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Saturday, October 17, 2009

ये शाम चरागों के नाम

एक अभिन्न मित्र के एक ई मेल से प्राप्त शुभकामना संदेश से आज के इस केव्स के शुभकामना लेख का आरम्भ करना चाहूँगा....रायपुर से ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़ में काम कर रहे पत्रकार साथी महेश मेवाडा लिखते हैं.....

जो कहीं-ना-कहीं बसा है, हर किसी के हृदय में,
क्यों ना उन दीयों को साथ यूँ सजाएँ हम ,
ना अँधेरा रहे कहीं दूर-दूर तक
कुछ इस तरह से दीवाली मनाएँ हम ।


दरअसल दीपावली को मनाने के पीछे कितने भी संख्य या असंख्य कारण गिना दिए जाएँ.....उत्सवधर्मिता की मूल भारतीय प्रकृति और तम की राह रोक अपने आस पास उजाले के अवतरण की कोशिशों की आदत....फिर चाहे वो उजाला भौतिक हो....सडकों पर....घरों पर या फिर वो लोगों की ज़िन्दगी में हो...या अपने मन के भीतर उजाले की खोज हो.....
भारतीय यानी कि हम स्वभाव से ही उत्सवधर्मी हैं....और इसी लिए जन्म से मृत्यु तक कोई अवसर ऐसा नहीं होता जब हम उत्सव मनाने का मोह छोड़ पाते हों.....शरद आते ही त्योहारों की लम्बी श्रृंखला इसी का उदाहरण है.....कहानी में भले ही राम घर लौट हों और अयोध्या सजी हो...पर यही वो वक़्त है जब इस वक़्त की प्रमुख फसल कट के आती है.....और फिर हम मंगल के प्रतीक गणेश और समृद्धि की आराध्या लक्ष्मी को उस उपजे हुए अन्न की भेंट चढाते हैं.....और साथ ही मनाते हैं फसल की खुशियाँ....जलाते हैं दीप और बीते अतीत की गौरव और आने वाले कल की तस्वीरें एक साथ दीयों की लौ में झिलमिलाने लगती हैं......और कतारों में चमकती है दीपावली.....
दुनिया बदल रही है...बीती दो सदियों में जिस तरह से इंसान लहू बहा कर एक दूसरे की जिंदगियों में अँधेरा करने पर आमादा था ....अब हालात बदले हैं....लोग जीना चाहते हैं...और जिन हाथों में संगीनें थी....आज धीरे धीरे उन सब हाथों में सब्र....सुकून.....और सवाब पाने की बेचैनी है....लोग अब दुनिया में अमन चाहते हैं और अपने अपने स्तर पर कोशिशों में लगे भी हैं.....
उजाला कुछ वक़्त के लिए रुका ज़रूर था...पर उसने हार नहीं मानी थी....वो आ रहा है...आता रहेगा ......और जीतेगा हमेशा.....यही उम्मीद शायद उजाले की जीत है...और दीपावली की रीत है.....आमीन.....और आख़िर में हमेशा की तरह नीरज की वही पंक्तियाँ दीवाली पर बरबस याद आ जाती हैं.....
सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही
भले ही दीवाली यहाँ रोज़ आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर
कहीं रह ना जाए

2 comments:

  1. बेहतरीन आलेख..नीरज की यह पंक्तियां हमेशा याद रहती हैं:

    सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
    दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
    खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
    दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

    सादर

    -समीर लाल 'समीर'

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