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Saturday, September 1, 2012

नहीं बचाएगा तुम्हे कोई...

नित नई होती तकनीक अगर गुमान करे तो यह उसका हक है। कल तक ब्लैक एंड वाइट से आज की रंगरंगीली दुनिया के निर्माण में इसका रोल अहम है। तकनीक अपनी शक्ति को लेकर जितनी भी इतराना चाहे, वह इतरा सकती है। हमारे जीवन को आसान बनाने में इसकी भूमिका को शब्द दो शब्द में कहना तकनीक को मुहल्ला विचार मंच की ओर से दिए जाने वाली कोई उपाधिभर होगी। जबकि तकनीक की भूमिका इतनी वृहद है कि इसे नोवल प्राइज या संसार का और भी कोई बड़ा पुरस्कार दिया जाए तो भी कम ही लगेगा। मीलों दूर बैठे लोगों से बातें, समंदरों की दूरियां घंटों में पार करने या फिर अंतरिक्ष की बारीकियों को खंगालने की बात हो। तकनीक तुम कमाल हो। तकनीकी को दरअसल कई बार मोबाइल फोन से नापा जाता है। यानी नई तकनीकी तो स्मार्ट फोन, तो नई तकनीक यानी एंड्रायड। लेकिन तकनीकी इससे भी वृहद है। तकनीक हमारे जीवन की एक तरह से पयार्य सी है। इतनी करीबी, इतनी दासी, इतनी सेवक, इतनी जरूरी कि शायद मानव निर्मित वस्तुओं में सबसे ज्यादा उपयोगी। तकनीकी भले ही डिवाइस पर अवलंबित हो, किंतु मनुष्य के मस्तिष्क के भीतर छुपी कलाओं से कमतर नहीं है। यहां तक कि वह कला को भी एक दिन चैलेंज कर सकती है। कला बेचारी सालों से इंसान की संगिनी बनी हुई कभी सुरों से झरती, तो कभी कलम से टपकती रही है। न इसे डिवाइस चाहिए न कोई ऐसा जरिया, जिसके बगैर यह प्रस्फुटित न हो सके। कला का इतना तक कहना है कि तकनीकी को जन्म तक उसी के मौसेरे, चचेरे भाइयों ने दिया है। कला का एक यह दावा है, तो तकनीक का भी अपना दंभ है कि वह कला को भी पछाड़ देगी। हो भी सकता है वह अपने मंसूबे में कामयाब हो जाए। कला पीछे बैठ जाए। इससे कोई नफे नुकसान की बात भी नहीं होगी। मगर तकनीक का दंभ नहीं टूटेगा। तकनीक से क्या कुछ मुमकिन नहीं है। एक मोबाइल कंपनी के एड में तो यह तक बताया जाता है, कि एक व्यक्ति अपने ऑफिस से अचानक एक पार्टी में सिर्फ मोबाइल के बूते चला जाता है। वह जैकेट स्टोर खोजता है, फिर गिटार बजाने की प्रैक्टिस करता है और चंद मिनटों में पार्टी में हुंदड़ाकर वापस अपने ऑफिस में बेहद ही सज्जन किस्म के एक्जेक्यूटिव की तरह काम करने लगता है। यह मोबाइल से ही मुमकिन हुआ था। वह तो खैर गिटार था, अगर कोई और भी वाद्य यंत्र होता तो भी शायद इंसान चंद मिनटों की मंोबाइल प्रैक्टिस से सीख सकता है। तकनीक अपने साथ एक संसार लेकर चल रही है। तेजी से अपना साम्राज्य फैला रही है। देश दुनिया के हर तत्व की अगुवा और प्रतिनिधि बन रही है। इसमें बेशक नेतृत्व क्षमता है भी तो सही, किंतु फिर भी इसका बड़बोलापन ठीक नहीं है। तकनीक चीखती है चिल्लाती है, अपनी क्षमताओं पर नाज करती है, अपनी शक्तियों को बिखेरती है और प्रभावित करती है, अन्य तत्वों को हाईजेक करती है। अपने में समाहित करती है। कला के पास यह हुनर नहीं। तकनीक ने तबला वादन, गायन, लेखन, वाचन, मंचन, अभिनय समेत कमोबेश सभी कलाओं को कब्जा सा लिया है। कोई बात नहीं। इन सबने तकनीक की अधीनता स्वीकार भी कर ली। सहज और स्वभाविक जो हैं। तकनीक का दंभ आगे बढ़ा और आगे बढ़ा तो कला को चुनौति भी दे दी जाएगी। किंतु कला का एक ही जवाब तकनीक को मूक कर सकता है। वह जवाब है तकनीक तुम श्रेष्ठ हो, संसार को आसान बना रही हो, हम पर भी शासन कर रही हो, किंतु याद रखना। तुम अपने आपको ही खा जाती है। छत्तीसगढ़ की लोक कला को बचाने के लिए 108 संगठन बनेंगे, किंतु नोकिया 3310 बचाओ समिति कभी नहीं बनेगी। तुम नित नई हो, तुम चंचल हो, तुम निर्मल हो, तुम अच्छी हो, किंतु दंभी हो। तुम्हें बचाने के लिए कभी आईफोन-3 बचाओ समिति कभी नहीं बनेगी। कोई पेट वाली टीवी बचाओ आंदोलन नहीं होगा। कोई अन्ना तुम्हारे पुरान वर्जन को करप्शन की भेंट चढऩे से रोकने खानपीना नहीं छोड़ेगा। हां मगर कला को पूरा भरोसा है उसके लिए आदिकाल से भावीकाल तक यह सिलसिला जरूर चलता रहेगा। वरुण के सखाजी

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