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Thursday, December 3, 2009

कड़वे अतीत की वरसी...भोपाल गैस कांड २५ साल बाद...



तकरीबन २५ वर्ष पहले की वो कड़वी रात का मंजर... जब भी उस रात के चश्मदीतों की आंखों के सामने आता है, दिल सहर उठता है। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ वही काली, दर्दनाक रात की जिसने भोपाल की खुबसूरत फिजा में ज़हर घोला था। उन लम्हों को बीते तो आज ढाई दशक बीत गए, मगर उसका दर्द लोगों के ज़हन में आज भी जीवंत है।
विश्व की सबसे भयानक घटनाओं में से एक भोपाल गैसकांड की आज रजत जयंती पुरी हुई है। लेकिन इसके पीड़ित लोगों को आज भी इंसाफ की गुहार है। न तो अभी तक असल जरूरतमंद लोगों को सही से मुआवजा मिला है, नाही इस त्रासदी के गुनहगार एंडरसन को सजा मिली है। भोपाल की आबो-हवा में अब भी यूनियन कार्बाइड का ज़हर घुला हुआ है। गैस रिसाव वाले क्षेत्र की कॉलोनियों में आज भी लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
इस त्रासदी का दंश झेल रहे हजारों लोगों की जिंदगी सिर्फ़ अस्पताल, डाक्टर, जाँच, और दवाओं तक सिमट के रह गई है। लाखों रुपये ये अपने इलाज में खर्च कर चुके हैं, लेकिन अब तक राहत नसीब नही हुई है। अफ़सोस इस बात का है कि जो लोग गैस कांड के क्षेत्र से लाखों दूर रहते थे वे अब तक ४-४ बार इसका मुआवजा ले चुके हैं। लेकिन इसके असली हकदार अभी भी गैस रहत कोष के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं। कई लोगों ने तो बकरे को अपना लड़का बताकर मुआवजा हथिया लिया है, और गैस कांड कि राहत में मिलने वाला पैसा रायसेन, होशंगाबाद, सीहोर जिले तक के लोगों ने हथियाया है, जो इस त्रासदी से कोशो दूर थे। कहने को तो ७०२ करोड़ रूपए बतौर मुआवजे बांटे जा चुके हैं पर कितना, असल जरूरतमंद लोगों तक पंहुचा कहना मुश्किल है।
सरकारी आंकड़े के अनुसार तकरीबन पाँच लाख लोग इस गैस त्रासदी से पीड़ित हैं मगर मुआवजा पंहुचा केवल तीन-साढ़े तीन लाख लोगों तक...और उनमे कितने असली हैं और कितने फर्जी कौन जानता है? गैस त्रासदी से पीड़ित ५६ कॉलोनियां मानी गई थी मगर मुआवजे में मात्र ३६ कॉलोनियों को शामिल किया गया।
इस गैस त्रासदी पर खूब राजनीती हुई, विवाद हुए, आन्दोलन हुए, प्रदर्शन हुए मगर इंसाफ का मोहताज इन्सान आज भी अपने हक का इंतजार कर रहा है। पीड़ितों की आँखों के आंसू अब सूख गए हैं, लेकिन दिल आज भी बेचैन बना हुआ है। इस त्रासदी में २५ वर्ष पहले लगभग १६००० लोग मरे थे लेकिन लाखों लोग अब भी पल-पल मर रहे हैं।
यूनियन कोर्बोइड जैसे संयंत्र तो आज भी जगह-जगह बिखरे पड़े हैं, जो हर पल जहरीले तत्व प्रकृति में छोड़ रहे हैं। यदा-कदा जयपुर गैस कांड जैसी वारदातें भी सामने आ जाती हैं पर कौन ये सब देखने-सुनने वाला है। जब गैस त्रासदी कि माँ भोपाल गैस कांड पर प्रशासन आँखे मूंदे बैठा है तो दूसरों का तो कहना ही क्या? हमारी आंखों के सामने हमारे विनाश का बिगुल बज रहा है और हम इसे अपना विकास समझकर तालियाँ बजा रहे हैं। इस आधुनिकीकरण के जरिये हम अपनी आने वाली पीड़ी को क्या एक ऐसा माहौल दे पाएँगे, जहाँ साफ पानी-हवा और बेहतर भविष्य हो?
भोपाल गैस कांड का काला अतीत हमें नसीहत देता है, लेकिन ये हमारे ऊपर है कि हम उसे मानते हैं या नही। अंत में इन पंक्तियों के साथ बात ख़त्म करता हूँ-
आसमानों तुम्ही कुछ कहो, मैं बेजुबान हो गया हूँ...ये मंज़र देखकर.

Saturday, November 28, 2009

विकिपीडिया सियासी बकवास का ...आईने में लिब्रहान


विवेक मिश्रा

रात में समाचार देख कर सोया की संसद में गन्ने के उचित मूल्य के मुद्दे पर विपक्ष ने किसानो को सड़क पर उतारकर सरकार को मुश्किल में डाल दिया है और कल सरकार ज़रूर किसानो के लिए कुछ करेगी लेकिन कहते है कल किसने देखा है ,आम आदमी तो नही देख सकता क्यूंकि वह सियासत का मोहरा जो है खैर मै मुद्दे से भटक रहा हूँ,लेकिन लगता है सरकार को मुद्दे से भटकने का मुद्दा चाहिए रहता है कांग्रेस सरकार किसानो की मसीहा जो ठहरी सुबह हुई संसद का माहौल और मिज़ाज दोनों बदला बदला दिखा आज अडवानी ख़ुद ही एक समाचार पत्र लिए प्रवेश कर रहे थे यह वही समाचारपत्र था जो जसवंत सिंह के लिए हाल में अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का साधन बना था समाचारों में हेडिंग बन रही थी बोतल से फिर जिन्ना का जिन्न निकला खैर जसवंत सिंह की अभिव्यक्ति चल निकली और हमेशा की तरह विवादित चीज़ हिट फोर्मुले पे हिट हुई विवादित शब्द से ध्यान आया संसद में उस दिन अडवानी जी के हाथो में जो समाचार पत्र था उसके पहले पेज पे ही विवादित ढांचा यानी बाबरी १९९२ के आरोपी लगभग ६८

जिंदा जिन्नों के बारे में छपा था हमारी विपक्ष संसद के शुरू होते ही किसान और गन्ना दोनों को ताख पे रखा और सरकार से लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट जो सत्रह सालो से बोतल में कैद थी को पेश करने की मांग कर दी ,उधर समाचार चैनेल से लेकर पूरी मीडिया ने बयार बहने की दिशा को भांपकर किसान और गन्ने को स्क्रीन से बाहर फेककर अडवानी एंड संस की जिन्न टीम को अपने स्क्रीन में कैद कर भूखे किसानो को खाने को परोस दिया मेरी नीद खुलने के बाद और रात में बेड पर जाते समय तक इन चीजो ने मुझे बैचैन कर दिया की अब गन्ना किसानो का ? समझ में आया की सुगर लाब्बिंग ने किसानो के नेता होने का दावा करने वालो को इतनी मीठी चाय पिला दी है की वे देश को आज़ाद कराने वाले नेताओं पर भी संसय करने लगे है साथ यह भी कह रहे है की इस मीठी चाय पर कौन न कुर्बान हो जाए ,मुझे सैफ अली खान की तरह इन किसान नेताओं का भविष्य भी कुर्बान होता दिख रहा है टाटा के चाय उत्पाद ने नया स्लोगन भी निकाला है चाय पिलाओ घूस नही लेकिन टाटा वाले भूल गए की यदि चाय मीठी हुई तो ?मैंने बहूत बकवास कर ली क्या करू आदत से मजबूर जो हूँ कुछ लोग यह भी कहते है आंकड़े बताता नही केवल मुंह खोला और जो आया भक से कह दिया ,लिख दिया फिलहाल एक सर्व विदित तथ्य आपको बता दूँ की समाचार पत्र का नाम इंडियन एक्सप्रेस था अब इसने लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट स्वय खोजी या इससे खोज्वाई गयी खोज का विषय है यह हमारे किसान के सबसे वफादार नेता और हम सभी भारतीय किसानो के बीच पढ़े लिखे सरदार माफ़ कीजियेगा सरकार मनमोहन सिंह का कहना है जांच लिब्रहान की तरह १७ का दूना ३४ साल में न आए बस यही दुआ है मेरी और सियासत के जिन्नों से अनुरोध है की किसानो के बचे गन्ने तो कम से कम न चूसो घर जाओ और किसानो के खून को चूस कर जो फ्रूटमिक्सेर मंगवाया है मंहगे फलो को उसमे डाल कर रस निकालो और गालो को लाल करो ......जारी रहेगा

Thursday, November 26, 2009

हमें नहीं आता

हमें बताना नहीं आता
ग़म के साथ ए हसीना हमें जीना नहीं आता
मोहब्बत तो हम भी करते हैं,
मगर ठुकराए इज़हार पर पीना हमें नहीं आता
मयख़ाने की शिरक़त हम अक्सर किया करते हैं,
मगर बस्ल ए इंतज़ार में, आंखे भिगाना हमें नहीं आता
क़ॉलेज के गेट पर हो खड़े,
राह तेरी तकता ज़रूर हूं, मगर क्या करूं
दिल को एक जगह टिकाना हमें नहीं आता
दुनिया के हुज़ूर से कहना ज़रूर, बुरक़े के भीतर छुपे
बदन पर इतराना हमें नहीं भाता
कनखियों से सुरमाई आंखे क़हर ढाती तो हैं
मगर पसंद इस तरह किसी को
बहकाना हमें नहीं आता
सुर्ख आफताब से गालों पर लेकर डिंपल हंसना हसीना
तुम्हे पाने की मशक्कत में पसीना बहाना हमें नहीं आता
होगी नवाब की भोपाली झील तेरी नीली आंखे
मगर इन आंखों की चाह में आंसु बहाना हमें नहीं आता
गुलाबी बाग की हसरतें हैं,तेरे होठों की तरह फड़फड़ाने की
मगर असल में बस्ल की चाह में
सब कुछ लुटाना हमें नहीं आता
चले जाओगे ज़िंदगी से क्या समझते हो
ख़ुदा की नेमत "जान" इस तरह गंवाना हमें नहीं आता
एक बात तुमसे कहे देता हूं,
मेरी "जान" मेरे बदन में नहीं ,
बसती है तुममें बताना हमें नहीं आता
वरुण के सखाजी
पत्रकार
ज़ी24घंटे,छत्तीसगढ़
9009986179

हमें नहीं आता

हमें बताना नहीं आता
ग़म के साथ ए हसीना हमें जीना नहीं आता
मोहब्बत तो हम भी करते हैं,
मगर ठुकराए इज़हार पर पीना हमें नहीं आता
मयख़ाने की शिरक़त हम अक्सर किया करते हैं,
मगर बस्ल ए इंतज़ार में, आंखे भिगाना हमें नहीं आता
क़ॉलेज के गेट पर हो खड़े,
राह तेरी तकता ज़रूर हूं, मगर क्या करूं
दिल को एक जगह टिकाना हमें नहीं आता
दुनिया के हुज़ूर से कहना ज़रूर, बुरक़े के भीतर छुपे
बदन पर इतराना हमें नहीं भाता
कनखियों से सुरमाई आंखे क़हर ढाती तो हैं
मगर पसंद इस तरह किसी को
बहकाना हमें नहीं आता
सुर्ख आफताब से गालों पर लेकर डिंपल हंसना हसीना
तुम्हे पाने की मशक्कत में पसीना बहाना हमें नहीं आता
होगी नवाब की भोपाली झील तेरी नीली आंखे
मगर इन आंखों की चाह में आंसु बहाना हमें नहीं आता
गुलाबी बाग की हसरतें हैं,तेरे होठों की तरह फड़फड़ाने की
मगर असल में बस्ल की चाह में
सब कुछ लुटाना हमें नहीं आता
चले जाओगे ज़िंदगी से क्या समझते हो
ख़ुदा की नेमत "जान" इस तरह गंवाना हमें नहीं आता
एक बात तुमसे कहे देता हूं,
मेरी "जान" मेरे बदन में नहीं ,
बसती है तुममें बताना हमें नहीं आता
वरुण के सखाजी
पत्रकार
ज़ी24घंटे,छत्तीसगढ़
9009986179

Tuesday, November 24, 2009

सबकी मिली भगत सबको फायदा

बाबारी का जिन्न फिर बाहर आगया है। कहने को ये घटना आज से सत्रह साल पुरानी है, जिसे कोई शर्म,कोई शौर्य और धैर्य का अवसान मानता है। लेकिन सच में ये घटना थी क्या..क्या वास्तव में किसी विदेशी अक्रांता की बनाई गई जागीर को तोड़ देना अपने धर्म और जाति के लिए कर्तव्य परायणता होगी या फिर राष्ट्रवाद होगा क्या हमने इस विवादित ढांचे को गिरा कर बाबर की बर्बरता और उसकी पौध याने औरंगज़ेब की ज़्यादितियों को भुला दिया या इतिहास में दर्ज़ इस सच को पौछ पाये..शायद जवाब आसान नहीं होगा।
एक बार फिर आंतक के लिए एक जुट होते देश के सामने वही दो सवाल आएंगे एक आंख मेरी धर्म कहलाती है दूसरी राष्ट्र..मैं किसे क़ुर्बान करूं...मुस्लिम कठमुल्लों को पटरी पर दौड़ती ज़िंदगी को फिर एक बार पाक में बैठे आक़ाओं की उस बात को साबित करने का मौक़ा मिल गया है जिसमें वो अक्सर भारतीय मुस्लिमों को हिंदुओं से दूर रहने की सलाह देते हैं..कहा करते है उनके हित भारत में नहीं बल्कि भारत के भीतर एक और पाकस्तान बनाने में हैं....सीमापार के ये तथाकथित इस्लाम के प्रचारक सक्रिय हो गये हैं..और सबसे बड़ी बात इस रिपोर्ट की ये है कि इससे निकलने वाले राज़ दरअसल राज़ हैं ही नहीं...सब खुली ख़िताब की तरह पढ़ा, समझा जा सकता है। रिपोर्ट लीक हुई अफसोस ये नहीं जिस वक्त लीक हुई वो समय राष्ट्रीय एकता और गौरव को नये आयाम देने वाला है...इसी महीने के आखिरी सप्ताह में मुम्बई हमले की सालग़िरह होगी और देश के दूसरी बड़ी आबादी इस बात से आशंकित और आतंकित होगी कि कहीं फिर भगवा सेना सक्रिय होकर कुछ ऐंसा ना करने लग जाए जो 1992 का दोहराव हो....उनके हाथों में ज़रूर शोक के प्रतीक कैंडल,काली पट्टी या कुछ और हो सकता है हो मगर दिल में एक भय खौफ और ख़तरनाक यादें होंगी वो जो बात उस पीढ़ी को नहीं बताना चाहते थे जो उस वक्त पैदा नहीं हुई थी...वो पीढ़ी ख़ुद ही सब जान जाएगी...
अब सवाल ये उठता है कि आखिर रिपोर्ट इसी वक्त क्यों लीक हुई या कराई गई...ये कोई परीक्षा का पर्चा नहीं जो बदमाशों ने लीक किया हो या गैस पेपर नहीं है..बल्कि देश की अस्मिता औऱ मान गौरव सम्मान के साथ राष्ट्रीय शांति का मसला है...इसके पीछे सरकार का हाथ है या जो भी है, कोई माइने नहीं रखता ये बात अल्हदा है।
इस रिपोर्ट के नजदीकी बुरे असर और दूरगामी बुरे असर दोनो पर हम इन बिंदुओं पर सोचते हुए विचार कर सकते हैं..
पहला देश के मुखिया का बाहर होना और रिपोर्ट का लीक होना-मनमोहन सिंह एक मंझे हुए खिलाड़ी है वे इसका ठीकरा अपने सिर नहीं लेना चाहते अब तक उनकी छवि सीधे सरल औऱ काम के प्रति निष्ठावान की बनी हुई है..औऱ फिर वे अपने वाक् चातुर्य के आभाव में गरम मुद्दे पर बहस में बुरे फंस भी सकते थे..
दूसरा इसी बीच उनका पाकस्तान के लोकतांत्रिक अस्तित्व पर सवाल खड़ा करना कि कौन है वहां जिससे बात की जा सके याने पाकस्तान की ज़म्हूरियत भारत की नज़र में बोगस है असल ताकत वहा के सेना नायकों और तालिबानियों में है...जो कि सच भी है..इस बयान ने वैश्विक पटल पर एक नई सोच और बहस दोनों ही समान रूप से रखी हैं..जिसमें शर्म-अल-शेख के साझां बयान का पश्चाताप भी शामिल है..
तीसरा गन्ना के गड़ने से कांग्रेस नीति संप्रग में ठीकराबाज़ी से लोगों औऱ विपक्ष का ध्यना पूरी तरह से हटाना....
तीसरा स्पेकट्रम घोटाले को सेफसाइड करना....चौथा कोड़ा पर पड़ रहे कोड़ों को भले ही केंद्र ने ही परोक्ष समर्थन दिया हो लेकिन पार्टी इसे तह तक नहीं ले जाना चाहती कांग्रेस के पुराने सहयोगी कोड़ा ने घोटाला नहीं किया बल्कि झारखण्ड के सीएम की करतूत है..याने कोड़ा और कांग्रेस का मेल कमतर दिखाना...पांचवा औऱ आखिरी भाजपा ने राव को घेरा तो कांग्रेस कैसे चुप रहे वो ऐंसा काला चिठ्ठा लेकर आई जिसने उसे फिर बूस्ट कर दिया।
वास्तव में सियासी दांव बड़े गहरे होते हैं...बाबरी के जिन्न को निकालना...वंदेमातरम् पर फतवे वाली सभा में परोक्ष रूप से रहना सबके बड़े गहरे माइने हैं...जिन्हे आम आदमी नहीं समझना नहीं चाहता..
इससे जो देश का माहौल बनेगा वो भाजपा या किसी औऱ भगवा का नुकसान नहीं होगा..बल्कि डूबती बिखरती पार्टी को फिर एक बार स्थापित होने का मौका मिलेगा वहीं सपा जो मुस्लिम परस्ती से कुछ दिन बाहर आई थी वो फिर उसी कूप में डूब जाएगी..वहीं ये सत्र तो गया जिसमें देश के बड़े मुद्दों पर चर्चा होनी थी..कुल मिला कर ऐंसा लगा कांग्रेस को मुद्दों से बचने का फायदा..भाजपा को रिस्टेंड होने का फायदा सपा को फिरका ताकतों का प्यार दोबारा मिलने की संभावनाओ का फायदा होता दिखाई दे रहा है जो साबित करता है कि शायद ये सर्वदलिय रमनीति थी जो सर्वदिलीए भारत को सियासी सौहवत के बुरे असरों के रूप में मिल रहीं है..
लिब्रहान रिपोर्ट लीक हुई कराई गई जो भी हुआ मतलव नहीं बहरहाल इससे ये ज़रूर लगता है कि जनता को अब नेता खुले आम मूर्ख बनाने लगे हैं..जिसमें कोई हिंदू नहीं कोई मुस्लिम नहीं हौ बल्कि सिर्फ एक आदमी है जिसे नेता वोटर कहते हैं। कल्याण कब भगवा भगवान छोड़ सपाई हो जाते हैं..मौहभंग होने या उपेक्षा से फिर भगवा छत्ते के आस-पास मंडराने लगते है कब उमा को पार्टी की उपेक्षा बुरी लगती है औऱ कब वो अटल आजवाणी को बाप समान कहने लगती है पवार कांग्रसे से अलग होते हैं लेकिन फिर वही लोगो के बीच साझा हो जाते है.शिबु कल तक साथ आज नहीं लालू संप्रग के घटक रहे तो लगने लगा वे इससे बड़े हो गये हैं तो बिहार में कैसे कांग्रेस को आने दे झगड़ा कुर्सी टेबल सब कुछ नाचक ..ना जाने कब किस नेता को क्या अच्छा बुरा लग जाता है पता नहीं चलता इतना खुल कर किसी राज या युग में जनता को नहीं छला गया। इसलिए किसी रिपोर्ट, सर्वे, और साराशों पर ना जाए बल्कि सीधे सियासत की अंधी चाल को समझें...
वरुण के सखाजी
पत्रकार ज़ी24घंटे,चत्तीसगढ़
रायपुर
09009986179
sakhajee@yahoo.co.in

Saturday, November 21, 2009

खेती की सियासत


छत्तीसगढ़ राज्य देश के नक़्शे पर उस वक़्त उभरा जब समूचा राष्ट्र नेताओं से सवाल कर रहा था कि आखिर देश में कभी गठबंधन की सरकार स्थायित्व दे पाएगी या य़ूं ही कभी किसी वजह से तो कभी किसी वजह से लड़खड़ाती और गिरती रहेगी...इसी के साथ 2 राज्यों ने भी अपना जीवन शुरू किया लेकिन इनमें से सिर्फ़ छत्तीसगढ़ है जो स्वस्थ है झारखण्ड तो जैसे बुरी तरह से बीमार है...अस्थिरता तो अस्थिरता देश का तबसे बड़ा घोटाला भी यहां सामने आया...लेकिन राज्य छत्तीसगढ़ अपनी ज़िंदगी की नई इबारत लिख रहा है...राज्य में रमन की सरकार बड़ी लोकप्रिय और कर्मठ है इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन इस राज्य में भी वोट की राजनीति की जाती है..विधायकों की खरीद-फरोख्त तो अब पुरानी बात हो गई लेकिन बेमतलव का औबिलीगेशन जारी है...देश का सबसे बड़ा विद्युत उत्पादक होने के नाते राज्य को एक अल्हदा पहचान भी मिली हुई है...लेकिन क्या रमन सरकार को येन वक्त पर किसानों के आंदोलन के सामने हथियार डाल देने थे...धमतरी की हिंसा से घवराए सीएम ने ये फैसला इतने जल्द लिया कि कोई सोच भी नहीं सका...माना कि देश में किसानों से किसी को भी द्वेष नहीं होगा इन्हें कइयों रियायतें भी दी जानी चाहिए ताकि किसान अपनी तंग ज़िंदगी से परेशान ना हो औऱ खेती घाटे का सौदा क़तई ना रहे...लेकिन इन सबके बीच क्या सरकार को इन बातों पर ग़ौर नहीं करना चाहिए...
पहला राज्य़ के किसानों को मुफ्त बिजली देने से खज़ाने पर पड़ने वाले भार की पूर्ती कहां से की जाएगी।
दूसरा 200 करोड़ के अधिभार से राज्य के शेष विकास कार्यों पर क्या फर्क पड़ेगा
तीसरी क्या महज़ बिजली देने से किसान खुश हो जाएंगे या फिर उनकी वाकई यही समस्या है
चौथा इसकी क्या व्यवस्था की गई है कि खेतों में सिंचाई के नाम पर कनेक्शन लेकर इसका दुरूपयोग नहीं होगा जिसमें विभागीय कर्मी भी शामिल होते हैं
पांचवा क्या इस फैसले से राज्य के कर्मठ किसानों की कर्मठता पर असर नहीं होगा. या फिर वे हर मौकों पर सरकार के सामने हाथ फैलाए खड़े नहीं हो जाए जिससे किसानों की कर्मठता तो ख़त्म हो ही जाएगी साथ ही प्रदेश भविष्य में आंदोलनों और सरकारों पर पूरी तरह से निर्भर हो जाएगा, हालाकि ये देश की समस्या है लेकिन इसके पीछे नेता वोटिंग कॉज देकर बच निकलते हैं...
छठा क्या इस तरह मुफ्त बिजली बांट कर सरकार दोबारा पॉवर एक्सीलेंसी एवार्ड जीत सकेगी
सातवां क्या सरकार ये भूल गई कि इसी साल गर्मियों में बढ़ते पावर लोड के कारण राज्य सरकार को केंद्र के सामने अपने एनटीपीसी वाले कोटे के लिए ज़द्दोजहद करनी पड़ी थी
आठवां क्या सरकार भूल जाती है कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल का ख़ुदका कुल उत्पादन दोनों स्रोतों , पनबिजली और थर्मल बिजली से 2200 मेगावॉट तक ही पहुंचता है..जबकि सरप्लस का मतलव आईपीयू औऱ सीपीयू की बिजली होता है..
नौवां क्या सरकार इस बात को नहीं जानती कि यही बिजली बेंच कर राज्य को करोड़ों का लाभ होता है..
दसवां क्या यही किसान प्रेम है...जिसमें खजाना लुटाया जाए...अगर ऐंसा है तो फिर सभी किसानों को कह देना चाहिए कि वे खेतों पर ना जाए बल्कि किसी शेड के नीचे बैठ कर आंदोलन करें।
ये महज़ वोट की राजनीति होती है..जिसे राजनीति के चतुर सुजान रमन सिंह ने क्यों किया इस पर नज़र डालते हैं..
पहला इस मुद्दे पर कांग्रेस की सियासी बढ़त को ख़त्म करना जो वैशालीनगर परिणामों के बाद सामने आई है...
दूसरा अगर मुद्दा आगे बढ़ा जाता तो रियायतें देने के बाद भी श्रेय कांग्रेस को जाता और अगर रियायतें नहीं दी जातीं तो रमन की चांउर वाले बाबा की वोटिंग इमेज पर बुरा असर पड़ता
तीसरा कांग्रेस को बे-मुद्दा करके साबित करना कि सरकार चहुंओर विकास की लहर चला रही है इससे देश की सियासत में सीएम का रुतबा तो बढ़ता है साथ ही डॉ.रमन सिंह की पार्टी के भीतर बेहतर छवि भी बनती...यानें वे एक अच्छे प्रबंधक भी बन जाते...जो कि उन्हे शिवराज से आगे निकलने में मदद करता..गौरतलब है कि शिवराज के डंपर घोटाले ने उनकी पार्टी के भीतर छवि को कम किया है जो एक खराब प्रबंधन का नतीज़ा माना गया है, ऐंसी ही सूझ-बूझ धान घोटाले के वक्त दिखा कर साबित किया था..इन सबसे सीएम का क़द लगातार बढ़ा है..
लेकिन क़द के चक्कर में प्रदेश के साथ बड़ा अन्याय हो सकता है..
किसी भी नेता से पर्सनली पूछा जाए तो वो यही कहता है कि ये सब हमारी सियासी मज़बूरी है वरना हम भी ऐंसा नहीं चाहते...लेकिन इसका समाधान किसी के पास नहीं किसानों की राजनीति अब जोरों पर है हालाकि देश के बड़े नेता मुलायम हों या लालू सभी ने किसानों की नौका का इस्तमाल किया है यहां तक कि अजीत सिंह तो हरित प्रदेश को लेकर किसान पुत्र के नाम से ही जाने जाते हैं...ऐंसे बहुत से नेता हैं जो किसानों के हितैषी कहे जाते हैं..नवीनतम् घटनाक्रम में गन्ना किसानों की बात की जाए तो कांग्रेस के यू-टर्न और शरद पवार पर ठीकरे ने फिर साबित किया कि किसान बड़ा वोट बैंक है...लेकिन सालों से किसानों के हित की बात की जा रही है और ऐंसा नहीं है कि किसी किसान नेता को किसानों के लिए कुछ करने का मौका ना मिला हो कम या ज्यादा सभी को मौका मिल चुका है लेकिन इस सबके बाद ही से किसानी में इज़ाफ़ा किसी नेताई करिश्में से नहीं बल्कि उद्योगपतियों के नये प्रयोगों से हुआ है...जिसमें देश के इंडस्ट्रीयालिस्ट्स ने खेती के उपकरण आमलोगों तक सस्ते दामों पर पहुंचाए...जिससे खेती मौसम के चंगुल से किसी हद तक बाहर आ सकी...सरकारी स्तर पर भी कोशिशें क़ाबिले तारीफ़ हैं...लेकिन पर्टीकुलर नेता इसका श्रेय नहीं ले सकता भले वो इस नाम पर वोट लेले।
अब बात करते हैं सरकारी मदद और किसानों के उत्थान की तो ये कहना ग़लत ना होगा कि इसके बाद से ही किसानों की मेहनत पर उल्टा असर पड़ा है...गांवों में अपराध बढ़ा है, और हद तो तब हो जाती है कि देश के भंडारण में अनाज इतना कम पड़ जाता है कि बाहर से आयात करना पड़ जाता है...राज्य छत्तीसगढ़ की बात की जाए तो देश के कुल चावल उत्पादन का बड़ा हिस्सा राज्य का है लेकिन शायद मौसम की बैरूखी से ज़्यादा सरकारी योजनाओं के कारण 20 सालों बाद देश को चावल का आयात करने पर मज़बूर होना पड़ा....
वरुण के सखाजी
पत्रकार ज़ी24घंटे छत्तीसगढ़ रायपुर
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Wednesday, November 18, 2009

हैडली नहीं हैदर अली...

आंतकी वारदातों के बढ़ते ग्राफ और तरह-तरह की बातों ने ज़ेहन में कई सवालात खड़े कर दिए है...दरअसल..मन बेहद विचलित है कि कोई भला कैसे ये कह सकता है कि फलां वर्ग या समाज धर्म के लोग ऐसे होते हैं..क्यों इस मामले में इतना पूर्वाग्रह होता है...इन दिनों हैडली प्रकरण बड़ा उछला हुआ है...सच तो जो भी हो लेकिन भारतीय तीव्रतम् मीडिया को मसाला ख़ूब मिला है...मुम्बई हमले में शामिल था देश के एक-एक शहर को घूमा आदि..आदि। खैर ये तो किसी भी सूचना माध्यम के साथ होता है..मेरे मन में सहसा ही हैडली के बारे में ख़्याल आया कि ये जो डेविड कॉलमेन हैडली है, कहीं इसका असल नाम दाउद क़ल उम्मैन हैदर अली तो नहीं....इस तरह का विचार ज़ेहन में यूं ही नहीं आया था..बल्कि ऐंसे विचारों की शुरूआत कंधार काण्ड के बाद हुई थी ,जब हाईजैकर्स में से एक का नाम शंकर था जो बाद में साकिर निकला...औऱ चल पड़ा सिलसिला आतंकी वारदातों का...जुड़ने लगा नाम इनके पीछे..अक्सर ऐंसी कौम का जो पहले से ही भारत जैसे सहिष्णु देश में रहने की ज़द्दोजहद कर रही है...हर चेकपोस्ट पर अपने देशभक्त होने का सबूत दे रही है...इसी दौरान मैंने एक निजी समाचार चैनल के खास कार्यक्रम में देवबंद के मदनी साहब के विचार जाने उनका दर्द उनकी टीस हर शब्द में थी...बात-बात पर कटघरे में खड़े होने वाले मुल्ला मौलवियों के सामने अब आखिर कितने और सवाल हैं...रजत शर्मा जैसे मंझे हुए पत्रकार अपना पूर्वाग्रह रोक ना सके..उनका भी एक सवाल सीमापार और देशी लोगों के बीच भेद ना कर सका...मुझे तकलीफ इस बात की है..कि आखिर मुस्लिम कौम ही क्यों कटघरे में है अमरिका में भारतीय क्यों नहीं जबकि वहां तो खुले तौर पर भारतीय आज़ादी का दिन औऱ बाकी सब वो राष्ट्रीय त्यौहार मनाये जाते हैं..जो उन्हें सीधा एक भारत परस्त साबित करतीं हैं..क्या कारण है कि भारत में ही ऐंसा होता है...इसके पीछे हम उस पुरानी सोच पर भी चल कर देखते हैं..जिसमें हिंदी वर्णमाला पढ़ाते वक़्त कई ऐंसी चीज़ें पढ़ाई जाती हैं..जिन्हें बच्चा अपने दिमाग में हमेशा के लिए बिठा लेता है..जैसे कि....क्ष क्षत्रिए का और फोटो रहता है एक योद्धा का...जो तलवार ढाल लिए खड़ा रहता है..तब से अब तक कोई अगर ख़ुद को क्षत्रिए बताता है..या ठाकुर जाति का बताता है तो ख़ुदवख़ुद ज़ेहन में बचपन की पढ़ाई गई तस्वीर उभरने लगती है..जबकि सच उस तस्वीर के इतर होता है...ऐंसे ही हर काली पगड़ी बढ़ी दाढी वाला व्यक्ति आतंकी नज़र आता है और ये हमें पढ़ाया गया उस आतंक की क्लास में जो शुरू हुई थी..सन् 2001 में जब अमरिका तिलमिलाया था..तभी एक चेहरा आतंक का पर्याय बन गया..उसकी शक़्ल हुबहू उसी शक़्ल से मिलती है जो आज मौलाना मुल्ला मौलवियों का लुक है...सीधी बात ये है कि धर्म की आड़ लेकर जितनी क्रूरता आतंकियों ने की है और कर रहे हैं उतना ही ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैया उनका भी है जो सच्चे इस्लाम के विचारक हैं..चाहे वो मस्ज़िद में हों या मज़ार में..सब जगह वो हैं..अब अच्छी बात है कि मदनी साहब जैसे लोग आतंक और इस्लाम में फर्क करने के लिए सामान्य सभाएं भी करने लगे हैं..देवबंद का सम्मेलन कई माइनों में देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के चाल,चरित्र,और चेहरा को निर्धारित करने वाला था...जिसमें समय के साथ इस आबादी का सही चेहरा औऱ मौहरा सामने आएगा वहीं बहुसंख्यकों का भी इनके प्रति नज़रिए साफ होता जाएगा..अब हमें क्ष क्षत्रिए का प पंडित का ल लाला का पढ़ाया जाएगा तो तस्वीरें ऐंसी तो बनेंगी ही ना...लेकिन फिर भी पूर्वाग्रह जैसी चीज़ें देश,समाज,दुनिया और धर्म सबके लिए घातक हैं..मीडिया ने इस सम्मलन से वंदेमातरम् उठाया बाकियों पर तो ध्यान ही नहीं गया......इस देश का विचार मीडिया,मुस्लिम,और महंत बनाते हैं तब इनकी भूमिकाएं खास के साथ ही ज़िम्मेदाराना भी हो जाती हैं....

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