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Sunday, September 21, 2008

हिन्दी दिवस के बाद भी ....

केव्स संचार पर हमने कुछ दिन बीते हिन्दी सप्ताह मनाया ........ हिन्दी के प्रति थोड़ा सा आभार जो हम व्यक्तकर पाए। मेरा और मयंक का हमेशा से आग्रह रहा है की केवल लिखने के लिए न लिखा जाए और न ही ब्लॉग पर कोई पोस्ट केवल अवसर की खानापूर्ति के लिए हो । जनादेश पोर्टल पर ( जिसका लिंक साइड बार में दिया है http://www.janadesh.in ) हिन्दी से सम्बंधित प्रभाष जी का एक आलेख मिला है जिसे जनादेश पोर्टल के सौजन्य से आपके लिए दे रहा हूँ। पोर्टल पर जायेंगे तो आपको और भी कई अच्छे आलेख मिलेंगे , लेकिन फिलहाल यही प्रस्तुत है ..........

हिन्दी दिवस और हिन्दी सप्ताह तो बीत गया है लेकिन फिर भी आपसे आग्रह है की इसे ज़रूर पढ़ें ...........

हिंदी पर गर्व है असली मुसीबत
प्रभाष जोशी
हिन्दी भाषा के रूप में मर कर गरीब से गरीब और पिछड़ों से पिछड़े लोगों की बोली होकर रह जाएगी ऐसा डर एक नहीं कई बोलने वालों ने बताया। मौका दिया जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी का भविष्य और भविष्य की हिंदी पर दो दिन की गोष्ठी ने। उनका कहना था- ज्ञान आयोग ने पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने की सिफारिश की है। चौथी-पांचवीं से सभी विषय अंग्रेजी में पढ़ाने की बात भी कही गई है। कई राज्यों ने प्राथमिक स्कूलों में ही अंग्रेजी पढ़ाना शुरू भी कर दिया है। महानगरों और नगरों में ही नहीं कस्बे-कस्बे और गांव-गांव में अंग्रेजी स्कूल खुल रहे हैं क्योंकि मां-बाप अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना चाहते हैं। वही लोग अपने बच्चों को हिंदी स्कूल में पढ़ाते हैं जिनके पास उतना पैसा नहीं कि अंग्रेजी पढ़वा सकें।
यह सारे देश में मान लिया गया है। कि ज्ञान और बड़ी नौकरी और नए संसार की भाषा अंग्रेजी है। हमारे मित्र राजकिशोर ने अपने पचर्ें में कहा- इस तरह हिंदी पहली बार गरीब की जोरू बन (रही है) जिसके लहंगे के साथ कोई भी कभी भी खेल सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी के इस बोलबाले के बाद प्रौद्योगिकी भी अंग्रेजी को बढ़ाने और फैलाने में लगी है। मोबाइल पर संदेश नई किस्म की अंग्रेजी में आते जाते हैं। इंटरनेट की भाषा अंग्रेजी है। अखबारों और विज्ञापनों का काम अब हिंदी से नहीं चलता। उनमें अंग्रेजी मिलाना अनिवार्य हो गया है। अध्यापक और आलोचक अजय तिवारी ने कहा-जिन नागरिकों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी शिक्षा और रोजगार में है उनका माध्यम अंग्रेजी बन चुकी है।
हिंदी उन्हीं का माध्यम है जिनकी पहली-दूसरी पीढ़ी शिक्षा तक पहुंची है। ऐसे अधिकतर लोग निम्न और निम्न-मध्यवर्ग से हैं। इनमें बड़ी संख्या दलितों, आदिवासियों पिछड़े वर्ग और स्त्रियों की है।यानी पढ़े-लिखे और खाते-पीते हिंदी वाले की भाषा अंग्रेजी हो चुकी है यह हो जाएगी। विकसित और महाबली भारत को हिंदी की कोई जरूरत नहीं होगी। इन लोगों के भाषण और पर्चे छोड़ दें और अपने आसपास अपनी ही नजर से देखें तो अंग्रेजी का जितना बोलबाला ओर हिंदी की जितनी अनदेखी आज हमारे सार्वजनिक, सामाजिक और निजी जीवन में हो रही है अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं थी।
विकास मार्ग का निर्माण विहार के मेरे घर के पास मेट्रो स्टेशन बन रहा है। उस पर किसके लिए अंग्रेजी में-निर्माण विहार स्टेशन लिखा हुआ है मैं नहीं जानता। जो उसे बना रहे हैं सब हिंदी बोलते हैं। मेट्रो चलने पर जो उसका उपयोग करेंगे सब हिंदी बोलने वाले होंगे। फिर अंग्रेजी में निर्माण विहार स्टेशन किस के लिए और क्यों लिखा गया है? शान के लिए? प्रतिष्ठा के लिए? या हमारे मध्यवर्ग के लिए जो मानता है कि अंग्रेजी ही हमें विकसित और महाशक्ति बनाएगी?

दिल्ली को छोड़िए और बनारस को देखिए जहां इस बार मैं नाग पंचमी के दिन था। सेंट जोन्स की नर्सरी में पढ़ने वाले हमारे मित्र के पोते ने कहा-मेम ने बताया कि आज स्नेक एनवर्सरी है। सुन के हमारे मित्र का सिर लटक गया- जनता हूं कि यह शर्मनाक और अपसंस्कृति है। लेकिन वहां नहीं पढ़ाऊं तो लोग कहेंगे कि बच्चों को पिछड़ा छोड़ दिया। फिर उनने उत्तर प्रदेश के एक नामी नेता का किस्सा सुनाया जिनका बड़ा बेटा उन्हें इसलिए गाली बकता था कि उसे उनने हिंदी में पढ़वाया और अंग्रेजी में पढ़ा उनका छोटा बेटा बहुराष्ट्रीय कंपनी में मौज कर रहा है। वे उत्तर प्रदेश के बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और प्रख्यात हिंदी सेवी थे।
सरकारी और निजी दफ्तरों में ही नहीं कारखानों और बाजारों में भी अंग्रेजी का ऐसा ही दबदबा आप देख सकते हैं। जानकर कहते हैं कि महानगरों की नकल नगरों में ओर नगरों की नकल कस्बों और गांवों में होती है। जिस रास्ते पर महाजन जाते हैं वही सही रास्ता है। और भारत का महाजन यानी भद्रलोक यानी प्रभुवर्ग अंग्रेजी को ऐसे पकड़ रहा है जैसे वही उसे धनी और महाबली बनाएगी। इन्हीं के महानगरीय भारत को नया इंडिया कहा जा रहा है जो अगले दस-बीस बरस में विश्व की महाशक्ति हो जाएगा।
यह महाशक्तिमान भारत किस भाषा में बोलेगा? शक्ति की तो एक ही भाषा यह जानता है- अंग्रेजी। दक्षिण अफ्रीका में गांधी ने जब सत्याग्रह करना तय किया तो उन्हें बहुत खटका कि अपनी लड़ाई के लिए अपना शब्द भी नहीं है- इसे सिविल डिसओबिडियन्स- कहना पड़ेगा। तब उनने सदाग्रह और फिर सत्याग्रह निकाला। मौलिक काम करने वालों के पास अपना मौलिक शब्द होता है। महाशक्ति इंडिया के पास बोलने को क्या होगी- हिंगलिश! कोई मानेगा कि यह महाशक्ति और उसकी भाषा है?
अगर आप मनमोहन सिंह की नव उदार अर्थव्यवस्था के आने के पहले जन्में हैं तो निश्चत ही जानते हैं कि सन नब्बे के पहले ये हाल नहीं थे। हमारे इंडियन एक्प्रसप्रेस में मुलगावकर और जॉर्ज वर्गीज जैसे अंग्रेजी दां संपादक थे जो खुद होकर हमें आकर कहते थे- भविष्य तो आप हिंदी वालों का है।
राजकुमार केसवानी की यूनियन कारबाइड के कारखाने के बारूद के ढेर पर बैठे होने की जो खबर जनसत्ता में छपी थी और जिस पर उन्हें भगवानदास गोयनका पुरस्कार मिला था- उसका अंग्रेजी अनुवाद एक्सप्रेस में न छपने पर रामनाथ गोयनका ने परेड करवा दी थी। अखबार ही नहीं सत्ता के केंद्रों और प्रतिष्ठत संस्थानों में अंग्रेजी चलती थी। पर आम धारणा थी कि भविष्य तो हिंदी और भारतीय भाषाओं का है और लोग मेहनत करके हिंदी सीखते और प्रयत्न करके बोलते थे। माना जाता था कि भारत जब सही मानो में अपनी वाली पर आएगा यानी लोकतंत्र अपने को सचमुच प्रकट करेगा तो हिंदी के साथ दूसरी भारतीय भाषाएं भी चलेंगी। अंग्रेजी रहेगी एक भाषा के नाते लेकिन राज तो भारतीय भाषाओं का ही होगा।
फिर क्या हो क्या गया? भारत पर फिर से अंग्रेजों का साम्राज्य तो स्थापित नहीं हुआ? सन इकानवे में भाषाविद और संस्कृतिविज्ञ नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया और भारत ने विश्व बैंक के उबाव में उसी के नुस्खों पर अपनी अर्थव्यवस्था को खोला। भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण नई अर्थसंहिता के मंत्र बने। भूमंडलीकरण के आंधी की भाषा अंग्रेजी थी क्योंकि यह अमेरिकी और यूरोपीय पूंजी का भूमंडलीकरण्ा था। इस उग्गत की पूंजी यानी सरप्लस केपिटल को भारत में चलाने की भाषा अंग्रेजी थी क्योंकि भूमंडलीकरण करवाने वाले विदेशी ओर करने वाले देसी दोनों की ही उसमें सुविधा थी।
यही नहीं, प्रधानमंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह ऑॅक्सफोर्ड में सम्मान लेने गए तो उनने कहा कि आपकी सिखाई अंग्रेजी हमें आती न होती तो आज सूचना क्रांति में हमारा यह स्थान नहीं होता। भूमंडलीकरण तो और भी देशों में हुआ है लेकिन उनने उसे अपनी भाषा में किया। भारत के नेताओं, नौकरशाहों और भद्रलोक ने पूंजी के इस भूमंडलीकरण के लिए अंग्रेजाी को ही चुना। भारत के वसुधैव कुटुंबकम और पूंजी के इस नए भूमंडलीकरण का फर्क न समझने वाले बेचारे भोले लोग भूल जाते हैं कि इस भूमंडलीकरण का भाषा, ज्ञान और संस्कृति से कोई संबंध नहीं है। पिछले सत्रह वर्षों मर्ें र्जो भी परिवर्तन आप भारत में देख रहे हैं वे अप्सरा पूंजी के भूमंडलीकरण के अवांछित परिणाम हैं।
पूंजी और मुनाफे को चूंकि नव उदार अर्थव्यवस्था ने ब्रह्म और मोक्ष का पर्याय बना दिया है इसलिए आध्यात्मक भारत भी माया के जबरदस्त फेर में पड़ गया है। अब वह भारत भी नहीं रहना चाहता है। समाज, संस्कृति और भाषा के जो पारंपरिक नियंत्रण और संतुलन जैविक ग्रामीण समाज में होते हैं वे महानगरों में टूट गए हैं। वे स्वच्छंद महाउपभोग के केंद्र हो गए हैं। और इसीलिए आप एक ऐसा इंडिया बनते देख रहे हैं जिसकी न अपनी कोई भाषा है न अपनी कोई संस्कृति। जिसमें किसी भी तरह कमाने और कितने ही और कैसे ही उपभोग की छूट हो वही इसकी संस्कृतिए भाषा और जीवन शैली बन सकती है।
भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण ने अमेरिकी जीवन स्तर को इस नए इंडिया का लक्ष्य बना दिया है। उसे समझ नहीं आता कि खुद अमेरिका में भी सबको एक समान जीवन स्तर प्राप्त नहीं है और वहां भी तेरह प्रतिशत गरीबी है। वहां दुनिया की छह फीसद आबादी विश्व के तीस प्रतिशत संसाधनों का उपभोग कर रही है। भारत का तो मध्यवर्ग ही अमेरिका से बड़ा है। भारत के सब लोगों को अमेरिका जीवन स्तर देने के संसाधन भारत में तो क्या दुनिया में भी नहीं हैं। इसीलिए भारत कुछ भी कर ले तथाकथित अमेरिका नहीं हो सकता। अमेरिकी सपना भारत के लिए असंभव है भले ही वह महान आर्थिक शक्ति हो जाए। लेकिन भारत में जो अंग्रेजीकरण होता हुआ आप देख रहे हैं वह पूंजी के भूमंडलीकरण से उपजे अमेरिकी सपने का ही नतीजा है। इस अंग्रेजीकरण में न अंग्रेजी की समझ है न यूरोपीय संस्कृति और ज्ञान की समझ। इसमें अमेरिका की स्वतंत्रचेता आत्मा के खुद के माने हुए बंधन भी नहीं हैं। कहते हैं नकल सिर्फ छिछली और भदेस चीजों की होती है। भारत में खासकर उसके मध्यवर्ग में वही हो रहा है।
जिस अंग्रेजी और जिस अमेरिकीकरण के कारण हिंदी और भारतीय जीवन पध्दति को आप ग्रहण में पड़ी देख रहे हैं वह अंग्रेजी भाषा, यूरोपीय संस्कृति और अमेरिकी जीवन पध्दति के कारण नहीं- अमेरिकी- यूरोपीय पूंजी के भूमंडलीकरण की वजह से है। अप्सरा पूंजी इस लवारे को अपने साथ लाई है। आप जानते ही हैं कि सत्रह साल पहले भारत में यह परिस्थिति नहीं थी। भारतीय भाषाओं का अपना स्थान और सम्मान था। भविष्य हिंदी का माना जा रहा था क्योंकि भारत को भारत की तरह का भारत बनना था। जो सपना एक सौ नब्बे साल के संघर्ष में से निकला था वह सिर्फ सत्रह साल के पूंजी के भूमंडलीकरण से समूल नष्ट हो सकता है?
इस भूमंडलीकरण से मालामाल हुए लोग आपको बार-बार कहेंगे कि इसका कोई विकल्प नहीं है और यह जो प्रक्रिया चल रही है उसे अब सुई के कांटों की तरह वापस नहीं घुमाया जा सकता। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि यह कोई पहला भूमंडलीकरण नहीं है जिसमें भारत पड़ा है। साम्रज्यवद भी एक भूमंडलीकरण ही था जिसके जरिए यूरोपीय देशों ने ऐशिया, अफ्रीका, अमेरिका आदि महाद्वीपों में अपने साम्रज्य कायम किए थे। भारत को सभ्य बनाने के लिए अंग्रेज हम पर राज करने आए ही थे और हमें उन्हें वापस इंग्लैंड भेजना पड़ा था। भूमंडलीकरण के दिन भी अब आ गए हैं। इन्हीं लोगों का कहना और भय है कि चीनी और भारतीय पूंजी अगले दस-बीस बरस में दुनिया पर छा जाएगी। तब भी क्या अमेरिकी पूंजी से बना अंग्रेजी का दबदबा भारत और भारतीय पूंजी अंग्रेजी में राज करेगी?

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