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Friday, May 1, 2009

१ मई....मजदूर दिवस पर...


गर्द चेहरे पर, पसीने में जबीं डूबी हुई
पसीने मे कोहनियों तक आस्तीं डूबी हुई

पीठ पर नाक़ाबिले बरदाश्त इक बारे गिराँ
ज़ोफ़ से लरज़ी हुई सारे बदन की झुर्रियाँ

हड्डियों में तेज़ चलने से चटख़ने की सदा
दर्द में डूबी हुई मजरूह टख़ने की सदा

पाँव मिट्टी की तहों में मैल से चिकटे हुए
एक बदबूदार मैला चीथड़ा बाँधे हुए

जा रहा है जानवर की तरह घबराता हुआ
हांफता, गिरता,लरज़ता ,ठोकरें खाता हुआ

मुज़महिल बामाँदगी से और फ़ाक़ों से निढाल
चार पैसे की तवक़्क़ोह सारे कुनबे का ख़याल

अपनी ख़िलक़त को गुनाहों की सज़ा समझे हुए
आदमी होने को लानत और बला समझे हुए

इसके दिल तक ज़िन्दगी की रोशनी जाती नहीं
भूल कर भी इसके होंठों तक हसीं आती नहीं।

सीमाब अकबराबादी

2 comments:

  1. मजदूर की वास्तविक हालत पर अच्छी रचना।

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  2. ahaha,
    bilkool dard ka manjar hai chahe wo company ke under ho ya bahar ho...........

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