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Thursday, April 1, 2010

गुजरात दंगे और विभिन्न नजरिया

गुजरात दंगे के बाद जिस तरह से नरेंद्र मोदी और गुजरात की गलत छवि पूरी दुनिया मे पेश की गई वो राजनीतिक के धुरंधर खिलाड़ियों को अपनी दुकान चमकाने मे भले मदद करता हो लेकिन यह गुजरात की 5.50 करोड़ जनता के साथ अन्याय है... क्योकि उसी मोदी को दो बार भारी बहुमत से वहां की जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से विधानसभा मे पहुंचाया तो आप किस बिना पर मोदी को बदनाम कर सकते है. आपको गुजरात दंगे की त्रासदी तो दिखाई देती है लेकिन गुजरात मे दंगे क्यो हुए उसकी पीड़ा नही दिखाई देती हैं. जब किसी भी घटना या दुर्घटना को एक पक्षीय नजरिये से देखा जाता है तो पीड़ित जनता अपनी वोटिंग के अधिकार से अपनी भावना को व्यक्त करने मे गुरेज नही करती है यही मोदी के साथ हुआ. तथाकथित धर्मनिरपेक्षियों ने जिस तरह से गुजरात को बदनाम किया उस स्थिति मे गुजरात की जनता ये महसूस करने लगी कि उसके सामने मोदी के अलावा कोई विकल्प नही है और इसलिए वो विधानसभा चुनाव जीतने मे कामयाब रहे है. ऐसा नही है कि गुजरात या मोदी का विरोध केवल भारत मे ही हुआ बल्कि एक विशेष तबके ने मोदी का विरोध अमेरिका और इग्लैंड मे भी किया. मोदी से घृणा करने वाले उन तमाम लोगो ने यूरोप, अमेरिका और खाड़ी के देशों मे मोदी वहां की सरकार पर यह दवाब डाला कि किसी भी कीमत पर मोदी को इन देशों मे आने का वीजा ना दिया जाए. खैर आपका काम है विरोध करना लेकिन जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है और इसी स्तंभ के कुछ लोग द्वारा बिना सोचे समझे और घटना का पूरा पड़ताल किये हुए मोदी के हजारो लोगो की मौत का गुनाहगार ठहराया जाता है तो उसे किसी भी कीमत पर जायज ठहराया नही जा सकता है. यह समझा जाता है कि मीडिया समाज का दर्पण होता है और अगर दर्पण गंदा हो जाता है तो लोग उसमे अपना चेहरा देखना पसंद नही करते है. और ऐसा ही आजकल मीडिया मे कुछ लोग कर रहे है.... मेरा मानना है कि दंगे मे जो लोग हिंसा के शिकार हुए चाहे वह ट्रेन मे दंगाइयो द्वारा जलाये गये हो या 27 फरवरी 2002 के बाद से पीड़ित लोग हो उसको सजा मिलनी चाहिए लेकिन साथ मे ये भी याद रखा जाए कि ना सिर्फ गुजरात बल्कि 1947 से लेकर अब तक देश मे जितने भी दंगे हुए उन दंगे पीड़ित लोगो को भी न्याय मिल सके. चाहे वह 2008 का असम दंगा जिसमे 60 से ज्यादा आदिवासी मारे गये या फिर हालिया बरेली और हैदराबाद का दंगा हो इस घटना के पीछे शामिल तमाम लोगो पर कार्यवाई होनी चाहिए....जिस तरह का गठजोड़ इंदिरा गांधी को हराने के लिए उस समय के तत्काल विपक्ष ने किया था ठीक उसी तरह का गठजोड़ 2002 और 2007 के चुनाव मे विपक्षी दलो, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पंथियो ,प्रायोजित एनजीओ ,और मीडिया के खासे वर्ग ने मोदी के खिलाफ लेकिन मोदी फिर भी मजबूती से उभरे और उभर रहे है. ये बात समझ से परे है क्योकि मीडिया के कुछ खास लोग गुजरात दंगे का मीडिया ट्राइल कर रहे है क्योकि मीडिया ट्राइल से न्याय प्रक्रिया पर असर नही होता बल्कि देश का आम जनमानश दिगभ्रमित होता है....अब सवाल तीस्ता सीतलवाड़ ..क्यो इन्हे दिखता है सिर्फ गुजरात दंगे का जख्म....क्यो इन्हे नही दिखता है 27 फरवरी 2002 –ट्रेन दुर्घटना से पीड़ित इन 59 परिवारों का दर्द जिसके परिजनों को 500 से ज्यादा लोगो ने आग के हवाले कर दिया था....
क्यो इन्हे नही दिखता जम्मू काश्मीर के दस लाख हिंदू विस्थापितों का दर्द जो पिछले 60 साल से विस्थापितों की जिदंगी जी रहे है..
क्यो इन्हे नही दिखता दंतेवाड़ा,बीजापुर, मीदनापुर के भोले भाले आदिवासियों का दर्द जो नक्सली हिंसा से सर्वाधिक पीड़ित है.....
क्यो इन्हे नही दिखता है आतंकवाद से पीड़ित परिवारों का दर्द क्यो इन्हे नही दिखता है 26नवंबर 2008 ,11 जुलाई 2006 13 सितंबर 2008 के आतंकवादी घटना के शिकार परिवार और सैना के जवानों का दर्द क्या इनका कोई मानवाधिकार नही है क्या ये देश के नागरिक नही है..
क्या तिस्ता सीतलवाड़ को हैदराबाद और बरेली की हिंसा नही दिखती है आज पुराने हैदराबाद और बरेली मे क्या हुआ क्या इसके लिए तिस्ता सीतलवाड़ या सिर्फ तिस्ता ही क्यो उन तमाम तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादी और मीडिया के खास वर्ग ने कभी यह मांग की बरेली और हैदराबाद दंगे की जांच के लिए कमेटी बनाई जाए और आयोग की स्थापना की जाए .क्या इसके लिए कभी भी कोर्ट मे किसी ने कोई याचिका लगायी जवाब है नही क्रमश: ....

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