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Wednesday, September 10, 2008

पुलिया कमजोर है

सडकों के किनारे
अक्सर यह सूक्ति वाक्यलिखा मिलता है
पढ़कर कलेजा हिलता है
पुलिया कमजोर है कृपया धीरे चलें
ऐसी उलटी बात वोह भी सरेराह
सड़क विभाग को है मेरी एक सलाह
कृपया बोर्ड टाँगे
पुलिया कमजोर है
जल्दी भागें

Tuesday, September 9, 2008

हिन्दी सप्ताह और हिन्दी की बात ......

"हिंद के निवासी और भारत के वासी हम ,
इसका हमें तो अभिमान होना चाहिए ।
काहे भागते हैं अंग्रेजिअत के पीछे हम ,
अपनी गरिमा का हमें ध्यान होना चाहिए ।
बाहरी दिखावा और झूठा बहकावा ये,
इसका न हमको गुमान होना चाहिए ।
दूसरे की भाषा तो है बाद वाली बात,
अरे पहले हिन्दी का पूरा ज्ञान होना चाहिए !" -कवि हिम

हिन्दी सप्ताह

अ ने बी से कहा
आओ हिंदी मैं काम करे
बी ने सी से कहा
आओ हिन्दी मैं काम करे
सारे ऑफिस मैं था
हिन्दी -हिन्दी का शोर
हर एक कर्मचारी अधिकारी
हिन्दी प्रेम से सराबोर
हमने कहा आप सभी का हिन्दी के प्रति
ये प्रेम मन को लुभाने वाला है
वे बोले क्या करे मजबूरी है हिन्दी दिवस
जो आने वाला है

लालटेन कवि

जैसे कवि को कविता सुनाना एक रोग है
वैसे ही मंच के कवियों पर हमारा यह नया प्रयोग है
यानि की यह कविता है प्रयोगवादी
कवियों के गले मैं फूल मालाओं के स्थान पर
जलती हुई लालटेने लटका दी
श्रोता कवि को हूट करने का नया फार्मूला छोड़ता
लालटेन को गुलेल मारकरजरूर फोड़ता
इसी से प्रेरणा लेकर कुछ कवियों ने
अपने घर से अपनी नेम प्लेट तक हटा दी
और नेम प्लेट की जगह एक लालटेन लटका दी
इसी से प्रेरणा लेकर हमने भी एक लालटेन
अपने दरवाजे पर लटका दी
लटका कर जला दी जलते ही पता नही
किस मनहूस ने आकर बुझा दी
साथ मैंएक पर्ची और चिपका दी
रे कवि प्रयोग वादी तेरा यह लाल्तेनी प्रयोग हमे
बेहद पसंद आया है
सच पूछो तो आज हफ्तों के बाद भी
मिटटी का तेल नही मिल पाया है
ये बात मैं किसी और को नही बताऊँगा
आज का काम तो हो गया
कल फिर आऊँगा

Monday, September 8, 2008

हिन्दी सप्ताह की पहली रचना .... सुखद आश्चर्य

हिन्दी सप्ताह के लिए मांगी गई रचनाओं की पहली रचना आ चुकी है, और रचना वाकई में एक सुखद आश्चर्य की तरह आई है। हिन्दी सप्ताह के आयोजन की पहली रचना भेजी है देविका छिब्बर ने और यह सुखद आश्चर्य इसलिए है की हमारे ज़्यादातर साथियों ने देविका से हिन्दी रचना की उम्मीद नहीं की होगी। दरअसल देविका छिब्बर हमारे विश्वविद्यालय के उन छात्रों में से रहीं जिन्हें अंग्रेज़ी का अच्छा लेखक माना जाता रहा। देविका ने इरादा भी अंग्रेज़ी पत्रकारिता का ही किया और इस समय जी न्यूज़ के ऑनलाइन विभाग में अंग्रेज़ी कॉपी राइटर के तौर पर कार्यरत हैं। जो देविका को जानते हैं आज उनके कई भ्रम टूट जायेंगे की वे अंग्रेज़ी पत्रकार हैं बल्कि वे मानेंगे की वे हिन्दी की अच्छी लेखिका भी हैं.....इतनी शानदार रचना के बाद भी उनका निवेदन था की अच्छी हो तो ही प्रकाशित करना। देविका की ये रचना उन छद्म आवरण में बसने वालों के लिए एक सीख है कि माँ और मुल्क कभी बदले नहीं जाते .......
प्रस्तुत रचना देविका की पहली हिन्दी रचना है जो कहीं भी प्रकाशित हो रही है।
प्रस्तुत रचना में लेखिका का प्रयास रहा है कि उन के बीते हुए छात्र जीवन में हिन्दी ने किस तरह उन्हें लोगो से जोड़े रखा और जीवन के कुछ सबसे स्मरणीय क्षणों को और सुन्दरता प्रदान की। बाकी आप स्वयं पढ़ें.....

हिन्दी तुम मेरी साथी हो !
सुबह की सुर्ख लाली और शाम का चमकता सितारा
खुशियों का मौसम और बागों का महकता ठिकाना
दोस्त की वो मीठी बात और
हँसते हुए वो कॉलेज ना जाने का बहाना
कभी किसी पे हसना कभी ख़ुद मजाक का हिस्सा बनना
वो होठों की हँसी और शोर शराबे में क्लास में न पढ़ना

मौजों की लहर मतवाली
चाय की दुकान पर वो मीठी प्याली
कभी गलती पर डांट पड़ना
कभी मुस्कुरा के सारी बातें अनसुना करना
सत्र ख़तम होते होते वो भविष्य के इरादे
वो साथ रहने के वायदे

वो हम-तुम करने की शरारत
हर बात पे खीजना हर बात पे झल्लाना
पर फिर मुस्कुरा के दोस्ती की कसमें खाना
हर कसम पे नसीहत हर
नसीहत पे गुस्सा
हर गुस्से पे मुस्कराहट
हर मुस्कराहट का किस्सा
वो सारा आलम
आज भी मेरी यादों का हिस्सा

हर खुशी आपस में बांटना
हर दुःख में किसी का साथी होना
हर पल को खुशियों से तोलना
आखिरकार ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पे जीना

ये सब इतना आसान नही होता
अगर तू मेरे पास नही होती
तूने मेरी ज़िन्दगी को आसान ही नही बनाया है
बल्कि मेरे जीवन में जोश का जज्बा भी जगाया है
शायद मैं संवेदनाहीन होती
अगर मुझे तेरा साथ नही होता मिला
तू मेरी भाषा ही नही मेरी आत्मा है
मेरा विश्वास मेरा हौंसला
पूरी की तूने जीवन की कमियाँ
तू है मेरी मां

देविका ने अंत में कुछ शब्द अपने उदगारों के रूप में भेजे हैं इन्हे बिना सम्पादन के प्रकाशित कर रहा हूँ
"इसलिए मैं तेरा शुक्रिया करती हूँ और इस अवसर पर मैं तुझे शत शत प्रणाम करती हूँ इस हिन्दी ने हमें सब कुछ दिया
पर
हम आज उसे ही भूलते जा रहे हैं
क्या ये आज की ज़रूरत नहीं
एक तरफ़ हम जहाँ अपनी सभ्यता और परम्परा को बचने की बात करते है
वही प्रतिस्पर्धा के नाम पे अपनी मात्रभाषा को भूलते जा रहे हैं
चलो आज अपनी आवाजों को एक कर कर अपनी भाषा का वैसा ही ख्याल रखने का प्राण करे जैसे हम अपने मां बाप का रखते हैं "

देविका छिब्बर
ऑनलाइन
जी न्यूज़ लिमिटेड
FC-19, सेक्टर १६A
नॉएडा, उत्तर प्रदेश -२०१३०१
ई मेल : devikachhibber@gmail.com

शुभारम्भ .... हिन्दी सप्ताह

मित्रो, साथियों और कामरेडों ( वामपंथी अर्थों में नहीं ), आज से हम CAVS संचार पर हिन्दी सप्ताह का प्रारंभ कर रहे हैं। इस वेब आयोजन का उद्देश्य यह नहीं है कि हम इसके बाद हिन्दी को भूल जायेंगे और न ही यह कि हम अंग्रेज़ी सहित अन्य भाषाओं का विरोध या बहिष्कार कर रहे हैं बल्कि बात सिर्फ़ इतनी है कि दुनिया के साथ कदम मिलाने के लिए मां को छोड़ नहीं दिया जाता। बिल्कुल हिन्दी हमारी माँ है...... हिन्दी वह भाषा है जिसने पूरे देश को एक सूत्र में जोड़ा, कैसे जोड़ा वह हम सप्ताह भर बात करेंगे। हिन्दी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में महती भूमिका निभाई तो मित्रो हम इस सप्ताह बात करेंगे कि किस तरह इसे और प्रचलित और सहज बनाया जाए। हिन्दी किसी भाषा का विरोध नहीं करती पर यदि कोई हिन्दी बोलने वालों को हीन दृष्टि से देखता है तो वह अपने माता पिता और पूर्वजो पर भी शर्म महसूस करता है।

हिन्दी हमारी पहचान है ...... हमारे अतीत के गौरव का शिलालेख है ...... भविष्य के निर्माण की नींव है.......तरक्की के महान शिल्प कभी मांगे हुए औजारों से नही गढे जाते......

तरक्की करनी है तो बाहर का मुंह मत ताकें अपनी भाषा में ही तरक्की मिलेगी और बड़ी मिलेगी ...

आज पहले परिशिष्ट में भाषा और उन्नति के सम्बन्ध की बात जो कही थी हिन्दी के पितामह भारतेंदु ने,


निज भाषा उन्नति अहै


निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।

सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।


भारतेंदु हरिश्चन्द्र

Sunday, September 7, 2008

एक साथी और ........

मैं भी आ गया हूँ केव्स संचार पर अपने सीनियर्स का साथ देने । सबसे पहले सीनियर्स को मेरा प्रणाम और शुक्रिया की उन्होंने मुझे ये मंच दिया । मैं उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक नगर बनारस का निवासी हूँ। राजनीति में रूचि रखता हूँ। माखन लाल विश्व विद्यालय में केव्स प्रथम सेम का छात्र हूँ। सीनियर्स से गुजारिश है की मेरे पोस्ट पर अपने कमेंट्स दे कर मुझे प्रोत्साहित करें।

आशुतोष चतुर्वेदी

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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