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Friday, September 12, 2008

शीर्षक !

हिन्दी सप्ताह की एक अन्य रचना आई है सुधीर सक्सेना ' सुधि' जी की ओर से। सुधीर जी जयपुर में रहते हैं और गाहे बगाहे इनकी रचनायें ब्लॉग जगत में देखने को मिल जाती हैं। इस बार ये हमारा सौभाग्य है कि इन्होने केव्स संचार के लिए अपनी रचना हमें भेजी है। आप ख़ुद ही पढ़ें और आनंद लें इस कटाक्ष का,


शीर्षक !

मेरी कविता का शीर्षक

जो गुम हो गया था,

शब्दों की भीड़ में,

कल शाम अचानक

मिल गया सड़क पर

एक वृद्ध भिखारी की

लाठी से लिपटा हुआ.

हम एक दूसरे को देखकर

बहुत रोये.

मैने उससे कहा- चलो

कविता तुम्हारी प्रतीक्षा

कर रही है.

उसने कहा- नहीं,

मैं नहीं जा सकता

तुम्हारी वो कविता

सिर्फ़ कल्पना है

पर यहाँ मैं

हकीकत में जी रहा हूँ!


-सुधीर सक्सेना 'सुधि'


75/44, क्षिप्रा पथ, मानसरोवर, जयपुर-३०२०२०


sudhirsaxenasudhi@yahoo.com



एक चर्चा हिन्दी सप्ताह पर

हिन्दी सप्ताह के अवसर पर अक्सर हिन्दी के कलम घिस्सुओं के द्वारा ये चखचख उठाई जाती है की हमे मातृभाषा में ही कार्य करना है हम इस बात का प्राण ठान लेते हैं की मर जायेंगे पर काम हिन्दी में ही करेंगे। पर हर एक हिन्दी सप्ताह ऐसे गुजरता जाता है जैसे बिन ब्याही लड़की की जवानी। बेचारी अपनी व्यथा को किसी से कह भी नही सकती। शाम को जब पिता घर लौटकर आता है तो माँ पूछती है किया जवाब मिला तो उस वक्त यदि उस पिता को कोई गोली मार दे तो शायद उसे अफ़सोस कम होता की आज भी में तेरे लिए लड़के को समाज के इस बाज़ार से खरीद नही सका बेटी !मुझे माफ़ कर दे मैं एक पिता नही बन सका। ठीक यही दशा हमारी हिन्दी माता की है वो बेटों वाली विधवा की तरह अपने ही घर में निर्वासित की तरह रह रही है। भारतेन्दुबाबु जैसे कुछ सपूतों ने हिन्दी माता की अस्मत को ढकने के प्रयत्न किए और वो उसमे सफल भी हुए। अब ये जिम्मेवारी हमारे ऊपर है हमें बचाना है हिन्दी की इज्जत और प्रतिष्ठा को हम किसी पड़ोसी को मौका क्यों दें की वो हमसे कहे की अपनी माता का ख्याल रखा करो। वो कल बहुत दुखी दिख रही थी। हमें दिखा देना है दुनिया और इस विश्व परिद्र्स्य को हिन्दी के सपूत अभी जीवित हैं और जिस वक्त एक सौ चालीस करोड़ भारतीय जनमानस की गूंज पूरीदुनिया में गूंजेगी तो दुनिया के सामने उसी तरह भागने का कोई भी रास्ता नही होगा जैसे मार्तंड के उदित होने पर रजनीश के पास भाग जाने के सिवाय कोई रास्ता नही होता।
जय भारत जय भारती जय हिन्दी

Thursday, September 11, 2008

साहित्य की महादेवी

आज ११ सितम्बर है , आप लोगों को याद होगा अमेरिका पर आतंक के हमले के लिए । मुझे याद है हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल की मीरा महादेवी वर्मा की पुण्य तिथि होने के कारण । आज ही के दिन १९८७ में वो दुनिया को छोड़ गयीं थीं । आज मैं उनको याद करते हुए , उन्ही की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ , जो मेरी व्यक्तिगत पसंद भी है ......

मैं बनी मधुमास आली!

आज मधुर विषाद की घिर करुण आई यामिनी,

बरस सुधि के इन्दु से छिटकी पुलक की चाँदनी

उमड़ आई री, दृगों में सजनि, कालिन्दी निराली!


रजत स्वप्नों में उदित अपलक विरल तारावली,

जाग सुक-पिक ने अचानक मदिर पंचम तान लीं;

बह चली निश्वास की मृदु वात मलय-निकुंज-वाली!

सजल रोमों में बिछे है पाँवड़े मधुस्नात से,

आज जीवन के निमिष भी दूत है अज्ञात से;

क्या न अब प्रिय की बजेगी मुरलिका मधुराग वाली?

मैं बनी मधुमास आली!

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

काफ़ी दिनों से हमारे कुछ पाठकों और साथियों की इच्छा थी की ब्लॉग के मुख्या पृष्ठ पर एक यूनिकोड हिन्दी टंकण का औजार ( टूल ) उपलब्ध कराया जाए तो हमने सोचा की इसके लिए हिन्दी सप्ताह से बेहतर मौका क्या होगा ...... हिमांशु कई बार फरमाइश कर चुका है सो प्रस्तुत है गूगल बाबा का हिन्दी टंकण औजार ......


इसमे आप सीधे रोमन में टंकित करके उसे हिन्दी में परिवर्तित कर सकते हैं, ये उन पाठको के लिए बहुत काम का है जो अपनी टिप्पणियाँ अभी रोमन में देते हैं ..... इस औजार के लिए हिंद युग्म के शम्भू जी का भी हार्दिक आभार !


इसका प्रयोग करने के लिए ब्लॉग के पृष्ठ के सबसे नीचे जायें और रफ़्तार के सर्च टूल के ऊपर इसे खोजें, उसके बाद इसमें टंकित करें ऐसे .....

शृंगार है हिन्दी ( हिन्दी सप्ताह श्रृंखला )

सबसे पहले तो आशु प्रज्ञ और हिमांशु को बहुत साधुवाद, इन दोनों ने लगातार हिन्दी सप्ताह को जीवंत बनाए रखा। इन दो दिनों की अस्वस्थता के कारण लगा कि पता नहीं हिन्दी सप्ताह का प्राण पूरा होगा कि नहीं पर इन लोगों ने प्रयास को सफल किया। फिलहाल आज थोडा ठीक हूँ तो फिर से वापस हूँ और आज आप लोगों के सामने प्रस्तुत करूंगा एक ऐसी कविता जो हिन्दी के बारे में है।


इस कविता के रचयिता कवि हैं रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु '। इनका जन्म १९ मार्च १९४९ को ग्राम हरिपुर, तहसील बेहट, जिला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनकी प्रमुख कृतियाँ माटी, पानी और हवा, अँजुरी भर आसीस, कुकड़ूकूँ, हुआ सवेरा, असभ्य नगर(लघुकथा संग्रह), खूँटी पर टँगी आत्मा(व्यंग्य -संग्रह) हैं। वर्तमान में काम्बोज जी केन्द्रीय विद्यालय आयुध उपस्कर निर्माणी, हज़रतपुर, जिला फ़िरोज़ाबाद, उत्तर प्रदेश में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।


श्रृंगार है हिन्दी

खुसरो के हृदय का उदगार है हिन्दी ।
कबीर के दोहों का संसार है हिन्दी ।।
मीरा के मन की पीर बनकर गूँजती घर-घर ।
सूर के सागर- सा विस्तार है हिन्दी ।।


जन-जन के मानस में, बस गई जो गहरे तक ।
तुलसी के 'मानस' का विस्तार है हिन्दी ।।
दादू और रैदास ने गाया है झूमकर ।
छू गई है मन के सभी तार है हिन्दी ।।

'सत्यार्थप्रकाश' बन अँधेरा मिटा दिया ।
टंकारा के दयानन्द की टंकार है हिन्दी ।।
गाँधी की वाणी बन भारत जगा दिया ।
आज़ादी के गीतों की ललकार है हिन्दी ।।

'कामायनी' का 'उर्वशी’ का रूप है इसमें ।
'आँसू' की करुण, सहज जलधार है हिन्दी ।।
प्रसाद ने हिमाद्रि से ऊँचा उठा दिया।
निराला की वीणा वादिनी झंकार है हिन्दी।।

पीड़ित की पीर घुलकर यह 'गोदान' बन गई ।
भारत का है गौरव, शृंगार है हिन्दी ।।
'मधुशाला' की मधुरता है इसमें घुली हुई ।
दिनकर के 'द्वापर' की हुंकार है हिन्दी ।।

भारत को समझना है तो जानिए इसको ।
दुनिया भर में पा रही विस्तार है हिन्दी ।।
सबके दिलों को जोड़ने का काम कर रही ।
देश का स्वाभिमान है, आधार है हिन्दी ।।


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

साभार : कविता कोष (http://www.kavitakosh.org/)

पन्द्रह अगस्त

हमने नेता जी से कहा ,
आज तो पन्द्रह अगस्त है
वे बोले तभी तो हम मस्त है
हमने कहा आज क्या कार्यक्रम है
वे बोले गरमा गरम है
सुबह झंडा फहराने जाना है
उसके बाद प्रभात फेरी मैं जाना है
फिर दोपहर मैं नॉन वेजिटेरियन लंच भी निपटाना है
हमने कहा उसके बाद कहीं
वे बोले कुछ ख़ास नही
हाँ आज हमने पूरा दिन देश की याद
मैं बिताने की कसम खायी है
शाम को अंग्रेजी की जगह देशी मंगवाई है
शौक रखते हो तो आईयेगा
मैंने कहा वाह नेता जी तुमने यहाँ
भी हमे बना दिया
जब तक अच्छी वाली मंगवाई तब तक
पूछा भी नही
और देसी मंगवाई तो दावत पर बुलवा लिया
नेता जी तुम जियो बरसो बरस जियो
तुमने देश भी अकेले पिया है
देसी भी अकेले पियो

Wednesday, September 10, 2008

अंदाज़ ऐ बयाँ

मेरी बातों को हलके में लेने की गुस्ताखी मत कीजियेगा हुजुर हमने आसमानों को सीने में दफ़न कर रखा है

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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