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Monday, April 19, 2010

थरूर तो गए...अब क्या मोदी?

शशि थरूर की कुर्सी जानी ही थी सो चली गई। और कोई मौका होता तो ललित मोदी बहुत बड़े हीरो के तौर पर सामने आते। लेकिन एक केंद्रीय मंत्री को उनके लगाए आरोपों की वजह से जाना पड़ा इससे ललित मोदी की मुसीबत असल में और बढ़ गई है। बीसीसीआई के सामने साधारण विकल्प है कि मोदी से कहे कि जब सरकार ने ठीक से जवाब नहीं दे पाने के कारण दस जनपथ के इतने करीबी शशि थरूर को बाहर का रास्ता दिखा दिया तो तुम्हारा तो अतीत भी कलंकित है और वर्तमान भी। अगली बलि ललित मोदी की चढ़ने वाली है। मगर वह सब बाद में।

यह तो पहले लिखा जा चुका है कि शशि थरूर के साथ सब कुछ वैसी ही मुद्रा में होने वाला था जैसा नटवर सिंह के साथ हुआ था और दस जनपथ के बहुत करीबी होने के बावजूद हुआ था। शशि थरूर से हर मंच पर सफाईयां मांगी गई, संसद में उन्होंने जो बयान दिया वह भी प्रणब मुखर्जी ने बोल कर लिखवाया था लेकिन कांग्रेस में या भारतीय राजनीति में शशि थरूर जैसे अभिजात मुद्राओं वाले नेताओं की अभी तक जगह नहीं बन पाई है। इस अभिजात आरोप को नकारने के लिए शशि थरूर ने सूट छोड़ कर कुर्ता पाजामा पहनना शुरू किया। ज्यादातर मलयालम बोलनी शुरू की और कोच्ची की आईपीएल टीम पर विवाद में भी अपना केरल प्रेम जाहिर करने की कोशिश की मगर वह काम नहीं आया। केरल का विदेश मंत्रालय और उसके विवादों से बहुत करीब का रिश्ता है। जवाहर लाल नेहरू की सरकार में वी के कृष्ण मैनन खुद नेहरू जी का चुनाव थे। वे सबसे पहले स्वतंत्र भारत के इंग्लैंड में उच्चायुक्त बनाए गए थे। उस दौर में संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के मुद्दे पर भारतीय पक्ष रखने पर आठ घंटे लंबा उनका भाषण आज तक लोगों को याद है। इसके बाद उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया और 1962 में जब चीन ने भारत को हरा दिया तो उन्हें जाना पड़ा। वैसे सेना में जीप खरीद घोटाले में भी उन पर आरोप लगे थे।

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम ने भारत की विदेश नीति चलाने वाले बहुत से बड़े नेताओं को भेजा है। थरूर की इसी सीट से कृष्ण मैनन जीते थे। तिरुवनंतपुरम अपनी साक्षरता और महाराजा त्रावणकोर के अलावा नारायण गुरु जैसे समाज सुधारकों के लिए भी जाना जाता है। दिल्ली की राजनीति और अफसरशाही में मलयाली मूल की बहुत महत्वपूर्ण जगह है और विदेश सचिव से ले कर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक केरल मूल के अधिकारी ही बनते रहे है। कृष्ण मैनन और थरूर की अलग तुलना की जाए तो दोनों में समानता यह है कि राजनैतिक छवि के अलावा उनकी छवि मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग में दुनिया भर में मशहूर राजनयिक और विद्वानों की रही है। थरूर के संसदीय परिचय में उनको लेखक और शांति रक्षक के अलावा संयुक्त राष्ट्र का भूतपूर्व उप महासचिव भी लिखा गया है। पहली बार ही वे 92 हजार वोटो से जीत कर आए लेकिन विवादो से दोस्ती करने में शशि थरूर का कोई जवाब नहीं है। कभी राष्ट्रगान को ले कर फंसते हैं, कभी टि्वटर को ले कर और अब आईपीएल विवाद ने तो लगभग उनका सफाया ही कर दिया।

केरल की राजनीति में सांसदों से आईपीएल की टीम बनवाने की बजाय समाज सेवा की अपेक्षा की जाती है लेकिन 54 साल की उम्र में भी युवा दिखने वाले शशि थरूर ने बहुत सालों तक पूरी दुनिया देखते रहने के अपने अनुभव के आधार पर अपनी आधुनिक छवि पेश करने का फैसला किया। मगर दस जनपथ का कमाल यह है कि उसने न अपने तीन पीढ़ी से वफादार नटवर सिंह की उपेक्षा की बल्कि जिन थरूर को राहुल गांधी और मनमोहन सिंह बहुत समझा और पटा कर राजनीति में लाए थे, उनकी रक्षा की भी कोई परवाह नहीं की गई। शशि थरूर ने गलती से यह मान लिया था कि अपनी आधुनिक छवि और परंपरागत शैली के हिसाब से उनके पास युवा और पढ़े लिखे मतदाताओं का अपना चुनाव क्षेत्र बन गया है। उन्होंने एक स्वायत्त किस्म की राजनीति शुरू की। थरूर ने मनमोहन सिंह से कुछ नहीं सीखा जिन्हें राजनीति नहीं आती है मगर वफादारी का अभिनय अच्छा कर लेते हैं। मनमोहन सिंह ने तीन पार्टी अध्यक्षों और तीन प्रधानमंत्रियों के साथ अलग अलग पदों पर काम किया और लगातार वफादार बने रहे। शायद इसीलिए जब सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुन लिया गया था तो उन्होंने अपना ताज पालतू मनमोहन सिंह को पहना दिया। यूपीए अगर ठीक से चलती रही तो मनमोहन सिंह जवाहर लाल नेहरू के बाद सबसे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड बनाएंगे।

थरूर की दिक्कत यह भी है कि वे जो सोचते हैं, कह देते हैं और इंटरनेट के जमाने में एक सेकेंड में उनकी बात दुनिया भर में फैल जाती है। अमेरिका और दूसरे लोकतंत्राें ने बड़े नेता टि्वटर और फेसबुक पर हैं और अपनी निजी राय जाहिर करते रहते हैं लेकिन उन पर कोई सवाल नहीं उठाता। फ्रांस के सरकोजी तो अपनी प्रेमिकाओं की तस्वीरे ऑरकुट पर डालते हैं और जनता से उन पर राय मांगते हैं। मगर यह भारत हैं और भारतीय राजनीति के कुछ सुविधाजनक संस्कार बन गए हैं। भारतीय राजनीति में नेता की जो छवि है उसे तोड़ने वालों को आसानी से माफ नहीं किया जाता। अमिताभ बच्चन जैसे महानायक इसी छवि की वजह से राजनीति से जाने पर मजबूर हुए। अरुण नेहरु, अरुण सिंह और अशोक मित्रा ने मणिशंकर अय्यर, यशवंत सिन्हा और बंगाल के वित्त मंत्री असीम दास गुप्ता से कोई सबक नहीं सीखे। मणिशंकर अय्यर तो जब कॉलम लिखते थे तो काफी उग्र शब्दों में लिखते थे मगर उन्हें अपनी सीमाएं मालूम थी। उन्होंने नेहरू, गांधी परिवार को ऐतिहासिक संदर्भों में भी कभी शामिल नहीं किया। भारतीय राजनीति में बने रहने के लिए आपके पास एक बड़ा आश्रय होना चाहिए और उस आश्रय का सम्मान या कम से कम सम्मान का अभिनय करना आना चाहिए यह बात थरूर भूल गए। वे पेशेवर नेता नहीं है। थरूर की राजनीति का क्या होगा यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन कांग्रेस के लिए वे पूंजी अब भी हैं। राजनीति उनकी मजबूरी नहीं हैं। सात लाख रुपया महीना टेक्स फ्री पेंशन उन्हें संयुक्त राष्ट्र से मिलती है और वे जिस दिन चाहेंगे उस दिन कोई भी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी उन्हें अपना सीईओ बना कर बुला लेगी। कई ऐसे बड़े राजनेता रहे हैं जिन्होंने अपनी राजनीति खूंटी पर टांग कर अपने अपने कारोबार में मन लगाया है।

आलोक तोमर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, टीवी-फिल्म पटकथा लेखक हैं)

2 comments:

  1. बेहतर लिखा है। कांग्रेस की राजनीति राजशाही की है। उस पर आंच कैसे बर्दाश्त हो सकती है।

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  2. कांग्रेस की राजशाही का अच्छा वर्णन किया है आपने पर मुझे कुछ और भी लगता है , मुझे लगता है की ये ललित मोदी के पैसे का कमाल है की आज शशी थरूर को पद छोड़ना पड़ा , खैर देखिये अभी खेल बाकी है ....

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