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Monday, November 16, 2009

जन्मदिन मुबारक जनसत्ता

सत्रह नवम्बर १९८३ को प्रभाष जी ने हिन्दी पत्रकारिता को तेवर दिए थे। जनसत्ता की शुरुआत करके। प्रभाष जी पिछले दिनों ही हमसे दूर हुए। अपने बिल्कुल शुरूआती वर्षों में जनसत्ता ने लोकप्रियता के सभी कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। हम आज भी वो कहानी सुनते हैं जब प्रिंटर की बीमारी के चलते जनसत्ता के पाठकों से ये अपील की गई थी की उसे मिल बाँट के पढ़ा जाए। इसे चौथा थाना कहा जाता था। १९८३ में भारत की एक टीम विश्वकप उठा लायी थी। जनसत्ता की एक टीम की चर्चा आजतक होती है। भले ही ये बिखर गई हो। ये सबकुछ आज भी सुना, पढ़ा और लिखा जाता है। जनसत्ता आज भी दूसरों से आगे है लेकिन ख़ुद से कहीं पीछे हो गया है। इस मोड़ पर प्रभाष जी का एकदम से जाना और दुखद है। आज जनसत्ता के जन्मदिन के रोज़ हम इस बात की उम्मीद कर सकते हैं की ये दुबारा से अपने स्वर्णकाल तक पहुचेगा।

Friday, November 13, 2009

प्रभाष जी की आत्मा को भगवान कभी शांति नहीं दे...


प्रभाष जोशी चले गए। उनकी अस्थियां भी उस नर्मदा में विसर्जित हो गई जिस वे हमेशा मां कहते थे और अक्सर नर्मदा को याद कर के इतने भावुक हो जाते थे कि गला भर आता था। इन दिनों हमारे प्रभाष जी को ले कर संवेदनाओं के लेख, संस्मरण और शोक सभाओं का दौर चल रहा है। वे लोग जो कुछ दिन पहले तक इंटरनेट पर प्रभाष जी को इस युग का सबसे पतित, मनुवादी और ब्राह्मणवादी पत्रकार करार दे रहे थे, उनकी बोलती बंद है। उनमें से कई तो उनके निधन पर घड़ियाली आंसू भी बहाते दिखे। लेकिन अब वक्त प्रभाष जी को याद करने से ज्यादा उनके सरोकारो को याद करने का है। तिहत्तर साल की उम्र में भी जिन सरोकारो को ले कर प्रभाष जी देश के हर कोने तक हर किस्म के वाहन से और होटलों से ले कर लोगों के घरों में ठहर कर पत्रकारिता के कायाकल्प और उसमें आ गए दोषों से कलंक मुक्ति की अलख जगा रहे थे, उनके इसी सरोकार को जारी रखना और आगे बढ़ाना शायद प्रभाष जी को सबसे बड़ी श्रध्दांजलि होगी।
पता नहीं आज जो लोग आंसू बहा रहे हैं वे इस सरोकार को सहेजने में कितनी रुचि दिखाएंगे। सरोकार रोटी और शराब के पैसा नहीं देता। उसके लिए तो प्रभाष जी जैसा कलेजा चाहिए और एक सक्रिय और तेजस्वी वैराग्य चाहिए। प्रभाष जी पत्रकारिता के नाम पर हो रही धंधेबाजी के खिलाफ जूझ रहे थे। वे समाज की हर बुराई और हर अन्याय के खिलाफ लड़ रहे थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ भी वे खड़े थे और बंगाल के नंदीग्राम के ग्रामीणों के साथ भी शामिल थे। हमारे मित्र और विश्वविख्यात कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा बता रहे थे कि चंडीगढ़ में एक्सप्रेस के संपादक रहने के दौरान उन्होंने एक सवाल किया था कि जिस देश में 70 प्रतिशत लोग खेती पर आधारित हो वहां गंभीर कृषि पत्रकारिता क्यों नहीं हो सकती? देवेंद्र शर्मा कृषि वैज्ञानिक बनने के रास्ते पर थे मगर कृषि पत्रकार बन गए और इन दिनों उन्हीं से पता लगा कि विदेशी बीजों और मल्टीनेशनल खेती के अलावा किसानों पर कर्जे के खिलाफ भी प्रभाष जी की जंग जारी थी।
प्रभाष जी के बेटे संदीप ने उनके अंतिम क्षणों का वर्णन किया है। सचिन के आउट होते ही वे टीवी वाले कमरे से उठ कर चले गए थे और संदीप जो खुद भी रणजी और कांउटी तक खेल चुके थे, ने पिता को फोन किया तो आखिरी सवाल था कि क्या स्कोर हुआ है? इसके बाद फोन मां ने लिया और कहा कि बेटा जल्दी आओ, पिता जी बेहोश हो गए। सो प्रभाष जी के अंतिम शब्द थे- 'क्या स्कोर हुआ है'। क्रिकेट की भाषा में ही कहे तो प्रभाष जी ने अपने आपको हिट विकेट कर दिया। उम्र हो चली थी। पच्चीस साल से शुगर के मरीज थे। एक बाई पास सर्जरी हो चुकी थी। पेस मेकर लगा हुआ था। फिर भी अगर किसी से मिलना है तो मिलना है। तीन मंजिल चढ़ के चले जाएंगे।
प्रभाष जी जैसा न कोई हुआ है, न कोई होगा क्योंकि जैसा कि पहले और हमेशा कहा कि प्रभाष जोशी बनने के लिए कलेजा चाहिए। जिस समय प्रभाष जी का जनसत्ता अपने चरम पर था और विज्ञापन देने वालों की और पैसा दे कर खबर छपवानों वालों की लाइन लगी होती थी, प्रभाष जी ने जनसत्ता को घाटे में चलने दिया लेकिन वे सौदे नहीं किए जिनके खिलाफ वे आखिर तक लड़ रहे थे। इंडियन एक्सप्रेस के एक्सप्रेस टॉवर्स की किराएदार न्यू बैंक ऑफ इंडिया के घपलों को बैंक के निपट जाने तक उजागर करने का पूरा मौका दिया और इसके बावजूद दिया कि उनके खास मित्र और बड़े वकील लक्ष्मी मल्ल सिंघवी रामनाथ गोयनका तक पहुंच गए थे। इसके अलावा अखबार को साल में करोड़ों का विज्ञापन देने वाले मारुति उद्योग समूह के मुखिया के खिलाफ अभियान चलाया, विज्ञापन बंद हो गए मगर उन्हें परवाह नहीं थी।
बाजार के कुछ नियम होते हैं मगर पत्रकारिता की एक पूरी आचार संहिता होती है। प्रभाष जी ने इस आचार संहिता को वास्तविकता बनाने के लिए कई मोर्चे खोल रखे थे। इतना ही नहीं एक मोर्चा हिंद स्वराज का भी था। प्रभाष जी भारत की पत्रकारिता को आजादी का मंत्र देने वाले रामनाथ गोयनका की एक प्रमाणिक जीवनी लिखना चाहते थे और एक किताब आजादी के बाद की राजनीति पर लिखना चाहते थे और यह सब दो साल में यानी 75 का आंकड़ा पार करने के पहले कर लेना चाहते थे। मगर काल ने मौका ही नहीं दिया।
प्रभाष जोशी को याद करना असल में उन कामनाओं को पूरा करना होगा जिनमें से एक भी खुद उनके लिए नहीं थी। वे एक मुक्त और ताकतवर समाज चाहते थे। ऐसा समाज बने और वही प्रभाष जी को याद करे, इससे बड़ी श्रध्दांजलि दूसरी नहीं हो सकती। मगर दिक्कत यह है कि आज अखबार चलाने के साथ शराब की फैक्ट्रियां और दूसरे कारोबार करने वाले लोगों की जो जमात है और इसमें से कई अखबार को सिर्फ अपने कारोबार का कवच बनाना चाहते हैं उनके लिए उनके पत्रकार उनके धंधे के चौकीदार के अलावा कुछ नहीं होते।
प्रभाष जी की लड़ाई पत्रकार को चौकीदार बनाने के खिलाफ थी। जो यह लड़ाई जारी रखेगा वही प्रभाष जी की परंपरा का हिस्सेदार होने का हक पाएगा। प्रभाष जी के जाने के यथार्थ का आभास सिर्फ पत्रकारिता जगत को नहीं बल्कि पूरे समाज को होने में वक्त लगेगा। अभी से बहुत सारे आंदोलनकर्मी, बहुत सारे जूझारू पत्रकार और बहुत से साहित्यकार कहने लग गए हैं कि प्रभाष जी के बिना सब कुछ अधूरा लग रहा है। प्रभाष जी को भी इस संसार में जो अधूरा लगता था उसे पूरा करने की कोशिश वे कर रहे हैं। पहले भी कह चुका हूं और फिर कह रहा हूं कि प्रभाष जी वैरागी नहीं थे मगर उनकी सांसारिकता और उनके संघर्ष हमारे संसार को बेहतर और रहने लायक बनाने वाले थे। प्रभाष जी की आत्मा को भगवान कभी शांति नहीं दे। उनकी आत्मा हमारी नायक बनी रहे। आंखे बंद कर के सुनिए यह आत्मा पुकार रही है- आओ और संघर्ष के सहयात्री बनो। कोई है?

आलोक तोमर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जनसत्ता की प्रभाष जोशी के नेतृत्व वाली कोर टीम का हिस्सा रहे हैं....सम्प्रति डेटलाइन इंडिया के सम्पादक और सीएनईबी समाचार में सलाहकार संपादक हैं। आलोक जी को आप aloktomar@hotmail.com पर संदेश भेज सकते हैं।)

Tuesday, November 10, 2009

खूब अच्छा लिखो...यही आर्शीवाद मिला...


उस दिन सुबह साढ़े पांच बजे दैनिक भास्कर, भोपाल से हिमांशु का फ़ोन नंबर जब मोबाइल स्क्रीन पर चमका तो लगा कि फिर कुछ खुराफात होगी, एक दिन पहले ही हिमांशु ने सुबह साढ़े छः बजे फ़ोन कर के राधेश्याम रामायण का सस्वर पाठ कर तंद्रा भंग की थी। पर जब फ़ोन उठाया तो उधर से बिना कुछ और कहे आवाज़ आई, "भइया, प्रभाष जी गुज़र गए....!" सारी नींद जैसे काफूर हो गई और मेरे मुंह से बस यही निकला, "कब...क्या हुआ?" हिमांशु की आवाज़ आई, "भइया आलोक जी (आलोक तोमर) से पता कीजिये, यहां पीटीआई की ख़बर है....."
बिना मुंह धोये कंप्यूटर खोला और पीटीआई की वेबसाइट देखी, हिमांशु की बात सच थी.... तब भी विश्वास करना सहज न था सो टीवी ऑन किया और तमाम चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ चलती पायी। दिमाग ने जैसे कुछ देर के लिए काम करना बंद कर दिया तो इन्टरनेट पर उनकी तस्वीरें तलाश करता रहा। सुबह सवा छः के करीब अपने ब्लॉग पर एक श्रद्धांजलि की पोस्ट डाली और साढ़े छः बजे आलोक जी को फ़ोन लगाया, फ़ोन उठते ही एक अजीबोगरीब सवाल पूछा,"सर, कहां हैं आप?" उधर से उत्तर आया, "एम्स में हूं बेटा, रात से ही हूं।"
मैंने फिर कहा, "सर हिमांशु का फ़ोन आया था....क्या वाकई..." फिर दोनों ओर सन्नाटा छा गया और फिर आलोक जी की भर्राई हुई आवाज़ आई जो शायद मैंने पहली बार सुनी थी," हां, दिल का दौरा पड़ा था...मैच के बाद........मैं तो अनाथ हो गया!" मैं जब कुछ सेकेण्ड तक कुछ नहीं बोला तो आलोक जी की आवाज़ आई, "पार्थिव देह साढ़े आठ बजे तक वसुंधरा पहुंच जायेगी...." इसके बाद ज्यादा कुछ कहने की गुंजाइश ना पा के मैंने बस इतना ही कहा, "जी मैं पहुंचता हूँ..."
इसके बाद यशवंत भाई को ख़बर दी और मैं निकल पडा वसुंधरा के लिए.... प्रथम तल पर वही कमरा जहाँ उनसे मिलने वालों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव हुआ करता था.... प्रभाष जी का शरीर निर्जीव रखा था। झुक के फूल उठाये, चरणों में डाले और जैसे ही उनके पैर छुए, तुरंत याद आ गया उनका वो आर्शीवाद जो उन्होंने पहली बार चरण छूने पर दिया था...."खूब अच्छा लिखो...." और उसके बाद की हर भेंट में उन्होंने यही आर्शीवाद दिया था। भर आई आंखों को पोंछना शुरू किया तो देखा कि कमरे में तमाम लोग खड़े मेरे ही जैसे स्मृति यात्रा में खोये हुए हैं.... नीचे उतरते उतरते सब कुछ एक एक कर के आंखों के सामने घूमता जा रहा था। प्रभाष जी से पहली मुलाक़ात भोपाल में हुई थी एक कार्यक्रम में, उनसे जब गुरुजनों ने मिलवाया तो लपक कर उनके पैर छू लिए और कहा, "आपको तो बहुत पहले से जानता हूँ..." प्रभाष जी बोले,"अपन कहीं मिले हैं क्या भाई?" मैंने तपाक से कहा, "आप तो नही पर हर हफ्ते मैं आपको मिलता हूँ जनसत्ता में!" ठठा के हँसे प्रभाष जी और जोर से बोले कि ये सब लड़के बहुत आगे जायेंगे.... और पहले सर पर हाथ फेरा और फिर चिरपरिचित अंदाज़ में कांधे पर हाथ रख के काफ़ी देर खड़े छात्रों से बतियाते रहे। चलते पर चरण छुए तो वही आर्शीवाद,"खूब अच्छा लिखो!"
उस रात ऐसा लगा कि पता नहीं क्या हासिल कर लिया हो, उस गुरु के दर्शन हो गए जिसको पढ़कर लिखना सीखा। उसके बाद कई बार प्रभाष जी से मुलाक़ात हुई। तीन चार बार भोपाल में और फिर गाजियाबाद और नोएडा में। नौकरी में आने के बाद एक बार उनको फ़ोन किया तो झट से पहचान गए और बोले, "अच्युता (अच्युतानंदन मिश्र) के चेले हो ना... कहां नौकरी लगी?" मैंने जैसे ही उनको बताया कि ज़ी न्यूज़ में तो छूटते ही बोले, "भइया, अच्छा लिखते हो अखबार में क्यों नहीं गए ?" मैं जानता था कि मेरा कोई भी तर्क काम नहीं करेगा सो चुप ही रहा तो बोले,"अरे कोई बात नहीं, काम में मन तो लग रहा है ना.... दरअसल अपन ठहरे पुराने आदमी, अपन को अखबार ही समझ में आता है...." उसके बाद उनके वसुंधरा वाले घर जाकर उनसे मिला और उनकी लाइब्रेरी भी देखी.... कुमार गन्धर्व को भी सुना। साथ बैठा तो आधे घंटे पूरा जीवन वृत्त पूछ डाला, ये भी पूछ लिया कि "पत्रकारिता कर रहे हो तो इंजीनियरों से भरा परिवार संतुष्ट है?" कुमार गन्धर्व के गायन की वो बारीकियां समझायी कि मेरा संगीत का ज्ञाता होने का दंभ चूर चूर हो गया।
इसके बाद चैनल की नौकरी की कृपा से उनसे स्टूडियो में मिलना हुआ. हर बार एक नए विषय पर चर्चा होती पर एक विषय हमेशा वही रहता और वो था क्रिकेट। क्रिकेट के लिए उनका जूनून हमारी पीढी को भी मात देता था। एक बार मैंने गलती से उनके सामने सचिन की बुराई कर दी तो बोले,"भइया, सचिन का भी कोई मुकाबला है क्या और अगर केवल मैच जिता देने के लिए खिलाड़ी खेलेगा तो खेल की कला और लय दोनों ख़त्म हो जायेंगी।" और चलते पर जब भी पांव छुए फिर वही चिर-परिचित आर्शीवाद,"खूब अच्छा लिखो"
उनसे आखिरी बात अभी करीब १५-२० दिन पहले हुई, इधर तहलका में उनका स्तम्भ छपने लगा था, उसे नियमित पढ़ रहा था और उसी को पढ़ के फ़ोन किया। उस पर चर्चा करते करते जब अनायास मैंने पूछ लिया कि इस उम्र में भी आप इतना लिखते हैं और इतने जीवंत हैं तो बोले की होना ही चाहिए नहीं तो जीवन भर का श्रम और पढ़ाई लिखाई व्यर्थ है, की उम्र भर लिखते पढ़ते रहो और अंत में चुप हो के बैठ जाओ। दैनिक जागरण वालों की पैसे लेकर ख़बर छपने की कहानी सुनाने लगे और नए पुराने दोनों मालिकों की बात की। फिर बोले,"भइया, अपन को जो लगता है वही बोलते हैं....और जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखते आए हैं!" और उसके बाद जब फ़ोन रखने लगा तो बोले, "फ़ोन कर लिया करो, घर आओ तो और सुकून से बात करेंगे पर नवम्बर के दूसरे हफ्ते के बाद आना....अभी तो बहुत सफर करना है।"
और इसके बाद प्रभाष जी वाकई जीवन के सबसे लंबे सफर पर निकल गए.... और मैं इंतज़ार ही करता रह गया.... उनके घर उनके बिना बुलाए ही गया.... नियत समय से पहले ही गया.... नवम्बर के पहले हफ्ते में.... वो मिले.... सामने ही थे पर उनसे इस बार ना तो क्रिकेट पर ही बात हुई, ना ही कुमार गन्धर्व पर.... और इस बार उन्होंने एक साथ ही सबको बुला लिया था, वो जो उन्हें बचपन से जानते थे.... वो जो उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा थे.... वो जो उनके सहयोगी थे.... वो जिन्होंने उनसे सीखा.... वो जो उनके विरोधी थे.... और वो भी जो उनसे कभी नहीं मिले थे... प्रभाष जी अब आप की कलम किसी भी कागद को कारा नहीं करेगी, पर आपका लिखा पढ़ कर हमने जो सीखा है उसे हम सारे एकलव्य हमेशा याद रखेंगे... और जब तक हाथों में कलम रहेगी, जेहन में आप रहेंगे.... आखिरी में वो बात जो मुझसे हिमांशु ने कही, "हमने.... हम सब ने अपने जीवन काल में कोई महापुरुष नहीं देखा, पर हम इतना ज़रूर कह पायेंगे कि हमने प्रभाष जी को देखा था..."
मयंक सक्सेना
9310797184

Monday, November 9, 2009

प्रभाष जी का जाना ...

प्रभाष जी चले गए। सचिन और क्रिकेट के दीवाने से टीम इंडिया की ऐसी रुसवाई देखी नही गई। सचिन जब आउट होता है और इंडिया हार जाती है तो क्रिकेट प्रेमी अक्सर दर्शक दीर्घा या कमरा छोड़ जाते हैं। प्रभाष जी दुनिया ही छोड़ गए। अगर वो होते तो निश्चित तौर पर सचिन की इस बेमिसाल पारी को कई मिसालें और मिलतीं।

मृत्यु से कुछ घंटों पहले ही वे जनसत्ता लखनऊ की उसी कुर्सी पर बैठे थे जहाँ बैठकर मैंने इस संस्थान में पत्रकारिता के गुर सीखे थे। यहाँ के ब्यूरो चीफ अम्बरीश कुमार की तबियत नासाज़ थी तो उनका हाल जानने आए थे, जिद करके और जाते-जाते अभिभावक की तरह झिड़की भी दे गए थे "अपना ख्याल रखा करो" । इत्तेफाक से जब मैंने फ़ोन किया तो पत्रकारिता के बीते दौर की चर्चाएं चल ही रहीं थीं। मैंने न जाने कितने ही लोगों को बताया की आज जोशी जी लखनऊ में थे। कुछ ही वक्त बाद जब उनके जाने की ख़बर सुनी तो यकीं ही नही हुआ।

जनसत्ता ने हमेशा मुझे अपनी तरफ़ खीचा है। मित्र मंडली में जब मैं जनसत्ता जाने के सपने की बात करता था तो दोस्त यही कहते थे की वहां जाना बुढापे में पहले खूब काम कर लो वहां वानप्रस्थ होता है। मुझे जल्दी थी। प्रभाष जी के स्वप्न के साथ जुड़ने की उनके जीवनकाल में ही। अलोक तोमर साहब या अम्बरीश जी को जब प्रभाष जी के विषय में बात करते सुनता हूँ तो रश्क होता है। प्रभाष जी उस जनसत्ता परिवार के अभिभावक थे और मैं इस परिवार का हिस्सा बनना चाहता था। प्रभाष जी जल्दी चले गए या कहें मैंने ही देर कर दी। हो सकता है की कभी जनसत्ता पहुच जाऊं लेकिन उस आकर्षण और जूनून में एकाएक कमी आ गई है। क्यूंकि वो प्रभाष जी से ही था। जोशी जी के बिना जनसत्ता कैसा होगा इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

जिस साल बैचके सब लोग हिन्दुस्तान, सहारा, अमर-उजाला और जागरण में इंटर्नशिप करने गए थे मैंने जनसत्ता लखनऊ को चुना था इसलिए ताकि जनसत्ता के अनुभव पर इतरा सकूँ, भले ही ये इन्टर्न के तौर पर ही क्यूँ न हो।

मेरा मिजाज़ भी जनसत्ता के ही करीब था, लखनऊ में जागरण और हिन्दुस्तान की रौनक के सामने भले ही ये उतना चमकीला न दीखता हो लेकिन इसका अलग रंग आपको ज़रूर नज़र आएगा। जैसे की मैं बैच में चमकीला नही था लेकिन कुछ अलग पहचान तो थी ही।

इन्टर्न के दौरान ही पहली बार प्रभाष जी से मिला था। ह्रदय नारायण दीक्षित की किताब के लोकार्पण कार्यक्रम में। हिंद स्वराज और यंगिस्तान पर अद्भुत बोले थे। उसके बाद विश्वविद्यालय में हमारी फेयरवेल पार्टी में आए थे और बोल गए थे की आप भारत के सबसे अच्छे पत्रकारिता संस्थान के हिस्से हैं।

सत्रह नवम्बर को जनसत्ता का जन्मदिन होता है। पत्रकारिता के विद्यार्थी तो प्रभाष जी के हमेशा कृतज्ञ रहेंगे की उन्होंने हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों को एकमात्र पढने लायक अखबार दिया। गज़ब अखबार। जो रिक्शे वाले और गाय की फोटो फ्रंट पेज पर लगाता है। अभी तक पूरी हेडिंग छापता है। उल्टे सीधे विज्ञापनों से दूर है। फिल्मी चर्चाओं में वक्त नही बरबाद करता। संस्कृति पत्रकारिता को अभी तक गंभीर विषय मानता है। साजिद रशीद और तरुण विजय को एकदम ऊपर नीचे छापता है.ये सब प्रभाष जी का दिया हुआ है। सम्पादक वही थे सही मायनों में। जब तक वो रहे मालिक नही चम्बल में डाकुओं का समर्पण और बढ़ी तनखा लेने से इनकार केवल वही कर सकते हैं। नियमों से समझौता नही किया। पत्रकारिता की पूरी एक खेप तैयार की। अलोक तोमर जनसत्ता से जाने के बाद भी उनके भक्त हैं। अम्बरीश जी को मिलने का वक्त नही दिया क्यूंकि मालिक की धौंस लेकर आए थे।

चौथे थाने का ये थानेदार अपने अन्तिम वक्त तक अपराधियों को शिकंजे में लेता रहा। कागद कारे जैसा वृहद् कालम उम्र की इस अवस्था में लिख पाना उन्ही के बस की बात थी। प्रभाष जी के भारत-ऑस्ट्रलिया मैच पर लिखने की उम्मीद थी जो अधूरी रह गई। इस दौर में मैंने पत्रकारिता का एक ही महापुरुष देखा और वो हैं प्रभाष जी। इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी उनके निधन को खूब-खूब कवर किया। बहुत दिनों बाद उसकी भूमिका से खुशी हुई। प्रभाष जी आपकी सबसे ज्यादा कमी अगर किसी को खलेगी तो वो पत्रकारिता की तरुण पीढी है...

Friday, November 6, 2009

युग का अवसान .....


कल देर रात हिन्दी पत्रकारिता के युग पुरूष प्रभाष जोशी का देहावसान हो गया। केव्स संचार की ओर से उनको भावभीनी श्रद्धांजलि.....हिन्दी पत्रकारिता के लिए ये राह भटकने के बाद दिक् सूचक के खो जाने जैसा है....प्रभाष जी हम सब आज आप के कारे किए कागदों की वजह से पत्रकार हैं...आपको पढ़ पढ़ के लिखना सीखा है....और आपको याद याद कर कर के लिखते रहेंगे.....

Thursday, October 22, 2009

साजिशों का दौर....

वर्तमान परिदृश्य को देखने से तो लगता है भारत में होने वाली तमाम आतंकी गतिविधियाँ ,माओवादी छापामारी के तहत पुलिस वालो की हत्या लालगढ़ में लाल का आतंक ,तालिबान की भारत पर नजर से तो लगता है की ये सारी गतिविधियों के पीछे कोई बहुत बड़ी साजिश रची जा रही है . दरअसल भारत बड़ी तेजी के साथ विकास कर रहा है और इस विकास में अमेरिका भारत के साथ हर कदम पर खड़ा है भारत और अमेरिका न केवल सामरिक बल्कि आर्थिक ,सामजिक ,राजनैतिक हर छेत्र में बहरत के साथ सहयोगात्मक रवैया अपना रहा है साथ साथ विश्वमंच पर भारत की भागीदारी बढ़ी है वाही पकिस्तान में संघर्ष की स्थिति बनी है दो देश साथ आजाद हुए एक में लोकतंत्र ,दूसरे में आतंकतंत्र ये वज़ह है जिससे पकिस्तान बहुत अधिक चिंतित है पकिस्तान के साथ साथ कई और देशों में भी ये विकास आँख की किरकिरी बना हुआ है इसी वज़ह से भारत को हर तरफ से घेरने की तैयारी चल रही है खुफिया विभाग के अनुसार भारत में एक बार फिर से मुबई २ की तैयारी चल रही है वहीँ तालिबान भारत के सरहदी इलाकों तक पहुच बना रहा है इधर लाल का साया अपना लाल रंग दिखा ही रहे है लगभग १८ राज्यों में चुनोती दे रहे है इस बात के पुख्ता प्रमाण मिल चके हैं की इस साए को चीन का सहयोग मिल रहा है चीन इसे आर्थिक ,सामरिक ,वैचारिक हर छेत्र में सहयोग देता है और इसकी वजह से ये अपना आतंक भारत में फैला रहे है दरसल पहले ये मदद नेपाल से होते हुए भारत तक पहुँचती है इन पर लगाम लगाने के लिए गृह मंत्री ने जो कदम उठाये है वो कड़े तो हैं और सही भी है नक्सलियों के लिए विशेष बल ,वायु सेना को दी गयी मंजूरी से नक्सलियों के हौंसले पस्त हो सकते है नवम्बर से इन कारवाही हो सकती है यानी लाल साये को जलाने की तैयारी हो चुकी है अगर इस अमल हुआ तो तो लाल का आतंक ख़तम ही हो जायेगा हलाकि इसको रोकने के प्रयास चल रहे है मेरे ख़याल से जो भी इसे रोकने की कोशिश करेगा वो निश्चित ही देशद्रोही होगा इससे नक्सलियों के हौंसले पस्त हो जायेगे लेकिन भारतीय माओवाद चीन से अत्यधिक प्रभावित है इसलिए भारतीय माओवादी इससे बचने के लिए चीन की मदद ले रहे है इसी वजह से भारतीय सीमाओं पर चीन ने दखल देना शुरू कर दिया है इस दखल से भारत अपना पूरा ध्यान आपने सरहदी इलाको की सुरछा में लगा देगा और नक्सलियों पर कार्यवाही रूक जायेगी मैं अपने लेख में यही ध्यान दिलाना चाहता हूँ की जब चीन का गृह मंत्रालय भारतीय माओवादियों को पत्र व्यवहार के द्वारा निर्देशित कर सकता है तो ये संभव है की ये कार्यवाही को टालने की कोशिश हो ।इसी कारण चाइना, पकिस्तान, नेपाल तीनो तरफ से असहयोगात्मक रवैया देखने को मिल रहा है चीन ने अचानक ही नहीं तवांग -तवांग ,अरुणांचलअरुणांचल कर रहा है चीन का अचानक से ये राग अलापना ही इस बात का सबूत है की माओवादियों की कार्यवाही से जरूर कोई लेना- देना है ,कुल मिलाकर देखा जाये तो बड़े तरीके से रायता तैयार किया जा रहा है मगर इस रायते को फैलने से रोका जाना चाहिए
- कीर्ति भास्कर
(लेखक ने अभी अभी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है.....आप इनसे thinktank.guru@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )

Tuesday, October 20, 2009

सोर्स नही तो कोर्से क्यूँ ?

विवेक मिश्रा
साथियो आज पत्रकारिता में सोर्स, जुगाड़ और माखन बाजी इतने प्रचलित शब्द हो गए है की लगता है बिना इन्हे जाने आप पूर्ण पत्रकार नही हो सकते कुछ आदि ईमानदारों को पत्रकारिता करने की जगह मिलती भी है तो उन्हें वो जगह दी जाती है जँहा वे एक टाइपिंग बाबू से ज़्यादा कुछ नही ,पत्रकारिता में नई पौध को कुछ आला मीडिया कर्मियों के द्बारा यह कहा जाता है सोर्स नही तो कोर्से क्यूँ किया ,अब यह परिभाषा नई पौध को जेहन में डाल कर मीडिया फील्ड में आना चाहिए ,देश के चार स्तंभों में हर स्तम्भ में अयोग्यो की सरकार है ,यह बात किसी से छुपी नही है बावजूद इसके की कुछ ईमानदार और सच्चे लोग है जो देश को बचाए है मुझे कभी -कभी कार्लायन के ये कथन याद आते है की विश्व में एक बुद्धिमान के साथ नौ मूर्ख लोग हमेशा रहते है ,फील्ड में आओगे तो पता चलेगा यह जुमला मीडिया के लिए आज टैग लाइन बन गयी है जो नई पौध के मानसिक शोषण से ज्यादा कुछ भी नही है ,मै मानता हूँ की मीडिया में पूरे विश्व में यही चल रहा है लेकिन चयन प्रक्रिया जो मुख्य आधार होता है किसी भी संस्थान को सृजित करके उचाइंयो पर ले जाने का वही गायब होती आज मीडिया के फील्ड में साफ़ दिखायी देती है ,और जब तक मीडिया अपनी चयन प्रक्रिया में सुधार कर योग्यता को तरजीह नही देगी तब तक मीडिया की छवि और कृति सुधर नही सकती तथा ख़बर एक मिशन कभी नही बन सकती ,और कुछ विश्व भर में बनी ये फिल्मे जो कही मीडिया के बहादुरी की दास्ताँ बताती है तो कही मीडिया के अन्दर का सच आप चाहे तो इन्हे पढ़ कर देखे भी.............................

FILM- ALL THE PRESIDENTS MEN, DIRECTED BY-ALLEN PAKOOLA,
यह फ़िल्म वाटर गेट के स्कैंडल को दुनिया के सामने लाने में वाशिगटन पोस्ट के पत्रकारों कार्ल बर्नस्टाइन ,बोब वुडवर्ड की यात्रा की कहानी है डस्टिन हाफ मैन और रॉबर्ट रेडफोर्ड के अभिनय ने इस पूरी फ़िल्म को गहरे आयाम दिए है ,पत्रकारिता के गहरे गंभीर काम काम को सामने लाती यह एक बेहतरीन फ़िल्म है ।

FILM-A CRY IN THE DARK ,DIRECTED BY-FRED SHIVASKI,
मीडिया द्बारा ख़ुद जज बनने को कहती यह फ़िल्म मेरिल स्ट्रीप और सैम नील के अदभुत अभिनय को दिखाती है ,यंहा एक माँ के अपने बच्चे के मारे जाने का अपराधी साबित करता मीडिया है तो दूसरी तरफ़ एक माँ की पीड़ा और उसका मजबूत इरादा है एक सत्य घटना पर आधारित यह कहानी जीवन के बहूत से पहलूँ से साक्षात्कार कराती है

FILM-SHATTERD GLAAS,DIRECTED BY-BILE रे
रोलिंग स्टोन के पत्रकार स्टेवन ग्लास की जिन्दगी के उतार चढावो को दिखाती यह कथा ,सत्य घटना है रिपोर्टर को जब यह पता चलता है की उसका काम सच कम और झूठ पर ज्यादा आधारित है तो उसे समय की एक गहरी टूटन को दिखाती यह फ़िल्म पत्रकारिता के सभी पहलूँ को खूबसूरती से दिखाती है

FILM-THE FRONT PAGE,DIRECTED BY-BILEE बिल्डर
सम्पादक और रिपोर्टर के रिश्ते और अखबार की सुर्खियों की तलाश पर तंजिया नज़र डालती यह फ़िल्म वाल्टर और जैक लेमन की जोड़ी ने खूब अच्छे से अभिनय किया है रिपोर्टर, सम्पादक के द्वारा दिए लालच में कैसे फसता है दिलचस्प तरीके से फिल्माई गयी है

FILM-NEW DELHI TIMES ,DIRECTED BY -ROMESH शर्मा
पत्रकारिता और राजनीति के गहरे रिश्तो की पड़ताल करती कहानी ,वर्तमान की तस्वीर साफ़ करती है कहानी का मूल ताकत की तलाश में इस्तेमाल होना बखूबी दिखाया गया है भारतीय कलाकार -शशिकपूर शर्मीला ,मनोहर सिंह ,कुलभूषण खरबंदा ने अपना शानदार अभिनय दिया ह

FILM-THE KILLING FIELDS ,DIRECTED BY-RONALD JOF
कम्बोडिया में आतताई शासन के दौरान तीन पत्रकारों जिनमे एक कम्बोडियन एक अमेरिकन और एक ब्रिटिश है अनुभवों पर आधारित है आतंक और हत्याओं के बीच जीवन को सामने लाती है यह कृति

FILM-CITIZEN KEN ,DIRECTED BY -AARSAN VELSविश्व सिनेमा में आर्सन वेल्स के द्बारा लिखित और अभिनीत भी है,व्यक्तित्व को परत पर परत जिस तरह से खोलती है वह एक चमत्कार की तरह दिखाई देता है ,यह फ़िल्म साईट एंड साउन्द पत्रिका के द्बारा विश्व की श्रेष्ठ फ़िल्म ठहराई गयी है

FILM -THE INSIDER ,DIRECTED BY-MICHEL MAN
अमेरिका के प्रसिद्ध प्रोग्राम 60 मिनटस की एक कहानी जिसमे तम्बाकू उद्योग का परदाफाश हुआ था को आधार बनाकर यह फ़िल्म बनायी गयी है

FILM-REDS,DIRECTED BY-VAAREN BITE
पत्रकार जोन रीड की रुसी क्रान्ति पर लिखी पुस्तक (TEN DAYS THAT SHOOK THE WORD )पर आधारित है वामपंथी सोच और रूस के क्रांति की कथा बड़े सजीव तरीके से सामने लाता है

FILM -THE ABSENS OF MAILIS ,
पाल न्यूमन के द्बारा अभिनीत यह फ़िल्म एक माफिया पुत्र को हत्या के इल्जाम में फ़साने की कहानी है अखबार की रिपोर्टर द्बारा अपनी कहानी को सच बनाने की कोशिशों में नैतिकता को धुंधलाती सीमओं का आख्यान है यह फ़िल्म..जारी रहेगा ..wwwjungkalamkiblogspotcom

गूगल बाबा का वरदान - हिन्दी टंकण औजार

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