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Saturday, April 9, 2011
अन्ना हजारे कर बैठे बड़ी गलती-
5 अप्रैल से अन्ना ने अपनी दिसंबर मे किए संकल्प को साकार कर दिखाया। इसके नतीजे भी आए, एक के बाद एक संघ संघठन व्यक्तित्व जुड़े और जुड़ेते ही चले गए। मीडिया ने अपनी खराब आदत के अनुसार अच्छा काम किया कि पूरा अनशन कवरेज का अखंड पाठ सा बिठा दिया। वल्र्डकप के सतही देशप्रेम में डूबे भारतीय कब वास्तविक राष्ट्रहित और परमात्म सोच में डूब गए यह पता तक नहीं चला। अन्ना एक आवाज बन गए, लोकतंत्र के उस आम की जो इसे महज अपने ऊपर थोपा हुए उपले (गोबर का कंडा) मानता था। और शुरू हुआ देश में पहली बार देश की असली बात पर गैर सियासी दांव पेंचों का महासंग्राम। अबतक भ्रष्टाचार पर सियासी बोल बयान, योगी आसनों में छुपे निहितार्थ ही सतह पर थे। लेकिन पहली बार किसी ने देश में चेतना जगाई। आंदोलन की राह दिखाई। निराश, किंकर्तव्य व्यूमूढ़ सा बैठा भारतीय जनमानस इस सोच से उबर नहीं पा रहा था, कि 15 अगस्त 1947 को क्या हुआ था और इससे पहले क्या था मेरा देश। उसे दी सोच प्रज्ञा और चेतना। इस ब्रेन स्टॉर्मिंग के प्रणेता बने अन्ना। और खड़ा हो गया भ्रष्टाचार से महापीडि़त जन।
देश में शायद ऐसा कभी मौका नहीं रहा होगा, जब रूस की वोल्सेविक और फ्रांस की क्रांति सा माहौल बना हो। वल्र्डकप, दबंग में उलझी युवा पीढ़ी ने शायद इससे पहले भ्रष्टाचार को इतने करीब से खुद से जुड़ा पाया होगा और इसके समाधान के लिए स्वयं को सक्षम। देश के महा इवेंटों की बात की जाए जो राष्ट्र नाम की संस्था के लिए हुए तो अन्ना के अनशन को टॉप लिस्ट में रखा जा सकता है। अन्ना के साथ मुंबई के वैसे सफेदपोश भी खड़े दिखे जो मजबूरी में इस महा-करप्शन के साथ रहते हैं। मैं बात कर रहा हूं, फिल्मी जनगण की। इस माहौल को अन्ना ने अपने जीवन की सार्थकता और संपूर्णता को जस्टीफाइ कर दिया।
लेकिन अन्ना फैल हो गए। वे अवाज तो दे गए लेकिन मानस की रगों की ऊर्जा को एकत्र करके अमल में नहीं ला सके। अन्ना ने अपने आंदोलन की शुरुआत गलत समय पर कर दी। अभी उन्हें फिल्मी सितारों, बड़ी शख्सियतों, वेटिंग इन पॉलिटिशियंस और तथा कथित सामाजिक पशुओं का साथ मिला। मीडिया के पास कोई और जिंदा रहने की खबरिया ऑक्सीजन न होने से अन्ना तुम हिट हो गए। लेकिन वास्तव में फैल ही रहे। क्योंकि सरकारों के पास मधुमख्खियों, मछलियों, जंगली जानवरों, आदमियों और अन्यान्य प्राणियों को अपने में फांसने के अल्हदा से जाल होते हैं। इन जालों के सरकार के पास अलग-अलग कारीगर भी हैं, मसलन कपिल सिब्बल, अभिषेक मनुसिंघवी, जयराम रमेश, दिगविजय सिंह आदि आदि। अन्ना तुम भूखे तो रहे, जन में आवाज भी फूंकी, तंतुओं में साहस भी भरा, लेकिन संपूर्ण समाधान के मुहाने पर आकर अंश से संतुष्ट हुए। अन्ना के इन आंदोलन को कुछ इस तरह से समझें तो ज्यादा अच्छा होगा।
अन्ना अन्न-ना को फायदे:
अन्ना के भूख हड़ताल पर बैठने से आम आदमी में साहस दिखा, समस्या पर निराश होते मध्यम वर्ग में दूर से चौंधिया रही किरण आंखों में प्रवेशित होती दिखी, नेता, कार्यकर्ता, योगकर्ता, भोगकर्ता, सरकार, मीडिया, न्याय, आदि से मोह भंग होते मनुष्य का भरोसा लौटा कि अभी लोग सच्चे भी मौजूद हैं, सरकार को सर्वमान्य सर्वोच्च ताकत समझने और आत्मसात करने वालों के मन में इसे खारिज करने का माद्या आया। युवाओं ने फिल्म, फैशन, क्रिकेट से इतर भ्रष्टाचार को समस्या और समाधान दोनों को माना, जाना और रक्तवाहिनियों में क्रोध को संचारित महसूस किया, इस देश में क्रांति कभी न हो सकने का पूर्वाग्रह टूटा। नक्ललियों के प्रति सहानुभूति रखने वालों के लिए नई बात यहां आई, कि अहिंसा से भी लोकतंत्र में कुछ किया जा सकता है, मंच, मन, नंबर वन की सियासी भेड़चालों से हटकर भी कुछ हुआ। कुल मिलाकर तथाकथित प्रबुद्धों और अपने आलीशान घरों की चित्रशालाओं (ड्रॉइंग रूम) में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ गरीब जन की बात करने वालों की भी कलई खुली, वहीं हर्ष मंदर जैसे गरीब और अपराधी के बीच के अंतर को न समझने वाले सतही वक्ता, विचारक छपास भी कर्टेन ऑउट हुए। योग आसानों में छुपी सियासी चालें बेपर्दा हुईं।
अन्ना के भोजन विमुखता के नुकसान:
अन्ना हीरो द ग्रेट के इस कदम के लिए अभी उचित समय नहीं था, लोगों के जेहन में करप्शन के प्रति क्रोध तो था, लेकिन सडक़ों पर उतर थानेदार को पीट-पीट कर मार डालने का साहस नहीं था, तहसीलदार को जमीनें डकारने में बिल्डरों की थाली का राजदार के आरोपों में ऑफिसों से निकालकर जला देने की हिम्मत नहीं थी, आईएएस की घुर्र घुर्र करती गाडिय़ों को बमों से उड़ाने के हालात नहीं थे, भ्रष्टाचार को लोकाचार में तब्दील होते देखने वाले रोए नहीं थे, सफेदपोश अभी बेफिक्र कमरों में सिगरेटिया छल्ले नहीं उड़ा रहे थे। अन्ना यह अगर दो साल बाद करते, तो देश की सडक़ों पर लोग निकलते, अधिकारियों को ऑफिसों से निकालकर पीटते, थानेदारों को आग लगाकर जला डालते। अन्ना तेरा साथ पाकर लोग आजादी के लिए लड़ पड़ते। हिंसा के नफरतिया लबादे के भीतर के मोती में समाई आजादी के लिए ईंट से ईंट बजा देते। इस व्यवस्था की एक कमी नहीं सारी कमियां पूरी कर देते। मगर अन्ना तुमने जल्दबाजी कर दी, अपने जीवन की सबसे बड़ी जल्दबाजी।
लेकिन फिर भी तुम सही हो अन्ना:
इस सबके बाद भी तुम सही हो अन्ना, लेखन चिंतन में अन्ना भारत में ऐसे लोग 10 लाख हैं, जो कुछ करना चाहते हैं, ऐसे लोग 1 लाख हैं जो व्यवस्था को उखाड़ फेकना चाहते हैं, वो भी बिना किसी ऑल्टनेट के। ऐसे लोग 50 हजार हैं जो व्यवस्था से खिन्न हैं और इसका विकल्प भी रखते हैं, जिन्हे दूर से लोग नक्सली भी कहते हैं, करीब से सच्चे देशभक्त। ऐसे लोग एक हजार हैं, जो व्यवस्था के सारे खोटों को एक साथ एक ही किसी काल्पनिक रामवाण से ठीक करना चाहते हैं। और अन्ना ऐसे लोग महज 10 हैं जो क्रमश: व्यवस्था को ठीक करना चाहते हैं, जबकि ऐसा एक ही अन्ना है, जो व्यवस्था के एक हिस्से को अपने जीवन की कुर्बानी देकर सुधारना चाहता है, जिसे लोग जन लोकपाल विधेयक कहते हैं। 100 अन्ना मिलकर इस व्यवस्था के सारे दोषों को खत्म कर सकते है।
बाकी अन्नाओं तुम भी जागो:
देश के लाखों अन्नाओं साहस जुटाओ, जागो, न भागो, आओ, खाने वालों का खाओ, कुछ तो कर जाओ, नहीं तो क्या देश, दुनिया, समाज, परिवार, और यह सबकुछ जो दिखता है। हिमालय की कंदराओं में अल्लाह के भगवान रूप को खोजते योगियों, आसमान को चूमती मस्जिदों की मीनारों सो चिल्लाते अल्ला हो अकबर के मुरीदों, चर्च के घंटे पर टन टन करते भक्तों, अरदास पढ़ते सरदारों, नमो अरिहंताणौ जैनों इस पर कुछ करो। अल्लाह, भगवान, खुदा, न जाने क्या कहते हैं उसे, वह खुद ही साकार हो उठेगा वो भी तुम्हारे अंतस में कहीं और नहीं तुम्हारे अस्तित्व में।
जय हो अन्ना द ग्रेट
sakhajee.blogspot.com
Monday, April 4, 2011
लोक गाता नवसंवत्सर लोक गीत .....शुभकामना ....
- महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की
- कहते हैं कि मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ।
- हिन्दू धर्म में विकास और विध्वंस की देवी मॉं दुर्गा की उपासना की नवरात्र व्रत का प्रारम्भ इसी दिन से होता है।
- उज्जयिनी सम्राट- विक्रामादित्य द्वारा विक्रमी संवत् प्रारम्भ किया गया।
- महर्षि दयानंद द्वारा आर्य समाज की स्थापना इसी दिन की गई।

ये पंछी नहीं
लोकगायक आए हैं
कुछ प्राकृत
कुछ अप्रभंश गीत लाए हैं
चिड़ियों की जिह्वा पर
बिरहड़ा
तोतों के कण्ठ में
भंगड़ा
कौव्वों के टप्पे
ये आदिवासी तानों में
कानन पर छाए हैं
यह चकवी की धुन
किन्नरी के सुर-सी
रामचिरैया रे
बोलों में चौपाई उभरी
ये आल्हा और ऊदल के उत्सर्ग
मैना ने भारी-मन गाए हैं
सुन कोयला का ढोलरू
नवसंवत्सर लाया
पपीहे ने बारहों-मास
सावनघन गाया
ये मोनाल के सोहाग राग
शतवर्धावन लाए हैं
ये चकोर-चकोरी की
लोक-ऋचाएं
ये मयूर-मयूरी की
मेघ-अर्चनाएं
ये सारसों के अरिल्ल
सृष्टि की बांसुरी बन भाए हैं
ये इतने–सारे राग रंग
गीत कण्ठ ये ढेर-ढेर
मन्त्र-गीत
प्रीत-छन्द
ये सब इन लोकगायक कवियों के जाए हैं
ओमप्रकाश सारस्वत
Sunday, April 3, 2011
इसे क्रिकेट कहते हैं
की जीत और 28 सालों से तरसती आंखों को मिले सुकून को इस भावनाओं के ज्वारभाटे से समझा जा सकता है। सबसे बड़ी बात अपनी गाडिय़ों से निकले इस मानव गुच्छे में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या भी कम नहीं रही। इस मामले में रायपुर की जितनी तारीफ की जाए कम है। किसी और शहर के मुकाबले यहां उत्सवों को मनाने और उन पर झूमने का माहौल अपेक्षाकृत ज्यादा रहता है और इनमें महिलाओं की भागीदारी कहीं ज्यादा तारीफ के काबिल है। किसी भी भीड़ के जश्न का कोई कानून नहीं होता, बल्कि वह एक निश्चित समय के बाद जश्न से हटकर खुराफात पर उतरती है। लेकिन रायपुर में हुए इस जलसे के महा खुशनुमा अंदाज में न तो कहीं शरारत दीख पड़ती है और न ही असुरक्षा जैसी कोई बात। इतनी बड़ी खुशी को मनाने क्या पुरुष और क्या महिलाएं, सब एक संग सेलिब्रेशन के मूड में नजर आए। भीड़ को चीरती महिलाएं बेफिक्र इस जुलूस में शामिल रहीं। इसके लिए रायपुर के लोग बधाई के पात्र हैं।
Sunday, March 13, 2011
नौ साल बाद मिला इंसाफ
27 फरवरी 2002 एक ऐसा दिन जिसे गुजरात और भारत के लोग याद नहीं रखना चाहेंगे।यह वह दिन जब अयोध्या से गोधरा आ रही है साबरमती एक्सप्रेस को आग के हवाले कर दिया गया और एस 6 में मौजूद कारसेवकों को जिंदा जलाया गया.जो ना तो नक्सली थे ना आतंकवादी।और उसके बाद गुजरात में भड़का दंगा जिसे 1200 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।राजनीति अपनी जगह है लेकिन नेताओं से गुजारिश की जाती है कि वे गोधरा जैसे मामले में संवेदना बरते लेकिन ऐसा नहीं हुआ.यह एक निर्विवाद तथ्य था कि साबरमती एक्सप्रेस की एस 6 में आग बाहरी लोगों ने लगाई थी यह एक गहरी साजिश थी लेकिन कुछ लोगों ने ऐसा मानना से इंकार कर दिया ..मैं आपके सामने वो कुछ तथ्य रखूंगा जो बताने के लिए काफी हैं कि किस तरह सच्चाई पर झूठ और गलत दलीलों पर पर्दा ढका गया।लालू जी ने थोथी दलील देने वाले की बातों में आकर बनर्जी कमीशन की स्थापना की जबकि इससे पूर्व गोधरा की सच्चाई को दुनिया के सामने लाने के लिए नानावटी कमीशन की स्थापना कर दी गई थी।बनर्जी कमीशन ने यह रिपोर्ट दी कि साबरमती एक्सप्रेस में लगायी नहीं गई थी बल्कि इसमें आग लगी थी यानि साबरमती एक्सप्रेस की एस 6 में लगी आग महज हादसा थी।
अब साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग या लगायी गयी आग के लिए हादसा की जांच जिस जांच अधिकारी को दी गई थी वो थे नोएल परमार..नोएल परमार ने 200 प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिये और उसके आधार पर वो इस तथ्य पर पहुंचे कि ट्रेन में लगी आग एक गहरी साजिश थी..
नोएल परमार ने साफ बताया हैं कि साबरमती एक्सप्रेस में आग दंगाईयों ने लगाई थी जिसके उन्होंने 6 वजह बतायी हैं..
1 जैसा कि बनर्जी कमीशन की रिपोर्ट बताती हैं कि कारसेवक बोगी के अंदर खाना बना रहे थे और स्टोव में रखे तेल की वजह से पूरी बोगी में आग लगी थी..फोरेंसिक साइंस कहता हैं कि रेलवे की किसी भी बोगी में आग लगाने के लिए 60 लीटर तेल की जरूरत होती हैं .क्या यह संभव हैं कि स्टोव में रखे 1 लीटर तेल से पूरी बोगी में आग लगना संभव हैं।.बिल्कुल नहीं
2 क्या यह संभव है कि चंद मिनटों में 140 लीटर पेट्रोल इक्टठा कर लिया जाए.आपको बता दे कि घटना से ठीक एक दिन पहले गोधरा स्टेशन के पास अमन गेस्ट हाउस में दंगाईयों की मीटिंग हुई थी और प्रत्येक को काम बाटा गया था और इन्ही अभियुक्तों में कुछ ने पेट्रोल का इंतजाम रात में ही कर लिया था
3 क्या यह संभव है कि सुबह 7.35 मिनट के करीब 700 से ज्यादा भीड़ इक्टठी कर ली जाए.भीड़ का इक्टठा करना भी दंगाईयों के प्लान का हिस्सा था..
4 जब ट्रेन गोधरा स्टेशन से आगे बढ़ा तो उसे दो बार क्यों रोका गया।ये रणनीति भी दंगाईयों ने 26 फरवरी की रात को बनाई थी ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतारा जा सके.
5 जब ट्रेन को जलाये जाने की खबर के बाद फायर ब्रिगेड रवाना हुई तो रास्ते में फायर ब्रिगेड को क्यों रोका गया.
इन्हीं निष्कर्षों और 200 से ज्यादा प्रत्यक्षदर्शियों और इस क्रूरतम अपराध को देखते ही जज पी आर पटेल को 22 फरवरी 2011 को मानवता के जघन्य अपराधियों को कठोर दंड देना पड़ा।जज पी आर पटेल ने अपने फैसले में 20 को उम्रकैद और 11 को फांसी की सजा सुनाई है.
अब तक मानवता के चंद गद्दार यह कह रहे थे कि साबरमती एक्सप्रेस में आग कोई साजिश नहीं बल्कि महज एक घटना था..22 फरवरी का फैसला तिस्ता सीतलवाड़ जैसे चोचलेबाजों के लिए करारा तमाचा हैं.
एक बात और भारत में सजा सुनाने और उसे लागू करने में एक बहुत बड़ा वक्त लगता हैं.प्रश्न यह हैं कि इन जघन्य अपराधियों को अपील की कितनी छूट मिलनी चाहिए।क्यों नहीं इन्हें फांसी पर जल्द लटकाया जाए ताकि पीड़ितों की आत्मा को शांति मिल सके।
गोधरा और उसके बाद गुजरात में जो हुआ उसे किसी भी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता हैं और यह हकीकत है लेकिन उससे भी बड़ी हकीकत हैं कि अगर साबरमती एक्सप्रेस की एस 6 की बोगी या यू कहे कि अगर 56 गुनहगारों को जिंदा नहीं जलाया जाता तो गुजरात में दंगे नहीं भड़कते।अब सामान्य लोगों को चाहिए कि इस फैसले को कबूले और दिल और दिमाग को इतना मजबूत बनाए ताकि देश में फिर कभी ऐसी हिंसा ना फैले।कुछ तथाकथित बौद्धिक आतंकवाद से शिकार लोग और मानवतावादी इस फैसले की अलग व्याख्या कर रहे हैं उनसे गुजारिश हैं कि वो अब सच्चाई को स्वीकार करेंगे।कानून की चक्की भले धीरे पीसती हों लेकिन पीसती बड़ी महीन है और गोधरा के गुनहगारों के लिए यह एक सख्त संदेश हैं।यह देश हिंदू ,मुस्लिम ,सिख,ईसाई सभी का है सभी का हक बराबर का हैं .हम सदियों से साथ रहते आये है और कोई भी ताकते हमारी एकता तो नहीं तोड़ सकते...
गोल्डन ग्लोब नहीं...गोल्डन केला...अवॉर्ड्स की पूरी सूची देखें....
साल की शुरुआत से ही तमाम बॉलीवुडिया अवार्ड फंक्शन्स हो रहे हैं...और इसी सिलसिले में इनमें से सबसे अनोखे लेकिन सबसे ज़रूरी पुरस्कार बॉलीवुड को समर्पित कर दिए गए....गोल्डन केला अवार्ड्स...जी हां गोल्डन केला अवार्ड फिल्मों में सबसे बुरे, अतार्किक और बेहूदा प्रदर्शनों के लिए दिए जाते हैं....इन पुरस्कारों को ट्वेन्टी ऑनवर्ड्स मीडिया प्रदान करती है....और इस बार के पुरस्कार हालांकि आप में से बहुतों को सहमत न कर पाएं...पर चेहरे पर मुस्कान ज़रूर ले आएंगे....चलिए नज़र डालते हैं समूची लिस्ट पर...Friday, March 11, 2011
यानी सिविक सिविलिएंस
। दूसरी अब आम लोग खासों के सुधरने का इंतजार करते हुए, एक दूसरे का मुंह नहीं ताकना चाहते, वे खुद ही से जिम्मेदारी होने लगे हैं। तीसरी बात जो साबित होती है, कि सियासी दखल से परे कड़ी नकेल के साथ पुलिस से भी अच्छा काम करवाया जा सकता है। हालांकि भोपाल वाले मामले में पुलिस से ज्यादा बधाई के पात्र यहां के आम नागरिक हैं। ऐसी ही कुछ अपेक्षाएं करता हूं, रायपुर में भी जल्दी स्वयं के प्रति ईमानदारी का भाव लोगों में पैदा होगा। दरअसल व्यवस्था के ठेकेदारों (आईएएस) को पहले ऐसे हालात बनाने होंगे, जब कहीं जाकर लोगों में सुव्यवस्थापन आएगा। वैसे भी ट्रैफिक के तीन सिधांतों इफ्रास्ट्रक्चर, एजुकेशन और एन्फोर्समेंट में सबसे पहला इफ्रास्ट्रक्चर ही तो है। लेकिन स्वघोषित शाही सामंत (आईएएस) उल्टी शुरुआत करते हैं। रायपुर के लोग चूंकि सीधे हैं।
वे खुद ही से जिम्मेदारी होने लगे हैं
उल्टी शुरुआत करते हैं। रायपुर के लोग चूंकि सीधे हैं।


