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Friday, August 8, 2008

ओलम्पिक आज से......

आज से चीन की राजधानी बीजिंग में दुनिया के खेलों के महाकुम्भ ओलम्पिक खेलों का शुभारम्भ हो रहा है। इस बार के ओलम्पिक खेल इस मायने में महत्वपूर्ण हैं कि चीन इन खेलों के सफल आयोजन के द्वारा अपनी छवि दुनिया के सामने सुधारना चाहता है, वहीं दूसरी ओर तिब्बतियों के लगातार विरोध प्रदर्शन के कारण पूरी दुनिया में चीन में मानवाधिकारों को लेकर भी बहस चालू हो गई है।
हालांकि इस बात पर भी चीन ने तिब्बत को लेकर अपना रुख नहीं बदला है और तिब्बत को अपना आतंरिक मामला बताया है पर पूरी दुनिया जानती है कि तिब्बत का सच क्या है और ज़ाहिर तौर पर इस से कम्युनिस्ट चीन कहीं ना कहीं साम्राज्यवादी चीन के तौर पर उभरा है। पूरी दुनिया में ओलम्पिक मशाल के घूमने के दौरान जिस तरह के विरोध प्रदर्शन हुए और जिस तरह ल्हासा और तिब्बत के अन्य इलाको में चीन ने दमनकारी कार्यवाहियां की उससे दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में आक्रोश व्याप्त है। आशंका जतायी जा रही है कि ओलम्पिक के दौरान भी इसी तरह के बल्कि इससे भी व्यापक पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं।
अब बात ओलम्पिक की......तो कहा जाता है कि दुनिया के पहले ओलम्पिक खेल ईसा के पहले सन ७७४ में एथेंस में हुए पर आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आगाज़ १८९६ में अथेन्स में हुआ और उसके बाद से ये हर ४ साल पर आयोजित किए जाते हैं। तब से अब तक २८ बार यह मेला लग चुका है और इस बार यह उन्तीस्वा ओलम्पिक है।




इन खेलो में जहाँ दुनिया भर के २०० देशों के हजारों खिलाड़ी भाग ले रहे हैं, करीब ३०२ इवेंट्स कराये जाएँगे .... इन देशों में सबसे बड़ी टीम अमरीका की है, जिसमे करीब ६०० सदस्य हैं।


खेलों के लिए जो प्रतीक डिजाईन किया गया है उसे डांसिंग बीजिंग का नाम दिया गया है, इसमे परम्परागत लाल चीनी मुहर दिखाई गई है.... वहीं इसके शुभंकर के तौर पर पाँच शुभ चीनी गुडिया दिखाई गई हैं जिन्हें चीनी भाषा में फुवा कहा जाता है। ये शुभंकर मछली, बड़ा पांडा, अग्नि, तिब्बती अन्टीलोप और स्वलो को प्रर्दशित करते हैं। इनका नामकरण बैबेयी, जिंगजिंग, हुअन्हुअन, यिंगयिंग और निनी रखा गया है।


खेलों के लिए चीन ने बीते ५ सालों में अपना सब कुछ झोंक दिया है.......चीन में बने शानदार स्टेडियम और इमारतें इसकी गवाही देती हैं पर इस बार के ओलंपिकों के साथ चीन में मानवाधिकारों को लेकर जिस तरह के सवाल उठे हैं वो बेचैन करने वाले हैं। तिब्बत के विद्रोही भी दुनिया भर में चीन और ओलम्पिक विरोधी प्रदर्शन कर रहे हैं। विडम्बना है कि ओलम्पिक को दुनिया में शान्ति, एकता, सदभाव और स्वस्थ भावना प्रतीक माना जाता है और ये ८ अगस्त को शुरू हो रहे हैं ..... ९ अगस्त को १९४५ में नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। खैर ओलम्पिक के पाँच छल्ले जो पाँच महाद्वीपों को दिखाते हैं और उनमे शान्ति, बंधुत्व और सहकार की स्थापना की बात करते हैं, हम दुआ करें की चीन के लिए भी नया संदेश लायें और तिब्बत पर चीन गंभीरता व सदभावना से विचार करे।


Wednesday, August 6, 2008

दुनिया एक दिन ......... बदलेगी

आज ६ अगस्त है ....... हम में से नहीं मालूम कितने लोगों को याद है पर आज ही के दिन १९४५ में जापान के शहर हिरोशिमा पर दुनिया का पहला परमाणु बम गिराया गया था। इसके दो दिन बाद जापान के दूसरे शहर नागासाकी पर भी ऐसा ही हमला हुआ था ............ हिरोशिमा में उसी समय 118,661 लोग मारे गए थे और नागासाकी में 74 हज़ार लोग मारे गए, यही नहीं इसके बाद फैले रेडियोधर्मी विकिरण में न जाने कितने अपंग हुए, कितने बीमार और कितने मरे ! आज तक वहाँ बच्चे बीमार और अपंग पैदा होते हैं ! इस पर शायद उन लोगों को भी अफ़सोस रहा जिन्होंने ये किया - करवाया और आज भी दुनिया इस दिन को याद कर के आंसू बहाती है.......... पर शायद इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि आज भी दुनिया भर में लड़ाई है, युद्ध है, हमले हैं - जवाबी हमले हैं और शायद उस वक़्त से कहीं ज्यादा .............



आज उस दुर्भाग्यशाली दिन की बरसी है ........ ६३वी बरसी ........ तब केवल एक देश के पास परमाणु बम था आज तकरीबन १६ मुल्कों के पास ...... तब विश्व युद्ध हुआ था...... आज पूरे विश्व में युद्ध हो रहा है ! वाकई हम काफ़ी तरक्की कर चुके हैं .................... आज CAVS संचार में हम प्रस्तुत कर रहे हैं इस विभीषिका से जुड़ी कुछ जानकारियाँ, तसवीरें और दस्तावेज़......


सबसे पहले कुछ तसवीरें जो बयान करेंगी उस दर्दनाक मंज़र को





वह बम जिसने विध्वंस किया .....

बम धमाके का दृश्य
हमले के बाद का हिरोशिमा

एक सहायता शिविर का दृश्य









मेरा क्या कुसूर था ?
ये तब से थमी हुई है और लाखों लोगों की दुनिया भी !
अब प्रस्तुत है कि उस के अगले दिन अमेरिका के समाचार पत्रों में क्या छपा था...
अमरीका के एक हवाई जहाज़ ने जापान के हिरोशिमा शहर पर पहला परमाणु बम गिराया है.
अमरीकी राष्ट्रपति हैरी. एस. ट्रूमैन ने अटलांतिक महासागर में "आगस्ता" जहाज़ी बेड़े से यह घोषणा करते हुए कहा है कि यह बम 20 हज़ार टन टीनटी क्षमता का था और अब तक इस्तेमाल में लाए गए सबसे बड़े बम से दो हज़ार गुना अधिक शक्तिशाली था.
हिरोशिमा शहर पर छाए धूल के घने बादल की वजह से अभी तक नुक़सान का ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना संभव नहीं है.
हिरोशिमा जापानी सेना को रसद की आपूर्ति करने वाले कई केंद्रों में से एक है।
यह बम स्थानीय समयानुसार 8.15 बजे "इनोला गे" कहे जाने वाले एक अमरीकी विमान बी-29 सुपरफोर्ट्रेस से गिराया गया.
विमान के चालकदल का कहना है कि उन्होंने धुएँ के बादल और तेज़ी से फैलती हुई आग देखी है.
राष्ट्रपति का कहना है कि परमाणु बम ने दुनिया की मूलभूत शक्तियों को इकट्ठा करने का काम किया है, और इस बम के द्वारा परमाणु उर्जा के इस्तेमाल से सबसे पहले हथियार बनाने की दौड़ में भी हमने जर्मनी को पछाड़ दिया है.
राष्ट्रपति ट्रूमैन ने चेतावनी देते हुए कहा है कि सहयोगी देश जापान की युद्ध करने की क्षमता को पूरी तरह से नष्ट कर देंगे.
राष्ट्रपति ने कहा कि 10 दिन पहले पॉट्सडैम घोषणा जारी की गई थी जिसमें जापान को बिना शर्त आत्मसमर्पण करने को कहा गया था, यह उसके लिए भारी विनाश से बचने का आख़िरी मौक़ा था.
राष्ट्रपति ने कहा था,"अगर अब वो हमारी शर्तों को नहीं मानते है तो उन्हें आसमान से विनाश की ऐसी बारिश का सामना करना पड़ेगा जैसी कि पहले कभी नहीं हुई. इसके बाद समुद्र और ज़मीन के रास्ते ऐसे हमले होंगे जैसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखे, लेकिन यह हमले उसी युद्ध क्षमता का परिचायक होंगे जिससे वो अच्छी तरह से परिचित हैं."
विंस्टन चर्चिल की जगह ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने क्लीमेंट ऐटली ने हाउस ऑफ कॉमंस में संसद सदस्यों को चर्चिल का बयान पढ़ कर सुनाया है.
इस बयान में कहा गया है कि परमाणु परियोजना इतनी अधिक प्रभावशाली है कि सरकार का मानना है कि इस संबध में शोध किया जाना चाहिए और अमरीका के परमाणु वैज्ञानिकों के साथ मिल कर जानकारी का आदान-प्रदान किया जाना चाहिए.
चूँकि ब्रिटेन जर्मनी के बमवर्षक विमानों की पहुँच में था, परमाणु बम बनाने के कारखाने अमरीका में लगाने का निर्णय लिया गया था.
इस वक्तव्य में आगे कहा गया है,"प्रभु की कृपा से ब्रिटेन और अमरीकी प्रयासों ने जर्मनी के सभी प्रयासों को पीछे छोड़ दिया है. हालांकि जर्मनी के प्रयास भारी पैमाने पर किए गए थे, लेकिन फिर भी वो पीछे रह गए. यदि यह शक्ति जर्मनी के पास होती तो वो कभी भी युद्ध के नतीजों को बदल सकता था."
चर्चिल के बयान में यह भी कहा गया कि जर्मनी की प्रगति को रोकने के लिए क़ाफी प्रयास किए गए, जिनमें उन कारखानों पर हमले करना भी शामिल था, जहाँ परमाणु बम के दूसरे हिस्से बनाने का काम होता था.
उन्होंने अपने व्यक्तव्य के अंत में कहा है,"हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि ये प्रभावशाली हथियार देशों के बीच शांति पैदा करने में सहायक होंगे और पूरे विश्व पर कहर बरपाने के बजाय वैश्विक संपन्नता का स्रोत बनेंगें."
( आज भी वही अमेरिका दुनिया में शान्ति लाने के लिए युद्ध कर रहा है.....)
अब कुछ तथ्य ....


  • हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम को पूर्व राष्ट्रपति रुज़वेल्ट के सन्दर्भ में "लिटिल ब्वाय" के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस बम के कारण 13 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में तबाही फैल गई थी।
  • शहर की 60 प्रतिशत से भी अधिक इमारतें नष्ट हो गईं थीं।
  • उस समय जापान ने इस हमले में मरने वाले नागरिकों की आधिकारिक संख्या 118,661 बताई थी।
  • बाद के अनुमानों के अनुसार हिरोशिमा की कुल 3 लाख 50 हज़ार की आबादी में से 1 लाख 40 हज़ार लोग इसमें मारे गए थे।
  • इनमें सैनिक और वह लोग भी शामिल थे जो बाद में परमाणु विकिरण की वजह से मारे गए। बहुत से लोग लंबी बीमारी और अपंगता के भी शिकार हुए.
  • तीन दिनों बाद अमरीका ने नागासाकी शहर पर पहले से भी बड़ा हमला किया.
    इस बार गिराए गए बम का नाम विस्टन चर्चिल के सन्दर्भ में "फ़ैट मैन" रखा गया था और इसका वज़न लगभग 4050 किलो था।
  • नागासाकी शहर के पहाड़ों से घिरे होने के कारण केवल 6।7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही तबाही फैल पाई.
  • लगभग 74 हज़ार लोग इस हमले में मारे गए थे और इतनी ही संख्या में लोग घायल हुए थे।
  • दो परमाणु हमलों और 8 अगस्त 1945 को सोवियत संघ द्वारा जापान के विरुद्ध मोर्चा खोल देने पर, जापान के पास कोई और रास्ता नहीं बचा था।
  • जापान ने 14 अगस्त 1945 को मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

अब अटल विहारी बाजपेयी की हिरोशिमा पर एक कविता जो मुझे बहुत संवेदनशील कर देती है .......

हिरोशिमा की पीड़ा

किसी रात को
मेरी नींद अचानक उचट जाती है,
आँख खुल जाती है,
मैं सोचने लगता हूँ कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था:
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण नरसंहार के समाचार सुनकर,
रात को सोये कैसे होंगे?.... क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही,
यह अनुभूति हुई कि उनके हाथों जो कुछ हुआ,
अच्छा नही हुआ ?
यदि हुई, तो वक्त उन्हें कटघरे में खडा नही करेगा।
किंतु यदि नही हुई तो इतिहास उन्हें कभी
माफ़ नही करेगा।

अटल बिहारी बाजपेयी ( १९९५ )

एक कविता अज्ञेय की भी दिमाग में गूंजती है जो हिरोशिमा पर ही है पर अभी याद नहीं पड़ती ....... निवेदन है कि यदि किसी सुधि पाठक के पास वो कविता हो तो उपलब्ध कराने की महान कृपा करें !

बाकी यह कि मुझे पूरी आशा है कि ये प्रयास जो केव्स संचार की टीम की ओर से किया गया .... दुनिया को बदलने के लिए खींची गई बड़ी लकीर का एक छोटा बिन्दु बन पाएगी ...... इतना भी हो तो यह सब सार्थक है .... फिलहाल हम आज का दिन और यह हफ्ता समर्पित करतें हैं उस दिन को ......... दुनिया की शान्ति को ...... आमीन !

http://www.pcf.city.hiroshima.jp/top_e.html इस वेब पन्ने को ज़रूर देखें ......

अंत में एक बार फिर कि ये हफ्ता हम समर्पित करते हैं दुनिया की शान्ति को ...... कि फिर ऐसा कभी न हो ..... हम इस सप्ताह अपने ब्लॉग का हेडर का रंग हल्का नीला कर रहे हैं जो शान्ति का प्रतीक है और इस हफ्ते प्रयास होगा कि रोज़ शान्ति और अहिंसा पर कुछ सामग्री दे पाएं ....... आप सबके लेख-कविता आदि भी सादर आमंत्रित हैं !

Tuesday, August 5, 2008

Welcome my new friends

Dreams are what? -- An insight of your persona. They help you in achieving what might be quite difficult if you look otherwise. What`s my dream. If anybody would have asked me this question a year back I might have fallen short of words and may be you could have found me guessing. But today I am very clear about my goals and especially my dreams. I know where I have to reach and for this all thanks to Makhanlal University. The university has basically given me confidence, dareness and an attitude to survive in the media industry. So I wish for all the new students of my CAVS that they also get a bright future ensuring immense success in their lives.

Enjoy yourselves considering the fact that you are enjoying your dreams, then I can guarantee that you will never distract nor would ever fail.

I wish all the new chickens a bright future ahead as now the eggs have hatched and lets see who all will evolve out as ugly ducklings or transform themselves into beautiful swans.

God bless you all.

If anybody wants to contact me--
Devika Chhibber
F-104, Sector-27, Noida (UP)
Contact No.- 09310953590
devikachhibber@gmail.com

Kishore – Kabhi Alvida Na Kehna


Versatile singer and a man of different moods Kishore Kumar or otherwise called `Kishor Da` would have celebrated his 79th birthday today. An actor, playback singer and comedian Kishore Kumar still reign the industry`s heart and also those who still cherish his melodious voice. His voice was like a fresh air for all those who understood his vivacious creations. His artistic voice was like a mystic appeal that generated scores of waves for those interested in music and genuineness. The artist had always delivered his best be it his musical display or his artistic capabilities. He was surely a man who was ahead of his time.

He was born in Khandwa (MP), his father Kunjalal Ganguli was a pleader, an advocate and mother Gouri Devi was a simple housewife who belonged to a wealthy family.

His was the voice that sang unforgettable numbers like the joyous 'Paanch rupaiya baara aana', the soulful 'Zindagi ka safar', the romantic 'Pal, pal dil ke pas' and the foot tapping 'Eena meena deeka' that has people doing the twist even 50 years later. Mere Sapno Ki Rani and Roop Tera Mastana, which became smash hits are one of many which we all humm in our private moments. U can easily check his remix songs on any of the charts. Such was his profoundness for music that the scores are still relishable by the younger generation. Once music director Anu Malik regarded him by saying, "One can only copy him, none can innovate like him,"

However, to call Kishore Kumar only a singer would be underestimating his talent. He was a multi-faceted personality who was at once a lyricist, composer, producer, director, screenwriter and scriptwriter. And in all these areas he has left his unique mark. He is an idle for all the music directors in our country today.

Noticeable fact: Anand originally was supposed to star Kishore Kumar and Mehmood but due to some misunderstandings between him and Hrishikesh Mukherjee due to which the idea was dropped and new stars Rajesh Khanna and Amitabh Bachchan were casted.

Etymology

He has sung in many languages including Marathi, Assamese, Gujarati, Kannada, Bhojpuri, Malayalam and Oriya.
He holds the record for most number of Filmfare Awards won for Best Male Playback Singer.
His first film as an actor was Shikari (1946), first song Marne ki duayen kyon mangu for the film Ziddi (1948
First filmfare as Male playback singer for Roop Tera Mastana.
He was a genius when it came to singing be it roop tera mastana, Humein aur jeene ki, Saagar Kinare or the energetic Khaike Paan Banaras Wala

And as one song sung by him, states itself….
Chalte Chalte mere ye geet yaad rakhna……. Kabhi alvida na kehna-kabhi alvida na kehna

Kishore Kumar We wish you a Very Happy Birthday You live forever with us in your music.....................

स्वागत ...

महीना है अगस्त का..... और वक़्त है नए पंछियों के आगमन का और उसी सिलसिले को जारी रखते हुए हमारे विभाग में भी नए पंछियों का आगमन हो गया है ..... अलग अलग प्रान्तों, शहरों और संस्कृतियों से आने वाले ये नए पंछी भले ही अलग अलग बोलियों में चहकते हो पर बोलियाँ बदलने से भावना नहीं बदलती ........ ये सब एक साथ रहेंगे एक घोंसले में जो है केव्स ..... दृश्य श्रव्य अध्ययन केंद्र और इस बड़े वृक्ष का नाम है माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय !
अलग अलग राज्यों से आए और विभिन्न बोलियाँ बोलने वाले ये हमारे केव्स परिवार के नए सदस्य उम्मीद है कि विभाग को एक मिनी इंडिया या छोटा भारत बना देंगे ....... जहाँ रंग रूप, भेष - भाषा अलग होते हुए भी हम सब एक हैं एक दूसरे के लिए हैं ! जब तक यहाँ रहेंगे एक परिवार की तरह रहेंगे ...... लड़ाई झगडा होगा तो मान मनुहार भी .... और जब आंखों में आंसू लिए विदा होंगे तो भी एक दूसरे के साथ रहेंगे नैतिक और मानसिक रूप से !
हानि लाभ ...... सुख दुःख हर क्षण में साथ रहेगा केव्स ये शपथ लें और अच्छे पत्रकार बनें ...... क्यूंकि आप सब शायद इसीलिए घर से दूर आयें हैं इस नए परिवार में और हम यकीन दिलाते हैं कि ये आपका हमेशा साथ देगा ...... क्यूंकि परिवार हमेशा साथ रहता है !
बाकी बस यही कि हमेशा गुरुजनों का सम्मान करें ........ सीनिअर्स को पराया ना समझे और आपस की एकता कभी खंडित ना होने दें ................ एक दिन आप सब अपने माता पिता, गुरुजनों, विभाग का, देश का, पत्रकारिता और सबसे बढ़कर मानवता का सर ऊंचा कर दें यही हम सबकी शुभ कामना है !
आप सबका केव्स में स्वागत है ........ आशा है ये घर से दूर एक और घर बन पायेगा !
तो आज हम केव्स के सभी पूर्व विद्यार्थी और चिर परिवार जन अपनी गौरवशाली परम्परा आपको सौंपते हैं और निश्चिंत होते हैं कि आप इसके योग्यतम उत्तराधिकारी हैं !
और कुछ कहने की जगह साहिर लुधियानवी का एक गीत जो नया दौर फ़िल्म में भी था ....... ये सब कुछ बयान करता है ,

साथी हाथ बढ़ाना
एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना।
साथी हाथ बढ़ाना।
हम मेहनत वालों ने जब भी, मिलकर कदम बढ़ाया
सागर ने रास्‍ता छोड़ा, परबत ने सीस झुकाया
फ़ौलादी हैं सीने अपने, फ़ौलादी हैं बाँहें
हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें
साथी हाथ बढ़ाना।
मेहनत अपने लेख की रेखा, मेहनत से क्‍या डरना
कल गैरों की खातिर की, आज अपनी खातिर करना
अपना दुख भी एक है साथी, अपना सुख भी एक
अपनी मंज़‍िल सच की मंज़‍िल, अपना रास्‍ता नेक
साथी हाथ्‍ा बढ़ाना।
एक से एक मिले तो कतरा, बन जाता है दरिया
एक से एक मिले तो ज़र्रा, बन जाता है सेहरा
एक से एक मिले तो राई, बन सकती है परबत
एक से एक मिले तो इंसाँ, बस में कर ले किस्‍मत
साथी हाथ बढ़ाना।


मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com
9311622028

केव्स पताका फहराओ ......... शुभकामनाएं

हर्ष और गौरव दोनों के ही अनुरूप विषय है यह कि हमारे विभाग के १६ होनहारों का चयन जी न्यूज़ के आने वाले छत्तीसगढ़ न्यूज़ चैनल के लिए हुआ था और वे सभी रायपुर में ज्वाइन कर चुके हैं और आज से अपना काम शुरू कर देंगे या कर चुके होंगे। हर्ष की बात ये है कि सभी अत्यन्त प्रतिभाशाली हैं और योग्यता अनुरूप इन्हे बड़े नेटवर्क में काम मिला और गर्व का विषय यह कि विश्वविद्यालय में इतने बड़े नेटवर्क में कैम्पस चयन के द्वारा चयनित होने वाली यह रिकार्ड संख्या है ....... सो विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाने वाले इन केव्स वीरों को बधाई और इनके पत्रकारिता के उज्जवल भविष्य के लिए पूरे केव्स परिवार की ओर से शुभकामनाएं ........ ईश्वर करे कि ये सभी पत्रकारिता के दिन पर दिन स्वरुप में सुधार लायें और कीर्तिमान गढे....................
साथ ही सबसे ज़्यादा बधाई के पात्र हैं डॉ अविनाश बाजपई और डॉ श्रीकांत सिंह

Saturday, August 2, 2008

एक युग बीता ......




१८ मई, 2008 की रात, जगह थी नॉएडा के सेक्टर १२ के मेट्रो हॉस्पिटल का क्रिटिकल केयर सेंटर ......... मैं शांत और स्तब्ध खडा एक युग को अपने अवसान की ओर जाते देख रहा था........ देख रहा था एक भीष्म को शैया पर पड़े .... और सोच रहा था कि हाँ ये वाकई एक युग का अंत है। मैं तो मैं हूँ ही और यहीं हूँ पर वो युग आज बीत गया, भीष्म आज इच्छा मृत्यु को प्राप्त हो गया ........ और वो भीष्म थे हरकिशन सिंह सुरजीत...... भारतीय वामपंथ के पितामह ! मैं तब नोइडा में एक अदद मीडिया की नौकरी के लिए मन मार रहा था और तभी पता चला कि सुरजीत जी मेट्रो में भरती हैं...... पुराना सोशलिस्ट मन जोर मार गया और रात के ९ बजे मोटर साइकिल का हैंडिल अपने आप ही मुड गया मेट्रो हॉस्पिटल की ओर .... गेट पर गार्ड से पूछा कि सुरजीत जी यहीं भर्ती हैं ...... सर हाँ में हिला इशारा किया रिसेप्शन की ओर , रिसेप्शन पर कहा गया कि ऊपर दूसरी मंजिल पर क्रिटिकल केयर सेंटर में हैं ! ऊपर पहुंचा तो अजीब सी शान्ति मिली, बहुत भीड़ भाड़ नहीं, कोई उत्साही समर्थक नहीं; ना ही पार्टी नेताओं का जमावडा ....... सिर्फ़ दो घरवाले और लुधियाना से आए दो रिश्तेदार ! पहले बाहर बैठने को कहा गया तो मुलाक़ात हुई सुरजीत जी के बड़े बेटे से जो ब्रिटेन के ग्लासगो शहर से आए थे और आजकल वही रहते हैं ........ पता चला कि स्थिति ज्यादा नाज़ुक है ....... सुरजीत जी कोमा में हैं ही और फेफडे तथा गुर्दे दोनों ही काम नही कर रहे थे। उनके रिश्तेदारों से भी उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ चर्चा हुई और बेशक वे उनके राजनीतिक जीवन के बारे में बहुत नही जानते थे पर उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में ज़रूर जानकारी मिली।


तभी बाहर आए उनके पौत्र जो उनकी देखरेख कर रहे थे ....... मेरे ये बताते ही कि छात्र जीवन में स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया से जुडा रहा था तुंरत उन्होंने कहा कि आप साथ आयें और मुझे अन्दर ले गए, सामने की शैया पर मैंने वो देखा जो अब तक किताबो में पढा था ........ एक युग का अंत ! बिस्तर पर तमाम तरह की नलियों और उपकरणों के बीच में कुछ साँसे संघर्ष कर रही थी ....... पहली बार सुरजीत जी को बिना पगड़ी के देखा, देख रहा था एक युग को अचेतन अवस्था में और याद कर रहा था जब पहली बार उनको लखनऊ में और फिर सैकडो बार टीवी पर देखा था।


जितना जानता हूँ उनके बारे में वो सब आज याद आ रहा है क्यूंकि आज १ अगस्त २००८ को अब वे हमारे बीच नहीं हैं ........... एक आम नागरिक के तौर पर हम सब उनके बारे बस यही जानते हैं कि वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) के भूतपूर्व महासचिव और सबसे बुजुर्ग कम्युनिस्ट थे, कई लोग उन्हें वयोवृद्ध कामरेड के या कामरेड सुरजीत के नाम से भी जानते थे। उनको लेकर कई विवादित मुद्दे भी रहे और बिल्कुल ये दूसरो से और भीड़ से अलग होने की कीमत भी है कि आपको प्रसिद्द होने के साथ विवादित भी होना पड़ेगा। कामरेड सुरजीत का जन्म २३ मार्च १९१६ को जालंधर जिले के बुन्दाला में एक बस्सी जाट परिवार में हुआ, इसे संयोग कहें या विधि की भगत सिंह के इस कट्टर अनुयायी का जन्म १९२६ में उसी दिन हुआ जिस दिन १९३१ में भगत सिंह को फांसी दी गई। १९३० में सुरजीत ने किशोरावस्था में ही भगत सिंह की नौजवान भारत सभा की सदस्यता ले ली और आज़ादी की क्रांतिकारी आन्दोलन में कूद पड़े। २३ मार्च १९३२ को भगत सिंह के पहले शहादत दिवस पर सुरजीत ने होशियारपुर कचहरी परिसर में तिरंगा लहरा दिया जिसमे इन्हे दो गोलियाँ मारी गई, अदालत में पेश किए जाने पर जज को इन्होने अपना नाम लन्दन तोड़ सिंह बताया।


रिहाई के बाद सुरजीत पंजाब के साम्यवादियों के संपर्क में आए और १९३६ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली, १९३८ में सुरजीत किसान आन्दोलन से जुड़ गए जब पंजाब किसान संघ की नींव पड़ी और वे उसके महासचिव बनाए गए। उसी साल उन्हें ब्रिटिश सरकार ने पंजाब से बाहर जाने का फरमान सुना दिया, यहाँ से वे पहुंचे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और वहां से चिंगारी नाम की इंकेलाबी पत्रिका निकालने लगे। तभी द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और उनको भूमिगत होना पड़ा। फिर उन्हें गिरफ्तार करके लाहोर किले में क़ैद कर दिया गया। १९४४ में वे वहाँ से रिहा हुए और दोबारा किसान आन्दोलन में जुट गए। तभी देश आजाद हो गया ....... इस दौरान बंटवारे को लेकर हुए दंगो में हिंसा रोकने और सदभाव फैलाने की सुरजीत की कोशिशों को लोग आज भी याद करते हैं। १९५४ में भाकपा के तीसरे अधिवेशन में वे पार्टी की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में चुने गए। वो इन पदों पर १९६४ में पार्टी के टूटने तक रहे फिर १९६४ में विवादित घटनाक्रम में भाकपा मार्क्सवादी की स्थापना हुई और तब से अप्रैल २००८ तक वे पार्टी के वरिष्ठतम क्रम पर रहे। यही नही पिछले दस सालो में गठबंधन की राजनीती में भी सुरजीत हमेशा धुरी बने रहे। अप्रैल २००८ में गिरते स्वास्थ्य की वजह से सुरजीत ने पार्टी के तमाम पदों से इस्तीफा दे दिया।


१९६२ में (कथित साम्यवादी) चीन के हमले के दौरान चीन का समर्थन करने वाले नेताओं में सुरजीत भी शामिल थे और ये विवाद जीवन पर्यंत उनके साथ जुड़े रहे। सुरजीत का ये कदम उनके पूरे राजनैतिक जीवन का सबसे ग़लत कदम माना जा सकता है पर फिर भी इसे सबसे दुस्साहसिक कदम भी कहेंगे ....... ऐसा दुस्साहस सुरजीत हमेशा करते रहे !
सुरजीत उन साम्यवादियों में रहे जो विवादित तो रहे पर कई मामलो में उनके विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। वैसे भी कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नहीं पर उसके कुछ महान काम उसकी तमाम गलतियों पर भारी पड़ते हैं। उनका दुस्साहस यह भी था कि एक ज़बरदस्त विवाद की आधार भूमि पर एक नयी पार्टी बना दी और आज वो देश की सबसे बड़ी साम्यवादी राजनैतिक पार्टी है .......... ये श्रेय उनसे नहीं छीन सकते हम .......... हम में से कितने लोग एक झंडा फहराने के लिए सीने पर गोलियाँ खाने को तैयार हैं ? ...... हम में से कितने किसानो के हक के लिए अपनी जायदाद बेच देंगे ? हम में से कितने लोग खालिस्तान अलगाववादियों के ख़िलाफ़ खुल कर खड़े हो गए था ?



१८ मई की रात मेट्रो हॉस्पिटल में मेरे सामने सुरजीत जी कोमा में पड़े मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे ................ और मैं पहुँच गया था लखनऊ के उस वक़्त में जब मेरी उनसे पहली और चेतन अवस्था में आखिरी भेंट हुई थी ! ...... तब मैंने उनसे अभिवादन करते हुए कहा था
' कामरेड लन्दन तोड़ सिंह को मेरा सलाम '
और उधर से जवाब आया कि
" लन्दन क्या जो भी चीज़ तुम पर ज़बरदस्ती थोपी जाए उसे तोड़ डालो ! "


यादों से लौट कर मैं फिर हॉस्पिटल में था........और सोच रहा था कि क्या उनसे ऐसी ही दो मुलाकातें होनी थी .... एक जिसमे ऐसा जोश था और एक में जिंदगी के अंत का सन्नाटा ?
फिर अचानक देखा कि सुरजीत जी ने अवचेतन अवस्था में एक बार ज़ोर से साँस ली .... जैसे कहना चाहते हों कि लड़ाई तो हमेशा ही है, चाहे दुनिया से या ख़ुद से ! मैं फिर शांत था क्यूंकि देख लेना चाहता था पूरे ध्यान से और चाहता था कि हमेशा के लिए हिस्सा बन जाऊ उस युग का जो अब ख़त्म हो गया...........


मेरे सामने भीष्म की भांति एक युग और वाकई भारतीय राजनीति शर शैया ही है ..... एक महागाथा अपनी परिणिती की ओर थी .............. आज वो पूर्ण हुई ! विवाद तो होंगे ही ..... गलतियां भी होनी ही हैं पर युग तो युग है ........ यह एक युग की समाप्ति थी ....भारतीय साम्यवाद के !


मयंक सक्सेना
9311622028 mailmayanksaxena@gmail.com

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