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Sunday, May 29, 2011

आम दिमाग के बूता नहीं चुनौती देना

वनवास के दौरान जब रावण के कोई अतेपते भी नहीं थे, जब कोई पता भी न था कि राम रावण में दीर्घंतर ठनेगी। कोई समुंदर होगा, सुग्रीव, बाली और हुनमान होंगे। यह भी नहीं पता था सीता का हरण होगा या जटायू राम के लिए शहीद होंगे। तब लक्ष्मण ने सूपर्णखा की नाक काटकर किसी सुने त्रिलोकी राजा रावण को

दे डाली थी। लक्ष्मण के पास उस वक्त कोई रावण दिमाग में नहीं था, बल्कि अपनी ईमानदारी की महाताकत और कार्यकुशलता की योजनाबद्ध यशस्वीयता के साथ ही लक्ष्मण को अपने जोश पर भरोसा था। रावण को चुनौती देने वाले लक्ष्मण न तो अतिउत्साहित थे और न ही वे किसी गफलत में ही थे। और ऐसा भी नहीं कि लक्ष्मण को उस समय राम की ओर से ही शह थी। लक्ष्मण ने जो किया वो अपने दम पर किया। यह चुनौती न तो सोचकर दी थी और न ही किसी तरह की योजना को दिमाग में ही रखकर। इस बात यहां पर कहना लाजिमी होगा, भले ही रामायण काल खत्म होने के बाद लक्ष्मण को भगवान मानते हुए सारी बातों को पूर्व निर्धारित कहने लगें। लेकिन लक्ष्मण के इस शौर्य को प्रोत्साहित करना चाहिए।
चुनौती देना और लेना दोनों ही आज के बाजारी महागुणों में शुमार तत्व हैं। लंबे अरसे तक राज्य करने के बाद अंग्रेजों ने पूरे भारत में अपनी ऐसी स्वीकार्यता शुरू हो गई थी, कि छोटी रियासतें तो कुछ बोल ही नहीं सकती थी। बड़ी को कुचल दिया जाता था। बस एक आदमी था मंगल पांडे, जिसने सबसे पहले खारिज किया। कौन अंग्रेज कैसे अंग्रेज, कोई विधाता तो नहीं हैं, कोई परमात्मा तो नहीं हैं न, कोई नियति तो नहीं हैं न। तब कैसी स्वीकार्यता। दे डाली चुनौती और अंग्रेजी हुकुमत का ताबूत बनने लगा।
नक्सली हिंसा करते हैं, विकास के कार्यों को रोकते हैं, लेकिन सलाम के काबिल हैं, कम से कम अन्याय को तो नहीं स्वीकारते। सलाम उन्हें कि वे आतंक के महापर्याय होते हुए भी आदर्शवादी विश्व की परिकल्पना करते हैं। और जो सरकारें या व्यवस्थाएं आदर्शवाद का ढोल पीटती हैं उनमें नेता और अफसरों की ऐश देखते ही बनती है। खारिज करने की क्षमता ही चुनौती देने की क्षमता का विकास करती है।
हो सकता है लंबे अरसे से आदिवासियों की तरह पीपल के पेड़ में ढिमका देव रहते हैं। ट्राइब की सात पुश्तें उस पीपल के आसपास से निकलने या वहां पर गलत काम करने से डरती रहीं, क्योंकि देव हैं। और एक वक्त ऐसा आया कि उस पीपल में देव तो नहीं लेकिन आस्था की ताकत आ गई। नतीजा पीपल के देव अब हिंसक हो गए, वे कोई भला करें न करें, लेकिन अपना हक जरूर ले रहे हैं। जिस-तिस के साथ कुछ उल्टा हुआ पीपल देव के कोप को और बल मिलता गया। एक दिन वन विभाग का अमला आया सडक़ बननी थी। पीपल काटने लगा। आदिवासियों को लगा अब देव प्रकट होकर सबको मार डालेगा, कहां कुछ हुआ। पीपल को काट फेंका राष्ट्रीय राज्यमार्ग बन गया। अरबों का व्यापार बढ़ा, सैकड़ों की जिंदगी बदली। पीपल देव थे वरना सदियों से वहां।
खारिज करिए। चुनौती दीजिए। लोगों को बताइए आप क्या हैं। इसके लिए कई बार आप पर आरोप लगेंगे, आप आतार्ता, बदमिजाज, गैर वाजिब बात करने वाले और कई बार आपके खिलाफ षडयंत्र भी होंगे। लेकिन आप खारिज करते जाइए।
ईश्वर को पाने की पहली सीढ़ी भी खारिज करना ही तो है, आपने खारिज किया कि जो दिख रहा है संसार वह नहीं है। जो समझ आ रहा है, वह सत्य नहीं है। सत्य ईश्वर है, कहीं दिखाई नहीं दे रहा। लेकिन मिल गया। कैसे खारिज करने और संसार के अस्तित्व को चुनौती देने से।
-सखाजी

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