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Monday, September 1, 2008

फ़राज़ साहब के बारे में ....

अहमद फ़राज़ चले गए । उनके अदबी सफर और शायरी के बारे में बहुत जगह बहुत कुछ लिखा गया । तन्जीर सर और मयंक भाई ने अपने अपने तरीके से उन्हें श्रृद्धांजलि दी । बहुत अच्छा लगा । फ़िर मैं कैसे चुप रहता । मैं भी फ़राज़ साहब पर लिख रहा हूँ । पर न तो मैं आम जन को फ़राज़ साहब कौन थे ये बताते हुए उनका तारुफ़ दूंगा और न ही उनकी शायरी की तनकीद करूँगा ।

मैं फ़राज़ साहब की एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ और गुजारिश कर रहा हूँ की इसे पढ़े , अगर आपको ऐसा लगा की ये ग़ज़ल आपकी अपनी कहानी कह रही है , तो आपका सिर इस ग़ज़ल के शायर के सम्मान में अपने आप ही झुक जाएगा , फ़िर चाहें आपने अहमद फ़राज़ का नाम पहली बार सुना हो या आप भी मेरी तरह बरसों से उनके मुरीद हों।


बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा
अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा

खिंचे खिंचे से आँखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा

अल्फ़ाज़ थे के जुग्नू आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा

ख़्वाबों में ख़्वाब उस के यादों में याद उस की
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िन्दगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बतों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफ़ाक़तों से दिल था डरा डरा सा

कुछ ये के मुद्दतों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा

फिर यूँ हुआ के सावन आँखों में आ बसे थे
फिर यूँ हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा

अब सच कहें तो यारो हम को ख़बर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़िआ ज़रा सा

तेवर थे बेरुख़ी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आश्ना सा

हम दश्त थे के दरिया हम ज़हर थे के अमृत
नाहक़ था ज़ोंउम हम को जब वो नहीं था प्यासा

हम ने भी उस को देखा कल शाम इत्तेफ़ाक़न
अपना भी हाल है अब लोगो "फ़राज़" का सा

1 comment:

  1. अभी-अभी मैंने भी अहमद फ़राज़ की आवाज़ में उनकी २३ ग़ज़ले डाली हैं, आप द्वारा उल्लेखित ग़ज़ल पढ़कर याद आया कि आप भी उन्हें सुने, आनंद आयेगा।

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