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Thursday, May 5, 2011

चीनी सोच का सांचा


ओसामा का मरना हमें क्या करना। कुछ इस तरह का रवैया दुनिया के झंडाबरदार देशों का है। इस बात पर बड़ी शर्म है, कि चीन पाकस्तान को लेकर बेहद चापलूसी युक्त व्यवहार कर रहा है। आतंक को लेकर कच्ची सोच और अल्पगामी कदमों के फेवरर अक्सर ऐसा किया करते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि भारत के प्रधानमंत्री भी इस बात पर सीधी कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। जबकि यह एक ऐसा मौका है, जब अमेरिका को पूरी तरह से नैतिक रूप से कम किया जा सकता है। पाकस्तान भारत के लिए आतंक फैला रहा है, यह बात अब इतर हो गई है, वह उसके आन्नदाता अमेरिका को भी नहीं बख्स रहा। इससे पता चलता है, कि पाक किसका कितना है। चीन जो आज उड़ रहा है, चीख रहा है, पाकस्तान की कोई गलती नहीं, वह भी जान ले। अगर अमेरिका के साथ पाकस्तान कुछ हमदर्दी नहीं रख सकता तो, चीन तुम किस खेत की मूली हो। ओसामा की मौत के बाद बने अंतरराष्ट्रीय माहौल को भारत को बारीकी से परखना चाहिए। देखना चाहिए, कि इस हालात में भारत को क्या और कैसे फायदे हो सकते हैं। दुनिया का अगला दशक, 2011 से 2031 का दौर पूरी तरह से बाजर के उत्कर्ष का होगा। अमेरिका, चीन और भारत यही तीन महाशक्तियां होंगी, जो राज करेंगी। अगर इनके बीच की बाजरी लड़ाई को अगर चीन हथियारों का संघर्ष करेगा, तो नुकसान आखिर उसीका होगा। क्योंकि अमेरिका इस वक्त अपने आपको किसी पर अबलंबित न होने वाले देश के संकट से गुजर रहा है। जाहिर है, इसके सामने अलग तरह की चुनौतियां हैं। खैर जो होता है, अच्छे के लिए ही तो होता है। ओसामा से हमदर्दी के माइनों को दीर्घकालिक सोच के सांचे में ढालकर ही निकालने चाहिए।
वरुण के सखाजी

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