया।लालू जी ने थोथी दलील देने वाले की बातों में आकर बनर्जी कमीशन की स्थापना की जबकि इससे पूर्व गोधरा की सच्चाई को दुनिया के सामने लाने के लिए नानावटी कमीशन की स्थापना कर दी गई थी।बनर्जी कमीशन ने यह रिपोर्ट दी कि साबरमती एक्सप्रेस में लगायी नहीं गई थी बल्कि इसमें आग लगी थी यानि साबरमती एक्सप्रेस की एस 6 में लगी आग महज हादसा थी।
अब साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग या लगायी गयी आग के लिए हादसा की जांच जिस जांच अधिकारी को दी गई थी वो थे नोएल परमार..नोएल परमार ने 200 प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिये और उसके आधार पर वो इस तथ्य पर पहुंचे कि ट्रेन में लगी आग एक गहरी साजिश थी..
नोएल परमार ने साफ बताया हैं कि साबरमती एक्सप्रेस में आग दंगाईयों ने लगाई थी जिसके उन्होंने 6 वजह बतायी हैं..
1 जैसा कि बनर्जी कमीशन की रिपोर्ट बताती हैं कि कारसेवक बोगी के अंदर खाना बना रहे थे और स्टोव में रखे तेल की वजह से पूरी बोगी में आग लगी थी..फोरेंसिक साइंस कहता हैं कि रेलवे की किसी भी बोगी में आग लगाने के लिए 60 लीटर तेल की जरूरत होती हैं .क्या यह संभव हैं कि स्टोव में रखे 1 लीटर तेल से पूरी बोगी में आग लगना संभव हैं।.बिल्कुल नहीं

2 क्या यह संभव है कि चंद मिनटों में 140 लीटर पेट्रोल इक्टठा कर लिया जाए.आपको बता दे कि घटना से ठीक एक दिन पहले गोधरा स्टेशन के पास अमन गेस्ट हाउस में दंगाईयों की मीटिंग हुई थी और प्रत्येक को काम बाटा गया था और इन्ही अभियुक्तों में कुछ ने पेट्रोल का इंतजाम रात में ही कर लिया था

3 क्या यह संभव है कि सुबह 7.35 मिनट के करीब 700 से ज्यादा भीड़ इक्टठी कर ली जाए.भीड़ का इक्टठा करना भी दंगाईयों के प्लान का हिस्सा था..

4 जब ट्रेन गोधरा स्टेशन से आगे बढ़ा तो उसे दो बार क्यों रोका गया।ये रणनीति भी दंगाईयों ने 26 फरवरी की रात को बनाई थी ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतारा जा सके.

5 जब ट्रेन को जलाये जाने की खबर के बाद फायर ब्रिगेड रवाना हुई तो रास्ते में फायर ब्रिगेड को क्यों रोका गया.

इन्हीं निष्कर्षों और 200 से ज्यादा प्रत्यक्षदर्शियों और इस क्रूरतम अपराध को देखते ही जज पी आर पटेल को 22 फरवरी 2011 को मानवता के जघन्य अपराधियों को कठोर दंड देना पड़ा।जज पी आर पटेल ने अपने फैसले में 20 को उम्रकैद और 11 को फांसी की सजा सुनाई है.

अब तक मानवता के चंद गद्दार यह कह रहे थे कि साबरमती एक्सप्रेस में आग कोई साजिश नहीं बल्कि महज एक घटना था..22 फरवरी का फैसला तिस्ता सीतलवाड़ जैसे चोचलेबाजों के लिए करारा तमाचा हैं.

एक बात और भारत में सजा सुनाने और उसे लागू करने में एक बहुत बड़ा वक्त लगता हैं.प्रश्न यह हैं कि इन जघन्य अपराधियों को अपील की कितनी छूट मिलनी चाहिए।क्यों नहीं इन्हें फांसी पर जल्द लटकाया जाए ताकि पीड़ितों की आत्मा को शांति मिल सके।

गोधरा और उसके बाद गुजरात में जो हुआ उसे किसी भी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता हैं और यह हकीकत है लेकिन उससे भी बड़ी हकीकत हैं कि अगर साबरमती एक्सप्रेस की एस 6 की बोगी या यू कहे कि अगर 56 गुनहगारों को जिंदा नहीं जलाया जाता तो गुजरात में दंगे नहीं भड़कते।अब सामान्य लोगों को चाहिए कि इस फैसले को कबूले और दिल और दिमाग को इतना मजबूत बनाए ताकि देश में फिर कभी ऐसी हिंसा ना फैले।कुछ तथाकथित बौद्धिक आतंकवाद से शिकार लोग और मानवतावादी इस फैसले की अलग व्याख्या कर रहे हैं उनसे गुजारिश हैं कि वो अब सच्चाई को स्वीकार करेंगे।कानून की चक्की भले धीरे पीसती हों लेकिन पीसती बड़ी महीन है और गोधरा के गुनहगारों के लिए यह एक सख्त संदेश हैं।यह देश हिंदू ,मुस्लिम ,सिख,ईसाई सभी का है सभी का हक बराबर का हैं .हम सदियों से साथ रहते आये है और कोई भी ताकते हमारी एकता तो नहीं तोड़ सकते...

गोल्डन ग्लोब नहीं...गोल्डन केला...अवॉर्ड्स की पूरी सूची देखें....

साल की शुरुआत से ही तमाम बॉलीवुडिया अवार्ड फंक्शन्स हो रहे हैं...और इसी सिलसिले में इनमें से सबसे अनोखे लेकिन सबसे ज़रूरी पुरस्कार बॉलीवुड को समर्पित कर दिए गए....गोल्डन केला अवार्ड्स...जी हां गोल्डन केला अवार्ड फिल्मों में सबसे बुरे, अतार्किक और बेहूदा प्रदर्शनों के लिए दिए जाते हैं....इन पुरस्कारों को ट्वेन्टी ऑनवर्ड्स मीडिया प्रदान करती है....और इस बार के पुरस्कार हालांकि आप में से बहुतों को सहमत न कर पाएं...पर चेहरे पर मुस्कान ज़रूर ले आएंगे....चलिए नज़र डालते हैं समूची लिस्ट पर...

Award for Worst Actor 'Male' - शाहरुख खान (माय नेम इज़ खान)

Award for Worst Actor 'Female' - सोनम कपूर (आयशा)

Award for Worst Supporting Actor 'Male' - अर्जुन रामपाल (हाउसफुल और वी आर फैमिली)

Award for Worst Supporting Actor 'Female' - कंगना राणाउत (काइट्स, नो प्रॉब्लम और वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई)

Award for Worst Film 2010 - माई नेम इज़ ख़ान

Award for Worst Director 2010 - संजय लीला भंसाली (गुज़ारिश)

Award for Worst Debutante 'Male' - आदित्य नारायण (शापित)

Award for Worst Debutante 'Female' - पाखी त्यागी (झूठा ही सही)

Award for Most 'Original' Story - एक्शन रीप्ले (जो 'बैक टू फ्यूचर' से चुराई गई)

'Bawra ho Gaya hai Ke' Award - बेन किंग्सले (तीन पत्ती)

Most Atrocious Lyrics 2010 - अब्बास टायरवाला (क्राई क्राई कितना क्राई...झूठा ही सही)

Most irritating Song of the Year 2010 - पी लूं....(वन्स अपॉन अ टाइम इन मुम्बई)

"When did this come out?" Award 2010 - एक सेकेंड...जो ज़िंदगी बना दे (फिल्म)

Worst Animated Film Award 2010 - बारू द वंडर किड

Lajja Award for Worst Treatment of Serious Issue - डुन्नो वाय..न जाने क्यों..

Chimpoo Kapoor Award for No Talent relatives of Celebrities - उदय चोपड़ा

3 Idiots Child Birth Award for Most Ridiculous Sequence in a Film - प्रिंस (पूरी फिल्म)

The BLACK Award for Emotional Blackmail - गुज़ारिश

Jajantaram Mamantaram Award for Worst Named Film - लफंगे परिंदे

Special Award for the Worst Triology Ever - गोलमाल 3

Ajooba Award for Sheer Awesomeness - दबंग

Sonu nigam Award for Career Suicide - सुखविंदर सिंह (कुछ करिए)

Special Award for Worst Casting Ever - जैकी श्रॉफ (मालिए एक में साईं बाबा)

The "Bas keejiye, Bahut Ho Gaya.." Award - रामगोपाल वर्मा

ज़ाहिर है इन पुरस्कारों को पढ़ कर आपके चेहरे पर हंसी ज़रूर आएगी...पर कहीं न कहीं ये पुरस्कार कुछ गंभार मसले भी उठाते हैं...जैसे कि क्यों आखिर वाहियात फिल्में बड़े बजट की होती हैं...और अच्छी फिल्मों को निर्माता ही नहीं मिलता....क्या हिट हो जाने वाली बेहूदा फिल्में हमारे पूरे समाज के मानसिक स्तर की परिचायक हैं...कैसे फिल्म जैसे कला माध्यम में भी वंशवाद का बोलबाला है...कैसे आखिर इतने साल बाद बी हम सिनेमा को जनजागरुकता का माध्यम नहीं बना पाए हैं...सबसे वृहत मास मीडिया होने के बाद भी हम या तो अतिरेक हिंसा से भरे हैं...बेवकूफाना करतबों से अटे हुए हैं...या फिर पेड़ों के इर्द गिर्द नाच रहे हैं...बोल्ड होने का मतलब कथा वस्तु के स्तर पर बोल्ड होने की जगह केवल शरीर की नग्नता दिखाना है...वो भी जो सुंदर नहीं भयावह लगती है...बिना सर पैर की फिल्में बनाने वालों के लिए ज़ाहिर है गोल्डन केला कम से कम उन्हें आईना दिखाने का काम तो कर रहा है...ज़ाहिर है शाहरुख खान भले ही माई नेम इज़ खान के लिए तमाम पुरस्कार जीत गए हों...हम सब जानते हैं कि उड़ान इन सब से बेहतर फिल्म थी....
खैर अवॉर्ड देखें और मुस्कुराएं....ज़िंदगी में मुस्कुराने के मौके कम आते हैं....

मयंक सक्सेना

Friday, March 11, 2011

यानी सिविक सिविलिएंस

महीनो बाद भोपाल आना हुआ, लगा जैसे अपने आंगन में कूद रहा हूं। लेकिन कुछ ही पलों में एहसास हो गया कि यह वह आंगन कतई नहीं, जहां बेझिझक हम घूमते, खिलंदड़ से खेलते रहते थे। अब यह एक बड़े प्रदेश की संपूर्ण वरीयता प्राप्त राजधानी बन गया है। इसमें कोई नई बात नहीं है कि भोपाल राजधानी है। लेकिन नई बात है, कि यहां पर सिविक सेंस जितना तेजी से विकसित हो रहा है, वह काबिले तारीफ है। इसके पीछे लॉ एन्फोर्समेंट की सियासी इच्छाशक्ति और पुलिसिया प्रयास दोनो ही तारीफ के घेरे में आते हैं। लेकिन वास्तव में यहां के नागरिकों को बधाई दी जानी चाहिए, कि वे अब अपने प्यारे शहर को अस्त व्यस्त ट्रैफिक से हांफता शहर, दंगों से कांपता शहर, नहीं बल्कि सिविक सोसाइटल फेसलुक वाला शहर बनाना चाहते हैं। कभी जहांगीराबाद से न्यूमार्केट के लिए पीएचक्यू से किसी भी मिनी बस को जरा सा हाथ देकर न्यूमार्केट जाने की आदत रही, लेकिन इस बार ऐसा कतई नहीं हुआ। क्या मिनी बस और क्या जवाहर शहरी नवीनीकरण राशि से तोहफे में मिली बड़ी भारी भरकम महानगरीय बसें। सबकी सब बस स्टॉप पर ही आ रही हैं, वहीं खड़ी होकर सवारी उतारती और बिठाती हैं। मजार से आगे पुलिस पेट्रोल पंप के सामने बने बस स्टॉप की छाया में सवारी विधानानुरूप बस का इंतजार करती दिखी। बड़ी लाल परपल सी बसें आई एक व्यवस्थित अंदाज में रुकीं, कंडक्टर ड्रायवर के मुंह पर मीठी भाषा थी, पहले की तरह बढ़ाबढ़ा... के साथ दरबाजे को पीटकर चलने का इशारा नहीं था। न ही किसी के मुंह में जर्दे की पीक ही भरी थी। एक द्वार सादर अंदर आने और एक बाहर निकलने का। और इतना ही नहीं यह दोनो ही गेट्स स्टॉप से पहले खुलते भी नहीं। हां लेकिन एक चीज देखी, नियम कायदे आम लोग तो फॉलो कर रहे थे। लेकिन पौं...पौं... करती किसी मंत्रीनुमा व्यक्ति की स्कॉर्पियो लाल बत्ती सब्र न कर सकी। खैर मुझे जरूर सब्र रहा कि भोपाल में अब सिविक सेंस के मायने बदल रहे हैं। इस बात से तीन बातें तो स्पष्ट हो ही जाती हैं, एक तो अगर अधोसंरचनागत विकास और जरूरी संसाधन हों तो आम नागरिकों से भी सुशिक्षित व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है,

। दूसरी अब आम लोग खासों के सुधरने का इंतजार करते हुए, एक दूसरे का मुंह नहीं ताकना चाहते, वे खुद ही से जिम्मेदारी होने लगे हैं। तीसरी बात जो साबित होती है, कि सियासी दखल से परे कड़ी नकेल के साथ पुलिस से भी अच्छा काम करवाया जा सकता है। हालांकि भोपाल वाले मामले में पुलिस से ज्यादा बधाई के पात्र यहां के आम नागरिक हैं। ऐसी ही कुछ अपेक्षाएं करता हूं, रायपुर में भी जल्दी स्वयं के प्रति ईमानदारी का भाव लोगों में पैदा होगा। दरअसल व्यवस्था के ठेकेदारों (आईएएस) को पहले ऐसे हालात बनाने होंगे, जब कहीं जाकर लोगों में सुव्यवस्थापन आएगा। वैसे भी ट्रैफिक के तीन सिधांतों इफ्रास्ट्रक्चर, एजुकेशन और एन्फोर्समेंट में सबसे पहला इफ्रास्ट्रक्चर ही तो है। लेकिन स्वघोषित शाही सामंत (आईएएस) उल्टी शुरुआत करते हैं। रायपुर के लोग चूंकि सीधे हैं।

वे खुद ही से जिम्मेदारी होने लगे हैं

महीनो बाद भोपाल आना हुआ, लगा जैसे अपने आंगन में कूद रहा हूं। लेकिन कुछ ही पलों में एहसास हो गया कि यह वह आंगन कतई नहीं, जहां बेझिझक हम घूमते, खिलंदड़ से खेलते रहते थे। अब यह एक बड़े प्रदेश की संपूर्ण वरीयता प्राप्त राजधानी बन गया है। इसमें कोई नई बात नहीं है कि भोपाल राजधानी है। लेकिन नई बात है, कि यहां पर सिविक सेंस जितना तेजी से विकसित हो रहा है, वह काबिले तारीफ है। इसके पीछे लॉ एन्फोर्समेंट की सियासी इच्छाशक्ति और पुलिसिया प्रयास दोनो ही तारीफ के घेरे में आते हैं। लेकिन वास्तव में यहां के नागरिकों को बधाई दी जानी चाहिए, कि वे अब अपने प्यारे शहर को अस्त व्यस्त ट्रैफिक से हांफता शहर, दंगों से कांपता शहर, नहीं बल्कि सिविक सोसाइटल फेसलुक वाला शहर बनाना चाहते हैं। कभी जहांगीराबाद से न्यूमार्केट के लिए पीएचक्यू से किसी भी मिनी बस को जरा सा हाथ देकर न्यूमार्केट जाने की आदत रही, लेकिन इस बार ऐसा कतई नहीं हुआ। क्या मिनी बस और क्या जवाहर शहरी नवीनीकरण राशि से तोहफे में मिली बड़ी भारी भरकम महानगरीय बसें। सबकी सब बस स्टॉप पर ही आ रही हैं, वहीं खड़ी होकर सवारी उतारती और बिठाती हैं। मजार से आगे पुलिस पेट्रोल पंप के सामने बने बस स्टॉप की छाया में सवारी विधानानुरूप बस का इंतजार करती दिखी। बड़ी लाल परपल सी बसें आई एक व्यवस्थित अंदाज में रुकीं, कंडक्टर ड्रायवर के मुंह पर मीठी भाषा थी, पहले की तरह बढ़ाबढ़ा... के साथ दरबाजे को पीटकर चलने का इशारा नहीं था। न ही किसी के मुंह में जर्दे की पीक ही भरी थी। एक द्वार सादर अंदर आने और एक बाहर निकलने का। और इतना ही नहीं यह दोनो ही गेट्स स्टॉप से पहले खुलते भी नहीं। हां लेकिन एक चीज देखी, नियम कायदे आम लोग तो फॉलो कर रहे थे। लेकिन पौं...पौं... करती किसी मंत्रीनुमा व्यक्ति की स्कॉर्पियो लाल बत्ती सब्र न कर सकी। खैर मुझे जरूर सब्र रहा कि भोपाल में अब सिविक सेंस के मायने बदल रहे हैं। इस बात से तीन बातें तो स्पष्ट हो ही जाती हैं, एक तो अगर अधोसंरचनागत विकास और जरूरी संसाधन हों तो आम नागरिकों से भी सुशिक्षित व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है, यानी सिविक सिविलिएंस। दूसरी अब आम लोग खासों के सुधरने का इंतजार करते हुए, एक दूसरे का मुंह नहीं ताकना चाहते, वे खुद ही से जिम्मेदारी होने लगे हैं। तीसरी बात जो साबित होती है, कि सियासी दखल से परे कड़ी नकेल के साथ पुलिस से भी अच्छा काम करवाया जा सकता है। हालांकि भोपाल वाले मामले में पुलिस से ज्यादा बधाई के पात्र यहां के आम नागरिक हैं। ऐसी ही कुछ अपेक्षाएं करता हूं, रायपुर में भी जल्दी स्वयं के प्रति ईमानदारी का भाव लोगों में पैदा होगा। दरअसल व्यवस्था के ठेकेदारों (आईएएस) को पहले ऐसे हालात बनाने होंगे, जब कहीं जाकर लोगों में सुव्यवस्थापन आएगा। वैसे भी ट्रैफिक के तीन सिधांतों इफ्रास्ट्रक्चर, एजुकेशन और एन्फोर्समेंट में सबसे पहला इफ्रास्ट्रक्चर ही तो है। लेकिन स्वघोषित शाही सामंत (आईएएस)

उल्टी शुरुआत करते हैं। रायपुर के लोग चूंकि सीधे हैं।

Sunday, January 30, 2011

पहले तो हम अपनी पीठ थपथपाएं

यह बताने से पहले कि क्या कर रहे है, पहले तो हम अपनी पीठ थपथपालें। अब कुछ लिखता हूं।
प्रज्ञा दी, प्रखरता दी और दिया सम्मान, वाकई भैया रायपुर है महान। मैं इस शहर का आभारी हूं, जिसने मुझे वो सबकुछ दिया है, जो यह सबको देता है। मैं इसका और ज्यादा आभारी हो जाऊंगा अगर यह मुझे वो और दे देगा जो मुझे इससे अब चाहिए। जी हां अखबार की नौकरीनुमा रचनात्मकता में कहीं हम अपनी क्रियाशीलता तो बढ़ी पाते हैं, लेकिन रचनाशीलता को सिकुड़ा और पारंपरिक खांचों में फंसे जज्बात। इसी बात को ध्यान में रखकर हम कुछ लोगों ने गांधी पर एक अलग ढंग की फिल्म बनाने का फैसला किया है। यह काम कुछ-कुछ उसी तरह से है जैसे एक उद्योगपति के घर पर काम करने वाला माली उसकी हर अच्छी बुरी बात जानता है, लेकिन उस बात का इस्तेमाल नहीं। लेकिन अगर एकाध माली ऐसा कुछ जानने लग जाए तो उसे अतिरिक्त प्रज्ञा का धनी कहा जा सकता है। हम लोग भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। गांधी की प्रतिमा के नीचे खड़े होकर हम सबने इस फिल्म पर आज से औपचारिक रूप से काम करने का संकल्प लिया है। इसमें स्क्रिप्ट स्तर का काम रोहित और विनीत जी 5 फरवरी तक फाइनल कर देंगे। 15 फरवरी तक रोहित वरुण और नीरज कॉलेजों से इसके लिए पात्रों को खोजकर लाएंगे। 25 फरवरी तक वरुण इसकी पूरी शूटिंग रूप रेखा तैयार करके 26 फरवरी से शूटिंग स्टार्ट करेंगे। यह जिम्मा वरुण के पास ही रहेगा, कि कौन कैमरा चलाएगा, कौन एडिटिंग करेगा। साजसज्जा, फिल्म सेट्स, लोकेशन आदि की प्लानिंग। वहीं इस पुनीत और रचना के शुभ कार्य में हमारे सीनियर प्रसून जी का भी विशेष सहयोग मिल रहा है। विश्वविद्यालय में रावण के रूप में फैमस रहे हमारे साथी रंजीत की फिल्मी और नाटकीय प्रतिभा के इस्तेमाल की उनसे एसएमएस और मेल से बात हुई है। मित्रो यह कार्य ब्रम्हांड को अपने पैरों के नीचे रखने का बराबर है। यह फिल्म लोगों के बीच 1 अप्रैल तक होगी। इसकी संभावित रिलीज भी यही तारीख या रामनवमीं रहेगी। स्क्रिप्टिंग, शूटिंग, एक्टिंग, कोरियोग्राफी, फिल्मांकन, लोकेशन, इवेंट मैनेंिजग, एडिटिंग, पब्लिसिटी से लेकर सबकुछ काम हमारी यह टीम देखेगी। इस फिल्म के निर्माण से लेकर बहुत कुछ प्लानिंग है। दोस्तों संभव भी हो कि हम अपने मकसद में सफल न हो सकें। संभव भी है, कि हम इस प्रॉजेक्ट पर चंद कदमों पर ही ढेर हो जाएं। लेकिन आखिरी और आखिरी शब्द यही है, फिल्म तो बनकर रहेगी, और यह फिल्म जरूर बनेगी। गांधी जी से हमारा वायदा है दोस्त कि यह फिल्म जरूर बनेगी।
अंत में: फिल्म तो बनेगी भैया चाहे फिर कैसे भी बने। रचना यज्ञ में आहुति देने आप सभी पधारें। जय हे::::::::वरुण के सखीजी, ९००९९८६१७९
इनका आभार: श्री प्रसून जी, श्री विनीत जी, श्री रोहित जी, श्री नीरज जी, श्री श्याम जी, श्री भगत जी, श्री वो सब जो इस प्रॉजेक्ट से अबतक जुड़े हैं, और जो जुडऩे वाले हैं, या जो जुड़ेंगे ही जुड़ेंगे। और वो भी जो इसे हल्के से लेकर अंडर एस्टिमेट कर रहे हैं। इसके साथ ही वर्दी कमेंट्स भी हमें आपके चाहिए, जो आपको देने ही देने हैं।

Saturday, January 22, 2011

वह झूठ बोल रही है


आदमी एक साथ न जाने कितनी जिंदगियां जी रहा होता है। पिछले दिनों मेरे साथ एक जिंदगी में कुछ ऐसा ही हुआ, जब दुनिया के तमाम संसाधनों को ही अपनी सफलता समझने वाली इस जिंदगी को एक छोटे से प्यादेनुमा व्यक्ति ने चुनौती दे डाली। दरअसल मामला है उस दौर का जब मैं बहुत संघर्ष के दौर से गुजर रहा था, वक्त ऐसा था कि करियर कुछ शेप लेता इससे पहले ही हादसे हो जाते। इससे निराश हो कर वह जिंदगी का इनचार्ज सीधा बड़ी जिंदगी के पास गया। बड़ी जिंदगी अक्सर यही कहती है बेटा कार्य पूरे मनोयोग से नहीं किया गया एक बार फिर कोशिश करो। छोटी जिंदगी के इनचार्ज महोदय वापस अपने काम में जुट जाते। उन्हें बड़ी जिंदगी की कही बात कुछ ऐसी लगती जैसे जो कुछ हो रहा है, वह परम सत्य और न्याय के तराजू और छन्नियों से होकर निकल रहा है। जिंदगी कुछ कह ही नहीं पाती। एक दिन उसे ऐहसास हुआ कि बेटा इस तरह से काम चलेगा नहीं, जरा सोचो तुम्हारो पास कुछ ऐसा तो है नहीं कि बड़ी जिंदगी हमेशा सही ही बोलेगी। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह झूठ बोल रही है। इस उहापोह में जिंदगियां कई बार आपस में ही उलझ जाती। लडक़र, घबराकर बड़ी ंिजदगी एक अपात बैठक इन जिंदगियों के साथ करती। लेकिन वह भी नाकामयाब।
आज कुछ मेरे साथ ऐसा ही हो रहा है, कि कई जिंदगियां आपस में उलझ सी गई हैं, और इतना लड़ रही हैं, न पूछो।।।।।।।।
क्या हुआ वो जो नहीं हुए हमारे इश्कपरस्त
मगर मियां मेहताब तो चार दिन ही चमकता है,
कह रहे हैं वो बार-बार इस कदर,
अगर जीना है तो जी इसी तरह,
सखाजी

Friday, December 31, 2010

नए साल पर एक कविता...

गया और नया साल

हो कल की जैसे बात,
या कि नींद भरी रात,
किसी अपने की बारात,
बिना लड़े कोई मात।
शायद ऐसे गया, गया साल।।

आये नींद सुनकर गीत,
किसी बेदर्दी की प्रीत,
या कि चुटकी का संगीत,
वर्तमान सा अतीत।
शायद ऐसा ही था वो गया साल।।

चाहे जैसा भी था वो गया साल,
इस बात का किसे है मलाल,
वक़्त आया बनके फिर से द्वारपाल,
आओ सोचें कैसा होगा नया साल?
ज़रा करके देखें खुद से ये सवाल।।

जैसे शादी का हो पत्र,
मिले वर्षों बाद मित्र,
या पुराना कोई इत्र,
कोई ख़बर हो विचित्र।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे ग़ज़ल इक हसीन,
कोई सफ़र बेहतरीन,
जैसे दर्द हो महीन,
जैसे साफ हो ज़मीन।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।

जैसे घुँघेरू वाली पायल,
या हो जाये कोई क़ायल,
जैसे शेरनी हो घायल,
या कि 'मम्मी जी' का आँचल।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे कामगार का पसीना,
बिन श्रृंगार के हसीना,
कोई चुटकुला कमीना,
या फिर मार्च का महीना।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे साफ-स्वच्छ दर्पण,
या धुला हुआ बर्तन,
पतिव्रता का समर्पण,
या व्यक्तित्व का आकर्षण।
शायद ऐसा हो वो नया साल।

ये सब थे मान्यवर, मेरे ही उद्‌गार।
कैसा हो नव वर्ष ये, आप ही करें विचार।।
आप ही करें विचार हमें बस इतना कहना।
नया साल मंगलमय हो, प्रतिदिन और रैना।।

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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