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Sunday, September 21, 2008
आतंक के ख़िलाफ़ ई मेल अभियान
लेने न पायें रिपु महि
राणा शिवा के वंशजों के
शौर्य मैं संशय नही
दुर्नाम संघ सिमी है
रण की बजता दुंदुभी
उसको पढ़ा दो पाठ ऐसा
भूल न पाये कभी
मैं अनुरोध करता हूँ केव्स के अपने सभी सुह्रदजनों से , यह एक राष्ट्रीय विपदा का समय है। हम सभी पत्रकार बान्धुओं को इस विपदा के ख़िलाफ़ एकजुट होकर इस आतंकवाद का मुकाबला करना होगा। हमारा मध्यम कुछ भी हो , हमें इस विपदा के खिलाफ एक बौधिक क्रांति को ललकार देनी ही होगी। हम अपने से जुड़े हुए जितने भी लोगों को इन्टरनेट के मध्यम से जानते हैं उन्हें कम से कम पाँच ईमेल आगे भेजने को कहेंगे जो ये संदेश देते हों आतंक हटाओ देश बचाओ।
हिन्दी दिवस के बाद भी ....
हिन्दी दिवस और हिन्दी सप्ताह तो बीत गया है लेकिन फिर भी आपसे आग्रह है की इसे ज़रूर पढ़ें ...........
हिंदी पर गर्व है असली मुसीबत
प्रभाष जोशी
हिन्दी भाषा के रूप में मर कर गरीब से गरीब और पिछड़ों से पिछड़े लोगों की बोली होकर रह जाएगी ऐसा डर एक नहीं कई बोलने वालों ने बताया। मौका दिया जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी का भविष्य और भविष्य की हिंदी पर दो दिन की गोष्ठी ने। उनका कहना था- ज्ञान आयोग ने पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने की सिफारिश की है। चौथी-पांचवीं से सभी विषय अंग्रेजी में पढ़ाने की बात भी कही गई है। कई राज्यों ने प्राथमिक स्कूलों में ही अंग्रेजी पढ़ाना शुरू भी कर दिया है। महानगरों और नगरों में ही नहीं कस्बे-कस्बे और गांव-गांव में अंग्रेजी स्कूल खुल रहे हैं क्योंकि मां-बाप अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना चाहते हैं। वही लोग अपने बच्चों को हिंदी स्कूल में पढ़ाते हैं जिनके पास उतना पैसा नहीं कि अंग्रेजी पढ़वा सकें।
यह सारे देश में मान लिया गया है। कि ज्ञान और बड़ी नौकरी और नए संसार की भाषा अंग्रेजी है। हमारे मित्र राजकिशोर ने अपने पचर्ें में कहा- इस तरह हिंदी पहली बार गरीब की जोरू बन (रही है) जिसके लहंगे के साथ कोई भी कभी भी खेल सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी के इस बोलबाले के बाद प्रौद्योगिकी भी अंग्रेजी को बढ़ाने और फैलाने में लगी है। मोबाइल पर संदेश नई किस्म की अंग्रेजी में आते जाते हैं। इंटरनेट की भाषा अंग्रेजी है। अखबारों और विज्ञापनों का काम अब हिंदी से नहीं चलता। उनमें अंग्रेजी मिलाना अनिवार्य हो गया है। अध्यापक और आलोचक अजय तिवारी ने कहा-जिन नागरिकों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी शिक्षा और रोजगार में है उनका माध्यम अंग्रेजी बन चुकी है।
हिंदी उन्हीं का माध्यम है जिनकी पहली-दूसरी पीढ़ी शिक्षा तक पहुंची है। ऐसे अधिकतर लोग निम्न और निम्न-मध्यवर्ग से हैं। इनमें बड़ी संख्या दलितों, आदिवासियों पिछड़े वर्ग और स्त्रियों की है।यानी पढ़े-लिखे और खाते-पीते हिंदी वाले की भाषा अंग्रेजी हो चुकी है यह हो जाएगी। विकसित और महाबली भारत को हिंदी की कोई जरूरत नहीं होगी। इन लोगों के भाषण और पर्चे छोड़ दें और अपने आसपास अपनी ही नजर से देखें तो अंग्रेजी का जितना बोलबाला ओर हिंदी की जितनी अनदेखी आज हमारे सार्वजनिक, सामाजिक और निजी जीवन में हो रही है अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं थी।
विकास मार्ग का निर्माण विहार के मेरे घर के पास मेट्रो स्टेशन बन रहा है। उस पर किसके लिए अंग्रेजी में-निर्माण विहार स्टेशन लिखा हुआ है मैं नहीं जानता। जो उसे बना रहे हैं सब हिंदी बोलते हैं। मेट्रो चलने पर जो उसका उपयोग करेंगे सब हिंदी बोलने वाले होंगे। फिर अंग्रेजी में निर्माण विहार स्टेशन किस के लिए और क्यों लिखा गया है? शान के लिए? प्रतिष्ठा के लिए? या हमारे मध्यवर्ग के लिए जो मानता है कि अंग्रेजी ही हमें विकसित और महाशक्ति बनाएगी?
दिल्ली को छोड़िए और बनारस को देखिए जहां इस बार मैं नाग पंचमी के दिन था। सेंट जोन्स की नर्सरी में पढ़ने वाले हमारे मित्र के पोते ने कहा-मेम ने बताया कि आज स्नेक एनवर्सरी है। सुन के हमारे मित्र का सिर लटक गया- जनता हूं कि यह शर्मनाक और अपसंस्कृति है। लेकिन वहां नहीं पढ़ाऊं तो लोग कहेंगे कि बच्चों को पिछड़ा छोड़ दिया। फिर उनने उत्तर प्रदेश के एक नामी नेता का किस्सा सुनाया जिनका बड़ा बेटा उन्हें इसलिए गाली बकता था कि उसे उनने हिंदी में पढ़वाया और अंग्रेजी में पढ़ा उनका छोटा बेटा बहुराष्ट्रीय कंपनी में मौज कर रहा है। वे उत्तर प्रदेश के बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और प्रख्यात हिंदी सेवी थे।
सरकारी और निजी दफ्तरों में ही नहीं कारखानों और बाजारों में भी अंग्रेजी का ऐसा ही दबदबा आप देख सकते हैं। जानकर कहते हैं कि महानगरों की नकल नगरों में ओर नगरों की नकल कस्बों और गांवों में होती है। जिस रास्ते पर महाजन जाते हैं वही सही रास्ता है। और भारत का महाजन यानी भद्रलोक यानी प्रभुवर्ग अंग्रेजी को ऐसे पकड़ रहा है जैसे वही उसे धनी और महाबली बनाएगी। इन्हीं के महानगरीय भारत को नया इंडिया कहा जा रहा है जो अगले दस-बीस बरस में विश्व की महाशक्ति हो जाएगा।
यह महाशक्तिमान भारत किस भाषा में बोलेगा? शक्ति की तो एक ही भाषा यह जानता है- अंग्रेजी। दक्षिण अफ्रीका में गांधी ने जब सत्याग्रह करना तय किया तो उन्हें बहुत खटका कि अपनी लड़ाई के लिए अपना शब्द भी नहीं है- इसे सिविल डिसओबिडियन्स- कहना पड़ेगा। तब उनने सदाग्रह और फिर सत्याग्रह निकाला। मौलिक काम करने वालों के पास अपना मौलिक शब्द होता है। महाशक्ति इंडिया के पास बोलने को क्या होगी- हिंगलिश! कोई मानेगा कि यह महाशक्ति और उसकी भाषा है?
अगर आप मनमोहन सिंह की नव उदार अर्थव्यवस्था के आने के पहले जन्में हैं तो निश्चत ही जानते हैं कि सन नब्बे के पहले ये हाल नहीं थे। हमारे इंडियन एक्प्रसप्रेस में मुलगावकर और जॉर्ज वर्गीज जैसे अंग्रेजी दां संपादक थे जो खुद होकर हमें आकर कहते थे- भविष्य तो आप हिंदी वालों का है।
राजकुमार केसवानी की यूनियन कारबाइड के कारखाने के बारूद के ढेर पर बैठे होने की जो खबर जनसत्ता में छपी थी और जिस पर उन्हें भगवानदास गोयनका पुरस्कार मिला था- उसका अंग्रेजी अनुवाद एक्सप्रेस में न छपने पर रामनाथ गोयनका ने परेड करवा दी थी। अखबार ही नहीं सत्ता के केंद्रों और प्रतिष्ठत संस्थानों में अंग्रेजी चलती थी। पर आम धारणा थी कि भविष्य तो हिंदी और भारतीय भाषाओं का है और लोग मेहनत करके हिंदी सीखते और प्रयत्न करके बोलते थे। माना जाता था कि भारत जब सही मानो में अपनी वाली पर आएगा यानी लोकतंत्र अपने को सचमुच प्रकट करेगा तो हिंदी के साथ दूसरी भारतीय भाषाएं भी चलेंगी। अंग्रेजी रहेगी एक भाषा के नाते लेकिन राज तो भारतीय भाषाओं का ही होगा।
फिर क्या हो क्या गया? भारत पर फिर से अंग्रेजों का साम्राज्य तो स्थापित नहीं हुआ? सन इकानवे में भाषाविद और संस्कृतिविज्ञ नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया और भारत ने विश्व बैंक के उबाव में उसी के नुस्खों पर अपनी अर्थव्यवस्था को खोला। भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण नई अर्थसंहिता के मंत्र बने। भूमंडलीकरण के आंधी की भाषा अंग्रेजी थी क्योंकि यह अमेरिकी और यूरोपीय पूंजी का भूमंडलीकरण्ा था। इस उग्गत की पूंजी यानी सरप्लस केपिटल को भारत में चलाने की भाषा अंग्रेजी थी क्योंकि भूमंडलीकरण करवाने वाले विदेशी ओर करने वाले देसी दोनों की ही उसमें सुविधा थी।
यही नहीं, प्रधानमंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह ऑॅक्सफोर्ड में सम्मान लेने गए तो उनने कहा कि आपकी सिखाई अंग्रेजी हमें आती न होती तो आज सूचना क्रांति में हमारा यह स्थान नहीं होता। भूमंडलीकरण तो और भी देशों में हुआ है लेकिन उनने उसे अपनी भाषा में किया। भारत के नेताओं, नौकरशाहों और भद्रलोक ने पूंजी के इस भूमंडलीकरण के लिए अंग्रेजाी को ही चुना। भारत के वसुधैव कुटुंबकम और पूंजी के इस नए भूमंडलीकरण का फर्क न समझने वाले बेचारे भोले लोग भूल जाते हैं कि इस भूमंडलीकरण का भाषा, ज्ञान और संस्कृति से कोई संबंध नहीं है। पिछले सत्रह वर्षों मर्ें र्जो भी परिवर्तन आप भारत में देख रहे हैं वे अप्सरा पूंजी के भूमंडलीकरण के अवांछित परिणाम हैं।
पूंजी और मुनाफे को चूंकि नव उदार अर्थव्यवस्था ने ब्रह्म और मोक्ष का पर्याय बना दिया है इसलिए आध्यात्मक भारत भी माया के जबरदस्त फेर में पड़ गया है। अब वह भारत भी नहीं रहना चाहता है। समाज, संस्कृति और भाषा के जो पारंपरिक नियंत्रण और संतुलन जैविक ग्रामीण समाज में होते हैं वे महानगरों में टूट गए हैं। वे स्वच्छंद महाउपभोग के केंद्र हो गए हैं। और इसीलिए आप एक ऐसा इंडिया बनते देख रहे हैं जिसकी न अपनी कोई भाषा है न अपनी कोई संस्कृति। जिसमें किसी भी तरह कमाने और कितने ही और कैसे ही उपभोग की छूट हो वही इसकी संस्कृतिए भाषा और जीवन शैली बन सकती है।
भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण ने अमेरिकी जीवन स्तर को इस नए इंडिया का लक्ष्य बना दिया है। उसे समझ नहीं आता कि खुद अमेरिका में भी सबको एक समान जीवन स्तर प्राप्त नहीं है और वहां भी तेरह प्रतिशत गरीबी है। वहां दुनिया की छह फीसद आबादी विश्व के तीस प्रतिशत संसाधनों का उपभोग कर रही है। भारत का तो मध्यवर्ग ही अमेरिका से बड़ा है। भारत के सब लोगों को अमेरिका जीवन स्तर देने के संसाधन भारत में तो क्या दुनिया में भी नहीं हैं। इसीलिए भारत कुछ भी कर ले तथाकथित अमेरिका नहीं हो सकता। अमेरिकी सपना भारत के लिए असंभव है भले ही वह महान आर्थिक शक्ति हो जाए। लेकिन भारत में जो अंग्रेजीकरण होता हुआ आप देख रहे हैं वह पूंजी के भूमंडलीकरण से उपजे अमेरिकी सपने का ही नतीजा है। इस अंग्रेजीकरण में न अंग्रेजी की समझ है न यूरोपीय संस्कृति और ज्ञान की समझ। इसमें अमेरिका की स्वतंत्रचेता आत्मा के खुद के माने हुए बंधन भी नहीं हैं। कहते हैं नकल सिर्फ छिछली और भदेस चीजों की होती है। भारत में खासकर उसके मध्यवर्ग में वही हो रहा है।
जिस अंग्रेजी और जिस अमेरिकीकरण के कारण हिंदी और भारतीय जीवन पध्दति को आप ग्रहण में पड़ी देख रहे हैं वह अंग्रेजी भाषा, यूरोपीय संस्कृति और अमेरिकी जीवन पध्दति के कारण नहीं- अमेरिकी- यूरोपीय पूंजी के भूमंडलीकरण की वजह से है। अप्सरा पूंजी इस लवारे को अपने साथ लाई है। आप जानते ही हैं कि सत्रह साल पहले भारत में यह परिस्थिति नहीं थी। भारतीय भाषाओं का अपना स्थान और सम्मान था। भविष्य हिंदी का माना जा रहा था क्योंकि भारत को भारत की तरह का भारत बनना था। जो सपना एक सौ नब्बे साल के संघर्ष में से निकला था वह सिर्फ सत्रह साल के पूंजी के भूमंडलीकरण से समूल नष्ट हो सकता है?
इस भूमंडलीकरण से मालामाल हुए लोग आपको बार-बार कहेंगे कि इसका कोई विकल्प नहीं है और यह जो प्रक्रिया चल रही है उसे अब सुई के कांटों की तरह वापस नहीं घुमाया जा सकता। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि यह कोई पहला भूमंडलीकरण नहीं है जिसमें भारत पड़ा है। साम्रज्यवद भी एक भूमंडलीकरण ही था जिसके जरिए यूरोपीय देशों ने ऐशिया, अफ्रीका, अमेरिका आदि महाद्वीपों में अपने साम्रज्य कायम किए थे। भारत को सभ्य बनाने के लिए अंग्रेज हम पर राज करने आए ही थे और हमें उन्हें वापस इंग्लैंड भेजना पड़ा था। भूमंडलीकरण के दिन भी अब आ गए हैं। इन्हीं लोगों का कहना और भय है कि चीनी और भारतीय पूंजी अगले दस-बीस बरस में दुनिया पर छा जाएगी। तब भी क्या अमेरिकी पूंजी से बना अंग्रेजी का दबदबा भारत और भारतीय पूंजी अंग्रेजी में राज करेगी?
Saturday, September 20, 2008
किसी को कुर्बानी देनी होगी
केव्स के इस ब्लॉग में मेरी यह पहली कविता है .... इस हेतु क्षमा .... (इतना विलंब होने के कारण )
यह कविता मन की करुणा ने लिखी है आए दिन होते कत्ले आम बम विस्फोट से आख़िर ये लोग क्या हासिल करना चाहते है ये मेरी समझ से परे है ......
आज अपनों से ने रुला दिया है फिर मुझे ,
वह घाव जो भर रहा हा था हरा हो गया है फिर से
मै ख़ुद से पूछता हूँ ,क्यो आदमी स्वार्थी हो गया ?
मै दिल से आज रोता हूँ ,क्यो समाज ऐसा हो गया ?
मै गम का घूंट पिता हूँ, क्या इमान सबने बेच दिया ?
मै फ़िर आज मरता हूँ,क्यो इन्सान पराया हो गया ?
क्यों फ़िक्र नही किसी को देश की ?
क्यों याद नही किसी को देश की?
कहाँ चरम है इस स्वार्थ का ?
क्या लक्ष है इस इमान का ?
पर न चलेगा काम ऐसे ,इन्सान को अंगडाई लेना होगी
न बदलेगा मनुज ऐसे ,किसी को कुर्बानी देनी होगी
किसी को कुर्बानी देनी होगी ...................??????????
खुदकुशी की कतार में हैं लाखों किसान
अम्बरीष कुमार (http://www.virodh.blogspot.com )
सेवा ग्राम।।वर्धा।। गांधी की इस कर्म भूमि से किसान चल कर दो अक्टूबर को दिल्ली में मार्च करेंगे। सेवा ग्राम में महात्मा गांधी का आज भी वह चर्खा रखा हुआ है। जिसनें आजदी के आंदोलन को धार दी थी। उस चरखे के लिये कपास यहीं विदर्रभ के किसान देते थे। पर आज विदर्रभ के किसान केन्द्र और राज्य सरकार के किसान विरोधी नीतियों के चलते मौत को गले लगा रहे हैं। प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की कर्ज माफी की घोषणा के बाद पिछल्ले छह महीनों में अब तक पांच सौ चौवन किसान खुदकशी कर चुके हैं। औसतन तीन किसान रोज खुदकशी कर रहे हैं। पिछले वर्ष बारह सौ अड़तीस किसानों ने खुदकशी की थी। चौबीस घंटे पहले सत्तर दरा थाने के महाकाली नगर में कर्ज से डूबे एक किसान देवराम महादेवराव वैद्य ने खुदकुशी कर ली। मरने वाला किसान कर्ज में डूबा हुआ था। और उसकी आठ एकड़ जमीन कारगो हब में चली गयी थी। विदर्रभ में किसान दो तरफा लड़ाई लड़ रहे हैं। एक तरफ एस ईजेड के तहत किसानों की खेती की भूमि को अधिग्रहण करने की कोशिश हो रही है। तो उसके खिलाफ किसान कारबो सिलिंग अन्याय विरोधी समिति बनाकर बाबा दाबरे के नेतृत्व में लड़ाई लड़ रहा है तो दूसरी तरफ कपास किसानों को संगठित करने का बीणा किसान मंच और जनमोर्चा के नेता प्रताप गोस्वामी ने उठा रखा है। विदर्रभ के करीब दजर्न जिलों में किसानों को एक जुट करने का काम काफी समय से चल रहा है। यहीं के किसान आगामी दो अक्टूबर को दिल्ली में मार्च भी करेंगे। विदर्भ में किसानों को संगठित करने का प्रयास करीब डेढ़ साल पहले पूर्व प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के पुत्र अजय सिंह ने किया था। उन्होंने विदर्भ क्षेत्र में ललित रुंडवाल के जरिये खुदकुशी कर रहे किसानों के लिये वैकल्पिक उपायों पर गौर करना शुरू किया। दूसरी तरफ किसानों की मांगों को लेकर स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध भी शुरू किया। यही वजह है कि आज यवकमाल, अकोला, वर्धा, अमरवती, बुलढाना, वासिंम, भंडारा, गोंडिया और नागपुर जसे जिलों में किसानों का प्रतिरोध रंग लाता नजर आ रहा है। आज दोपहर बाद घाटन जी तहसील के नगर पंरिषद हाल में बड़ी संख्या में किसान इक्ट्ठा हुये। जो दूर दराज के गांवों से आये थे। और किसान मंच को अपनी व्यथा बता रहे थे। किसानों को सम्बोधित करते हुये दादरी आंदोलन पर जुड़े रहे जनमोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव विनोद सिंह ने कहा ह्लअब आपको लम्बी लड़ाई के लिये तैयार हो जना चाहिये। खुदकुशी करना किसी समस्या का समाधान नहीं है। हम इस मुद्दे को लेकर राज्य से लेकर केन्द्र सरकार के सामने किसानों का पक्ष पूरी ताकत से रखेंगे। दो अक्टूबर को अन्य किसानों के साथ विदर्रभ के किसान भी तीन मूर्ति से राजघाट तक मार्च करेंगे। आप सभी लोग इस कार्यक्रम में पूरी ताकत के साथ हिस्सा लेंग इस सभा में ज्यादा तर किसानों ने पत्र लिखकर सरकार से गुहार लगायी है कि कर्ज माफी के लिये ठोस कदम उठाये जयें। वरना किसानों की खुदकुशी का सिलािसला रूकने वाला नहीं है। इस बैठक में आई सीताबाई लक्ष्मनराला, ने कहा कपास लगाने में दो से ढाई हजर प्रति कुंतल लागत आती है। परकीमत मिलती है उन्नीस सौ से दो हजर रूपये कुंतल। अब क्या करें कपास लगाने वाला किसान कर्ज के बोङा में डूबा ज रहाहै। और खुदकुशी करने को मजबूर है दड़पापुर गांव के कपास किसान अमर नाथ विश्वनाथ नागराणो ने कहा ह्लकपास किसानों के लिये राहत का पैकेज और कर्ज माफी की घोषणा का कोई असर नहीं पड़ रहा है। राहत पैकेज गांव के किसानों तक पहुंचा ही नहीं है। और कर्ज माफी का फायदा बड़े और सम्पन्न किसान ले रहे हैं। कर्ज माफी का फायदा सांसद से लेकर विधायक तकउठा रहे हैं। पूर्व सांसद उत्तम राव पाटिल, विधायक संजय देशमुख, पूर्व मंत्री शिवाजीराम मोगे, पूर्व विधायक वामन राव कासावार और कांग्रेस नेता सुरेश लोनकर का नाम तो सार्वजनिक हो चुका है। दूसरी तरफ हमारे गांव का किसान कर्ज माफ न होने की वजह से आत्म हत्या कर रहा हैगौरतलब है कि आये दिन विदर्रभके ग्यारह जिलों में खुदकुशी की रोज खबरें आती रहती हैं। वर्धा से यवत माल की तरफ बढ़ते ही एक तरफ कपास के हरे भरे खेत दिखायी पड़ते हैं। तो दूसरी तरफ गरीब और बदहाल किसानों के गांव। जहां दो जून खाने को बड़ी मुश्किल से मिल पाता है। शिवनी गांव के दौलत सरदार राठौर ने कहा ह्लकर्ज माफी की घोषणा हवाहवाई है। कहने को सरकार ने कर्ज माफ कर दिया। पर उसका कोई फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है। जो राहत पैकेज आयाहै। उसका फायदा नेता और सांसद लोग उठा रहे हैं। घाटन जी से आगे बढ़ने पर किनी गांव आता है वहां पर करीब कुछ दिन पहले ही एक किसान ने खुदकुशी कर ली थी। घर पर उसकी पत्नी मिलती है सावित्रा, दो बेटियां और एक बेटा है। सावित्री ने कहा हमारा आदमी कज्र लिये था। पच्चीस फीसदी महीने के ब्याज पर पंद्रह हजर रूपये कर्ज नहीं चुका पाया। इसलिये जहर खा लिया। हम भी कर्ज पर ही चल रहे हैंह्व यह कुछ घटनायें हैं जो विदर्रभ के किसानों की दयनीयदशा को दर्शाती हैं। दिल्ली में जो घोषणा की जती है वह विदर्रभ के गांवों तकतो नहीं पहुंचती। मनमोहन सिंह कर्ज माफी की घोषणा पर अपनी पीठ भले थपथपा दें। पर ये ध्यान रखना चाहिये कि उनकी घोषणा के बाद पांच सौ चौवन किसान खुदकुशी कर चुके हैं। और सैकड़ों किसान खुदकुशी की कतार में हैं।
Friday, September 19, 2008
मौसेरे भाई
कवि जी जगे थे ,दर्द में पगे थे
यानि कविता करने में लगे थे।
अचानक उनके चेहरे पर आ गया
रौद्र रस का स्थायी भाव
आव देखा न ताव
कुछ समझा न सोचा
चोर को धर दबोचा।
बोले प्रिय भाई तुम ग़लत
जगह पर आ गए हो
लगता है धंधे में नए हो।
अरे अगर चुराना ही है
तो किसी नेता के घर चुराओ
देश की गरीबी मिटाओ।
चोर ने हंसकर दिया जवाब।
जनाब क्या कहते हैं आप
हरगिज़ नहीं करूंगा ऐसा पाप।
लोग बदल गए जमाना बदल गया
लेकिन फिर भी हम अपनी
पुराणी मान्यताओं को मानते हें
अपने मौसेरे भाइयों को
अच्छी तरह पहचानते हैं।
हम भूखों मर सकते हैं
मगर किसी नेता के घर
चोरी नही कर सकते हैं।
Thursday, September 18, 2008
सावधान आतंकवाद
Wednesday, September 17, 2008
इनको पहचान लें
दिल्ली पुलिस ने धमाकों के तीन दिन बाद कल शाम धमाकों के संदिग्ध अभियुक्तों के कंप्यूटर चित्र जारी कर दिए। पुलिस ने इन तीन लोगों के ५ स्केच जारी किए हैं। इनमें एक स्केच गफ़्फ़ार मार्केट के संदिग्ध का है जबकि दो स्केच बाराखंभा रोड पर बम धमाकों में शामिल आतंकवादियों के प्रत्यक्षदर्शियों की सूचना के आधार पर इनको तैयार किया गया है।
पुलिस का कहना है कि दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बारे में अहम जानकारी हाथ लगी है. ख़बरें हैं कि पुलिस ने कुछ लोगों को हिरासत में लिया है और उनसे पूछताछ भी की जा रही है। लेकिन इन लोगों के बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं दी गई है।
पुलिस ने इन लोगों के बारे में कोई भी सूचना मिलने पर तत्काल उपलब्ध कराने की अपील की है। आतंक के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में केव्स संचार भी कमर कस चुका हैं और हम देश के सभी जिम्मेदार नागरिकों से अपील करते हैं की इस लड़ाई में हम धर्म और जाति के मसलों से ऊपर उठ कर एक साथ ये लड़ाई लड़ें।
आप सभी से अपील है कि इन संदिग्धों के बारे में कोई भी सूचना 1090 के टाल फ्री नंबर पर दे सकते हैं....
