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Sunday, August 24, 2008

जन्माष्टमी विशेष ...

आज जन्माष्टमी है ..... इसका पौराणिक और धार्मिक महत्त्व हम सभी जानते हैं पर वस्तुतः इस दिन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता और महत्त्व उस मानव के चरित्र के कारण है जो अपनी बुद्धि और दृढ़ निश्चय के कारण महा मानव की श्रेणी में जा खडा हुआ और वह महामानव है कृष्ण ! कृष्ण जो प्रतीक हैं चिर यौवन के, प्रेरणा हैं अन्याय के ख़िलाफ़ विद्रोह की और सिद्धांत हैं दृढ़ निश्चय की जीत की ..................


अभी तक ब्लॉग पर हम जिस तरह की सामग्री आपके लिए लाते रहे हैं, ज़ाहिर सी बात है की हम उस स्तर से नीचे नहीं जाना चाहते हैं और दूसरों से अलग और सबसे बढ़ कर अलग तरीके से और ज्यादा गहराई में आपको जानकारी देना चाहते हैं सो हमने निर्णय किया कि इस बार हम लोक साहित्य की उस महान परम्परा को अवतरित करेंगे जो कृष्ण का नाम लेते ही मन में गूँज उठती है। जी बिल्कुल, हम बात कर रहे हैं भक्ति काल की उस लहर की जो कृष्ण भक्ति शाखा के नाम से जानी जाती है और जिसने साहित्य को अब तक के सबसे उम्दा साहित्य से नवाजा। आज हम लेकर आए हैं कुछ ऐसे पद जो बचपन की याद ताज़ा कर देंगे ....... कुछ ऐसे जो हमने सुने नहीं हैं पर वे उत्कृष्ट हैं .......







सूरदास



कहा जाता है की कृष्ण भक्ति शाखा का इनसे बड़ा कवि कोई नहीं हुआ। जन्म १४७८ ईस्वी में मथुरा आगरा मार्ग के किनारे स्थित रुनकता नामक गांव में हुआ। सूरदास के पिता रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषया में मतभेद है। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। अष्टछाप कवियों में एक । सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में १५८० ईस्वी में हुई।



सूरदास के पाँच प्रमुख ग्रन्थ माने जाते हैं



१ सूरसागर



२ सूरसारावली



३ साहित्य-लहरी



४ नल-दमयन्ती



५ ब्याहलो



सूरदास ने जिस तरह का कृष्ण के बाल रूप का वर्णन किया है शायद ही कोई कवि किसी भी भाषा में उतना सुंदर और सहज बखान पाया है , यही वजह है कि आज भी हमारे जेहन में उनके पद गूंजते हैं ..... प्रस्तुत है बाल रूप और नटखट पन....







तेरैं लाल मेरौ माखन खायौ ।



दुपहर दिवस जानि घर सूनौं, ढूँढ़ि-ढँढ़ोरि आपही आयौ ॥



खोलि किवार, पैठि मंदिर मैं, दूध-दही सब सखनि खवायौ।



ऊखल चढ़ि सींके कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढरकायौ ॥



दिन प्रति हानि होति गोरस की, यह ढोटा कौनैं ढँग लायौ।



सूरस्याम कौं हटकि न राखै, तै ही पूत अनोखौ जायौ ॥







( (एक गोपी उलाहना देती है-) तुम्हारे लालने मेरा मक्खन खाया है । दिन में दोपहर के समय घर को सुनसान समझकर स्वयं ढूँढ़-ढ़ाँढ़कर इसने स्वयं खाया ( अकेले ही खा लेता तो कोई बात नहीं थी। किवाड़ खोलकर, घर में घुसकर सारा दूध -दही इसने सखाओं को खिला दिया । ऊखल पर चढ़कर छींके पर रखा गोरस भी ले लिया और जो अच्छा नहीं लगा, उसे पृथ्वी पर ढुलका दिया । प्रतिदिन इसी प्रकार गोरस की बरबादी हो रही है, तुमने इस पुत्र को किस ढंग पर लगा दिया । श्यामसुन्दर को मना करके घर क्यों नहीं रखती हो । क्या तुमने ही अनोखा पुत्र उत्पन्न किया है ?)



माखन खात पराए घर कौ।




नित प्रति सहस मथानी मथिऐ, मेघ-सब्द दधि-माट-घमरकौ ॥




कितने अहिर जियत मेरैं घर, दधी मथि लै बेंचत महि मरकौ ।




नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति, बड़ौ नाम है नंद महर कौ ॥




ताके पूत कहावत हौ तुम, चोरी करत उघारत फरकौ ।




सूर स्याम कितनौ तुम खैहौ, दधि-माखन मेरैं जहँ-तहँ ढरकौ ॥




( (माता समझाती हैं-) `तुम दूसरे के घर का मक्खन खाते हो ! (तुम्हारे घर में) प्रतिदिन सहस्त्रों मथानियों से दही मथा जाता है, दही के मटको से जो घरघराहट निकलती है, वह मेघगर्जना के समान होती है । कितने ही अहीर मेरे घर जीते (पालन-पोषण पाते) हैं, दही मथकर वे मट्ठे के मटके बेच लेते हैं । व्रजराज श्रीनन्द जी का बड़ा नाम है, उनके यहाँ प्रतिदिन नौ लाख गायें दुही जाती है । उनके तुम पुत्र कहलाते हो और चोरी करके छप्पर उजाड़ते (अपने घर की कंगाली प्रकट करते) हो । श्यामसुन्दर! तुम कितना खाओगे, दही-मक्खन तो मेरे घर जहाँ-तहाँ ढुलकता फिरता है ।' )

मैया मैं नहीं माखन खायौ ॥



ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ ॥



देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ ॥



हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसैं करि पायौ ॥



मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्हीं, दोना पीठि दुरायौ ॥



डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ ॥



बाल-बिनोद-मोद मन मोह्यौ, भक्ति -प्रताप दिखायौ ॥



सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ ॥



( (श्यामसुन्दर बोले-) `मैया ! मैंने मक्खन नहीं खाया है ॥ ये सब सखा मेरी हँसी कराने पर उतारू हैं, इन्होंने उसे मेरे (ही) मुखमें लिपटा दिया तू ही देख ! बर्तन तो छींके पर रखकर ऊँचाई पर लटकाये हुए थे, मैं कहता हूँ कि अपने नन्हें हाथों से मैंने उन्हें कैसे पा लिया ? यों कहकर मुख में लगा दही मोहन ने पोंछ डाला तथा एक चतुरता की (मक्खन भरा) दोना पीछे छिपा दिया ॥ माता यशोदा ने (पुत्र की बात सुनकर) छड़ी रख दी और मुसकराकर श्यामसुन्दर को गले लगा लिया ॥ सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु ने अपने बाल-विनोद के आनन्द से माता के मन को मोहित कर लिया। (इस बालक्रीड़ा तथा माता से डरने में) उन्होंने भक्ति का प्रताप दिखलाया ॥ श्रीयशोदा जी को जो यह (श्याम के बाल-विनोद का) आनन्द मिल रहा है, उसे तो शंकर जी और ब्रह्मा जी (भी) नहीं पा सके ॥







अब एक मेरे मन की ....



बचपन से ही सूर का एक पद मुझे परम प्रिय रहा है...इस प्रसिद्द पद में सूर बताते हैं कि किस तरह बाल कृष्ण यशोदा से चाँद को खिलौना समझ दिला देने की जिद करते हैं ,



मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं ।



जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं ॥



सुरभी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं ।



ह्वै हौं पूत नंद बाबा को , तेरौ सुत न कहैहौं ॥



आगैं आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहि न जनैहौं।



हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहिया दैहौं ॥



तेरी सौ, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं ॥



सूरदास ह्वै कुटिल बराती, गीत सुमंगल गैहौं ॥



(श्यामसुन्दर कह रहे हैं) `मैया! मैं तो यह चंद्रमा-खिलौना लूँगा (यदि तू इसे नहीं देगी तो ) अभी पृथ्वी पर लोट जाऊँगा, तेरी गोद में नहीं आऊँगा । न तो गैया का दूध पीऊँगा, न सिर में चुटिया गुँथवाऊँगा । मैं अपने नन्दबाबा का पुत्र बनूँगा, तेरा बेटा नहीं कहलाऊँगा ।' तब यशोदा हँसती हुई समझाती हैं और कहती हैं-`आगे आओ ! मेरी बात सुनो, यह बात तुम्हारे दाऊ भैया को मैं नहीं बताऊँगी । तुम्हें मैं नयी पत्नी दूँगी ।' (यह सुनकर श्याम कहने लगे-) ` तू मेरी मैया है, तेरी शपथ- सुन ! मैं इसी समय ब्याह करने जाऊँगा।' सूरदास जी कहते हैं--प्रभो! मैं आपका कुटिल बाराती (बारात में व्यंग करने वाला) बनूँगा और (आपके विवाह में) मंगल के सुन्दर गीत गाऊँगा ।



Thursday, August 21, 2008

पुण्य प्रसून बाजपेयी का ब्लॉग

वेब यानी कि इन्टरनेट की दुनिया की पत्रकारिता के प्रेमियों के लिए एक और उम्दा और बड़ी ख़बर है.....तमाम खांटी पत्रकारों के बाद अब मशहूर पत्रकार और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के सबसे ज्यादा पहचाने चेहरों में से एक पुण्य प्रसून बाजपेयी ने भी ब्लोगिंग की डगर पर कदम धर दिया है। प्रसून जी को शायद ये लगता है कि उनका नाम किसी और नाम से ज्यादा चलेगा सो ब्लॉग का कोई नाम न धर के अपने ही नाम पर धर दिया .... हालांकि यह अच्छा भी है इससे नए और आलसी लोगों को इसे खोजने में आसानी होगी
ब्लोगिंग एक सशक्त मीडिया बन चुका है और प्रसून जी का भी इसमे उतर जाना इसकी गवाही देता है। प्रसूनजी के ब्लॉग की पहली पोस्ट एक बहुत ही लम्बी चौडी प्रस्तावना सी है जिसमे दुनिया की आजकल के हांल चाल ....हानि लाभ जीवन मरण का विषद वर्णन है। पहली पोस्ट कुछ लोगों को उबाऊ लग सकती है पर यकीनन वे सामग्री में विशवास नहीं करने वाले होंगे क्यूंकि पोस्ट वाकई उम्दा है। अगली दो पोस्ट उनके हाल के विदर्भ के यवतमाल के अनुभवों पर आधारित है......आगे और बहुत है क्यूंकि नया ब्लोगर तो रोज़ पोस्ट लिखता है न सो वे भी नियमित लिख रहे हैं।
हाँ अभी ब्लॉग पर एक शानदार कविता डाली है....मत रो माँ के शीर्षक से सो उसे भी पढ़े
हाँ ब्लॉग का पर एक माइक भी दीखता है जो शायद इसलिए है की प्रसून जी अपनी पहचान टीवी वाली ही रखना चाहते हैं ..... ब्लॉग का वेब एड्रेस है http://www.prasunbajpai.itzmyblog.com/

Monday, August 18, 2008

अति आत्मविश्वास या अति आशावाद ?


मुक्केबाज़ी के 54 किलोग्राम वर्ग के क्वार्टर फाइनल में मॉलडोवा के मुक्केबाज़ वेसलाव गोजान ने भारतीय मुक्केबाज़ अखिल कुमार को हरा दिया। इस मुकाबले में अखिल कुमार की हार के साथ भारत की ओलम्पिक में एक और मैडल की बड़ी उम्मीद पर तुषारापात हो गया। क्वार्टर फाइनल में अखिल ने विश्व चैम्पियन मुक्केबाज सर्गेई वोदोप्यानोफ़ को हरा कर सनसनी मचा दी थी और इसलिए उनसे उम्मीदें काफ़ी बढ़ गई थी।
रिंग में उतरे अखिल कुमार शुरुआत में आत्मविश्वास से लबरेज़ दिखे पर जल्द ही समझ में आ गया कि ये अति आत्मविश्वास था। पहले राउंड में अखिल ने १-१ के साथ के साथ बढ़त बनाई पर यही स्कोर दूसरे दौर में भी रहा, पर तीसरे और चौथे दौर में वेसलाव गोजान ने ६ अंक ले लिए और उनकी बढ़त अजेय हो गई।
क्वार्टर फाइनल में जीत के बाद एक निजी समाचार चैनल के साथ बातचीत में अति उत्साहित अखिल ने कहा था कि उन्हें ना तो किसी से डर है और न ही कोई उनके मुकाबले में है। उन्होंने बड़ी आक्रामकता से कहा था कि वे स्वर्ण पदक से कम किसी भी चीज़ पर समझौता नहीं करेंगे। शायद यही हुआ अब उन्हें स्वर्ण नही मिला है तो कोई भी पदक नहीं मिलेगा।
अखिल को दुनिया का सबसे बड़ा मन्त्र याद रखना चाहिए कि
अति का भला न बरसना, अति की भली ना धूप
अति का भला ना बोलना, अति की भली न चुप
तो अखिल भइया इससे बड़ा सबक नहीं मिलेगा, आप महान खिलाडी हैं पर महानता को घमंड खा जाता है !

Friday, August 15, 2008

सिग्नल ... बच्चा...झंडे....मैं... और १५ अगस्त !




आज स्वाधीनता दिवस पर जो महसूस हुआ वो इस कविता में है ..... इसके बाद नहीं समझता की ज्यादा कुछ कहने की ज़रूरत रहेगी इसलिए आप लोगो को सुनना चाहूँगा सो कृपया टिपण्णी करें .... जो भी कहना हो कहें पर कहें ज़रूर !


सुबह सुबह एक लाल बत्ती पर रुका


झंडे को देख कर झुका


स्कूल से निकलते


मासूम छातियों


और नन्हे हाथों में


सजे तिरंगों को देखा


ये नन्हे हाथ ही लिखेंगे


भविष्य का लेखा



सोच कर थी मुस्कराहट


चेहरे पर आई


पर तभी किसी ने


पीछे से आवाज़ लगाई


" बाबू जी झंडा ले लो !


गाड़ी पर खूब सजेगा


मेज़ पर भी चलेगा !"



मुड़ते ही पीछे पाया


एक और नन्हा बदन


हाथ में ढेर तिरंगे


नंगे बदन


"बाबू जी घर में बच्चो को देना,


खुश होंगे !'


वे नन्हे होंठ फिर हिले


पर


मेरे होंठ रह गए सिले



ट्रैफिक छूटा


और


मैं चल पडा


वो बच्चा वही खडा रहा


देखता


स्कूल से निकलते अपने हमउम्रों को


और हम


हर सिग्नल पर


उनसे मिलते हैं


और


उन्हें छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं



फिर अगले स्ग्नल पर मुझे आवाज़ आती है


" बाबू जी एक रुपये का झंडा है !


इससे सस्ता नहीं मिलेगा ....


बस एक झंडा ले लो ......??? "


पीछे मुड़ने पर मिलता है बच्चा


फिर वही


इस बार एक झंडा ले लेता हूँ


और देखता हूँ उसकी आंखों में


कम उम्र में अधिक भार


नन्हे हाथों में जीवन का विस्तार


कमज़ोर कन्धों पर बड़ी जिम्मेदारियां


ज़िन्दगी की दुश्वारियां



पूछा " बड़े होकर क्या करोगे ?"


जवाब मिला " काम करूंगा !!"


मैंने पूछा "मालूम है आज कौन सा दिन है ?"


जवाब था " नहीं !"


और फिर


वो चल पडा और कहीं !



बच्चा पता नहीं वो


समझदार या नादान था ...


पर उसके हाथों में झंडा


और


हालातों में हिन्दोस्तान था



अगले सिग्नल पर फिर पीछे से


" बाबू जी झंडा ले लो"


की आवाज़ आ रही है


पर इस बार पीछे देखने की


हिम्मत नहीं है !

Thursday, August 14, 2008

प्रथम वंदन !


स्वाधीनता की आज ६२वी सालगिरह हैं ................. दिन भर ब्लॉग पर जुड़ी सामग्री आती रहेगी पर शुरुआत करने के लिए सबसे पहले एक ऐसी रचना जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं ! ये रचना राम प्रसाद बिस्मिल की है और इसमे गहन देश प्रेम की अभ्व्यक्ति है सो सबसे पहले राष्ट्र को शत शत नमन ....


हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में शिर नवाऊँ ।

मैं भक्ति भेंट अपनी, तेरी शरण में लाऊँ ।।

माथे पे तू हो चंदन, छाती पे तू हो माला ;

जिह्वा पे गीत तू हो मेरा, तेरा ही नाम गाऊँ ।।

जिससे सपूत उपजें, श्री राम-कृष्ण जैसे;

उस धूल को मैं तेरी निज शीश पे चढ़ाऊँ ।।

माई समुद्र जिसकी पद रज को नित्य धोकर;

करता प्रणाम तुझको, मैं वे चरण दबाऊँ ।।

सेवा में तेरी माता ! मैं भेदभाव तजकर;

वह पुण्य नाम तेरा, प्रतिदिन सुनूँ सुनाऊँ ।।

तेरे ही काम आऊँ, तेरा ही मंत्र गाऊँ।

मन और देह तुझ पर बलिदान मैं जाऊँ ।।


इसके बाद वंदना की प्रस्तुति है राष्ट्रकवि मैथिलि शरण गुप्त की ..... मातृभूमि !


नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।

सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥

नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।

बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।

हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।

घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥

परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।

जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥
हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।

हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।

तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?

तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।

बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥
फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।

हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥

निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।

शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥

षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।

हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥
शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।

हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥

सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।

भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥

औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।

खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥
जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।

हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥

क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है।

सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥

विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।

भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥
हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।

हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥

जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।

उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥

लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।

उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥
उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।

होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥

Monday, August 11, 2008

हिरोशिमा नागासाकी ..... कुछ और !

हिरोशिमा और नागासाकी को समर्पित इस सप्ताह में हम आज अपने वादे को निभाते हुए, आपके लिए लाये हैं और कुछ सामग्री ! उस विध्वंस को हुए आज ६३ साल बीत चुके हैं पर आज भी उसके निशाँ इस दुनिया के बदन पर बाकी हैं। उस विध्वंस का इतिहास आपको हम पहले ही उपलब्ध करा चुके हैं आज हम बात अपने वादे के अनुसार अफलातून जी की उपलब्ध कराई २ और कवितायें उपलब्ध करायेंगे ....... ये कवितायेँ युद्ध और उसके परिणामों पर आधारित हैं......

युद्ध : दो
जो युद्ध के पक्ष में नहीं होंगे
उनका पक्ष नहीं सुना जायेगा
बमों और मिसाइलों के धमाकों में
आत्मा की पुकार नहीं सुनी जायेगी
धरती की धड़कन दबा दी जायेगी टैंकों के नीचे

सैनिक खर्च बढ़ाते जाने के विरोधी जो होंगे
देश को कमजोर करने के अपराधी वे होंगे
राष्ट्र की चिन्ता सबसे ज्यादा उन्हें होगी
धृतराष्ट्र की तरह जो अन्धे होंगे
सारी दुनिया के झंडे उनके हाथों में होंगे
जिनका अपराध बोध मर चुका होगा
वे वैज्ञानिक होंगे जो कम से कम मेहनत में
ज्यादा से ज्यादा अकाल मौतों की तरकीबें खोजेंगे
जो शान्तिप्रिय होंगे मूकदर्शक रहेंगे भला अगर चाहेंगे

जो रक्षा मंत्रालयों को युद्ध मंत्रालय कहेंगे
जो चीजों को सही-सही नाम देंगे
वे केवल अपनी मुसीबत बढ़ायेंगे
जो युद्ध की तैयारियों के लिए टैक्स नहीं देंगे
जेलों में ठूँस दिये जायेंगे
देशद्रोही कहे जायेंगे जो शासकों के पक्ष में नहीं आयेंगे
उनके गुनाह माफ नहीं किये जायेंगे

सभ्यता उनके पास होगी
युद्ध का व्यापार जिनके हाथों में होगा
जिनके माथों पर विजय-तिलक होगा
वे भी कहीं सहमें हुए होंगे
जो वर्तमान के खुले मोर्चे पर होंगे उनसे ज्यादा
बदनसीब वे होंगे जो गर्भ में छुपे होंगे

उनका कोई इलाज नहीं
जो पागल नहीं होंगे युद्ध में न घायल होंगे
केवल जिनका हृदय क्षत-विक्षत होगा ।
- राजेन्द्र राजन



अगली कविता गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की लिखी हुई है ..... मूल बांग्ला कृति के साथ उसका महात्मा गांधी द्बारा किया गया हिन्दी अनुवाद भी है !


जे युद्धे भाई के मारे भाई
(बांग्ला)

जे युद्धे भाई के मारे भाई
से लड़ाई ईश्वरेर विरुद्धे लड़ाई ।

जे कर धर्मेर नामे विद्वेष संचित ,
ईश्वर के अर्ध्य हते से करे वंचित ।

जे आंधारे भाई के देखते नाहि भाय
से आंधारे अंध नाहि देखे आपनाय ।

ईश्वरेर हास्यमुख देखिबारे पाइ
जे आलोके भाई के देखिते पाय भाई ।

ईश्वर प्रणामे तबे हाथ जोड़ हय ,
जखन भाइयेर प्रेमे विलार हृदय ।
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

(हिन्दी अनुवाद)

वह लड़ाई ईश्वर के खिलाफ लड़ाई है ,
जिसमें भाई भाई को मारता है ।

जो धर्म के नाम पर दुश्मनी पालता है ,
वह भगवान को अर्ध्य से वंचित करता है ।
जिस अंधेरे में भाई भाई को नहीं देख सकता ,
उस अंधेरे का अंधा तो
स्वयं अपने को नहीं देखता ।
जिस उजाले में भाई भाई को देख सकता है ,
उसमें ही ईश्वर का हँसता हुआ
चेहरा दिखाई पड़ सकता है ।
जब भाई के प्रेम में दिल भीग जाता है ,
तब अपने आप ईश्वर को
प्रणाम करने के लिए हाथ जुड़ जाते हैं ।
मूल बांग्ला से अनुवाद : मोहनदास करमचंद



अफलातून जी को एक बार फिर कोटि धन्यवाद करते हुए अब प्रस्तुत है कुछ तसवीरें जो हमें हाल ही में मिली ........



जब इतिहास रचा गया.....




यह अद्भुत दृश्य था.....विहंगम...कुछ विशवास नहीं कर पा रहे थे, कुछ मुस्कुरा रहे थे, कुछ चीख रहे थे और बाकी आंसुओं से भीगे थे ! दृश्य ही कुछ ऐसा था, तिरंगा लहरा रहा था और वो भी बीजिंग में ! जी हाँ .... और इसलिए क्यूंकि ओलम्पिक में भारत ने १९८० के बाद पहला स्वर्ण पदक जीता है। आपको भी विशवास नही हो रहा ? पर यह सच है ! यह पदक हाकी के अलावा किसी भी खेल में भारत का पहला स्वर्ण पदक है और यह इतिहास रचा है भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने ! उन्होंने 10 मीटर एयर राइफ़ल में स्वर्ण पदक हासिल किया।
जहाँ पिछले दो दिनों में एक एक करके सारी भारतीय उम्मीदें टूटती जा रहीं थी, बिंद्रा ने न केवल लाज रखी बल्कि सर गर्व से ऊंचा कर दियाइस बार हालांकि यह उम्मीद थी की हम कोई न कोई पदक जीतेंगे पर तीसरे ही दिन स्वर्ण पदक मिलना वाकई उस देश के लिए अतीव गर्व की बात है जहाँ लोग क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों की तरफ़ आंशिक रूप से भी गर्दन नही हिलाते। हाकी टीम के ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई ना कर पाने से निराश देशवासियों के लिए ये वाकई बड़ी ख़बर है बल्कि बहुत बड़ी ख़बर !
बिंद्रा का स्कोर रहा BINDRA Abhinav 100 99 100 98 100 99 596
Final shots: 10.7 10.3 10.4 10.5 10.5 10.5 10.6 10.0 10.2 10.8 104.5
Total Score : 700.5
अभिनव बिंद्रा का यह पदक १०४ साल में देश को मिला पहला व्यक्तिगत पदक है और यह निश्चित रूप से उनकी कड़ी मेहनत का परिणाम है। भारतीय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके स्वर्ण पदक जीतने पर बधाई दी है। भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि "ये बहुत बड़ा दिन है और देश के लिए बहुत गर्व की बात है। उनका कहना था कि अभिनव बिंद्रा युवाओं के लिए एक मिसाल बन गए हैं और इससे भारतीय युवाओं को बहुत बढ़ावा मिलेगा।" "अभिनव बिंद्रा के जीतने से भारतीय राष्ट्रीय ध्वज चीन में लहराया और राष्ट्रगान बजा जिससे हम सबका सर गर्व से ऊंचा हो गया" "कलमाडी का कहना था कि इसमें कोई शक नहीं कि ये ऐतिहासिक दिन है और इसका श्रेय भारतीय शूटिंग महासंघ को भी जाता है."
ज्ञात हो कि खेल रत्न से सम्मानित इस खिलाडी को पदक के दावेदार के तौर पर बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया था और न ही इस बार उनकी चर्चा ज्यादा थी लेकिन तुलसीदास ने कहा है कि सूर समर करनी करहिकही न जनावही आपु मतलब कि वीर कहते नहीं करके दिखाते हैं !


बिंद्रा तुम शूरवीर हो !


तुम लड़े....ऐसे देश में जहाँ लड़ना दुष्कर है


तुम लड़े ..... परिस्थितयों से


तुम लड़े....... समय से


तुम लड़े ....... अपने लिए नहीं, हम सबके लिए


तुम लड़े ...... देश के लिए


तुम जीते ..... इन सबके लिए


तुमको मिला सम्मान हमको मिला गौरवबोध है !


बिंद्रा ......... जीते रहो !!!

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