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Sunday, February 7, 2010

अखबार हैं या मस्तराम की किताबें

महोदय, बड़े ही खेद के साथ ये निवेदन करना चाहता हूँ। मुझे नहीं पता की व्यस्क होने के बावजूद अपने बड़ों के सामने ऐसी बातें मुझे लिखनी भी चाहिए या नहीं। जिस पत्रकारिता को मिशन का नाम देते लोगों और बड़ों को सुना करता था। उसी को कुछ दिनों से जब समझने की कोशिश करता हूँ तो देखता हूँ की शायद प्रिंट की नैतिकता जो अब तक हिम्मत की पत्रकारिता करने का दंभ भरते थी। मीडिया वालों को मुंबई कांड की लाइव रिपोर्टिंग पर गरियाती थी। उनको कहती थी की आप भूत प्रेत चुड़ैल और नाग नागिन बेचते हो। आप रावण की मम्मी दिखाते हो अब शायद अपना अस्तित्व बचने की दौड़ में है। अब अखबार का मकसद खबर नहीं पोर्न सामग्री बेचना है। मैं तो कम से कम रोज़ लोगिन करता हूँ और देखता हूँ की आज फलने अखबार की साईट में कौन सी पोर्न सामग्री है। और तो और अब संपादक जी भी अपनी पसंद की सामग्री देते हैं की हमारी पसंद ये है। देखो तो देखो ऑफिस में न देख पाओ तो अपनी मेल पता बताओ पैक करवा कर के ले जाओ। आज नव भारत टेम्स के वेब साईट पर लोग इन करके गए तो देखा की संपादक जी भी अपनी पसंद के अश्लील चित्र डाल रहे हैं ऊपर लिखा है बकायदे संपादक की पसंद। भई हम तो कर्मचारी बनेंगे हम संपादक जी की पसंद पर ऊँगली कर दें तो अन्याय है। हमने तुरंत पैक करवा लिया है। नेट कैफे में जाकर पढेंगे। घर में तो शायद माताओं और बहनों के बीच में अखबार नहीं पढ़ सकते हैं ना। मामला संपादक जी की पसंद का है। हाँ अभी तक सुनता था क्योंकि प्रिंट कहता था की तुम टी आर पी पर भागते हो हम सुनते थे अब नहीं सुनूंगा क्योंकि तुमभी तो क्लिक पर मरते हो। link:http://www.photogallery.navbharattimes.indiatimes.com photo name : dare bare

आशु प्रज्ञा मिश्र
माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल

1 comment:

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

अर्थ...अनर्थ....मतलब की बात !

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